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Sunday, 26 July, 2026
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वंदे मातरम् के विवादित इतिहास से क्यों मुश्किल हो जाता है इसके अपमान को अपराध बनाने का सवाल

अमित शाह का 'वंदे मातरम् बिल' इस गीत को कानून के जरिए राष्ट्रगान के बराबर दर्जा देने की कोशिश करता है. लेकिन यह दर्जा पिछले 76 साल से अधूरे समझौते पर टिका है.

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मौजूदा मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया है. इस बिल के तहत वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को वही कानूनी सुरक्षा दी जाएगी, जो अभी राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और संविधान को मिली हुई है. यानी अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् का अपमान करता है या इसके गाए जाने में रुकावट डालता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सज़ा हो सकती है.

यह बिल ऐसे समय लाया जा रहा है, जब वंदे मातरम् की रचना के 150 साल पूरे हो रहे हैं. ऐसे में यह सही मौका है कि इस गीत के लंबे और जटिल इतिहास को फिर से समझा जाए और यह भी सोचा जाए कि आखिर फौजदारी कानून का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए होना चाहिए.

इन सवालों को समझने के लिए मैं मुख्य रूप से दो किताबों का सहारा लेता हूं. पहली है टी.एम. कृष्णा की 2026 में प्रकाशित किताब We, the People of India, जिसमें बताया गया है कि वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा कैसे मिला और इस प्रक्रिया में किन मुश्किलों और मतभेदों का सामना करना पड़ा. दूसरी है कानूनी दार्शनिक पैट्रिक डेव्लिन का 1959 का व्याख्यान Morals and the Criminal Law, जिसमें यह चर्चा की गई है कि कानून और नैतिकता का आपस में क्या संबंध है.

वंदे मातरम् के पीछे की सोच

टी.एम. कृष्णा अपनी किताब We, the People of India: Decoding a Nation’s Symbols में बताते हैं कि वंदे मातरम् कैसे लिखा गया और बाद में इसका राजनीतिक सफर कैसा रहा. वह इसे एक संगीतकार की नज़र से समझाते हैं. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1872 से 1875 के बीच इस गीत के पहले दो अंतरे लिखे थे. इसके बाद 1881 में जब उन्होंने इस गीत को अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया, तब तीसरा और चौथा अंतरा जोड़ा गया. इन अंतरों में युद्ध और देवी-देवताओं से जुड़ी बातें ज्यादा हैं.

टी.एम. कृष्णा का कहना है कि अगर इस गीत को सिर्फ संगीत के नज़रिए से देखा जाए, तो बाद में जोड़े गए अंतरे पहले दो अंतरों के साथ अच्छी तरह मेल नहीं खाते. उनका कहना है कि जब भी सभी छह अंतरों को एक साथ गाने की कोशिश की गई, तो पूरा गीत बिखरा हुआ लगा, लेकिन पूरा गीत एक साथ जुड़ा हुआ महसूस नहीं होता.

कृष्णा का कहना है कि यही वह जगह है, जहां से राजनीति भी बदलने लगती है. शुरुआत में गीत में मातृभूमि की बात होती है, लेकिन बाद के अंतरों में हाथ में तलवार लिए देवी दुर्गा का चित्र आता है, जो योद्धाओं को दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करती हैं. उपन्यास में यह दुश्मन साफ तौर पर मुस्लिम समुदाय को बताया गया है. इसी वजह से बाद में इस गीत को लेकर अलग-अलग राय सामने आईं.

जब 1905 में बनारस कांग्रेस अधिवेशन में सरला देवी ने यह गीत गाया, तो उन्होंने चुपचाप “सप्तकोटि” (सात करोड़) की जगह “त्रिंशकोटि” (तीस करोड़) शब्द गा दिया, ताकि यह गीत सिर्फ बंगाल तक सीमित न लगे, बल्कि पूरे देश का गीत लगे. इससे यह भी साफ हुआ कि राष्ट्रीय प्रतीक बनाने के लिए गीत में बदलाव करना ज़रूरी समझा गया.

20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखा. उन्होंने बताया कि आनंदमठ का अंग्रेज़ी ट्रांसलेशन पढ़ने के बाद उन्हें लगा कि इस उपन्यास की पृष्ठभूमि मुस्लिम समुदाय को परेशान कर सकती है. यह उनकी पहले की सोच से अलग था, क्योंकि पहले उन्हें लगता था कि इस गीत पर उठे विवाद ज्यादा गंभीर नहीं हैं.

इसके बाद 26 अक्टूबर 1937 को रवींद्रनाथ टैगोर ने नेहरू को और उसी महीने बाद में बोस को पत्र लिखा. उन्होंने गीत के पहले अंतरे का समर्थन किया, लेकिन यह भी माना कि बंकिमचंद्र की दुर्गा वाली छवि को मुस्लिम समुदाय अपनी मातृभूमि का प्रतीक नहीं मान सकता. इसके बाद 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की. उसने तय किया कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे.

दूसरी ओर, पूरे गीत के प्रति लोगों की गहरी आस्था भी थी. हेमचंद्र दास कानुनगो ने लिखा कि उनके अंदर क्रांतिकारी सोच आनंदमठ पढ़ने के बाद ही आई. हरिवंश राय बच्चन ने 1948 में लिखे अपने लेख “हमारा राष्ट्रगान” में बताया कि जब वह 1919 में 12 साल के थे, तब उनके चाचा ने उन्हें चेतावनी दी थी कि अगर वे इस गीत की धुन भी जोर से गुनगुनाएंगे, तो पूरा परिवार गिरफ्तार हो सकता है. 23 दिसंबर 1945 को सोडेपुर में राजनीतिक कार्यकर्ताओं से बात करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि जिस गीत का संबंध इतने त्याग और बलिदान से जुड़ा हो, उसे कभी छोड़ा नहीं जा सकता.

