इस साल 10 मार्च को ‘रक्षा बलों का विज़न 2047: भविष्य के लिए तैयार भारतीय सेना का रोडमैप‘ जारी किया जाना भारत की रक्षा योजना में मील के एक नए पत्थर जैसा है. भारतीय सेना ने पहली बार अपने लिए एक ऐसी दीर्घकालिक योजना को सार्वजनिक किया है, जो उस ‘सशक्त भारत’ के निर्माण के लिए जरूरी होगी जो कि ‘विकसित भारत-2047’ का आधार बनेगी. इस तरह की पिछली योजना ‘इंडियन आर्मी पर्सपेक्टिव प्लान 2000’ जनरल के. सुंदरजी ने 1986 में पेश किया था. लेकिन वह गोपनीय थी.
लक्ष्य जमीन, समुद्र, हवा, साइबर, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तथा बौद्धिक, आदि सभी दायरों के लिए एकीकृत तथा आपस में जुड़ी सेना तैयार करना है जो गतिशील हो और सोच एवं क्षमताओं के मामले में आत्मनिर्भर हो. वह युद्ध के सभी पहलुओं में उभरती चुनौती का जवाब तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी के बूते देने को तैयार हो ताकि वह राष्ट्रीय शक्ति के सभी तत्वों के साथ तालमेल बिठाते हुए राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा कर सके, उन्हें आगे बढ़ा सके. इस ‘विजन’ को तीन चरणों में साकार करने की योजना है— 2030 तक चरण परिवर्तन का चरण होगा, 2030 से 2040 तक मजबूती का चरण होगा, और 2040 से 2047 तक उत्कृष्टता का चरण होगा.
असली मुद्दा यह है कि क्या भारत औपचारिक प्रक्रिया के तहत, और जिस गति से रणनीतिक तथा तकनीकी परिवेश बदलता है उसके मुक़ाबले ज्यादा तेजी से सेना में परिवर्तन लाने के इस महत्वाकांक्षी ‘विजन’ को साकार कर सकता है. असली चुनौती यही है.
औपचारिक राष्ट्रीय सुरक्षा योजना का अभाव
भारत के पास अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के औपचारिक प्रबंधन के लिए जरूरी सभी उपकरण मौजूद हैं, मसलन—‘कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी’, ‘नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल’ (जिसमें स्ट्रेटेजिक पॉलिसी ग्रुप, नेशनल सिक्योरिटी एड्वाइजरी बोर्ड, ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमिटी शामिल हैं), ‘डिफेंस प्लानिंग कमिटी’, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’, डिपार्टमेंट ऑफ मिलिटरी अफेयर्स’.
हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के इस विशाल ढांचे के बावजूद भारत की कोई औपचारिक राष्ट्रीय सुरक्षा विजन, रणनीति, या रक्षा नीति नहीं है. ये राष्ट्रीय सुरक्षा योजना, और सेना में परिवर्तन की बुनियाद होते हैं.
उपरोक्त बातों के मद्देनजर ‘डिफेंस फोर्सेज़ विजन 2047’ का हश्र तय दिखता है. वह मौजूदा ‘सिस्टम’ के दलदल में फंसकर रह सकता है. नियत समय के अंदर इसे सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी जाएगी ताकि विस्तृत योजना तैयार की जा सके और क्षमता विकास की दीर्घकालिक समेकित योजना पेश की जा सके. लेकिन संभावना यही है कि यह बिना पतवार की नाव बनकर अलग-थलग पड़ी रहे. हरेक बड़े सुधार को एक-एक करके मंजूरी दी जाएगी. प्रगति तो होगी मगर यह किस्तों में, धीरे-धीरे होगी जबकि रणनीतिक तथा तकनीकी परिवेश इससे ज्यादा तेजी से बदलता रहेगा.
भारत को चाहिए संस्थागत राष्ट्रीय सुरक्षा योजना और ऐसी क्रियान्वयन प्रक्रिया जिसके जरिए राजनीतिक लक्ष्यों को राष्ट्रीय सुरक्षा विजन और रणनीति, प्रतिरक्षा नीति, सैन्य रणनीति, क्षमता विकास योजनाओं, बजट, और समयबद्ध क्रियान्वयन में उतारा जा सके.
यह कड़ी इस तरह की हो सकती है : राष्ट्रीय लक्ष्य— राष्ट्रीय सुरक्षा विजन और रणनीति– राष्ट्रीय प्रतिरक्षा नीति, सैन्य रणनीति, सेना में परिवर्तन की योजना— क्षमता विकास योजना—कई सालों तक फंडिंग—क्रियान्वयन— ऑडिट.
