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Tuesday, 14 July, 2026
होमफीचरदिल्ली के शाहीन बाग में SIR का हाल: दस्तावेज़ जुटाने की भागदौड़, अफवाहों से बचने की कोशिश

दिल्ली के शाहीन बाग में SIR का हाल: दस्तावेज़ जुटाने की भागदौड़, अफवाहों से बचने की कोशिश

सीएए विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा केंद्र रहे शाहीन बाग में एक बार फिर लंबी कतारें, लोगों की चिंता भरी बातें और दस्तावेज़ों के ढेर दिखाई दे रहे हैं.

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नई दिल्ली: पिछले 60 दिनों से शगुफ्ता अपने घर, शाहीन बाग और पुरानी दिल्ली के बीच लगातार चक्कर लगा रही हैं. उनके हाथ में करीब पचास साल पुराने दस्तावेज़ों और रिकॉर्ड की फोटोकॉपी का एक पुलिंदा रहता है. 50 साल की शगुफ्ता एक बूथ से दूसरे बूथ तक जाकर 2002 की मतदाता सूची में अपने माता-पिता का नाम ढूंढ़ रही हैं. उनके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आज उसी सूची में दर्ज उनके नाम उस प्रक्रिया को पूरा करने की कुंजी बन गए हैं, जिसने पिछले दो महीनों से उनकी पूरी ज़िंदगी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है.

मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा शुरू किया गया स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) अभियान अब दिल्ली में भी शुरू हो चुका है, लेकिन इसकी प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच काफी भ्रम और गलत जानकारी फैली हुई है, जिससे नागरिकों में चिंता बढ़ गई है.

इस प्रक्रिया के तहत मौजूदा मतदाताओं को यह साबित करना होगा कि उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम 2002 की संदर्भ मतदाता सूची में दर्ज था. लेकिन यह काम जितना आसान सुनाई देता है, हकीकत में उतना है नहीं.

प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट जानकारी की कमी के अलावा, शगुफ्ता जैसे लोग तरह-तरह की अफवाहों से भी जूझ रहे हैं. दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में एसआईआर बूथों और फोटोकॉपी की दुकानों के बाहर लोग दस्तावेज़ों से भरी फाइलें सीने से लगाए अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं और इस बात पर चर्चा करते रहते हैं कि अगर समय पर प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो क्या होगा.

भीड़ की बातचीत में कुछ आवाज़ें बार-बार सुनाई देती हैं—“मुसलमानों को बांग्लादेश या पाकिस्तान भेज दिया जाएगा.”, “हिंदुओं को कोई दिक्कत नहीं होगी.”, “जिन लोगों का नाम मतदाता सूची से हट जाएगा, उनके लिए डिटेंशन सेंटर बनाए जाएंगे.”, “हमने पूरी ज़िंदगी यहीं बिताई है, और अब हमें यह साबित करना पड़ रहा है कि हम इसी देश के हैं.”

साल 2019-20 में शाहीन बाग नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ हुए देश के सबसे बड़े महिला-नेतृत्व वाले आंदोलनों का केंद्र था. करीब छह साल बाद, अब उसी इलाके के लोग अपने मताधिकार को बचाने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ जुटाने में लगे हुए हैं.

एसआईआर की प्रक्रिया में उलझी कई पीढ़ियां

शगुफ्ता की मुश्किल सिर्फ उन्हीं तक सीमित नहीं है. उनके घर में एक साथ दो पीढ़ियां एसआईआर की प्रक्रिया में फंसी हुई हैं.

जहां शगुफ्ता पुरानी दिल्ली की गलियों में अपने माता-पिता के ऐसे पुराने रिकॉर्ड तलाश रही हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि उन्होंने 2002 में मतदान किया था, वहीं उनके पति उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित अपने पैतृक घर में इसी तरह के दस्तावेज़ ढूंढ़ रहे हैं. दूसरी ओर, उनकी 18 साल की बेटी अपने पहले वोटर आईडी कार्ड का बेसब्री से इंतज़ार कर रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि 29 जुलाई तक गणना (एन्यूमरेशन) फॉर्म जमा करने की अंतिम तारीख से पहले उनका वोटर आईडी बन जाएगा.

शगुफ्ता की भाभी, जिन्होंने अपने पति को खो दिया है और हाल ही में दुबई से वापस लौटी हैं, उनके लिए यह प्रक्रिया और भी ज़्यादा जटिल हो गई है.

