भगोड़े
अक्टूबर 1962 में, जब भारत और चीन के बीच जंग छिड़ी, तो सरहदी ज़िलों से औरतों और बच्चों को सुरक्षित निकाला जाने लगा. हम लोग कलकत्ता चले आए. वहां पहुंचने के बाद, मेरी मां ने फ़ैसला कर लिया कि अब वह लौटकर असम नहीं जाएंगी. कलकत्ता से हमने देश के दूसरे छोर, दक्षिण में ऊटकमंड—ऊटी—तक का सफ़र किया, जो तमिलनाडु में एक छोटा-सा हिल स्टेशन है. मेरा भाई, एलकेसी—ललित कुमार क्रिस्टोफ़र रॉय—तब साढ़े चार साल का था, और मेरे तीसरे जन्मदिन में अभी एक महीना बाक़ी था. उम्र के तीसरे दशक में पहुँचने से पहले, हमने अपने पिता को फिर कभी नहीं देखा और न ही उनसे कोई बात हुई.
ऊटी में हम एक ‘हॉलिडे’ कॉटेज के आधे हिस्से में रहते थे, जो हमारे नाना का था. वह कीटविज्ञानी थे, और दिल्ली में हुकूमत-ए-बरतानिया के ऊंचे सरकारी ओहदे—इम्पीरियल एंटोमोलॉजिस्ट—पर काम करते हुए रिटायर हुए थे. वे और मेरी नानी अलग हो चुके थे. उनसे और अपने बच्चों से उन्होंने वर्षों पहले रिश्ता तोड़ लिया था. जिस साल मैं पैदा हुई थी, उसी साल वे गुज़र गए.
मुझे नहीं मालूम कि हम उस कॉटेज में घुसे कैसे. हो सकता है कि दूसरे हिस्से में रहने वाली किराएदार के पास चाबी रही हो. या शायद हम ज़बरन अन्दर घुस गए थे. वह घर मेरी मां का जाना-पहचाना हुआ लगता था. और वह शहर भी. बचपन में शायद वह अपने मां-बाप के साथ वहां रही हों. चटख़े हुए सीमेंट के सर्द फ़र्श और एस्बेस्टस की छत वाली वह कॉटेज सीलन से भरी हुई मनहूस जगह थी. प्लाईवुड की एक दीवार हमारे आधे हिस्से को उन कमरों से अलग करती थी, जिनमें किराएदार रहती थीं. वह एक बूढ़ी अंग्रेज़ महिला मिसेज़ पैटमोर थीं. उनके बाल ऊंचे, फूले हुए रहते थे, जिसे देखकर हम हैरान होते थे कि आख़िर इसके अन्दर क्या छिपा है. मुझे और मेरे भाई को लगता कि ज़रूर ततैया होंगी. रात में उन्हें डरावने ख़्वाब आते थे और वह चीख़ती और कराहती थीं. मुझे पक्का मालूम नहीं कि वह किराया देती भी थीं या नहीं. शायद उन्हें मालूम नहीं था कि किराया किसे देना है. यह पक्का है कि हमने कोई किराया नहीं दिया. हम तो नाजायज़ क़ब्ज़ेदार थे, घुसपैठिए—किराएदार नहीं. हमने तो भगोड़ों की तरह उस जगह पनाह ले रखी थी, और मरहूम इम्पीरियल एंटोमोलॉजिस्ट की महंगी और शानदार पोशाकों से ठसाठस भरे हुए लकड़ी के बड़े-बड़े सन्दूक़ों के बीच रहते थे—रेशमी टाइयां, ड्रेस-शर्ट्स, थ्री-पीस सूट. हमें कफ़लिंक से भरा हुआ बिस्किट का एक पुराना डिब्बा मिला. (ज़ाहिर है, वह औपनिवेशिक सरकार के उत्साही सहयोगी थे और अपने ओहदे के राजसी पहलू को गम्भीरता से लेते थे.) बाद में, जब मैं और मेरा भाई समझने लायक़ बड़े हो गए, तो हमें कुनबे में उनके बारे में मशहूर कहानियां सुनाई जाती थीं; उनके ग़ुरूर के बारे में (उन्होंने हॉलीवुड के एक फ़ोटो स्टूडियो में अपना एक पोर्ट्रेट बनवाया था) और उनके सितम के बारे में (वह अपने बच्चों को कोड़े मारते थे, आए दिन उनको घर से बाहर निकाल देते थे, और पीतल का फूलदान मारकर मेरी नानी की खोपड़ी फोड़ दी थी). हमारी माँ ने हमें बताया कि उनसे दूर जाने के लिए ही, उन्होंने शादी का प्रस्ताव देने वाले पहले ही आदमी से ब्याह कर लिया था.