राष्ट्रीय सुरक्षा योजना को औपचारिक स्वरूप दें
‘विकसित भारत-2047’ के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा विजन ऐसी औपचारिक विशाल अवधारणा हो जिसमें भू-रणनीति, सैन्य, आर्थिक, संसाधन, ऊर्जा, सूचना तंत्र, खाद्य, स्वास्थ्य, पर्यावरण, और साइबर सुरक्षा आदि सभी तत्व समाहित हों.
सेना रणनीतिक स्वायत्तता पक्की करती है और राष्ट्रीय हितों पर खतरा आने की स्थिति में ‘एनफोर्सर’ की भूमिका निभाती है. राष्ट्रीय सुरक्षा विजन के सैन्य पहलुओं में 2047 तक की अवधि को शामिल किया जाए और उन्हें संभावित रणनीतिक परिवेश और उभरने वाले खतरों को आधार मानकर तय किया जाए.
सेनाओं के मामले में, यह उनमें परिवर्तन के तात्कालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक व्यापक लक्ष्यों को स्पष्ट करे. राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में ज्यादा जोर अल्पकालिक और मध्यकालिक योजनाओं परदिया जाता है,और उनकी आम तौर पर पांच-पांच साल पर समीक्षा की जाती है. दोनों अवधियों से पहले रणनीतिक समीक्षा की जाती है. उन्हीं के मुताबिक सेना में परिवर्तन के लक्ष्य तय किए जाते हैं. व्यापक राष्ट्रीय शक्ति में वृद्धि के साथ सेना के विकास में ज़ोर खतरों से ज्यादा क्षमता निर्माण पर दिया जाने लगता है.
राष्ट्रीय सुरक्षा विजन और रणनीति को औपचारिक स्वरूप देना सरकार की ज़िम्मेदारी है. उसे यह ज़िम्मेदारी उसी तरह उठानी चाहिए जिस तरह वह आर्थिक और वित्तीय योजना की ज़िम्मेदारी निभाती है. उसे राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को लागू करने के लिए जरूरी बजट की व्यवस्था करनी पड़ती है. अगर अर्थव्यवस्था कटौती के लिए मजबूर करती है तब सेना की क्षमता में कमी को औपचारिक तौर पर स्वीकार करना पड़ता है और उसकी कूटनीतिक भरपाई करनी पड़ती है.
तार्किक रूप से तो राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) को इसे औपचारिक स्वरूप देने की ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए, लेकिन पता नहीं क्यों यह ज़िम्मेदारी डिफेंस प्लानिंग कमिटी को दी गई है, जिसके अध्यक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSC) हैं. डिफेंस प्लानिंग कमिटी की अध्यक्षता रक्षा मंत्री को करनी चाहिए और उसे राष्ट्रीय सुरक्षा नीति बनाने और उसे लागू करने पर ज़ोर देना चाहिए.
राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति से ही राष्ट्रीय सुरक्षा विजन या नीति तय होती है, जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा के विशेष लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जरूरी है. यह उस ढांचे को तैयार करती है जो राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को नियोजन, प्रबंधन, और क्रियान्वयन के लिहाज से सेना के निरंतर विकास और सुधार से जोड़ती है. राष्ट्रीय सुरक्षा नीति यह व्यवस्था करती है कि रक्षा बजट का अधिकतम उपयोग सेना की क्षमताओं में वृद्धि, और आज के संदर्भ में सेना में बदलाव के लिए हो. सैन्य रणनीति राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा नीति, दोनों से तय होती है और सेना के वास्तविक इस्तेमाल के मामले को देखती है. इसे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ तैयार करते हैं और रक्षा मंत्री इसे मंजूरी देते हैं.
अवधारणा, नीति, समयसीमा, तालमेल और ऑडिट और क्रियान्वयन के मामलों में यह प्रक्रिया तार्किक रूप से तो ऊपर से नीचे की ओर चलनी चाहिए. लेकिन जवाबदेही से बचने के लिए तमाम सरकारों ने इसे कभी औपचारिक स्वरूप नहीं दिया. नतीजतन, पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रक्रिया के लिए सेना ही जिम्मेदार बन जाती है, जिसके कारण वित्तीय मंजूरी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए बल प्रयोग को छोड़कर बाकी मामलों में निचले स्तर से शुरुआत करने का चलन चल गया है.
