करीब तीन हज़ार लोग, शायद उससे भी ज़्यादा, पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर की जलती हुई पहाड़ियों को पार करके पूर्व की तरफ भाग गए थे. वे उस आज़ादी से बच रहे थे जो उन पर थोपी गई थी. सून-पाटोची गांव के किशोर लड़कों को, जैसा कि ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने पाकिस्तान की संविधान सभा में दी गई शिकायत में दर्ज किया, पंजाब पुलिस ने “अप्राकृतिक यौन शोषण” का शिकार बनाया. शिकायत में आगे कहा गया कि महिलाओं के साथ “सिर्फ बलात्कार ही नहीं किया गया, बल्कि कुछ मामलों में उनके स्तन और गुप्त अंगों को भी काटा गया.”
जल्द ही प्रधानमंत्री बनने वाले सरदार अब्दुल कय्यूम ने लिखा कि गांव के बुजुर्गों और सम्मानित लोगों को पहले कोड़े मारे गए, फिर उन्हें रस्सी से बांधकर पलंदरी बाज़ार में घुमाया गया. “उनमें से कुछ को कुत्तों की तरह भौंकने का आदेश दिया गया और बाकी को बिल्लियों की तरह म्याऊं करने पर मजबूर किया गया.”
1955 की हिंसा से तबाह हुए गांवों और कस्बों पर आठ हफ्तों से भी ज़्यादा समय से फिर हमला हो रहा है. पत्रकार हारिस कादिर की रिपोर्ट के मुताबिक, लोकतांत्रिक सुधारों और आर्थिक संसाधनों पर अधिकार की मांग को लेकर शुरू हुए प्रदर्शनों के बाद से अब तक 87 से ज़्यादा लोगों को केंद्रीय और प्रांतीय पुलिस ने गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया है. इन प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाले जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी, यानी JAAC, को जून में आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया.
पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर (PoK) में इस्लामाबाद की ओर से पिछले एक दशक में की गई क्रूर हिंसा पर दुनिया और भारत, दोनों में बहुत कम ध्यान दिया गया है. 1951 से ही, उसी साल जब जम्मू-कश्मीर में पहली लोकतांत्रिक चुनाव हुए थे, पाकिस्तान में शामिल होने के लिए लड़ने वाले नेता उसी नए देश के खिलाफ खड़े हो गए जिसे उन्होंने अपनाया था. PoK के पुंछ के लोग खुद को एक नए मालिक के अधीन पाए, जो उस नफरत के पात्र महाराजा हरि सिंह जितना ही क्रूर था, जिसके खिलाफ उन्होंने विद्रोह किया था.
सून-पाटोची की इस क्रूर हिंसा से पांच साल पहले, खुश गांव वाले और बैंड-बाजे लेकर रावलपिंडी रेलवे स्टेशन पर उन लश्करों का स्वागत करने पहुंचे थे जिन्होंने हत्या और बलात्कार करते हुए श्रीनगर के दरवाज़ों तक पहुंच बनाई थी, लेकिन बाद में भारतीय सेना ने उन्हें पीछे धकेल दिया. एक ब्रिटिश राजनयिक ने लिखा कि ये तथाकथित पवित्र योद्धा “उनके सम्मान में किए गए खुशहाल जश्न को स्वीकार करते थे,” और खुशी में हवा में गोलियां चलाते थे.
फिर उन्हीं तथाकथित आज़ाद कराने वालों की बंदूकें उन लोगों की तरफ मुड़ गईं जिन्हें वे अभी-अभी आज़ाद कराने का दावा कर रहे थे.
एक देश के लिए लड़ाई
हालांकि PoK के प्रदर्शनों को इस्लामाबाद की सत्ता के खिलाफ विद्रोह बताया गया, लेकिन उनकी शुरुआत सिर्फ नागरिक अधिकारों की मांग से हुई थी. सितंबर 2023 में बनी JAAC ने व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों, वकीलों, छात्रों और नागरिक समाज के संगठनों को एक साथ लाकर सस्ते अनाज और इलाके की जलविद्युत से बनने वाली बिजली की कम कीमत की मांग की, क्योंकि पाकिस्तान में तेज़ महंगाई चल रही थी.
