scorecardresearch
Saturday, 25 July, 2026
होममत-विमतबार-बार होने वाली परीक्षा की नाकामी को मोदी सरकार किसी और की विरासत नहीं बता सकती

बार-बार होने वाली परीक्षा की नाकामी को मोदी सरकार किसी और की विरासत नहीं बता सकती

छात्रों का प्रदर्शन अब सिर्फ नीट पेपर लीक का मुद्दा नहीं, बल्कि जवाबदेही के संकट का सवाल बन गया है.

Text Size:

आज भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है. देश की करीब 65 प्रतिशत आबादी, यानी 95 करोड़ से ज्यादा लोग, 35 साल से कम उम्र के हैं. यही वह पीढ़ी है, जिसने यह भरोसा करके परवरिश पाई कि शिक्षा ही आगे बढ़ने का सबसे बड़ा रास्ता है. मेहनत से पढ़ो, ईमानदारी से प्रतियोगिता करो और योग्यता के दम पर सफलता मिलेगी. इसी भरोसे पर लाखों छात्रों और उनके परिवारों ने अपने सपने बनाए.

लेकिन उन्हें बदले में क्या मिला? हर कुछ साल में कोई न कोई पेपर लीक हो जाता है. हर कुछ साल में छात्र सड़कों पर उतरते हैं. सरकारें सुधार का वादा करती हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, समितियां बनती हैं और कुछ समय बाद यह मामला खबरों से गायब हो जाता है. फिर एक और परीक्षा में गड़बड़ी होती है और एक बार फिर किसी की जवाबदेही तय होती हुई नहीं दिखती.

अगर देश का राजनीतिक वर्ग अब भी यह मानता है कि जंतर-मंतर पर हो रहा प्रदर्शन सिर्फ नीट या किसी एक मंत्री के इस्तीफे की मांग तक सीमित है, तो वह इस पूरे आंदोलन को सही तरीके से समझ नहीं पा रहा है. यह सिर्फ ऐसा प्रदर्शन नहीं है, जिसमें सरकार से कोई फैसला वापस लेने की मांग की जा रही हो. छात्र इस्तीफे और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं. वे पूछ रहे हैं कि जब संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम होती हैं, तो उसकी कीमत कौन चुकाता है? अगर जवाबदेही नहीं होगी, तो सुधार के वादों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. छात्र अब यह सुनने के लिए तैयार नहीं हैं कि “ऐसा ही सिस्टम चलता है.”

यह पीढ़ी सिर्फ इसलिए प्रदर्शन नहीं कर रही कि एक परीक्षा में गड़बड़ी हुई. यह इसलिए प्रदर्शन कर रही है क्योंकि उसे लगता है कि सिस्टम खुद अपनी नाकामियों को रोकना ही नहीं चाहता और यही सबसे बड़ा संकट है.

समस्या को स्वीकार करना

बीजेपी के लिए यह स्थिति निश्चित तौर पर असहज करने वाली होनी चाहिए.

बीजेपी सिर्फ सरकार बदलने का वादा करके सत्ता में नहीं आई थी, बल्कि शासन व्यवस्था बदलने का भी वादा किया था. उसकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह था कि उसने कहा था कि देश की संस्थाएं सुस्त, लापरवाह और बिना जवाबदेही वाली हो गई हैं, लेकिन सत्ता में आए एक दशक से ज्यादा समय हो चुका है. अब बार-बार होने वाली परीक्षा की नाकामियों को किसी और सरकार की विरासत बताकर नहीं टाला जा सकता. अगर संस्थाएं अब भी नहीं बदलीं, तो आखिर बदला क्या?

शायद इस पूरे मामले की सबसे बड़ी विडंबना इसकी राजनीतिक तस्वीर में छिपी है. प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी मांगों में से एक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है, लेकिन 1990 के दशक के आखिर में, जब धर्मेंद्र प्रधान एबीवीपी के युवा छात्र नेता थे, तब उन्होंने खुद ओडिशा में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन किया था.

इतिहास की यही खास बात है कि जो लोग कभी सवाल पूछते थे, वही बाद में उन्हीं सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी संभाल लेते हैं. यह विडंबना सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान से जुड़ी नहीं है, बल्कि हमारी संस्थाओं से जुड़ी है. सरकारें बदलती हैं. प्रदर्शन करने वाले मंत्री बन जाते हैं. विपक्ष सरकार बन जाता है, लेकिन असल में कुछ भी नहीं बदलता. प्रदर्शनकारी जवाबदेही की मांग कर रहे हैं और यह पूरी तरह सही है. लोकतंत्र में यही होना चाहिए. जब संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम हों, तो जिम्मेदार लोगों को जवाब देना चाहिए. पद खोने का डर ही हर मंत्री और सरकारी अधिकारी को याद दिलाता है कि नाकामी की कीमत चुकानी पड़ती है. अगर जवाबदेही नहीं होगी, तो संस्थाओं के बेहतर होने की कोई वजह भी नहीं बचेगी.

आखिरकार, सरकार को उन्हीं संस्थाओं की जिम्मेदारी लेनी होती है, जिन्हें वह चलाती है.

लेकिन लंबे समय में विपक्ष को भी खुद की पीठ नहीं थपथपानी चाहिए. विपक्ष में बैठकर छात्रों का समर्थन करना आसान है. उसे यह भी सोचना चाहिए कि अगर वह कल फिर सत्ता में आया, तो क्या बदलेगा? भारत की शिक्षा व्यवस्था में भरोसे की जो कमी आज दिख रही है, वह एक दिन में पैदा नहीं हुई और न ही सिर्फ एक सरकार की वजह से हुई है. यह समस्या कई सरकारों के दौर में धीरे-धीरे बढ़ती गई है. सरकारें बदलती रहीं, लेकिन व्यवस्था की कमजोरियां बनी रहीं और सुधार अब भी अधूरे हैं.

