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Saturday, 1 August, 2026
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भारत के Gen Z ने एक दरार बना दी है, यह BJP पर है कि उसे भरे या विपक्ष उसे और चौड़ा करे

युवाओं ने कुलीन तबकों की खुद की ओढ़ी उस चुप्पी को तोड़ दिया, जो उन्हें मोदी सरकार की आलोचना में एक भी शब्द खुलकर बोलने से रोकती थी, और कुछ कहना भी हो तो दाएं-बाएं, आगे-पीछे झांकने के बाद दबी आवाज में.

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यह आपके राजनीतिक रुझान पर है कि जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ उसे आप एक क्रांति मान लें या एक आई-गई आंधी. मैं जानता हूं कि मैं जो कुछ कहने जा रहा हूं उससे किसी का विचार नहीं बदलने वाला है. फिर भी मैं यह कहने की कोशिश करूंगा कि क्या कुछ हुआ और क्या कुछ नहीं हुआ.

इतना तो निश्चित रूप से हुआ है कि पहली बार मोदी सरकार के खिलाफ एक सीधा जन आक्रोश उभरा और सरकार की खुली निंदा हुई. 20 जुलाई की हिंसा के बाद सरकार ने अगर तत्परता से कदम उठाए तो इसकी असली वजह यह थी कि विरोध कर रहे 95 फीसदी युवा, मुख्यतः बच्चे मध्य और उच्च मध्यवर्गीय हिंदू परिवारों के थे.

ये ही तो उसके मूल जनाधार हैं. आप उन्हें Gen Z, ‘जेन-जी’ कह सकते हैं और उनकी भाषा, उनके लहजे या उनकी गालियों पर बहस करके (खासकर टीवी समाचार चैनलों पर) उनके विद्रोह को खारिज कर सकते हैं. ‘यह’ Gen Z किस तरह अलग ढंग से सोचता है, इस पर चाहे सैकड़ों ‘परिचर्चाएं’ कर लीजिए, उन्होंने जिस प्रतिरोध का प्रदर्शन किया उसे खारिज नहीं किया जा सकता.

सबसे पहली बात तो यह है कि यह प्रतिरोध उन्होंने बड़े शारीरिक जोखिम के बावजूद किया, जिसका सबूत यह है कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई की पिटाई के बाद भी वे वहां फिर से जमा हुए.

दूसरे, उन्होंने अपने करियर की चिंता न करते हुए लगभग बेपरवाह निडरता का प्रदर्शन किया. यह वी.पी. सिंह के छोटे कार्यकाल के दौरान हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन के बाद नयी दिल्ली में छात्रों का सबसे उग्र आंदोलन था. उस आरक्षण विरोधी आंदोलन में उस समय के युवाओं ने भाग लिया था, जिसमें सुरिंदर सिंह चौहान और राजीव गोस्वामी (जिसकी मौत भी हो गई थी) जैसे कुछ युवाओं ने आत्मदाह तक करने की कोशिश की थी.

दोनों आंदोलनों के पीछे चिंता के मुद्दे समान थे— करियर, नौकरी, शिक्षा. पहला आंदोलन घोषित रूप से ‘ऊंची जातियों’ का था, यह आंदोलन ज़्यादातर अंग्रेजीभाषी, मीम बनाने वाले उच्च-मध्यवर्गीय युवाओं का था. दोनों पीढ़ियों के बीच करीब चार दशक का फासला था, लेकिन दोनों ने पुलिस या दमन की कोई परवाह नहीं की.

जो कुछ घटित हुआ उसे सार रूप में इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है. इन युवाओं ने कुलीन तबकों की खुद की ओढ़ी उस चुप्पी को तोड़ दिया, जो उन्हें मोदी सरकार की आलोचना में एक भी शब्द खुलकर बोलने से रोकती थी, और कुछ कहना भी हो तो दायें-बायें, आगे-पीछे झांकने के बाद दबी आवाज में. लेकिन यह बहुत हद तक सीधी चुनौती देता विरोध था. और यह रुकने वाला नहीं है. इन युवाओं ने दिखा दिया कि एक बड़ी आबादी उन लोगों की है जिन्हें ‘विकसित भारत’ या ‘अमृत काल’ जैसे नारों पर विश्वास नहीं है. आज के Gen Z में जो बड़ी उम्र वाले हैं वे 2047 तक 50 की उम्र के हो जाएंगे, और जो सबसे कम उम्र के हैं वे 35 की उम्र के हो जाएंगे. तब तक इन लोगों की ज़िंदगी लगभग बीत चुकी होगी. इतना लंबा इंतजार करने का धैर्य किसके पास है? इस पीढ़ी के भारतीयों या किसी भी देश के युवाओं के पास तो नहीं ही है. इसके उलट, इन नारों से 50 से ज्यादा उम्र के मध्य या उच्च-मध्यवर्गीय भाजपाई मतदाता बेशक प्रभावित हो सकते हैं. इन नारों के मुताबिक, लक्ष्य हासिल करने की समय सीमा इतनी लंबी रखी गई है कि ऐसे बुजुर्ग तब तक विदा हो चुके होंगे, यानी मोदी सरकार सुरक्षित है. लेकिन बच्चे उतनी दूर तक नहीं देख सकते.