हमारे वहां पहुंचने के तुरन्त बाद ही उन्हें ब्रीक्स नाम के एक स्थानीय स्कूल में पढ़ाने की नौकरी मिल गई. उन दिनों ऊटी में स्कूलों की भरमार थी, उनमें से कुछ स्कूल अंग्रेज़ मिशनरी चलाते थे, जिन्होंने आज़ादी के बाद भारत में ही रहने का फ़ैसला किया था. ऐसे ही लोगों के एक समूह से उनकी दोस्ती हो गई, जो सिर्फ़ गोरे बच्चों के लिए चलाए जाने वाले स्कूल लशिंगटन में पढ़ाते थे, जहां भारत में काम कर रहे अंग्रेज़ मिशनरियों के बच्चे पढ़ते थे. मां ने किसी तरह उन्हें राज़ी कर लिया कि अपनी नौकरी से छुट्टी के बाद आकर वह उनकी कक्षाओं में बैठ सकती हैं. वहां उन्होंने प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाने के उन लोगों के मौलिक तौर-तरीक़े (पढ़ने और उच्चारण के लिए फ़्लैशकार्ड, गणित के लिए लकड़ी की रंगीन क्यूज़ेनेयर रॉड) बड़ी लगन से आत्मसात किये, हालांकि इसके साथ ही भारतीयों और भारत के प्रति उन लोगों की हमदर्दी-भरी, सौम्य टिप्पणियों में निहित नस्लवाद से परेशान भी हुईं. अपने काम के लिए वह जब बाहर जाती थीं, तो कुछ घंटों के लिए हमें एक बदमिज़ाज महिला के पास, और कभी-कभार पड़ोसियों के पास छोड़ जाती थीं.
हमारी भगोड़ों की ज़िन्दगी को अभी कुछ महीने ही बीते थे कि हमें वहां से बेदख़ल करने के लिए केरल से मेरी नानी (एंटोमोलॉजिस्ट की विधवा) और उनका बड़ा बेटा—मेरी मां के बड़े भाई जी. आईसाक—आ धमके. मैंने उन दोनों को पहले कभी नहीं देखा था. उन्होंने मेरी मां से कहा कि त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार एक्ट के मुताबिक़, बेटियों का अपने बाप की जायदाद पर कोई हक़ नहीं बनता और इसलिए हमें तुरन्त वह घर छोड़ना होगा. उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि हमारे पास कोई और ठौर नहीं था. मेरी नानी ने ज़्यादा कुछ नहीं कहा, मगर मैं उनसे डर गई. कोनिकल कॉर्निया की वजह से वह गहरे रंग का चश्मा लगाती थीं. मुझे याद है कि मेरी मां, मेरा भाई और मैं, एक-दूसरे का हाथ पकड़े, घबराए हुए, किसी वकील को ढूंढने की कोशिश में शहर-भर में भागते फिरे. मेरी स्मृति में वह रात थी, और सड़कें अंधेरे में डूबी हुईं. मगर ऐसा हो नहीं सकता था. क्योंकि हमने किसी तरह एक वकील तलाश ही लिया, जिन्होंने हमें बताया कि त्रावणकोर एक्ट सिर्फ़ केरल में लागू होता है, तमिलनाडु में नहीं, और क़ब्ज़ेदारों के भी अधिकार होते हैं. उन्होंने कहा कि अगर कोई हमें निकालने की कोशिश करे, तो हम पुलिस बुला सकते हैं. हम थराथराते हुए मगर विजेता का उल्लास लिये कॉटेज लौट आए. मेरा भाई और मैं, यह समझने के लिहाज़ से बहुत छोटे थे कि बड़े लोग क्या बातें कर रहे थे. लेकिन भावनाओं का वह खेल हमें ख़ूब समझ में आ रहा था : धमकी, डर, ग़ुस्सा, खलबली, दिलासा, सुकून, फ़तेह.
