नई दिल्ली: जब 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों की घोषणा हुई, तो सभी चुनाव लड़ने वाली पार्टियां जानती थीं कि राष्ट्रीय राजधानी में सत्ता की चाबी महिला मतदाताओं के हाथ में है. इसलिए सभी पार्टियां उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए दौड़ पड़ीं. उन्होंने हर महीने नकद मदद, मुफ्त बस यात्रा और अलग पेंशन योजनाओं जैसे वादे किए.
डेढ़ साल से ज्यादा समय बाद, दिल्ली की बीजेपी सरकार ऐसा ही एक वादा लागू करने जा रही है, लेकिन इसमें कई तरह की शर्तें लागू हैं.
दिल्ली लक्ष्मी योजना, जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) की महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये की सहायता दी जाएगी, इसमें पात्रता और अपात्रता की कई शर्तें हैं. साथ ही यह भी बताया गया है कि इस पैसे का इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए. अधिकारियों के अनुसार, इस योजना का फायदा करीब 17 लाख महिलाओं तक पहुंचने की उम्मीद है. इसमें 21 से 60 साल की उम्र की वे महिलाएं शामिल होंगी, जिनके परिवार की सालाना आय 2.5 लाख रुपये तक है और जो कम से कम 10 साल से दिल्ली में रह रही हैं.
लेकिन जिस महिला के तीन से ज्यादा बच्चे हैं, या जो इनकम टैक्स भरती है या GST रिटर्न दाखिल करती है, या जिसके परिवार के पास चार पहिया वाहन है, या जिसके परिवार की बिजली खपत 2,400 यूनिट से ज्यादा है, या जिसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड है, वह इस योजना के लिए पात्र नहीं होगी.
आवेदन करने वाली महिलाओं को अपने क्षेत्र के सांसद या विधायक से समर्थन पत्र भी जमा करना होगा. हर आवेदन चार चरणों की जांच प्रक्रिया से गुजरेगा.
और जब कोई महिला इन सभी शर्तों को पूरा करके योजना के लिए योग्य भी हो जाती है, तब भी उसे यह पैसा सीधे अपने बैंक खाते में नहीं मिलेगा. इसके बजाय उसे लाभ पाने के लिए दो विकल्प दिए जाएंगे. वह या तो पूरे 2,500 रुपये को रिकरिंग डिपॉजिट (RD) या फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में जमा करवा सकती है, या फिर सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) वॉलेट के जरिए 1,000 रुपये ले सकती है और बाकी 1,500 रुपये RD या FD खाते में जमा कर दिए जाएंगे.
और अगर वह दूसरा विकल्प चुनती है, तो भी वह तय नहीं कर सकती कि वह इस पैसे को किस चीज पर खर्च करेगी. CBDC वॉलेट में पहले से ही उन सामानों और सेवाओं की सूची होगी, जिन पर यह पैसा खर्च नहीं किया जा सकता. इसमें शराब, तंबाकू उत्पाद और लॉटरी टिकट शामिल हैं.
चुनावों से जुड़े मुफ्त लाभों का सफर ज्यादातर राज्यों में लगभग एक जैसा होता है. चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़े और खुले वादे किए जाते हैं. लेकिन जब पार्टी सत्ता में आती है, तो आर्थिक सीमाओं के कारण हकीकत सामने आती है. फिर यह महसूस होता है कि पूरा वादा निभाना संभव नहीं है. इसके बाद ऐसी योजना सामने आती है, जो उस वादे की सिर्फ एक कमजोर छाया रह जाती है, जिसके आधार पर इसे शुरू किया गया था.
महाराष्ट्र में भी सत्ता बनाए रखने के लिए बीजेपी के नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने 2024 में मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना के तहत महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये देने का वादा किया था. अपने वादे को मजबूत दिखाने के लिए चुनाव से पहले कई महीनों तक 2.3 करोड़ से ज्यादा लाभार्थियों को 1,500 रुपये की मासिक किस्त दी गई.