अगर कल कांग्रेस या उसका कोई सहयोगी फिर सत्ता में आता है, तो आखिर क्या बदलेगा? जवाबदेही कैसे मजबूत होगी? और इसकी क्या गारंटी है कि अगली पीढ़ी के छात्रों को फिर किसी नए परीक्षा घोटाले के खिलाफ सड़कों पर नहीं उतरना पड़ेगा? इस्तीफे की मांग करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन ऐसी संस्थाएं बनाना, जहां बार-बार वही नाकामियां न हों, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल काम है.

जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शन को सिर्फ वहां मौजूद लोगों का ही नहीं, बल्कि देश के बाहर रहने वाले भारतीयों का भी समर्थन मिला है. सोनम वांगचुक के अनशन ने इस आंदोलन को और ज्यादा पहचान दिलाई, जबकि विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने भी एकजुटता दिखाते हुए प्रदर्शन किए. ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिका समेत कई देशों में लोगों ने भारत के छात्रों के समर्थन में आवाज़ उठाई. उनका समर्थन सिर्फ भावनात्मक नहीं था. यह उस उम्मीद को दिखाता है, जो भारत में रहने वाले और विदेशों में बसे लगभग हर भारतीय की है—एक ऐसी व्यवस्था, जो निष्पक्ष, पारदर्शी और भरोसेमंद हो.

लोकतंत्र में जनता का भरोसा

ऐसा नहीं है कि पेपर लीक सिर्फ भारत में ही होते हैं. दुनिया के किसी भी देश की परीक्षा व्यवस्था पूरी तरह परफेक्ट नहीं है. गलतियां हर जगह होती हैं. असली फर्क इस बात से पड़ता है कि उसके बाद क्या किया जाता है.

दक्षिण कोरिया का उदाहरण देखिए.

भारत की तरह वहां भी यूनिवर्सिटी में दाखिले की परीक्षाएं छात्रों का पूरा भविष्य तय कर सकती हैं. परिवार इन परीक्षाओं की तैयारी में कई साल लगा देते हैं. इन परीक्षाओं का दबाव बहुत ज्यादा होता है. साल 2024 में जब दक्षिण कोरिया में शिक्षकों, परीक्षा प्रश्न बनाने वालों और प्राइवेट कोचिंग संस्थानों का एक ऐसा नेटवर्क सामने आया, जिस पर गैरकानूनी तरीके से परीक्षा के सवाल बनाने और बेचने का आरोप था, तब वहां सिर्फ गिरफ्तारियां ही नहीं हुईं.

सियोल मेट्रोपॉलिटन ऑफिस ऑफ एजुकेशन ने सिर्फ सियोल में ही 142 शिक्षकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की. इनमें से कई शिक्षकों को निलंबित कर दिया गया या नौकरी से निकाल दिया गया. सरकार ने हितों के टकराव से जुड़े नियम भी और सख्त कर दिए.

इसके बाद एक और विवाद सामने आया. साल 2025 में दक्षिण कोरिया की कॉलेज प्रवेश परीक्षा की अंग्रेज़ी की परीक्षा को लेकर आलोचना हुई. कहा गया कि प्रश्नपत्र तय स्तर से कहीं ज्यादा कठिन था. इस मामले में पेपर लीक नहीं हुआ था और कोई धोखाधड़ी भी नहीं हुई थी. फिर भी कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर करिकुलम एंड इवैल्यूएशन के प्रमुख ने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि उनके कार्यकाल में परीक्षा को लेकर लोगों का भरोसा कमज़ोर हुआ था.

दक्षिण कोरिया अकेला ऐसा देश नहीं है. अल्जीरिया, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में भी परीक्षा से जुड़ी गड़बड़ियों के बाद इस्तीफे हुए हैं, अधिकारियों को हटाया गया है और संस्थागत सुधार किए गए हैं. राजनीति, सरकार या विचारधारा को लेकर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन शायद ही कोई भारतीय इस बात से असहमत होगा कि व्यवस्था भरोसेमंद होनी चाहिए और संस्थाओं की जवाबदेही तय होनी चाहिए.

सत्ता में बैठे लोगों को एक बात समझनी चाहिए कि लोकतंत्र नीतियों की नाकामी के बाद भी चल सकता है, लेकिन जब लोगों का भरोसा उन संस्थाओं से उठने लगता है, जिनका काम उन नाकामियों को ठीक करना है, तब लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती पैदा होती है.

बेहतर भविष्य, अच्छी सरकार और देश की तरक्की की हमारी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि लोगों को भरोसा रहे कि व्यवस्था सुधर सकती है. लोकतंत्र की ताकत सिर्फ आज़ाद और निष्पक्ष चुनाव से नहीं आती, बल्कि इस भरोसे से भी आती है कि उसकी संस्थाएं निष्पक्ष, सक्षम और अपनी गलतियों को सुधारने में सक्षम हैं. चुनाव जीतने से सरकार को सत्ता मिलती है, लेकिन संस्थाओं पर लोगों का भरोसा ही लोकतंत्र को असली ताकत देता है.

आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: CJP प्रदर्शन अन्ना आंदोलन जैसा नहीं, मोदी सरकार को समझ नहीं आ रहा इससे कैसे निपटें


 

share & View comments