हमारे मामा जी. आईसाक को तब यह गुमान भी नहीं रहा होगा कि अपनी छोटी बहन को पिता की कॉटेज से बेदख़ल करने की कोशिश करके वह ख़ुद अपनी बर्बादी की बुनियाद डाल रहे थे. त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार एक्ट को चुनौती देने लायक़ साधन और हैसियत हासिल करने और केरल में अपने पिता की जायदाद में बराबर का हिस्सा मांगने में मेरी मां को कई साल लग गए. तब तक, अपने अपमान की इस स्मृति को उन्होंने हिफ़ाज़त से इस तरह सहेजकर रखा जैसे कि यह कुनबे की कोई बेशक़ीमती धरोहर हो, जो कि एक तरह से थी भी.
इस क़ानूनी तख़्तापलट के बाद हम कॉटेज में पसर गए, और अपने लिए थोड़ी जगह बनाई. इम्पीरियल एंटोमोलॉजिस्ट के सूट और कफ़लिंक मेरी मां ने बाज़ार के क़रीब टैक्सी स्टैंड पर टैक्सी ड्राइवरों में बाँट दिये, और कुछ अरसे तक दुनिया के सबसे ज़्यादा सजे-धजे टैक्सी ड्राइवर ऊटी में दिखाई देते थे.
कठिन संघर्षों से हासिल जीत के बावजूद, हम अब भी दुविधा से घिरे हुए थे, हालात हमारे मनमुताबिक़ नहीं थे. ऊटी की ठंडी और नम आब-ओ-हवा से मेरी मां का दमा और बढ़ गया. चमकीले गुलाबी रंग की एक मोटी रज़ाई ओढ़कर वह लोहे की ऊंची चारपाई पर लेटी रहतीं, हांफती-सी, गहरी सांसें लेतीं, और कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रहती थीं. हमें लगता था कि वह मर जाएंगी. उन्हें यह बिलकुल पसन्द नहीं था कि हम उनके आसपास खड़े होकर टकटकी लगाए रहें, तो वह हमें अपने कमरे से बाहर निकल जाने को कहतीं. ऐसे में, मेरा भाई और मैं घूरने के लिए कुछ और तलाश करने निकल पड़ते. हम ज़्यादातर, उस तिकोने अहाते के कोने पर लगे छोटे खटारा-से गेट पर लटककर झूलते थे, और हनीमून पर आए शादीशुदा जोड़ों को एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आते-जाते देखा करते, जो रोमांस के लिए ऊटी के मशहूर बोटेनिकल गार्डन जाते हुए हमारे घर के पास से गुज़रते थे. कभी-कभार ठहरकर वे हमसे बातें करते. हमें मिठाइयां और मूंगफली देते. एक आदमी ने हमें एक गुलेल दी. कई दिनों तक हम उससे निशाना लगाना सीखते रहे. अजनबी लोगों से हमारी दोस्ती हो गई. एक बार उनमें से एक ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे घर के अन्दर ले गया. बड़ी रुखाई से उसने मेरी मां को बताया कि मुझे चेचक हो गई है. उसने मुझे अपने पेट पर निकला छाला उन्हें दिखाने को कहा, जो मैं हर उस शख़्स को दिखाती घूम रही थी, जो उसे देखना चाहता था. मेरी मां आगबबूला हो गईं. वह आदमी जब चला गया, तो उन्होंने मेरे गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाया और हिदायत दी कि आइन्दा कभी मैं अपनी फ़्रॉक उठाकर किसी अजनबी को अपना पेट न दिखाऊं. ख़ासकर मर्दों को.
