नई दिल्ली: नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को देख रहे पाकिस्तानियों के मन में एक सवाल है और थोड़ी जलन भी—”पाकिस्तान में ऐसा क्यों नहीं होता?”
ज्यादातर युवाओं की अगुआई में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में नीट पेपर लीक के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन ने देश और दुनिया का ध्यान खींचा है. सीमा के उस पार पाकिस्तान में भी लोग इसे हैरानी से देख रहे हैं. गाने, नारे और आंदोलन का मुद्दा—हर चीज़ पर चर्चा हो रही है.
लोग पूछ रहे हैं कि पाकिस्तान के युवा सड़कों पर क्यों नहीं उतरते? इस्लामाबाद के डी-चौक (डेमोक्रेसी चौक) पर क्रिकेट मैच की लाइव स्क्रीनिंग के अलावा किसी मुद्दे पर इतनी बड़ी भीड़ क्यों नहीं जुटती? कंटेंट क्रिएटर मुहम्मद वलीद के मुताबिक, इसका जवाब यही है कि “पाकिस्तान में शुरू से कभी असली लोकतंत्र था ही नहीं.”
Dawn के पूर्व संपादक सिरिल अल्मेडा ने जंतर-मंतर के प्रदर्शन को “रावलपिंडी के लिए चेतावनी” बताया. रावलपिंडी में ही पाकिस्तान का GHQ यानी सेना मुख्यालय है.
‘हमारे देश में ऐसी क्रांति नहीं आती’
कुछ लोग भारत और पाकिस्तान में पुलिस की सख्ती की भी तुलना कर रहे हैं.
कंटेंट क्रिएटर मुहम्मद वलीद ने इंस्टाग्राम पर एक लंबे वीडियो में बताया कि पाकिस्तानी युवा भारतीयों से क्या सीख सकते हैं.
उन्होंने कहा, “अगर एहतिजाज (प्रदर्शन) करना है तो बड़े स्तर पर करना चाहिए.” उन्होंने कहा, “पाकिस्तानी कभी अपना इरादा नहीं दिखा पाते. उनका रवैया होता है- ‘हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.’ वे सिर्फ डिग्री लेकर देश छोड़ने की बात करते रहते हैं. यह हार मानने वाली सोच है.”
एक और पाकिस्तानी कंटेंट क्रिएटर नोमी सैयद ने कहा कि पूरे दक्षिण एशिया में “बांग्लादेशी बदलाव ला सकते हैं, भारतीय प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान में ऐसे लोग नहीं हैं.”
उन्होंने कहा, “हमारे मुल्क में ऐसा कोई इंकलाब नहीं आता.”
एक और मशहूर इन्फ्लुएंसर महवाश एजाज़ ने कहा कि भारत के प्रदर्शनों की एक खास बात है. “वे वंदे मातरम् गाते हैं और देश की भलाई के लिए प्रदर्शन करते हैं, लेकिन पाकिस्तान में लोगों को ‘अलगाववादी’ कह दिया जाता है.”
उन्होंने आगे कहा, “फिर हम कहते हैं कि तुम यहां क्या कर रहे हो?”
हालांकि, हर कोई इससे सहमत नहीं था. मानवाधिकार पत्रकार अलिफिया सोहैल ने कहा, “आप पाकिस्तान के प्रदर्शनों की बात बिल्कुल वैसे ही करते हैं, जैसे भारतीय मीडिया भारत के प्रदर्शनों की बात करता है.”
क्रिएटर अहसान मिर्जा ने एक मैसेज शेयर करते हुए कहा, “पाकिस्तानी छात्र आपके साथ हैं. अगर छात्र ही छात्रों का साथ नहीं देंगे, तो कौन देगा? हम सब एक हैं. हम भी उसी तरह के दमन का सामना करते हैं, जैसा आप करते हैं. हमारे ऊपर भी एक्सपायर हो चुके आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं. हमारे यहां तो सरकार हालात और भी खराब कर देती है.”
उन्होंने सलाह भी दी, “अगर हालात बिगड़ जाएं, तो खुद को भगत सिंह मत समझना. अपनी जान बचाकर भाग जाना. यह बहुत जरूरी है.”
‘पाकिस्तान में हर ढाई साल में प्रधानमंत्री बदल जाता है’
एक्स पर कई लोग पुराने तर्कों से परेशान हैं. GenZ अब उन्हें मानने को तैयार नहीं है.
एक्स यूजर शिंज़ा ने लिखा, “पाकिस्तानी तानाशाह भारत का मुद्दा उठाते हैं. भारतीय तानाशाह पाकिस्तान का मुद्दा उठाते हैं. मैं इसे साबित तो नहीं कर सकता, लेकिन ये सब अंदर ही अंदर मिले हुए हैं.”
फिर दोनों देशों की तुलना करते हुए गुस्सा भी सामने आया.
एक्स यूजर अब्दुल्ला ने लिखा, “भारत के क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर खुलकर अपने लोगों के साथ खड़े हैं और अपनी सरकार से जवाब मांग रहे हैं. वहीं यहां हमारे इन्फ्लुएंसर हमेशा सत्ता में बैठे लोगों की आवाज बनने के लिए तैयार रहते हैं. बस मौका मिलने का इंतजार करते हैं. इनमें कोई हिम्मत नहीं है.”
कुछ लोग अपने मीडिया से भी परेशान हैं. पड़ोसी देश में सीजेपी के प्रदर्शन पर टीवी डिबेट सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है.
पत्रकार रऊफ क्लासरा ने एक्स पर एक टीवी शो का वीडियो शेयर करते हुए कहा, “पाकिस्तान में 2002 से हर ढाई साल में प्रधानमंत्री बदल जाता है, इसलिए यहां हालात कभी ऐसे नहीं बनते कि दंगे या अशांति करके सरकार गिरानी पड़े. पाकिस्तान में 1985 से सरकार बदलना या गिरना लगातार होता रहा है, इसलिए लोगों को प्रदर्शन करने की जरूरत भी महसूस नहीं होती. नया प्रधानमंत्री, नई उम्मीद… फिर ढाई साल बाद फिर बदलाव.”
सीजेपी प्रदर्शन
इस समय पाकिस्तान में भी पीओके और दूसरे अशांत इलाकों में कई प्रदर्शन हो रहे हैं. इस पर पत्रकार सवाल उठा रहे हैं कि अपने देश के प्रदर्शनों पर प्राइम टाइम में कभी चर्चा क्यों नहीं होती.
बाकी लोगों ने इस पूरे मामले पर मजाक का सहारा लिया. पाकिस्तान के मुरी की रहने वाली 22-वर्षीय अमशा ने लिखा, “BJP का यह कहना कि जंतर-मंतर के प्रदर्शन को पाकिस्तान फंड कर रहा है, बहुत मजेदार है. पाकिस्तान पहले अपने शिक्षा क्षेत्र को तो फंड कर ले.”
इस महीने की शुरुआत में नई दिल्ली में प्रदर्शन शुरू हुआ था, जब व्यंग्यात्मक सीजेपी ने नीट पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू किया. भारतीय शिक्षाविद सोनम वांगचुक ने अनशन का ऐलान किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया.
18 जुलाई को जब दिल्ली पुलिस उन्हें जबरन वहां से ले गई, तो उसके बाद मानसून सत्र शुरू होने के साथ ही हजारों प्रदर्शनकारी संसद मार्च के लिए इकट्ठा हो गए.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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