पिछली सदी के सत्तर के दशक के बीच से लेकर आखिर तक, पंजाब में अशांति शुरू होने से पहले तक, जिससे युवाओं के सभी उत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रम बंद हो गए, उस समय कॉलेज और यूनिवर्सिटी के प्रोग्राम्स में उनके दर्द भरे गीत हर किसी की जुबान पर होते थे.
जगजीत सिंह ने उनकी मशहूर कविताओं को अपनी आवाज़ दी. मैं कांडियाली थोर वे (मैं कांटों वाला कैक्टस हूं), गमां दी रात लम्मी ऐ (दुखों की रात बहुत लंबी है), एह मेरा गीत किसे ना गाणा (मेरे ये गीत कोई न गाए), माए नी माए (ओ मां), मैनू तेरा शबाब ले बैठा (तुम्हारी जवानी ने मुझे बर्बाद कर दिया), मैं इक शिकरा यार बनाया (मैंने एक जंगली बाज को अपना प्यार बनाया), यारियां रब करके (भगवान ऐसी दोस्तियां बनाए रखे), रोग बन के रह गया (यह एक दर्द बनकर रह गया), और रात गई कर तारा तारा (रात बीत गई, लेकिन आसमान में अभी भी कुछ तारे दिख रहे हैं).
हम इन गीतों को उस समय हर घर में मौजूद टेप रिकॉर्डर पर बजने वाली ऑडियो कैसेटों में सुनते थे. इन्हें ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर भी सुना जाता था क्योंकि उस समय दूरदर्शन अभी हर घर तक नहीं पहुंचा था. हालांकि, ज्यादा पढ़े जाने वाले हिंदी अखबार पंजाब केसरी और वीर प्रताप ने शिव कुमार बटालवी को नज़रअंदाज़ किया, क्योंकि वह पंजाबी में लिखते थे. वहीं पंजाबी अखबार अजीत और अकाली पत्रिका भी उनके खुले जीवन-शैली से सहज नहीं थे. खासकर हाथ में सिगरेट लिए उनकी सार्वजनिक छवि, जो सिखों की पारंपरिक सोच के खिलाफ मानी जाती थी. मुझे नहीं पता कि जालंधर या लाहौर के उर्दू अखबारों ने उनके बारे में लिखा था या नहीं, शायद नहीं लिखा. चंडीगढ़ से निकलने वाला इकलौता अंग्रेज़ी अखबार द ट्रिब्यून भी उस समय काफी औपचारिक था और उसके संपादकों ने बटालवी या उनकी कविताओं को वह जगह नहीं दी, जिसके वे हकदार थे. हालांकि, मशहूर रंगकर्मी बलवंत गर्गी ने 1979 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म्स डिवीजन के लिए उन पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई.
एक ऐसी बेहतरीन रचना, जिसे स्वीकार करना आसान नहीं था
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) में काम करने वाले बटालवी 1967 में सिर्फ 31 साल की उम्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार जीतने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति बने. उन्हें यह सम्मान उनकी सबसे मशहूर रचना ‘लूणा’ के लिए मिला, जो किस्सा भगत पूरन की एक नई और अलग व्याख्या थी. 1970 में बीबीसी उर्दू ने उनका इंटरव्यू लिया और इसके बाद उनकी पहचान भारत और पाकिस्तान, दोनों पंजाबों में फैल गई.
वैसे तो ‘लूणा’ को साहित्य जगत में काफी सराहना मिली, लेकिन कम से कम मेरे लायलपुर खालसा कॉलेज (1976-79) के अंग्रेजी और पंजाबी विभाग के महिला और पुरुष प्रोफेसरों को किस्सा पूरन भगत की इस नई और अलग व्याख्या को स्वीकार करना आसान नहीं लगा. बटालवी ने लूणा को कहानी की खलनायिका बनाने से इनकार कर दिया. लूणा एक बूढ़े, नपुंसक और ऊंची जाति के राजा की दूसरी और कम उम्र की पत्नी थी. बटालवी ने उसे खलनायिका नहीं, बल्कि अपनी चमार जाति और हालात की शिकार बताया. कहानी में बदले की भावना रखने वाला राजा अपने तपस्वी बेटे के टुकड़े-टुकड़े करने का आदेश देता है, क्योंकि उसने लूणा के प्रेम प्रस्ताव को ठुकरा दिया था.
सदियों तक लूणा को ही दोषी माना गया, जबकि राजा पर कोई सवाल नहीं उठाया गया. उसकी चाहत, उसका दर्द और उसकी तकलीफ को कभी नहीं समझा गया. फिर भी शरीर और मन की इच्छा पूरी करने की कोशिश करने पर उसी को दोषी ठहराया गया. फिर भी, इतने मुश्किल विषय होने के बावजूद इस किताब को बड़ी संख्या में पाठक मिले. साहित्य अकादमी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर और अंग्रेज़ी, उर्दू व पंजाबी साहित्य के जानकार बी. एम. भल्ला को ‘लूणा’ का अंग्रेज़ी अनुवाद करने की जिम्मेदारी दी. उन्होंने 170 पन्नों की एक किताब तैयार की, जिसे अनुवाद के लिए दिल्ली साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला.
