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Thursday, 23 July, 2026
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‘तब हमारे साथ कोई नहीं था’: CJP आंदोलन के बीच जामिया के छात्रों ने याद की 2019 की पुलिस कार्रवाई

CAA-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस की पिटाई का शिकार हुए जामिया के छात्रों को CJP मार्च में 2019 की झलक दिखती है—और साथ ही, लोगों की प्रतिक्रिया में ज़बरदस्त फ़र्क भी नज़र आता है.

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30 वर्षीय वकार पिछले कई दिनों से जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के छात्र आंदोलन की हर अपडेट अपने फोन पर देख रहे हैं. सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करते हुए वे यह सुनिश्चित करते हैं कि आंदोलन से जुड़ी कोई भी खबर उनसे छूट न जाए. वे खुद भी इस प्रदर्शन में शामिल होना चाहते थे, लेकिन 2019 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हुए सीएए विरोधी आंदोलन की अपनी यादों ने उनके कदम रोक दिए.

सोमवार को जब संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों को तितर-बितर करने के लिए दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, तो जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कई छात्रों को यह मंजर सात साल पहले की याद दिला गया. हालांकि, उनके मुताबिक इस बार एक बड़ा फर्क भी था.

वकार कहते हैं, “जैसे ही हमारा आंदोलन शुरू हुआ था, हमें देशविरोधी करार दे दिया गया. उस समय सिर्फ हमारे परिवार और दोस्त ही हमारे साथ खड़े थे. हमारे समुदाय की महिलाओं ने भी हमारा साथ दिया. जब पुलिस छात्रों पर हमला कर रही थी, तब वे हमारे बचाव में पुलिस के सामने खड़ी हो गईं. लेकिन आज पूरा देश छात्रों के साथ खड़ा है—सेलिब्रिटी से लेकर राजनेताओं तक, हर कोई उनका समर्थन कर रहा है.”

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ देशभर में चल रहे प्रदर्शनों के दौरान 15 दिसंबर 2019 को दिल्ली पुलिस हिंसा और आगजनी में कथित रूप से शामिल लोगों का पीछा करते हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया के परिसर में दाखिल हुई थी. छात्रों का आरोप था कि पुलिस बिना अनुमति कैंपस में घुसी और विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी समेत कई शैक्षणिक इमारतों के भीतर लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, जिससे कई छात्र घायल हो गए.

A protester is carried away as Delhi Police carry out lathicharge during the CJP march to Parliament | Praveen Jain | ThePrint
CJP के संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस की लाठीचार्ज में एक प्रदर्शनकारी को ले जाया जा रहा है | प्रवीण जैन | दिप्रिंट

वकार का कहना है कि उस समय छात्रों को देशविरोधी कहा गया और कई छात्रों की गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तारी ने लोगों के मन में ऐसा डर बैठा दिया कि बाद के किसी भी आंदोलन में शामिल होने से पहले वे कई बार सोचने लगे.

वे कहते हैं, “जंतर-मंतर पर भी पुलिस ने छात्रों को पीटा और जामिया में भी. लेकिन जामिया कैंपस के भीतर जो कुछ हुआ, उसने हममें से कई लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भविष्य में किसी भी प्रदर्शन में शामिल होने से पहले सौ बार सोचें.”

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन की शुरुआत 16 मई 2026 को अभिजीत दीपके ने ऑनलाइन की थी. इसकी पृष्ठभूमि उस टिप्पणी से बनी, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कुछ बेरोजगार युवाओं की तुलना “कॉकरोच” से की थी. इस बयान के बाद युवाओं में भारी नाराजगी फैल गई. इसके बाद 6 जून को जंतर-मंतर पर पहला संगठित प्रदर्शन हुआ, जो बाद में NEET 2026 पेपर लीक मामले में कार्रवाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने में बदल गया.

जामिया के प्रदर्शनकारी नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ अपना विरोध करते हुए | ANI

20 जुलाई को CJP ने “संसद चलो” मार्च निकाला. जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे इस मार्च को दिल्ली पुलिस ने रास्ते में रोक दिया, कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और इसके बाद दोनों पक्षों के बीच झड़प हुई.

हालांकि इस बार पुलिस की कार्रवाई की देशभर में आलोचना हो रही है, लेकिन जामिया की एक अन्य छात्रा निदा कहती हैं कि 2019 में हालात बिल्कुल अलग थे.