इस आंदोलन से मोदी के आलोचकों में यह भावुक धारणा बनी कि भारत में भी कोलंबो/ढाका/काठमांडो को दोहराया जा सकता है. लेकिन यह धारणा भारतीय लोकतंत्र, उसकी ‘सिस्टम’ की मजबूती के प्रति अनादर ही दर्शाती है. यह इस मुगालते को भी उजागर करती है कि किसी निर्वाचित सरकार को आसानी से हटाया जा सकता है.

बहरहाल, तथ्य यह है कि भाजपा को भले ही केवल 240 सीटें मिली  हों लेकिन करीब 24 करोड़ भारतीय मतदाताओं ने उसे वोट दिया. इसके बाद सबसे ज्यादा वोट कांग्रेस को मिले, लेकिन भाजपा को उसके मुक़ाबले करीब दोगुना ज्यादा वोट मिले. मुझे ‘देलूलू’ जैसे जुमले का इस्तेमाल करने का लालच हो रहा था, लेकिन इसका इस्तेमाल हो चुका है. अब उन्होंने कोई नया जुमला खोज लिया होगा.

वैसे, उन्होंने मोदी के विरोधियों के लिए दरवाजा थोड़ा तो खोल दिया ही है. उन्होंने यह दिखा दिया है कि मोदी की नाव में एक से ज्यादा छेद हैं. वह यह कि मोदी सरकार को अपने सबसे निष्ठावान जनाधार में अपनी लोकप्रियता को लेकर जो धारणा है उसमें और वास्तविकता में अंतर बढ़ रहा है, उस जनाधार में ऐसे लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है जो सरकार से बेजार हो रहे हैं.

यह मुझे 2018 में छत्तीसगढ़ के चुनाव के दौरान एक गांव में हुई उस बातचीत की याद दिला रहा है जिसमें प्रणय रॉय, दोरब सुपारीवाला के साथ मैं भी शामिल था. हमने एक ग्रामीण से पूछा था कि रमन सिंह की भाजपा सरकार आप लोगों को इतना कुछ दे रही है फिर भी आप बदलाव क्यों चाहते हैं?

उनका जवाब था : “यह सरकार कितने लंबे समय से राज कर रही है! आपको कोई सब्जी कितनी भी पसंद हो, रोज-रोज एक ही सब्जी खाते-खाते क्या आप ऊब नहीं जाएंगे?”

उस शाम टीवी पर चर्चा के दौरान प्रणय ने मुझसे पूछा था कि क्या मैं एक ही सब्जी खाते-खाते ऊबूंगा नहीं? मैंने जवाब दिया था, नहीं ऊबूंगा अगर वह भिंडी की होगी. यह तो मज़ाक की बात थी मगर गंभीर नतीजा यह सामने आया कि चुनाव परिणाम ने भाजपा सरकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया. इसका सबक यह था कि थकान और ऊब पुराने वफादार मतदाताओं में भी खीज पैदा कर सकती है. उनमें तो ज़रूर, जो वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध नहीं हैं.

इन आंदोलनों ने इसी सबक को रेखांकित किया है. भाजपा ने इसी एहसास के कारण अपने दो सबसे प्रमुख चेहरों, स्वास्थ्य मंत्री और छह साल तक भाजपा अध्यक्ष रहे जे.पी. नड्डा, और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री तथा अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, साइंस एवं टेक्नोलॉजी जैसे अहम मंत्रालयों के प्रभारी जितेंद्र सिंह को युवाओं से बातचीत के लिए भेजा. इसीलिए उन्हें कहा गया कि वे छात्रों के साथ नरमी से पेश आएं, उनकी सभी मांगें मान लें और उनके साथ संयुक्त पत्रकार वार्ता भी करें.

यह लचीलापन मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण और कृषि कानूनों के मामलों में भी दिखाया था. लेकिन अब हमने उसे कमजोर पड़ते भी देखा. इसकी मुख्य वजह यह थी कि विरोध की यह आवाज उसके अपने जनाधार में से उठी थी. वैसे, तथ्य यह भी है कि उसका जनाधार इससे भी आगे फैला है.

