दिल्ली के त्रि नगर के निवासी अपने घरों में सुअरों को पिंजरे में रख रहे हैं, जबकि दीवारों पर गहनों से सजे एक शक्तिशाली, देवी-देवता के पोस्टर लगाए गए हैं.
पिछले 30 सालों से, दिल्ली अपने औद्योगिक इलाकों में प्रदूषण के खिलाफ सख्ती बरत रही है, उन्हें वहां से हटा रही है, और फिर बिना किसी बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर के उन्हें बेसहारा छोड़ दे रही है. ‘हम अनाथों जैसे हैं.’
पद्म श्री से सम्मानित वह व्यक्ति, जिसने धन और सत्ता का त्याग कर दिया था, जनवरी में बदहाल, अकेला और लगभग बेजान हालत में पाया गया. उनकी कीर्ति भले ही बढ़ती जा रही हो, लेकिन डॉ. टी.के. लाहिरी आज भी एक पहेली ही बने हुए हैं.
NCERT अधिकारियों ने कहा कि मौजूदा कोर्स भी बेहतर किए जाएंगे, लेकिन ज्यादातर पहले जैसे ही रहेंगे, जबकि नए मास्टर्स और डॉक्टरेट प्रोग्राम अतिरिक्त तौर पर शुरू किए जाएंगे.
तुलसी में ज़्यादातर कंटेंट क्रिएटर्स लॉग ऑफ कर चुके हैं और वापस खेतों, फैक्ट्रियों या बेरोज़गारी में लौट गए हैं. कम होते व्यूज़, आपसी मतभेद और शॉर्ट-फॉर्म वीडियो के साथ खुद को ढाल न पाने की वजह से यह गिरावट आई.
कार्यकर्ता रुद्राणी छेत्री ने कहा, ‘किन्नर और हिजड़ा समुदाय आमतौर पर गरिमा गृह नहीं आते. अगर यह कानून लागू हुआ, तो जो लोग हमारे पास आते हैं, उनमें से ज्यादातर की हम मदद नहीं कर पाएंगे.’
“समस्या यह है कि एक पैरेलल सिस्टम बन गया है. जहां भी मुझे पोस्ट किया जाएगा, मुझे इसके खिलाफ लड़ना होगा, बिना किसी समर्थन के,” रिंकू सिंह रही ने दिप्रिंट को बताया.
कांग्रेस, AAP और अब बीजेपी ने चारदीवारी वाले शहर को फिर से बेहतर बनाने का वादा किया. रीडेवलपमेंट एजेंसी एसआरडीसी के तहत, यह दिल्ली का सबसे पुराना राजनीतिक वादा है और सबसे लंबे समय से अधूरा काम भी.