वे कहती हैं, “तब लोग नारे लगाते थे—’दिल्ली पुलिस लाठी बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं.‘ आज हर कोई पुलिस की बर्बरता की आलोचना कर रहा है. लेकिन जब जामिया के छात्रों को पीटा जा रहा था, तब किसी ने आवाज क्यों नहीं उठाई? क्या इसकी वजह यह थी कि हममें से ज्यादातर मुसलमान थे?”

‘आज तक किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया’

15 दिसंबर 2019 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में कानून के छात्र रहे मोहम्मद मिन्हाजुद्दीन अपने दोस्तों के साथ यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे. तभी दिल्ली पुलिस कैंपस में दाखिल हुई और लाठीचार्ज शुरू कर दिया.

लाठी का एक वार मिन्हाजुद्दीन के चेहरे पर लगा, जिससे उनकी बाईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई.

करीब सात साल बाद, जब उन्होंने जंतर-मंतर पर छात्रों के खिलाफ दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के वीडियो देखे, तो पुरानी यादें फिर ताजा हो गईं. उनके मुताबिक दोनों घटनाओं में समानता सिर्फ पुलिस हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि जवाबदेही की कमी भी उतनी ही बड़ी समानता है.

वे कहते हैं, “मैं अपनी एक आंख खो चुका हूं और आज भी इंसाफ के लिए लड़ रहा हूं. 2019 की पुलिस कार्रवाई के लिए आज तक किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया. मुझे नहीं लगता कि 2026 की घटना में भी किसी पर कोई जवाबदेही तय होगी.”

अब जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पीएचडी रिसर्चर मिन्हाजुद्दीन 2019 की पुलिस कार्रवाई में लगी चोटों के लिए जिम्मेदारी तय कराने की मांग को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में अपना मुकदमा लड़ रहे हैं.

वे कहते हैं, “हमने अदालत में वीडियो और दूसरे सबूत जमा किए हैं, जिनसे साफ दिखता है कि पुलिस ने किस तरह बर्बरता की और मेरी आंख कैसे चली गई. लेकिन पुलिस आज भी इन घटनाओं से इनकार कर रही है.”

मिन्हाजुद्दीन बताते हैं कि इस चोट ने उनकी जिंदगी के हर पहलू को प्रभावित किया. इलाज का खर्च उठाना उनके लिए बेहद मुश्किल हो गया था और मेडिकल खर्चों के लिए उन्हें लोगों से मिली आर्थिक मदद पर निर्भर रहना पड़ा. एक आंख की रोशनी चले जाने के बाद सड़क पार करने जैसे रोजमर्रा के साधारण काम भी उनके लिए काफी कठिन हो गए. वर्षों बाद भी अदालत में चल रही यह कानूनी लड़ाई हर सुनवाई के साथ उन पुराने जख्मों को फिर हरा कर देती है.

वे कहते हैं, “हर बार जब मैं अदालत जाता हूं, तो ऐसा लगता है जैसे मैं उसी दिन को फिर से जी रहा हूं.”

मिन्हाजुद्दीन का कहना है कि जामिया में निहत्थे छात्रों पर हुई पुलिस हिंसा के बावजूद उस समय इंसाफ की मांग करने वालों के समर्थन में न तो आम जनता का बड़ा जनसमर्थन दिखा और न ही राजनीतिक स्तर पर कोई मजबूत आवाज उठी.

वे कहते हैं, “अगर उस समय पूरा देश पुलिस कार्रवाई के खिलाफ हमारे साथ खड़ा होता, तो शायद आज जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ पुलिस वही बर्बरता दोहराने की हिम्मत नहीं करती.”

पुराने जख्म, नया आंदोलन

सड़कों पर हाथों में लाठियां लिए पुलिसकर्मी तैनात थे. हवा में आंसू गैस फैली हुई थी. पुलिस के भीड़ की ओर बढ़ते ही छात्र घबराकर इधर-उधर भागने लगे और एक-दूसरे को बचाने की कोशिश करने लगे. इस अफरातफरी में कुछ छात्र गिर पड़े, जबकि कई को पुलिस घसीटकर ले गई. यह सब 20 जुलाई को CJP के ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हुआ.

कुछ ही घंटों में लोगों ने इस घटना की तुलना 2019 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हुए आंदोलन से करनी शुरू कर दी. सोशल मीडिया पर भी 2019 के जामिया आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो तेजी से साझा किए जाने लगे. सात साल के अंतराल के बावजूद दोनों घटनाओं की तस्वीरों को साथ रखकर लोग दिखा रहे थे कि कैसे दोनों मौकों पर छात्रों को पुलिस की लाठियों का सामना करना पड़ा. हालांकि, कई लोगों ने यह भी कहा कि दोनों आंदोलनों के बीच सबसे बड़ा फर्क उन्हें मिले जनसमर्थन का था.