मैं फिर दोहराना चाहूंगा कि इस औपचारिक नियोजन प्रक्रिया को अपनाए बिना ‘डिफेंस फोर्सेज़ विजन 2047’ केवल एक महत्वाकांक्षा बनकर ही रह जाएगी.
विजन को लागू करने की योजना चाहिए
‘डिफेंस फोर्सेज़ विजन 2047’ अगले संकट और अधिग्रहण चक्र से आगे की बात करता है और 2050 वाले दशक के युद्ध की तैयारी के लिए दिशानिर्देश देता है. इसमें इन सात व्यापक प्राथमिकताओं पर ज़ोर दिया गया है: युद्ध के लिए तैयार रहना, संगठन में सुधार, क्षमताओं का विकास, सैद्धांतिक समायोजन, रणनीतिक संस्कृति, मानव पूंजी, और प्रतिरक्षा की कूटनीति. यह ज्यादा संयुक्त कार्रवाई, और अंतरिक्ष पर नियंत्रण, साइबर कमांड, डाटा फोर्स, ड्रोन फोर्स, और ‘कोग्निटिव’ युद्ध एक्शन फोर्स जैसी विशिष्ट क्षमताओं की बात करता है.
लेकिन प्रस्तावों के दस्तावेज़ स्वतः लागू नहीं हो जाते. सरकार इसे राष्ट्रीय कार्यक्रम में तब्दील करे, इसे राजनीतिक तौर पर अपनाए, इसके लिए संसाधन उपलब्ध कराए, संस्थागत ज़िम्मेदारी ले, और मूल्यांकन के मानदंड तय करे. वरना ‘विजन 2024’ मौजूदा ‘सिस्टम’ को बदल तो नहीं पाएगा, उलटे ‘सिस्टम’ उसे ही हड़प लेगी.
इसलिए, 2030 तक का जो पहला चरण है वह निर्णायक होगा. मेरे ख्याल से अगले चार वर्षों को 21 वर्षों के सफर की केवल शुरुआत का चरण नहीं माना जा सकता. उन्हें यह व्यवस्था करनी होगी कि बदलाव गति पकड़े. मैं बदलाव के चरण को दो साल और दे सकता हूं. तब तक भारत पांच ठोस नतीजे हासिल कर लेगा.
पहला यह कि थिएटर कमांड और सच्चे संयुक्त ऑपरेशनल कमांड सक्रिय हो जाने चाहिए, उनकी चर्चा मात्र नहीं होती रहेगी.
दूसरा, सेनाओं ने संरचनात्मक परिवर्तन का पहला चरण पूरा कर लिया होगा और ‘इंटिग्रेटेड बैटल ग्रुप्स’ सरीखे तेज तथा टेक्नोलॉजी सक्षम समूहों का गठन कर लिया होगा.
तीसरा, सेना ने ड्रोन, स्वायत्त सिस्टम, AI, साइबर, स्पेस, इलेक्ट्रोनिक युद्ध और दूर तक सटीक मार करने वाले हथियारों को अपनाने जैसा एकमुश्त परिवर्तन ला दिया होगा.
चौधा लड़ाकू विमानों, पनडुब्बियों, एअर डिफेंस, गोला-बारूद और सटीक मार करने वाले हथियारों आदि के मामलों में गंभीर कमियों को तीव्र खरीद और देसी उत्पादन के बूते दूर कर लिया गया होगा.
अंत में, भारत के पास दीर्घकालिक डिफेंस प्लानिंग की कार्यरत व्यवस्था और उसके साथ एकीकृत क्षमता विकास योजना होनी चाहिए जिनके साथ पक्की वित्तीय व्यवस्था जुड़ी हो.
अगर ये पांच लक्ष्य 2032 तक हासिल नहीं होते तो ‘विजन 2047’ कुल मिलाकर महत्वाकांक्षा ही बनी रहेगी.
आगे का रास्ता
भारत को ‘डिफेंस फोर्सेज़ विजन 2047’ के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए 21 साल का समय है. जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, पहला कदम यह होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा योजना और क्रियान्वयन प्रक्रिया चालू हो जाए. सेना में बदलाव तभी शुरू होगा जब राष्ट्रीय सुरक्षा विजन/रणनीति, डिफेंस प्लानिंग नीति, रक्षा बजट, सैन्य रणनीति, परिवर्तन की योजना, और क्षमता विकास योजना को औपचारिक रूप दिया जाएगा, और 21 वर्षीय रक्षा बजट योजना लागू की जाएगी. गाड़ी को घोड़े के आगे रखने से कुछ हासिल नहीं होगा.