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि इस इलाके को लंबे समय से मंगला बांध की रॉयल्टी नहीं दी गई, क्योंकि PoK को पाकिस्तान का प्रांत नहीं माना जाता. हालांकि 2002 में सैन्य शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने रॉयल्टी जैसी कुछ रकम देने की व्यवस्था की थी, लेकिन वह पाकिस्तान के चारों प्रांतों को मिलने वाली रॉयल्टी से कम थी. 2024 के प्रदर्शनों का जवाब पुलिस ने घातक बल प्रयोग से दिया. इसके बाद हुई हिंसा में एक पुलिस अधिकारी भी मारा गया.
धीरे-धीरे ये प्रदर्शन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जवाबदेही जैसे बड़े मुद्दों तक फैल गए. मुख्य मुद्दों में से एक था PoK विधानसभा में उन लोगों के वंशजों के लिए आरक्षित 12 सीटें, जो 1947 के बाद जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान चले गए थे. ये वंशज पाकिस्तान के चारों प्रांतों में फैले हुए हैं. माना जाता है कि इन्हीं सीटों के ज़रिए इस्लामाबाद इस इलाके पर अपनी मर्ज़ी थोपता है.
भारत में कम समझे जाने वाले इस मुद्दे की शुरुआत 1947 से जुड़ी है. उस साल, जब पश्तून कबायली लड़ाकों और पाकिस्तान सेना के जवानों ने कश्मीर पर हमला किया, उससे बहुत पहले ही पुंछ में महाराजा हरि सिंह के शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू हो चुका था. इसके कई कारण थे. इनमें से एक था क्षेत्र की स्वायत्तता का कम होना. 1936 में पुंछ के शासक राजा जगतदेव सिंह को महाराजा हरि सिंह का अधीनस्थ बना दिया गया था. इसके बाद बहुत ज़्यादा कर वसूली शुरू हुई. एक पर्यवेक्षक ने व्यंग्य करते हुए लिखा कि यहां “विधवा कर, पहली पत्नी के बाद हर पत्नी पर कर, और भेड़-बकरियों पर भी कर” लगाया गया.
इन शिकायतों को इस बात ने और बढ़ा दिया कि सेना और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत कम था.
लंदन में पढ़े-लिखे बैरिस्टर, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी, और प्रभावशाली सुधान कबीले के नेता मोहम्मद इब्राहिम खान जैसे स्थानीय नेताओं ने आज़ादी से पहले फैली अव्यवस्था का फायदा उठाया. इब्राहिम खान ने पाकिस्तान की ओर से 1947-1948 में कश्मीर पर कब्ज़ा करने की सैन्य कोशिश का नेतृत्व करने वाले मेजर जनरल अकबर खान के साथ मिलकर पुंछ के बड़ी संख्या में सेवा से मुक्त किए गए ब्रिटिश भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों और कुछ पूर्व भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के सैनिकों को स्वयंसेवक के रूप में तैयार किया.
इब्राहिम खान के मुख्य प्रतिद्वंद्वी अब्दुल कय्यूम खान ने दूसरी ओर महाराजा की सेना के खिलाफ छोटे स्तर का विद्रोह शुरू कर दिया. जवाब में कश्मीर की सशस्त्र सेनाओं ने स्थानीय मुसलमानों के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई की, जिससे लोगों में गुस्सा और बढ़ गया. यह संघर्ष जल्द ही और भयानक रूप ले गया. कश्मीर राज्य की सेना ने पंजाब के सिख रियासतों की निजी सेनाओं के साथ मिलकर चिनाब नदी के दक्षिण के हिंदू बहुल इलाके में बड़े पैमाने पर क्रूर जातीय सफाए का अभियान शुरू किया.
आज़ादी की झूठी शुरुआत
पुंछ के विद्रोहियों के लिए 1947-1948 की लड़ाई एक जीत थी. भले ही पाकिस्तान कश्मीर घाटी और जम्मू के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा करने में नाकाम रहा, लेकिन इब्राहिम खान अब सुधान इलाकों में एक तरह की आज़ाद सरकार चला रहे थे. लेकिन कराची में बैठी पाकिस्तान की संघीय सरकार की कुछ और ही योजना थी. मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के सबसे बड़े नेता चौधरी गुलाम अब्बास, जिनके पाकिस्तान के शासक वर्ग से गहरे संबंध थे और जो नए बने देश के साथ ज़्यादा एकीकरण चाहते थे, 1949 में भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए. इसके बाद वे पीओके के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक नेता बनकर उभरे. दूसरी तरफ, इब्राहिम खान, जिनकी पकड़ आज की लाइन ऑफ कंट्रोल के पश्चिम में फैली कबीलाई राजनीति पर मज़बूत थी, ने विद्रोह शुरू कर दिया.