हालांकि, इसके बाद योजना के लाभार्थियों की संख्या घटकर 1.66 करोड़ रह गई. करीब 81 लाख पंजीकृत लाभार्थियों को ई-KYC जांच के बाद योजना से हटा दिया गया, क्योंकि उन्हें पात्र नहीं पाया गया. हटाए गए लोगों में ज्यादा उम्र वाली महिलाएं, वाहन मालिक, सरकारी कर्मचारी और यहां तक कि 14,000 पुरुष भी शामिल थे.
इसी तरह, बिहार सरकार की पहल मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2025 में चुनाव से एक महीने पहले शुरू किया था. इसके तहत बिहार की 75 लाख महिलाओं के बैंक खातों में 10,000 रुपये भेजने की योजना थी.
इस योजना में आगे के चरणों में 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त आर्थिक मदद मिलने की संभावना का वादा किया गया था. लेकिन अभी तक ये किस्तें महिलाओं तक नहीं पहुंची हैं.
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले, समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने ‘नाम लिखवाओ’ अभियान के तहत लोगों के नाम दर्ज किए थे, ताकि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो 300 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ मिल सके.
उस समय बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनवरी में घोषणा की थी कि योजना की दूसरी किस्त जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. लेकिन राज्य में विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सरकार के खजाने खाली हैं और किस्तें जारी नहीं हुई हैं.
विश्लेषकों और खुद राजनीतिक दलों के अनुसार, इन योजनाओं को अक्सर सत्ता में आने का कारण माना जाता है. लेकिन चुनावों के दौरान किए गए वादों की तुलना में इनका असली लागू होना काफी अलग होता है. चाहे महाराष्ट्र की महायुति सरकार हो, दिल्ली और हरियाणा की बीजेपी सरकार हो, पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार हो या कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार हो.
राज्य सरकार के लिए बड़े स्तर पर चुनावी वादों को लागू करना कई बार दोधारी तलवार साबित होता है. उदाहरण के लिए, महिलाओं को 1,000 रुपये देने के अपने वादे को लागू न कर पाने से आम आदमी पार्टी सरकार की छवि को सिर्फ पंजाब में ही नहीं बल्कि दिल्ली में भी नुकसान पहुंचा.
लेकिन कर्नाटक में पांच चुनावी गारंटियों को लागू करने के कारण तत्कालीन उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने माना कि राज्य के पास विकास कार्यों के लिए पैसे नहीं बचे हैं. इन गारंटी योजनाओं का राज्य के विकास पर सीधा असर पड़ा. 2025 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में कहा गया कि इन योजनाओं के कारण 2023-24 में बुनियादी ढांचे पर होने वाला पूंजीगत खर्च करीब 5,229 करोड़ रुपये कम हो गया.
केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस बताते हैं कि जब भी चुनाव होते हैं, ऐसी नीतियों की चर्चा ज्यादा होती है. लेकिन आखिर में सभी सरकारों को राजकोषीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन (FRBM) नियमों और उपलब्ध आर्थिक संसाधनों के अनुसार काम करना पड़ता है.
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हमें ऐसी घोषणाओं को थोड़ा सावधानी से लेना चाहिए, क्योंकि ये सिर्फ घोषणाएं होती हैं. आखिर में अगर आप देखते हैं कि वास्तव में क्या दिया गया, तो वह इस बात पर निर्भर करता है कि बजट में कितनी गुंजाइश है. राज्यों को अपने राजकोषीय घाटे के अनुपात के अनुसार ही चलना पड़ता है.”
2024 लोकसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त सुविधाएं बांटने के विरोध में प्रदर्शन करते हुए सुबह-ए-बनारस के सदस्य बैनर पकड़े हुए थे.
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दो राज्यों की कहानी: दिल्ली और पंजाब
जब आम आदमी पार्टी ने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों में चुनावी मैदान में कदम रखा, तो वह राज्य में कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के मुकाबले एक बड़ी विकल्प के रूप में उभरी. उनकी पांच गारंटियों में से एक 18 साल या उससे अधिक उम्र की महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये देने का वादा था.