शगुफ्ता ने कहा, “मेरे परिवार की दो पीढ़ियां एक ही फॉर्म भरने के दौरान अलग-अलग तरह की परेशानियों का सामना कर रही हैं.” उनका कहना है कि सिर्फ उनका परिवार ही नहीं, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया से गुज़र रहा लगभग हर व्यक्ति परेशान, थका हुआ और पिछले कई महीनों से संघर्ष कर रहा है.

उन्होंने कहा, “हमें नहीं पता कि एसआईआर देश की कौन-सी समस्या का समाधान करेगा, लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने लोगों की ज़िंदगी में भारी उथल-पुथल मचा दी है.”

शगुफ्ता उन लोगों में शामिल थीं जिन्होंने 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ शाहीन बाग आंदोलन में हिस्सा लिया था. उनका कहना है कि एसआईआर की प्रक्रिया उससे अलग है.

उन्होंने कहा, “2019 के आंदोलन में हम उन छात्रों और अपने समुदाय के लोगों के समर्थन में खड़े हुए थे, जिनके साथ मारपीट हुई थी, लेकिन यह मामला अलग है. एसआईआर की प्रक्रिया जनगणना जैसी लगती है, फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें हमें यह सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है कि हमारा नाम मतदाता सूची से हटाया न जाए.”

भ्रम, अफवाहें और डर

शाहीन बाग के एफ ब्लॉक में स्थित रफीक ग्लोबल स्कूल का परिसर हर दोपहर एक अलग ही रूप ले लेता है. दोपहर करीब दो बजे के बाद स्कूल अस्थायी एसआईआर कैंप में बदल जाता है, जहां शाम सात बजे तक विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया चलती है. तीन बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) फॉर्मों के बंडल लेकर पहुंचते हैं, जबकि स्वयंसेवक स्कूल परिसर में प्लास्टिक की मेज़ें और कुर्सियां लगाते हैं.

कभी CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का सेंटर माने जाने वाले शाहीन बाग में एक बार फिर लंबी लाइनें, बेचैनी भरी बातें और कागज़ों का ढेर दिख रहा है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
कभी CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का सेंटर माने जाने वाले शाहीन बाग में एक बार फिर लंबी लाइनें, बेचैनी भरी बातें और कागज़ों का ढेर दिख रहा है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
शाहीन बाग के रफीक ग्लोबल स्कूल में बनाया गया एक कामचलाऊ SIR कैंप | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
शाहीन बाग के रफीक ग्लोबल स्कूल में बनाया गया एक कामचलाऊ SIR कैंप | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

कुछ ही मिनटों में स्कूल का आंगन लोगों से भर जाता है. किसी के हाथ में पुराने पंच-फोल्डर में रखे दस्तावेज़ों का बंडल है, तो कोई अपने मोबाइल में प्रमाणपत्रों की स्कैन कॉपी देख रहा होता है. बुजुर्ग लोग अधिकारियों से जानकारी लेते हैं, वहीं उनके परिवार के युवा सदस्य एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक चक्कर लगाते रहते हैं, ताकि फॉर्म पहली बार में ही सही तरीके से भर सकें.

धीरे-धीरे पूरा शिविर सवाल-जवाब से गूंजने लगता है. लोग एक के बाद एक अपनी चिंताएं सामने रखते हैं और बीएलओ उनके जवाब देते हैं. लंबा इंतज़ार और उमस भरी गर्मी से परेशान कुछ लोग अपनी बारी आने तक उसी फॉर्म से हवा करते रहते हैं, जिसे उन्हें जमा करना है.

40 साल की तनवीर फातिमा बेंच पर बैठकर अपनी नानी का विवरण सावधानी से भरते हुए बताती हैं, “हम बस चाहते हैं कि यह प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी हो जाए. लोग कुछ भी कहें, लेकिन मुसलमानों के लिए अपने मतदान का अधिकार खोने का जोखिम उठाना संभव नहीं है. हम ऐसा खतरा नहीं मोल ले सकते.”

कैंप के बाहर एक बेंच पर बैठीं फातिमा रूमाल से खुद को हवा कर रही हैं. उनके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी, जन्म प्रमाणपत्र और परिवार के सदस्यों की पासपोर्ट आकार की तस्वीरों से भरे कई फोल्डर रखे हैं. उनके आसपास लोग डिटेंशन सेंटर, देश से बाहर भेजे जाने और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने जैसी बातों पर चर्चा कर रहे हैं.