भल्ला के अनुवाद की इसलिए भी तारीफ हुई क्योंकि उन्होंने बंटवारे से पहले के पंजाब की बारीकियों, खासकर झेलम के आसपास के माहौल, लूणा की पृष्ठभूमि, कहानी की नाटकीय बनावट और बटालवी की कविता की गहरी भावनाओं को अच्छी तरह पेश किया. इससे पंजाबी साहित्य की इस महत्वपूर्ण रचना को अंग्रेजी पढ़ने वाले लोगों तक पहुंचाया जा सका. मुझे यह मानना होगा कि मैंने सबसे पहले इसका अंग्रेजी अनुवाद ही पढ़ा, क्योंकि मूल पंजाबी में कई ऐसे शब्द हैं जो आज आम बोलचाल में इस्तेमाल नहीं होते.
कवि की वापसी
पंजाब में उग्रवाद के दौर का एक बड़ा नुकसान यह भी था कि लोगों के बीच होने वाली लगभग हर चर्चा पर या तो वही कहानी हावी हो गई, जैसी अब फिल्म ‘सतलुज’ में दिखाई गई है, या फिर उसके जवाब में दूसरी मजबूत कहानी.
लेकिन नई सदी की शुरुआत में बॉलीवुड और म्यूजिक इंडस्ट्री ने शिव कुमार बटालवी को फिर से लोगों तक पहुंचाया.
इसकी शुरुआत लव आजकल (2009) के गाने ‘अज्ज दिन चढ़ेया’ से हुई, जिसे राहत फतेह अली खान ने गाया था. यह गाना बटालवी की मशहूर कविता ‘आज दिन चढ़ेया तेरे रंग वर्गा’ की शुरुआती पंक्तियों और उसके भाव से प्रेरित था. इसका मतलब है कि आज की सुबह सिर्फ रोशनी ही नहीं, बल्कि तुम्हारा रंग और तुम्हारी गर्माहट भी साथ लेकर आई है.
इसके बाद उड़ता पंजाब (2016) का मशहूर गाना ‘इक्क कुड़ी’ आया. इसका एक वर्जन शाहिद माल्या और दूसरा दिलजीत दोसांझ ने गाया. यह बटालवी की प्रसिद्ध कविता ‘इक्क कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत, गुम है, गुम है, गुम है’ पर आधारित है. इसका मतलब है—एक लड़की है, जिसका नाम मोहब्बत है, और वह कहीं खो गई है, हमेशा के लिए.
डंकी (2023) में निर्देशक राजकुमार हिरानी ने उनके गीत ‘कि पुछदे ओ हाल फकीरां दा’ की दर्द भरी पंक्तियों का इस्तेमाल एक भावुक दृश्य की पृष्ठभूमि में किया. अमर सिंह चमकीला (2024) में फिल्म के भावुक आखिरी गाने ‘विदा करो’ (जिसे ए. आर. रहमान ने संगीत दिया और अरिजीत सिंह ने गाया) को उनकी कविता ‘मैनू विदा करो’ से प्रेरित होकर बनाया गया और आखिर में ‘सतलुज’ फिल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक में उनकी कविता ‘गमां दी रात लम्मी ऐ’ (दुखों की रात बहुत लंबी है) का इस्तेमाल किया गया.
कीट्स, बायरन और शेली की तरह, बटालवी की भी कम उम्र में मौत हो गई—इससे पहले कि बगावत पंजाब को जड़ से हिला देती. मज़े की बात यह है कि जरनैल सिंह भिंडरावाले का हेडक्वार्टर बटाला के पास चौक मेहता में था, वही शहर जिसे कवि ने “बटालवी” को अपना तखल्लुस (पैन नेम) बनाकर मशहूर किया था, ठीक वैसे ही जैसे उर्दू और पंजाबी परंपरा के दूसरे कवियों, जैसे साहिर लुधियानवी और हाफ़िज़ जालंधरी ने किया था.
अब सिर्फ यह सोचा जा सकता है कि अगर बटालवी सतलुज या ब्यास नदी में बहता खून देखते, तो क्या महसूस करते और क्या लिखते. आखिर अमृता प्रीतम ने भी 1947 में ‘लहू दी भरी चिनाब’ नाम की दर्दभरी कविता लिखी थी. उसमें उन्होंने लिखा था कि चिनाब नदी में पानी से ज्यादा खून बह रहा था और नदी लाल हो गई थी. शायद बटालवी की आवाज़ उन लोगों को कुछ समझा पाती, जिन्होंने पंजाब के दो बर्बाद दशकों में बेवजह की हत्याओं को अंजाम दिया. उन घटनाओं का असर आज भी पंजाब और वहां के लोग झेल रहे हैं.
कवि अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कविताएं हमेशा ज़िंदा रहेंगी.
संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी और सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (PMML), नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं, जहां उनकी फेलोशिप का टॉपिक है बॉर्डर्स, बाउंड्रीज एंड ब्लूवाटर्स ऑफ भारत. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
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