लेकिन इसके बाद अगले चार साल तक यह वादा पूरा होने का इंतजार चलता रहा. इसका असर 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल के अभियान पर भी पड़ा हो सकता है, जिसमें आम आदमी पार्टी बीजेपी से हार गई.
हालांकि आम आदमी पार्टी सरकार ने इस वादे को पूरा करने में देरी के लिए खुले तौर पर आर्थिक परेशानी को जिम्मेदार नहीं बताया, लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था लंबे समय से चिंता का विषय रही है. महंगाई को ध्यान में रखने के बाद राज्य का राजस्व घाटा 1990-91 में 544 करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 24,588 करोड़ रुपये हो गया, यानी यह पांच गुना बढ़ गया. वहीं कर्ज और राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का अनुपात हाल के अनुमानों में 45 प्रतिशत से 47 प्रतिशत के बीच रहा है.
राज्य के 2026-27 बजट में इसके 45.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा है.
यह योजना 1 जुलाई को ही शुरू की गई, जब अगले पंजाब चुनावों में कुछ महीने बाकी थे. सरकार ने ‘मावां धियां सत्कार योजना’ शुरू की, जिसके तहत सामान्य वर्ग की महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये और अनुसूचित जाति की महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया गया. वित्त वर्ष 2026-27 के लिए इस योजना के लिए 9,300 करोड़ रुपये का अलग बजट रखा गया. वहीं पंजाब का कुल बकाया कर्ज वित्त वर्ष 2026-27 में 4.50 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंचने का अनुमान है.
इस योजना की घोषणा 2026-27 के बजट में की गई थी. पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने इसे “सारी गारंटियां पूरी करने वाला बजट” बताया था. उन्होंने कहा था कि पंजाब की 97 प्रतिशत वयस्क महिलाएं इस योजना के लिए पात्र होंगी.
शुरुआत में करीब 36 लाख महिलाओं के बैंक खातों में पैसा भेजा गया और तीन महीनों की किस्त एक साथ जारी की गई. वहीं जिन महिलाओं ने रजिस्ट्रेशन कराया है लेकिन अभी तक पैसा नहीं मिला है, उन्हें भरोसा दिया गया है कि उन्हें 1 अगस्त को किस्त मिल जाएगी.
कर्नाटक की मुश्किल स्थिति
जहां पंजाब का वादा अपने पांच साल के कार्यकाल में से चार साल तक सिर्फ कागजों पर ही रहा, वहीं कर्नाटक में इसके बिल्कुल उलट हो रहा है. यहां सरकार अपने वादों को लागू कर रही है, लेकिन इसकी आलोचना इस बात के लिए हो रही है कि यह विकास की कीमत पर किया जा रहा है.
कांग्रेस पार्टी के लिए जून 2023 में कर्नाटक में मिली जीत ऐतिहासिक थी. यह उस पार्टी के लिए वापसी जैसी थी, जो 2014 में केंद्र की सत्ता बीजेपी के हाथों गंवाने के बाद से कई राज्यों में लगातार कमजोर होती जा रही थी. पार्टी ने सिर्फ 135 सीटें ही नहीं जीतीं, बल्कि उसे कर्नाटक में 1989 के बाद सबसे ज्यादा वोट शेयर भी मिला.
हालांकि जीत के दो महीने बाद ही राज्य सरकार विपक्ष के निशाने पर आ गई, जब उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि राज्य के पास विकास कार्यों के लिए पैसे नहीं हैं, क्योंकि सरकार ने पांच चुनावी गारंटियों को लागू करने के लिए 40,000 करोड़ रुपये का बजट रखा है. इन गारंटियों में हर महीने 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली, हर महीने 10 किलो मुफ्त चावल, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, परिवार की महिला मुखिया को हर महीने 2,000 रुपये और बेरोजगार ग्रेजुएट और डिप्लोमा धारकों को हर महीने 2,000 रुपये का भत्ता शामिल था.
इस साल फरवरी में डीके शिवकुमार ने कथित तौर पर माना कि ये गारंटियां राज्य के खजाने पर “बोझ” हैं, लेकिन इन्हें जारी रखा जाएगा. हालांकि उन्होंने यह संकेत दिया कि सूची में कुछ कटौती की जा सकती है. उन्होंने कहा कि कई लोग ‘मृत लोगों’ के नाम पर भी लाभ ले रहे थे.