मेरा सुझाव यह है कि रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में ‘नेशनल डिफेंस ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन’ का गठन किया जाए जिसकी निगरानी सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी करे. यह ‘डिफेंस फोर्सेज़ विजन 2047’ को संशोधित करके ‘डिफेंस ट्रांसफॉर्मेशन प्लान’ में बदल दे, और इसके लिए 2030-32, 2040, और 2047 के लिए लक्ष्य निश्चित किए जाएं.
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ इसके प्रधान सैन्य सलाहकार हों और डिफेंस सेक्रेटरी प्रधान असैनिक समन्वयकर्ता हों. तीनों सेनाओं के अध्यक्षों, डिफेंस सेक्रेटरी, रक्षा उत्पादन सचिव, डिफेंस आर-ऐंड-डी सेक्रेटरी, वित्तीय विभाग के प्रतिनिधि और सेना के अनुभवी अधिकारियों तथा विशेषज्ञों, उद्योग और शिक्षा जगत के भी प्रतिनिधियों को जोड़ा जा सकता है.
हरेक बड़े सुधार की ज़िम्मेदारी किसी संस्थागत मुखिया को सौंपी जाए, समयसीमा परिभाषित हो, स्वीकृत बजट हो, क्षमता के विकास का मूल्यांकन हो और देरी होने की स्थिति में ऑपरेशन संबंधी जोखिम की पहचान हो. कमीशन प्रगति की तिमाही रिपोर्टें रक्षा मंत्री को दे. रक्षा मंत्री चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, सेना अध्यक्षों, के साथ छ्माही समीक्षा करें और परिवर्तन के बारे में वार्षिक रिपोर्ट सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी और संसद के समक्ष रखें.
एक स्वतंत्र ऑडिट न केवल खर्चों और प्रक्रियाओं के पालन की, बल्कि तय लक्ष्यों को हासिल करने की वास्तविक क्षमता की भी जांच करे. रक्षा मामलों की संसदीय कमिटी को समय-समय पर गोपनीय रिपोर्ट पेश करके संसदीय निगरानी को भी मजबूती दी जाए.
हरेक देरी के लिए किसी-न-किसी की जिम्मेदारी तय की जाए. फंड की कमी के कारण क्षमता में कमी का ऑपरेशन पर पड़ने वाले असर का रिकॉर्ड रखा जाए. इस तरह राजनीतिक ज़िम्मेदारी के सिर्फ दावे नहीं किए जाएंगे बल्कि उसे वास्तविक बनाया जा सकेगा.
एक नेशनल सिक्यूरिटी एक्ट राष्ट्रीय सुरक्षा योजना में शुद्धता, औपचारिकता और जवाबदेही बहाल करने में काफी मदद कर सकता है.
भारत में रणनीतिक मामलों में प्रतिभा, सैन्य अनुभव, या टेक्नोलॉजी के मामले में क्षमता की कमी नहीं है. कमी है संस्थागत सक्रियता की, जो रणनीतिक इरादों को सैन्य क्षमता में बदल सकती है. ‘विजन 2047’ से परिवर्तन आ सकता है, बशर्ते यह केवल दस्तावेज़ बनकर न रह जाए.
निर्णायक परीक्षा 2032 में हो जाएगी. तब तक भारत विजन को लेकर बयानबाजी से आगे बढ़ जाना चाहिए और भावी सेना के लिए आधार बना लेना चाहिए यानी संयुक्त कमांड सक्रिय हो जाएं, सेना का ढांचा बदल जाए, उभरती टेक्नोलॉजी को तेजी से अपनाया जाए, रक्षा उद्योग का मजबूत आधार तैयार हो जाए, और वित्तीय समर्थन के साथ क्षमता विकास की व्यवस्था तैयार हो जाए. यह सब नहीं हुआ तो 2047 के लिए जो सपना देखा जा रहा है वह सपना ही बनकर रह जाएगा.
21वीं सदी के युद्ध टेक्नोलॉजी की गति से लड़े जाएंगे. भारत में सैन्य परिवर्तन प्रक्रियागत गति से नहीं लाया जा सकता.
विजन के दस्तावेज़ प्रेरणा देते हैं, संस्थाएं परिणाम हासिल करती हैं. समय आ गया है कि परिवर्तन सिर्फ सेनाओं में न हो बल्कि उस ‘सिस्टम’ में भी हो जिसके जरिए भारत अपनी सेना में सुधार लाता है.
लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वे नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में GOC-in-C रहे. रिटायरमेंट के बाद, वे आर्म्ड फोर्सेज़ ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.
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