यह उनकी बीमारी या फिर दवाओं का असर हो सकता था, लेकिन वह बहुत चिड़चिड़ी हो गई थीं और अक्सर हमारी पिटाई कर देती थीं. वह जब ऐसा करतीं तो मेरा भाई भाग जाता और अंधेरा होने के बाद ही घर लौटता. वह दिनों-दिन चुप्पा होता जा रहा था. कभी रोता नहीं था. जब वह परेशान होता तो अपना सिर झुकाकर डाइनिंग टेबल पर टिका लेता और सोने का बहाना करता. जब वह ख़ुश होता, जो कि अक्सर नहीं होता था, तो हवा में मुक्के उछालता हुआ वह मेरे
इर्द-गिर्द नाचता और कहता कि वह कैसियस क्ले है. मुझे मालूम नहीं कि वह कैसियस क्ले को कैसे जानता था; मैं तो नहीं जानती थी. उसे शायद हमारे पिता ने बताया हो.
मुझे लगता है कि ऊटी के वे दिन उसके लिए मेरे मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मुश्किल थे क्योंकि उसके पास अतीत की यादें थीं. उसे एक बेहतर ज़िन्दगी याद थी. हमारे पिता और चाय बाग़ान का वह बड़ा-सा घर भी उसे याद था, जहां हम लोग रहते थे. उसे लाड़-प्यार किया जाना याद था. ख़ुशक़िस्मती से मुझे कुछ याद नहीं था.
मेरे भाई ने मुझसे पहले स्कूल जाना शुरू किया था. कुछ महीनों तक वह गोरे बच्चों के स्कूल लशिंगटन में पढ़ने जाता रहा. (यह मिशनरियों का मेरी मां पर एहसान रहा होगा.) लेकिन जब उसने हमारे जैसे दूसरे बच्चों को ‘वे हिन्दुस्तानी बच्चे’ कहना शुरू किया तो मां ने उसे वहां से निकाल लिया और उसका दाख़िला ब्रीक्स में करा दिया, जहां वह ख़ुद पढ़ाती थीं. मैं जब पांच साल की हुई तो उन्होंने मुझे एक नर्सरी स्कूल (हिन्दुस्तानी बच्चों के लिए) में भर्ती करा दिया, जो डरावनी दिखने वाली एक ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी मिस मिटन चलाती थीं. वह एक बेरहम औरत थीं, जिनके हाथों पर झाइयां थीं. उनके मुंह की जगह एक चीरा भर था. होंठ नहीं थे. उन्होंने साफ़ जता दिया था कि वह मुझे पसन्द नहीं करती थीं. घास के एक छोटे-से मैदान के किनारे एक सायबान हमारा क्लासरूम था, जहां कुछ दुबली, हड़ियल गायें चरती रहती थीं.
जिन दिनों उनका दमा बहुत बिगड़ जाता, मेरी मां सब्ज़ियों और किराने के सामान की एक फ़ेहरिस्त बनाकर उसे एक टोकरी में रख देतीं, और उसे लेकर हमें शहर भेज देती थीं. ऊटी तब एक छोटा, सुरक्षित शहर था, जहां सड़कों पर बहुत भीड़भाड़ नहीं थी. पुलिस वाले हमें पहचानते थे. दुकानदार बहुत रहमदिल थे, और कभी-कभार हमें उधार तक दे दिया करते थे. उन सब में सबसे ज़्यादा दयालु कुरुसम्माल नाम की एक महिला थीं, जो बुनाई की दुकान में काम करती थीं. उन्होंने हमारे लिए बन्द गले वाले दो स्वेटर बुने. मेरे भाई के लिए गहरे हरे रंग का. मेरे लिए आलूचे के रंग का.