तनवीर फातिमा उन अफवाहों को याद करती हैं जो उन्होंने सुनी हैं कि अगर लोग SIR प्रोसेस पूरा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें दूसरे देशों या डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाता है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
तनवीर फातिमा उन अफवाहों को याद करती हैं जो उन्होंने सुनी हैं कि अगर लोग SIR प्रोसेस पूरा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें दूसरे देशों या डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाता है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

फातिमा ने कहा, “मेरे परिवार के बाकी सभी लोगों ने अपने फॉर्म जमा कर दिए हैं. सिर्फ मेरा ही बचा है, क्योंकि ज़रूरी दस्तावेज़ जुटाने में मुझे करीब 15 दिन लग गए.”

उन्हें 2002 की मतदाता सूची में अपने माता-पिता का नाम नहीं मिला. इसलिए उन्हें उत्तर प्रदेश के मेरठ से अपनी दिवंगत नानी के रिकॉर्ड ढूंढ़ने पड़े. मेरठ में उनके रिश्तेदार संबंधित बीएलओ के पास गए और उनकी नानी से जुड़े सभी दस्तावेज़ जुटाए, जिनमें 2002 की मतदाता सूची, वोटर आईडी, आधार कार्ड और परिवार के राशन कार्ड की प्रतियां शामिल थीं.

फातिमा ने कहा, “लोग बार-बार कहते हैं कि अगर मैंने समय पर फॉर्म जमा नहीं किया तो मुझे डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाएगा. मुझे नहीं पता कि यह सच है या नहीं, लेकिन रोज़ ऐसी बातें सुनकर डर लगने लगता है.”

दस्तावेज़ों की तलाश

भ्रम और अफवाहों के इसी माहौल के बीच 53-वर्षीय तारिक खान स्कूल की सीढ़ियों के एक कोने में अपने दस्तावेज़ों का फोल्डर लेकर बैठे हैं. बाकी लोगों के मुकाबले उन्हें शुरू में लगा था कि यह प्रक्रिया उनके और उनके परिवार के लिए आसान होगी. उनके पिता दूरसंचार विभाग (डीओटी) में केंद्र सरकार के कर्मचारी थे. उन्हें विश्वास था कि इस वजह से परिवार के रिकॉर्ड आसानी से मिल जाएंगे, लेकिन ऑनलाइन खोजने के बावजूद उन्हें 2002 की संदर्भ मतदाता सूची में अपने माता-पिता का नाम नहीं मिला.

खान बताते हैं, “मुझे लगा था कि मैं अपने पैतृक शहर पटना जाऊंगा, वहां से अपने दिवंगत माता-पिता और दादा-दादी के दस्तावेज़ ले आऊंगा और आसानी से फॉर्म भर दूंगा. लेकिन वहां पहुंचने के बाद सबसे बड़ी मुश्किल सामने आ गई.”

दस्तावेज़ों की तलाश में उन्होंने सिर्फ संबंधित बीएलओ से ही नहीं, बल्कि गांव के मुखिया और पुराने पड़ोसियों से भी मदद मांगी. एक हफ्ते से ज़्यादा समय तक खोजबीन करने के बाद भी उन्हें कुछ नहीं मिला और उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा.

इसके बाद उन्होंने अपने इलाके के अलग-अलग बीएलओ से मिलकर पूरे एक हफ्ते तक इस समस्या का हल तलाशने की कोशिश की.

53 साल के तारिक खान स्कूल की सीढ़ियों के एक कोने पर बैठे हैं. उन्हें उम्मीद थी कि यह प्रोसेस आसान होगा, खासकर इसलिए क्योंकि उनके पिता एक सरकारी ऑफिसर थे, लेकिन जो उन्हें एक आसान काम लगा था, वह एक अनचाही चुनौती बन गया | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
53 साल के तारिक खान स्कूल की सीढ़ियों के एक कोने पर बैठे हैं. उन्हें उम्मीद थी कि यह प्रोसेस आसान होगा, खासकर इसलिए क्योंकि उनके पिता एक सरकारी ऑफिसर थे, लेकिन जो उन्हें एक आसान काम लगा था, वह एक अनचाही चुनौती बन गया | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

खान कहते हैं, “करीब 15 दिन तक दफ्तर का काम छोड़कर इधर-उधर भटकने के बाद मुझे आखिरकार सेल्फ-डिक्लेरेशन वाले विकल्प के बारे में पता चला.”