पिछले महीने उन्होंने घोषणा की कि लाभार्थियों को योजना का लाभ जारी रखने के लिए नए आवेदन जमा करने होंगे. यह लाभार्थियों की सूची को व्यवस्थित करने की एक और कोशिश थी.
इस बीच, इन योजनाओं पर खर्च 2025-26 में अनुमानित 51,034 करोड़ रुपये है, जो राज्य के कुल खर्च का 14 प्रतिशत है. वहीं 2026-27 में यह खर्च 51,286 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो कर्ज चुकाने के खर्च को छोड़कर कुल खर्च का 12 प्रतिशत है.
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, जिसमें 2023-24 के राज्य के वित्त की समीक्षा की गई थी, पांचों गारंटी योजनाओं पर 2023-24 में राज्य के राजस्व खर्च का 15 प्रतिशत हिस्सा खर्च हुआ.
इन योजनाओं के कारण पिछले साल की तुलना में खर्च में 12.54 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी हुई, जिससे 9,271 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ.
राज्य का राजकोषीय घाटा 2022-23 में 46,623 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 65,522 करोड़ रुपये हो गया. रिपोर्ट में कहा गया कि गारंटी योजनाओं और उनसे पैदा हुए घाटे को पूरा करने के लिए राज्य ने 63,000 करोड़ रुपये का शुद्ध बाजार कर्ज लिया. यह पिछले साल के शुद्ध कर्ज से 37,000 करोड़ रुपये ज्यादा था.
रिपोर्ट में एक और बात सामने आई. गारंटी योजनाओं के कारण पिछले साल की तुलना में बुनियादी ढांचे पर होने वाला पूंजीगत खर्च करीब 5,229 करोड़ रुपये कम हुआ.
लेन-देन वाली लोकतंत्र व्यवस्था
विशेषज्ञों के अनुसार, चुनावों से जुड़ी मुफ्त योजनाओं का भविष्य कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की जमीनी हकीकत और भारतीय लोकतंत्र के बढ़ते लेन-देन वाले स्वरूप को दिखाता है.
सबनवीस कहते हैं कि सामाजिक कल्याण योजनाओं के रूप में, जिन्हें आमतौर पर ‘मुफ्त की योजनाएं’ कहा जाता है, कई सरकारें महिलाओं के लिए आर्थिक योजनाओं की घोषणा कर रही हैं.
वह कहते हैं, “अब वे कथित तौर पर सूचियों को साफ कर रहे हैं और बहुत सी महिलाओं को बाहर कर दिया गया है. इसलिए पूरे कार्यक्रम की कुल लागत कम हो गई है. अगर आप इसे व्यावहारिक तरीके से देखें, तो सरकारों के पास इन सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए हमेशा सीमित पैसा होता है, खासकर तब जब वे नकद राशि सीधे देने वाली योजनाएं होती हैं.”
सबनवीस कहते हैं कि अगर कोई योजना रोजगार या शिक्षा से जुड़ी है, जैसे मिड-डे मील योजना, तो उसे आमतौर पर जारी रखा जाता है. लेकिन नकद पैसे देने वाली योजनाओं में अक्सर कटौती कर दी जाती है.
वह समझाते हैं, “जब आप सत्ता में आते हैं, तो आप जिम्मेदार बन जाते हैं क्योंकि आपको अपनी सीमाओं के कारण जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. आपकी आय की एक निश्चित सीमा होती है और कर्ज लेने की भी एक सीमा होती है. ब्याज, सब्सिडी, पेंशन और वेतन का भुगतान करना पड़ता है. सरकारें बचे हुए पैसे से ही जितना संभव होता है उतना करती हैं. इसलिए वे योजना पर खर्च कम कर देती हैं, या योजनाओं के नाम बदल देती हैं, या किसी दूसरी योजना का पैसा इसमें लगा देती हैं.”