यहां पर यह सवाल उभरता है कि इस आंदोलन में कमी क्या थी. पहली बात तो यह है कि यह कोई क्रांति नहीं थी, इसलिए आप फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के ऐलान को विराम दे सकते हैं.

उत्तर भारत में लाखों कांवड़ियों के कारण जाम लगने ही वाला है. उनमें से कई कांवड़िए कानफाडू डीजे के साथ निकलेंगे, भक्तों द्वारा लगाए गए ‘भंडारों’ में खाना खाएंगे, उत्तर प्रदेश सरकार के हेलिकॉप्टर उन पर पुष्पवर्षा करेंगे. इन कांवड़ियों में अधिकतर Gen Z वाले भी हैं. मतलब यह कि इन युवाओं में भाजपा के वफ़ादारों की संख्या भी अच्छी-ख़ासी है.

अब 2029 तक के लिए प्रतियोगी राजनीति का ज़ोर उस दरार को पाटने या उसे और चौड़ा करने पर होगा जो Gen Z ने बना दिया है. भाजपा ने इस समस्या को समझ लिया है. इसीलिए प्रधानमंत्री अब इंस्टाग्राम पर संदेश देने लगे हैं. लेकिन मतदाताओं की थकान का वे क्या करेंगे, 15 साल से ‘एक ही सब्जी’ से पैदा हुई ऊब के कारण उभरी चुनौती का क्या करेंगे?

क्या वे अपनी सरकार में नई जान फूंक पाएंगे? मंत्रिमंडल में उन्हीं-उन्हीं चेहरों की कुर्सियां बदलती रही हैं. युवाओं को सीधा प्रभावित करने वाले मंत्रालयों में से एक, शिक्षा मंत्रालय के पांच मुखिया बदले जा चुके हैं, अब उसे छठा मुखिया मिलने वाला है. कौशल विकास मंत्रालय चार मंत्री देख चुका है लेकिन यह मंत्रालय सफल हुआ होता तो बेरोजगारी या अर्ध-बेरोजगारी में कमी आई होती. इसके चार मंत्री रहे— राजीव प्रताप रूड़ी, धर्मेंद्र प्रधान, महेंद्र नाथ पांडे (ये कौन हैं?), फिर से प्रधान, और अब राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी हैं. हरियाणा के राव इंदरजीत सिंह 2009 से लेकर 2014 तक को छोड़ 2004 से राज्यमंत्री बने हुए हैं. अभी वे सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन एवं योजना मंत्रालय संभाल रहे हैं. मोदी सरकार ने योजना आयोग को तो बेशक खत्म कर दिया है लेकिन योजना मंत्रालय कायम है. जीतन राम मांझी ‘MSME’ मंत्रालय के मुखिया है, तो एच.डी. कुमारस्वामी भारी उद्योग मंत्रालय का भार उठा रहे हैं. इनमें से हर मंत्रालय रोजगार पैदा करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है. लेकिन हाल के दिनों में आपने इनके बारे में कोई चर्चा सुनी? सरकार को नया कुछ करने की जरूरत है, सिर्फ इंस्टाग्राम से काम नहीं चलेगा.

विपक्ष को जो मौका उपहार के रूप में मिला है उसका वह पूरा फायदा उठाना चाहता है तो उसे यह याद रखना होगा कि सत्ता आसमान से नहीं टपक जाती. मैं अक्सर कहता रहा हूं कि भारत में किसी ताकतवर नेता को चुनौती देने वाला उसे परास्त नहीं कर पाया है. उसे अपनी हार का खुद ही कारण बनना पड़ता है. इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को अपनी हार का कारण बनाया, राजीव गांधी ने शाह बानो से लेकर अयोध्या प्रकरण तक अपनी कई भूलों को, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘भारत उदय’ के धोखे में समय से पहले चुनाव करवा कर अपनी हार बुलाई. 2014 में नरेंद्र मोदी एक चुनौती के रूप में उभरे. लेकिन तब तक मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार चार साल से लंगड़ी सरकार बनी हुई थी.

हर बार कोई ताकतवर नेता तभी हारा है जब विपक्ष को किसी ऐसी हस्ती का सहारा मिला जिसने लहर पैदा की. इंदिरा गांधी के विरोध में जेपी खड़े हुए, तो राजीव गांधी के खिलाफ वी.पी. सिंह. इंदिरा, राजीव, और यूपीए के तख़्तापलट में आरएसएस की बड़ी भूमिका रही. कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके पास ऐसी कोई निष्ठावान पैदल सेना नहीं है. बहरहाल, इस नए अवसर का लाभ उठाने के लिए उसके पास तीन साल का समय है. और मोदी-शाह की भाजपा के लिए भी खुद को नए सिरे से तैयार करने के लिए इतना ही समय है.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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