इस प्रावधान के तहत अगर आवेदक का अपना नाम 2022 की मतदाता सूची में दर्ज है, तो वह फॉर्म जमा कर सकता है. हालांकि, इसके बाद उसके आवेदन की अलग से जांच की जाएगी.

खान ने गुस्से में कहा, “मेरे पिता केंद्र सरकार के कर्मचारी थे, फिर भी मुझे उनका नाम मतदाता सूची में नहीं मिला. सिर्फ एक फॉर्म भरने के लिए मुझे एक राज्य से दूसरे राज्य तक जाना पड़ा. अगर मेरी यह हालत है, तो आप सोच सकते हैं कि बाकी लोग किन मुश्किलों से गुजर रहे होंगे.”

यह कहते हुए उन्होंने लंबी कतारों में खड़े लोगों की ओर इशारा किया.

एसआईआर की प्रक्रिया से बीएलओ भी परेशान

जहां एक ओर लोग एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर असमंजस में हैं, वहीं दूसरी ओर वे अपनी तमाम शंकाएं लेकर लगातार बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) के पास पहुंच रहे हैं. कोई पूछता है, “मेरे पति दुबई में रहते हैं. क्या मैं उनकी ओर से फॉर्म ले सकती हूं और भर सकती हूं?” तो कोई जानना चाहता है, “मुझे अपनी जानकारी किस कॉलम में भरनी है?” कुछ लोग पूछते हैं, “मेरा बीएलओ कौन है और मुझे फॉर्म कहां मिलेगा?” वहीं कुछ लोगों के सवाल होते हैं, “क्या मैं अपनी नानी के दस्तावेज़ इस्तेमाल कर सकता हूं?” या “मुझसे फॉर्म गलत भर गया है, क्या मुझे दूसरा फॉर्म मिल सकता है?”

ऐसे सवालों का सिलसिला लगातार चलता रहता है. एक ही तरह के सवाल बार-बार सुनकर कई बीएलओ झुंझला जाते हैं, जबकि कुछ अधिकारी धैर्य के साथ लोगों की हर शंका का समाधान करते हैं.

बीएलओ यानी बूथ लेवल अधिकारी चुनाव आयोग के जमीनी स्तर के कर्मचारी होते हैं, जिनकी जिम्मेदारी मतदाता सूची को अपडेट करना होती है. आम तौर पर वे सरकारी स्कूलों के शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, पंचायत कर्मचारी या दूसरे सरकारी अधिकारी होते हैं, जिन्हें अपनी नियमित नौकरी के साथ चुनाव संबंधी जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं.

ऐसे ही एक बीएलओ हैं अफजल, जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया में लाइब्रेरियन हैं. पिछले तीन महीनों से वे शाहीन बाग के एफ ब्लॉक में बीएलओ की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. एसआईआर अभियान के तहत वे सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करते हैं. इसके बाद नमाज अदा करते हैं और फिर शाम तक शिविर में बैठकर लोगों को फॉर्म भरने और प्रक्रिया समझने में मदद करते हैं.

अफजल कहते हैं, “पूरी प्रक्रिया में हमें घर-घर जाकर फॉर्म बांटने होते हैं, लेकिन यह सुनने जितना आसान नहीं है. कई बार लोग दरवाजा नहीं खोलते, कई बार घर पर कोई नहीं मिलता और कई बार पता चलता है कि परिवार वर्षों पहले वहां से जा चुका है.”

इसी वजह से सुबह की डोर-टू-डोर मुहिम के बाद ये कैंप लगाए जाते हैं, ताकि जिन लोगों से घर पर मुलाकात नहीं हो सकी या जिन्हें प्रक्रिया को लेकर कोई सवाल हो, वे यहां आकर फॉर्म जमा कर सकें और अपनी शंकाएं दूर कर सकें.

एफ ब्लॉक के कैंप में अफजल स्कूल के बरामदे में प्लास्टिक की कुर्सी पर बिना पंखे के बैठे रहते हैं. उनके सामने रखी मेज़ पर फॉर्मों का ढेर लगा रहता है. दिल्ली की उमस भरी गर्मी के बीच भी वे लोगों के सवालों का लगातार जवाब देते रहते हैं.