मेरी मां जब कुछ हफ़्तों के लिए पूरी तरह से बिस्तर पर पड़ गईं, तो कुरुसम्माल हमारे साथ रहने चली आईं. हमारी बंजारों जैसी ज़िन्दगी पटरी पर आ गई. यह कुरुसम्माल ही थीं, जिन्होंने हमें सिखाया कि प्यार क्या होता है. सहारा देना किसे कहते हैं. गले लगाने का मतलब क्या है. वह हमारे लिए खाना पकातीं और ऊटी की कड़ाके की सर्दी में खुले में बैठाकर उस खौलते पानी से नहलातीं, जो लकड़ियां जलाकर वह एक बड़े-से बर्तन में उबालती थीं. आज भी मेरे भाई को और मुझे ढंग से नहाने के एहसास के लिए तक़रीबन उबालने की ज़रूरत पड़ती है. हमें नहलाने से पहले, वे हमारे बालों में कंघी करके जूं निकालतीं और उन्हें मारना सिखातीं. जूं मारना मुझे बहुत अच्छा लगता था. अंगूठे के नाख़ून से उन्हें कुचलते वक़्त जो आवाज़ होती थी, वह बहुत तसल्ली देती थी. अविश्वसनीय तेज़ी से बुनाई करने के साथ ही, कुरुसम्माल बेहतरीन बावर्ची थीं. नहीं के बराबर सामान से खाना बना लेने में उन्हें महारत थी. सिर्फ़ नमक और ताज़ी हरी मिर्च के साथ उबले हुए चावल जब वह हमें परोसतीं तो उसका भी स्वाद अच्छा लगता था.
तमिल में कुरुसम्माल नाम का मतलब ‘यीशु की जननी’ है. उनके पति अक्सर हमसे मिलने आ जाते थे, उनका नाम येसुरत्नम (‘यीशु का आभूषण’, ‘बेशक़ीमती नगीना’) था. उन्हें गलगंड था, जिसे छिपाने के लिए वह अपनी गर्दन में ऊनी मफ़लर लपेटे रहते थे. हमारी ही तरह, वे भी हमेशा लकड़ी के धुएं-से महकते रहते थे.
आख़िरकार मेरी मां इतनी बीमार हो गईं कि अपनी नौकरी बरक़रार नहीं रख पाईं. उन्हें दी जा रही स्टेरॉयड की भारी डोज़ भी काम नहीं आई. हमारे पास पैसे ख़त्म हो गए. मेरा भाई और मैं कमज़ोर हो गए और तपेदिक़ की चपेट में आ गए.
मनहूसियत से भरे कुछ और महीनों तक हर मोर्चे पर जूझते रहने के बाद, मेरी मां ने हार मान ली. अपना अभिमान छोड़कर उन्होंने केरल में हमारे नानी के गांव आयमनम लौटने का फ़ैसला कर लिया. उस वक़्त तक अपनी मां और भाई से उनके झगड़े की तपिश ठंडी पड़ चुकी थी. अगर नहीं हुई होती, तब भी उनके पास कोई और चारा नहीं था.
कुरुसम्माल को छोड़कर जाने का मुझे गहरा अफ़सोस था. मगर कुछ साल के बाद वह मुझे फिर मिल गईं, जब हमारे साथ रहने के लिए वह केरल चली आईं.
(‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ अरुंधति रॉय की अंग्रेज़ी किताब Mother Mary Comes To Me का हिंदी अनुवाद है, जिसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है और इसका अंश प्रकाशन की अनुमति से छापा जा रहा है.)