ज़ाकी रही भावना जैसी
पूरे बिहार को पता है कि मोदी जी और नीतीश कुमार जी बिहार की माताओं-बहनों को अभी 10000 हज़ार का उपहार देना शुरू किए हैं।
बुजुर्ग-विधवा-दिव्यांग को 1100 रुपये हर महीने दे रहे हैं। बेटियों को सरकारी जॉब में 35% डोमिसाइल लागू किया है। पंचायतों में नारीशक्ति को…
— BJP Bihar (@BJP4Bihar) September 29, 2025
दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक चंद्रचूड़ सिंह के अनुसार, राजनीतिक दल अब मतदाताओं को नागरिक नहीं बल्कि ग्राहक की तरह देखते हैं.
वह कहते हैं, “और मतदाता भी यह जानते हैं. भारतीय मतदाता अपने वोट के अधिकार को लेकर बहुत जागरूक हैं, लेकिन असल बात यह है कि वे सशक्तिकरण के लिए वोट देने की उम्मीद नहीं रखते. उन्हें पता है कि जो भी सत्ता में आएगा, उससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आने वाला. इसलिए उस समय जो भी मिल सकता है, वह उनके लिए काफी है.”
सिंह कहते हैं कि ग्राहकों की याददाश्त भी छोटी होती है. “मेरे पिता की पीढ़ी के ग्राहकों की एक ऐसी पीढ़ी थी जो खरीदी गई किसी भी चीज से बहुत जुड़ाव महसूस करती थी. याद कीजिए वह पेन जिसे हम बहुत संभालकर रखते थे. अब आप पेन इस्तेमाल करते हैं और फिर फेंक देते हैं क्योंकि उससे कोई जुड़ाव नहीं होता. मुझे लगता है कि आज जो हो रहा है उसे समझाने के लिए मैं इसी उदाहरण का इस्तेमाल करूंगा.”

‘संकल्प’ को कमजोर करना
सितंबर 2024 में, हरियाणा विधानसभा चुनावों से कुछ हफ्ते पहले, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने रोहतक में बड़े कार्यक्रम के साथ चुनावों के लिए ‘संकल्प पत्र’ जारी किया. इस दस्तावेज में वादा किया गया था कि “हरियाणा की सभी महिलाओं” को हर महीने 2,100 रुपये दिए जाएंगे.
पिछले साल सितंबर में नायब सैनी सरकार ने ‘दीन दयाल लाडो लक्ष्मी योजना 2025’ की अधिसूचना जारी की, जिसमें हर पात्र महिला को हर महीने 2,100 रुपये देने का प्रावधान किया गया.
हालांकि, अधिसूचना में योजना का दायरा काफी कम कर दिया गया. बाद की अधिसूचनाओं में इसे और सीमित कर दिया गया. जनवरी तक 80 लाख संभावित लाभार्थियों में से सिर्फ 10 लाख महिलाओं ने ही योजना के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था.
जब योजना की घोषणा हुई थी, तब इसमें केवल 23 साल या उससे अधिक उम्र की महिलाओं को शामिल किया गया था, जिनके परिवार की प्रमाणित सालाना आय 1 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए थी और जिनके लिए 15 साल तक हरियाणा में रहने की शर्त थी.
इसमें उन महिलाओं को शामिल नहीं किया गया जो योजना में बताई गई 10 सामाजिक सुरक्षा आर्थिक सहायता योजनाओं में से किसी का लाभ ले रही थीं. इसके अलावा ऐसी महिलाओं को भी बाहर रखा गया जो किसी अन्य सरकारी या स्थानीय निकाय से आर्थिक सहायता ले रही थीं, जो सरकार के नियंत्रण में हो, या जो इनकम टैक्स भरती हों.
इस साल जनवरी में कैबिनेट ने योजना में एक और बदलाव किया. इसमें हर महीने मिलने वाले 2,100 रुपये को दो हिस्सों में बांट दिया गया और आधी राशि राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे जमा खाते में रखी जाएगी. यह जमा राशि तय समय पूरा होने के बाद लाभार्थियों को दी जाएगी. जमा की अवधि सरकार तय करेगी, हालांकि यह पांच साल से ज्यादा नहीं हो सकती.