दोनों आंदोलनों की तुलना करते हुए एक इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा था, “हम तो आज भी आपके साथ खड़े हैं, लेकिन हमारे साथ उस वक्त कोई नहीं खड़ा था.”

सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में छात्र हाथ ऊपर उठाकर आत्मसमर्पण की मुद्रा में खड़े दिखाई देते हैं, जबकि उनके सामने हथियारबंद पुलिसकर्मी मौजूद हैं. एक अन्य वीडियो में पुलिसकर्मी एक छात्र को सड़क पर घसीटते हुए बार-बार लाठियों से पीटते नजर आते हैं. उसे बचाने के लिए हिजाब पहनी कुछ छात्राएं आगे बढ़ती हैं और पुलिस के सामने ढाल बनकर खड़ी होने की कोशिश करती हैं.

ऐसी ही एक इंस्टाग्राम पोस्ट के कैप्शन में लिखा था, “अगर 20 जुलाई को लोकतंत्र की हत्या के तौर पर याद किया जाएगा, तो जामिया मिल्लिया इस्लामिया में जो हुआ, वह भी उसी कहानी का हिस्सा है.”

एक अन्य पोस्ट में 2019 के शाहीन बाग और जामिया आंदोलन के दौरान घायल हुए लोगों की तस्वीरें थीं. किसी के सिर, किसी की आंख, किसी के हाथ और किसी के पैर पर गंभीर चोटें दिखाई दे रही थीं. पोस्ट पर लिखा था, “जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे, जो खुद पे गुज़रे तो लोग समझे.”

Glass lies shattered near the door to the Jamia Millia Islamia library after the police lathi-charged students in December 2019 | File photo: Manisha Mondal | ThePrint
दिसंबर 2019 में पुलिस द्वारा छात्रों पर लाठीचार्ज किए जाने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया लाइब्रेरी के दरवाज़े के पास टूटा हुआ कांच पड़ा है | फ़ाइल फ़ोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

30 वर्षीय आसिफ इकबाल तन्हा 2019 के सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया में फारसी (पर्शियन) में बीए की पढ़ाई कर रहे थे. उनका कहना है कि उस समय पुलिस की कार्रवाई काफी ज्यादा आक्रामक थी और उसने छात्रों के परिवारों को भी निशाना बनाया.

तन्हा कहते हैं, “छात्रों के परिवारों से पूछताछ की गई, उनके घरों पर छापे मारे गए और छात्रों के खिलाफ जांच शुरू की गई.” तन्हा बाद में 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में आरोपी बनाए गए थे और उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया गया था.

वे कहते हैं, “जिन छात्रों के खिलाफ एफआईआर और मुकदमे दर्ज हुए थे, वे आज भी उनकी वजह से परेशानियां झेल रहे हैं. कई छात्रों को विश्वविद्यालय ने ब्लैकलिस्ट कर दिया, जबकि कुछ लोग आज भी अदालत में चल रहे मामलों की वजह से न शहर छोड़ सकते हैं और न ही देश.”

वकार का कहना है कि जामिया की घटनाओं का असर आज भी छात्रों के मन में साफ दिखाई देता है.

वे कहते हैं, “आज भी कई लोग UAPA के मामलों का सामना कर रहे हैं. सात साल बाद भी हममें से कई लोगों की जिंदगी जैसे ठहर-सी गई है.”

उनके मुताबिक, “बहुत कुछ नहीं बदला है. आज भी अगर चार छात्र एक साथ खड़े हो जाएं, तो पुलिस उन पर नजर रखने लगती है. किसी बैठक या प्रदर्शन की अनुमति मांगने पर छात्रों को नोटिस भेज दिए जाते हैं.”

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों को निशाना बनाते हुए दिल्ली पुलिस | वीडियो ग्रैब

वकार बताते हैं कि उन्होंने और उनके साथियों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में आवाज उठाने की कोशिश की, लेकिन उसे भी रोक दिया गया.

वे कहते हैं, “हम जामिया के आसपास लोगों को आंदोलन और 20 जुलाई के ‘संसद चलो’ मार्च की जानकारी देने के लिए पर्चे बांट रहे थे. लेकिन पुलिस ने हमारे पर्चे छीन लिए और उन्हें बांटने से रोक दिया.”

वे आगे कहते हैं, “हमें विरोध प्रदर्शन करने की आजादी नहीं है. जैसे ही हम सड़क पर उतरते हैं, हमें आतंकवादी कह दिया जाता है और तरह-तरह के नामों से पुकारा जाने लगता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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