इसी सम्मान और असहजता के बीच का रास्ता निकालने की कोशिश 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने की. उन्होंने घोषणा की कि वंदे मातरम् को जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा, लेकिन यह फैसला सिर्फ भावना के स्तर पर था, क्योंकि संविधान सभा ने कभी यह साफ नहीं किया कि वंदे मातरम् के कौन-से अंतरों को यह बराबरी का दर्जा मिलेगा.

अब 2026 का यह बिल उसी दर्जे को कानून का रूप देना चाहता है, जो पिछले 76 सालों से एक अधूरे समझौते के आधार पर बना हुआ है.

अपमान को अपराध बनाने का सवाल

लॉर्ड पैट्रिक डेव्लिन का 1959 का व्याख्यान “Morals and the Criminal Law” आज भले ही ज्यादा चर्चा में नहीं रहता, लेकिन इस मुद्दे को समझने में यह काफी काम का है. इसकी वजह यह है कि इसमें बड़ी-बड़ी बातों की जगह आसान और साफ तर्क दिए गए हैं. डेव्लिन समाज की तुलना एक ऐसे घर से करते हैं, जो ईंटों से नहीं, बल्कि लोगों की साझा नैतिक सोच से जुड़ा होता है. अगर यह अदृश्य रिश्ता कमजोर पड़ जाए, तो पूरा ढांचा टूट सकता है.

इसे समझाने के लिए वह एक आसान उदाहरण देते हैं. अगर कोई व्यक्ति अपने घर में अकेले शराब पीता है, तो इससे किसी और को नुकसान नहीं होता, लेकिन अगर एक चौथाई या आधी आबादी हर रात ऐसा करने लगे, तो समाज पूरी तरह बदल जाएगा. डेव्लिन का कहना है कि इन दोनों स्थितियों के बीच एक ऐसा समय आता है, जब सरकार को कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है. हालांकि पहले से यह तय नहीं किया जा सकता कि वह सीमा कहां है.

वह देशद्रोह (Treason) का भी उदाहरण देते हैं. उनका कहना है कि कानून सरकार को हिंसक तरीके से गिराने की कोशिशों को इसलिए रोकता है, क्योंकि संगठित समाज उसके बिना नहीं चल सकता. इसका मतलब यह नहीं कि सरकार से असहमति रखना गलत है. अगर डेव्लिन की इस सोच से देखा जाए, तो सरकार के इस नए बिल की दलील कुछ हद तक मजबूत दिखाई देती है. 1950 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद की घोषणा के बाद वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के बराबर सम्मान दिया गया था. डेव्लिन के अनुसार, ऐसे प्रतीकों को समाज चाह सकता है कि उनका आसानी से अपमान न किया जाए.

लेकिन डेव्लिन इसके साथ एक और बात भी कहते हैं. वह इसे “लचीले सिद्धांत (Elastic Principles)” कहते हैं. यानी कानून लोगों की अंतरात्मा और असहमति में बहुत ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए. भारत की अदालतें भी राष्ट्रगान को लेकर ऐसी ही सीमा तय कर चुकी हैं और इस नए बिल को भी उसे ध्यान में रखना होगा.

1986 के ‘बिजो एमैनुएल’ (Bijoe Emmanuel) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो बच्चे सम्मान के साथ खड़े रहे, लेकिन राष्ट्रगान नहीं गाया, उन्होंने किसी तरह का अपमान नहीं किया. अदालत ने यह भी कहा कि किसी कानून में किसी व्यक्ति के लिए राष्ट्रगान गाना ज़रूरी नहीं है.

इसके बाद 2014 के ‘सलमान केस’ में केरल हाई कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत अपराध तब माना जाएगा, जब कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान में शोर-शराबा करे या रुकावट डाले. सिर्फ चुप रहना या राष्ट्रगान में हिस्सा न लेना अपराध नहीं है. इन दोनों फैसलों को साथ पढ़ने पर साफ होता है कि आपराधिक जिम्मेदारी सिर्फ वहीं बनती है, जहां साफ तौर पर अपमान या बाधा पहुंचाई जाए. अगर कोई व्यक्ति सिर्फ हिस्सा नहीं लेता या चुप रहता है, तो वह कानून के दायरे में नहीं आता, चाहे दूसरे लोगों को यह अच्छा लगे या नहीं.

यहीं पर यह नया बिल सवालों के घेरे में आता है.

जिस वंदे मातरम् के दायरे को जवाहरलाल नेहरू सीमित रखना चाहते थे, जिसके पूरे गीत को मोहम्मद अली जिन्ना ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था, और जिसे 1950 में राष्ट्रगान के बराबर सम्मान भी सभी की एक राय से नहीं, बल्कि समझौते के बाद मिला था, उसके बारे में यह कहना आसान नहीं है कि पूरे समाज की हमेशा से एक जैसी राय रही है.

इसलिए अगर इस कानून के तहत चुप रहने या गीत न गाने को भी अपराध बनाया जाता है, तो यह वही सीमा पार कर देगा, जिसे अदालतें राष्ट्रगान के मामले में भी स्वीकार नहीं करती हैं. आखिरकार, यह तय संसद में कम और आने वाले वर्षों में इस कानून को कैसे लागू किया जाता है, उससे ज्यादा होगा कि सरकार की यह दलील कितनी मजबूत साबित होती है.

शशांक माहेश्वरी जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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