लेकिन अतिरिक्त पात्रता शर्तों के कारण योजना का दायरा थोड़ा बढ़ा भी है. अब वे महिलाएं भी पात्र होंगी जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और कक्षा 10 या 12 की बोर्ड परीक्षा में 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक लाते हैं, या कक्षा 1 से 4 तक निपुण भारत मिशन के तहत अपनी कक्षा के स्तर की योग्यता हासिल करते हैं. इसके अलावा वे माताएं भी पात्र होंगी जो अपने बच्चों को गंभीर या मध्यम कुपोषण से सफलतापूर्वक बाहर निकालती हैं.
ऐसी महिलाओं के लिए सालाना आय की सीमा 1.8 लाख रुपये रखी गई है, जबकि अन्य लाभार्थियों के लिए यह सीमा 1 लाख रुपये है.
नए साल का तोहफा
पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में, कांग्रेस पार्टी ने 2022 में सत्ता में आने से पहले वादा किया था कि वह मुफ्त बिजली की सीमा बढ़ाकर 300 यूनिट करेगी और 18 से 60 साल की सभी महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये देगी.
कांग्रेस के इस वादे से एक महीने पहले, उस समय की बीजेपी सरकार ने राज्य में ‘125 यूनिट मुफ्त बिजली’ योजना शुरू की थी. सरकार ने दावा किया था कि अब 14 लाख से ज्यादा बिजली उपभोक्ताओं का बिजली बिल शून्य आ रहा है.
कांग्रेस ने चुनाव जीत लिया. लेकिन यूनिट बढ़ाने के बजाय, नई सरकार को 2024 तक 125 यूनिट मुफ्त बिजली योजना में भी बदलाव करना पड़ा. इसमें टैक्स भरने वाले उपभोक्ताओं को बाहर कर दिया गया और योजना को ‘एक परिवार एक मीटर’ तक सीमित कर दिया गया.
गंभीर आर्थिक संकट का हवाला देते हुए उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने मीडिया से कहा था कि योजना बीजेपी सरकार ने शुरू की थी, लेकिन इसका बोझ कांग्रेस सरकार को उठाना पड़ा.
2024 में उनके हवाले से कहा गया, “2022-23 में इस योजना पर 900 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. 2023-24 में यह बढ़कर 1,000 करोड़ रुपये हो गया.”
1 जनवरी 2025 को हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अपने राज्य को नए साल का तोहफा देते हुए अपने नाम पर दर्ज सभी पांच बिजली कनेक्शनों पर मिलने वाली सब्सिडी छोड़ दी. इसके साथ ही उन्होंने राज्य के अमीर लोगों से भी अपनी सब्सिडी छोड़ने की अपील की.
इस साल के बजट में, जब अगले साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं, सरकार ने आखिरकार घोषणा की कि वह हर महीने 300 यूनिट मुफ्त बिजली देगी. लेकिन यह सुविधा राज्य के सिर्फ “एक लाख सबसे गरीब परिवारों” को मुख्यमंत्री अपना सुखी परिवार योजना के तहत दी जाएगी.
इन एक लाख परिवारों की “बहनों” को भी हर महीने 1,500 रुपये दिए जाएंगे. इसके लिए ‘इंदिरा गांधी प्यारी बहना सुख सम्मान निधि योजना’ का दायरा चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया जाएगा.
समाचार रिपोर्टों के अनुसार, इस योजना के लिए 1.16 लाख परिवारों की पहचान की गई है. अन्य घरेलू उपभोक्ताओं के लिए राज्य सरकार 125 से 300 यूनिट बिजली खपत वाले स्लैब में हर यूनिट पर 1.72 रुपये की सब्सिडी देती है. इससे उन्हें 5.89 रुपये प्रति यूनिट के वास्तविक टैरिफ की जगह कम भुगतान करना पड़ता है.
जो उपभोक्ता हर महीने 125 यूनिट तक बिजली इस्तेमाल करते हैं, उन्हें आगे भी शून्य बिल मिलता रहेगा. यह सुविधा हर परिवार में अधिकतम दो बिजली मीटर तक जारी रहेगी.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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