अफजल की दिनचर्या उन कई बीएलओ की अतिरिक्त जिम्मेदारियों की झलक दिखाती है, जो तय समय से कहीं अधिक काम कर रहे हैं. उनके शांत और धैर्यपूर्ण व्यवहार के कारण आसपास के दूसरे बूथों के लोग भी सलाह लेने उनके पास पहुंच जाते हैं.

अफज़ल शाहीन बाग में “BLO हीरो” बन गए हैं. वह शांत और विनम्र हैं और न सिर्फ अपने ब्लॉक के बल्कि दूसरे ब्लॉक के लोगों के सवालों को हल करने में भी मदद करते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
अफज़ल शाहीन बाग में “BLO हीरो” बन गए हैं. वह शांत और विनम्र हैं और न सिर्फ अपने ब्लॉक के बल्कि दूसरे ब्लॉक के लोगों के सवालों को हल करने में भी मदद करते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

अबुल फज़ल एन्क्लेव के एक निवासी, जो शाहीन बाग से करीब ढाई किलोमीटर दूर रहते हैं, बताते हैं, “मुझे पता है कि मेरे बीएलओ कोई और हैं, लेकिन मुझे कुछ बातें समझनी थीं, इसलिए मैं अपना फॉर्म दिखाने और जांच कराने इनके पास आया हूं.”

अफजल का काम सिर्फ मैदान में लोगों से मिलने तक सीमित नहीं रहता. घर लौटने के बाद भी उन्हें फॉर्मों को डिजिटल रूप से अपलोड करना होता है. उनके पास जमा होने वाले हर फॉर्म को स्कैन करके मोबाइल ऐप के जरिए अपलोड करना पड़ता है.

वे बताते हैं, “एक फॉर्म को डिजिटल रूप में अपलोड करने में करीब 15 से 20 मिनट लग जाते हैं. अगर बीच में कोई तकनीकी दिक्कत आ जाए, तो पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ती है.”

मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान राजनीतिक दल भी अपने प्रतिनिधि या बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) नियुक्त करते हैं, ताकि वे प्रक्रिया में सहयोग कर सकें. लेकिन अफजल का कहना है कि उनकी भागीदारी बहुत कम रहती है.

वे कहते हैं, “या तो बीएलए आते ही नहीं हैं और अगर आते भी हैं तो सिर्फ कुछ मिनट के लिए, ताकि उनकी मौजूदगी दर्ज हो जाए. इस गर्मी और बारिश में कोई काम नहीं करना चाहता.”

शाहीन बाग से करीब 20 किलोमीटर दूर पुरानी दिल्ली में कुछ बीएलओ ने लोगों तक पहुंचने का अलग तरीका अपनाया है. उन्होंने रात 9 बजे से 11 बजे तक स्पेशल कैंप लगाने शुरू किए हैं, ताकि दिनभर काम पर रहने वाले लोग भी आसानी से आ सकें.

पुरानी दिल्ली के एक बीएलओ, जिन्होंने अपना नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बात की, बताते हैं, “दिन में जब हम घर-घर जाते हैं, तब कई लोग काम पर होते हैं या जिस व्यक्ति से मिलना होता है वह घर पर नहीं मिलता. इसलिए रात में मंदिर के पास तय जगह पर बैठते हैं और लोगों से कहते हैं कि काम खत्म होने के बाद आकर अपना फॉर्म ले जाएं.”

उनके मुताबिक, रात के इन शिविरों में अब पहले से ज्यादा लोग आने लगे हैं.

इसके बावजूद, कई लोगों को एसआईआर की प्रक्रिया पूरी करने के लिए अपना काम छोड़ना पड़ रहा है. शगुफ्ता, जो अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए घर से ही ब्यूटी पार्लर चलाती हैं, पिछले दो महीनों से अपना काम बंद किए हुए हैं क्योंकि उनका पूरा समय ज़रूरी दस्तावेज़ जुटाने में बीत रहा है.

उन्होंने कहा, “मैं अपने काम के बारे में तभी सोचूंगी, जब यह पूरी प्रक्रिया खत्म हो जाएगी और मेरे परिवार का हर सदस्य अपना फॉर्म जमा कर देगा.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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