1949 के आखिर में, दिप्रिंट के पास मौजूद भारतीय सैन्य खुफिया रिपोर्टों में दर्ज था कि पीओके की अंतरिम सरकार सुधान इलाकों में टूट चुकी थी. साथ ही, जो कश्मीरी मुसलमान भारत से पाकिस्तान गए थे, वे सुधान इलाकों में मिले ठंडे व्यवहार से निराश थे.
पाकिस्तान के संस्थापक गवर्नर-जनरल मोहम्मद अली जिन्ना की मौत और प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या के कारण यह संकट कुछ समय के लिए रुक गया. इससे दोनों पक्षों को युद्धविराम करना पड़ा. लेकिन सत्ता को लगातार अपने हाथ में केंद्रित करने की प्रक्रिया जारी रही. 1952 में पीओके सरकार के कामकाज के नियम बदल दिए गए और पाकिस्तान द्वारा नियुक्त नौकरशाह एम. ए. गुरमानी को असली ताकत दे दी गई.
17 महीने से भी ज़्यादा समय तक सुधान विद्रोहियों ने पंजाब पुलिस और पाकिस्तान सेना की मरी मुख्यालय वाली 12 ब्रिगेड की संयुक्त सेना से लड़ाई लड़ी.
उस्मान खान यूसुफजई ने लिखा, “सेना और पुलिस ने बेहद क्रूर तरीके अपनाए. पूरे के पूरे गांव जला दिए गए.” जिन लोगों पर विद्रोहियों का साथ देने का शक था, उनमें से कई को मौके पर ही मार दिया गया. बाकी लोगों पर बिना या बहुत कम सुनवाई के मुकदमे चलाए गए. नया कानून, पल्लंदरी डिस्टर्बेंसेज़ ट्रिब्यूनल एक्ट, सरकार को विशेष नियमों के तहत मुकदमे चलाने का अधिकार देता था. जैसे कि ऐसे लोगों के बयान को भी सबूत मानना जो मौजूद न हों या जिनकी मौत हो चुकी हो. साथ ही दोषी ठहराए गए लोगों को अपील करने का अधिकार भी नहीं दिया गया.
1958 में जनरल अयूब खान के सैन्य तख्तापलट ने पीओके में लोकतंत्र की बची-खुची उम्मीद को भी खत्म कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान के चारों प्रांतों में हुआ.
पाकिस्तान के अधूरे नागरिक
1950 के दशक का विद्रोह पीओके की पाकिस्तान के अधीन रहने के खिलाफ आखिरी कोशिश नहीं था. 1973 में शादी की एक बारात के 50 लोगों की डूबकर मौत हो जाने के बाद, समाजशास्त्री रोजर बैलर्ड ने लिखा कि गांव वालों ने स्थानीय मजिस्ट्रेट और पुलिस के दफ्तरों पर हमला कर दिया और विरोध के तौर पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया. आखिर में, पाकिस्तान की विशेष सेना को पैराशूट के जरिए डडयाल भेजा गया ताकि सरकारी अधिकारियों को बचाया जा सके.
1989 में कश्मीर जिहाद के बाद इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस द्वारा हिजब-उल-मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे इस्लामी संगठनों को बढ़ावा देने से इस इलाके में पाकिस्तान सरकार की पकड़ और मजबूत हो गई.
पीओके में बढ़ते गुस्से का सामना करते हुए, पत्रकार अरीबा फातिमा लिखती हैं कि सत्ता से जुड़े राजनेताओं और सेना ने दमन और बढ़ाने का फैसला किया. देश के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बातचीत की किसी भी संभावना से इनकार कर दिया.
ख्वाजा आसिफ ने कहा, “मैं उन्हें भारत की ही तरह मानता हूं और उन्हें पाकिस्तान का दुश्मन समझता हूं.”
पाकिस्तान की सेना का मानना है कि पहले की तरह वह इस विद्रोह को भी कुचल देगी. हो सकता है वह ऐसा कर भी दे. लेकिन यह साफ है कि सरकारी आतंकवाद उन लोगों के गुस्से को खत्म नहीं कर पाएगा, जिन्हें अपनी ही आज़ादी के नाम पर अधूरी नागरिकता के साथ जीने के लिए मजबूर किया गया है.
प्रवीण स्वामी ‘दिप्रिंट’ में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. ये उनके निजी विचार हैं.
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