नई दिल्ली: पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान (रिटायर्ड) ने शनिवार को दिप्रिंट के ‘ऑफ द कफ’ कार्यक्रम में कहा कि भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती अग्निपथ योजना के तहत होगी और इस पर फैसला नेपाल सरकार को लेना होगा.
पूर्व CDS ने दिप्रिंट के एडिटर-इन-चीफ शेखर गुप्ता और एडिटर (डिफेंस एंड डिप्लोमेसी) स्नेहेश एलेक्स फिलिप के साथ गुरुग्राम के द क्वोरम में बातचीत के दौरान कहा, “हमारे (भारत-यूके-नेपाल) बीच यह त्रिपक्षीय समझौता हुआ था. उस समय नेपाल (1947 में) एक राजशाही था और ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता हुआ था. उन्होंने कहा था कि नेपाली सैनिकों के लिए इस सेवा में आवेदन करने के लिए भी ऐसी ही शर्तें होंगी.”
पूर्व CDS ने कहा, “उस समय राजा की ओर से यही शर्त रखी गई थी—आपको उन्हें उसी तरह की सुविधाएं देनी होंगी, जो भारतीय सेना और ब्रिटिश (सेना) में लागू हैं. और यही वादा किया गया था.”
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1815 में पहली गोरखा रेजिमेंट बनाई थी. इसके साथ नेपाली सैनिकों के किसी दूसरे देश की सेना में सेवा करने की दो सदी पुरानी परंपरा शुरू हुई. आज़ादी के समय नई दिल्ली और लंदन ने गोरखा रेजिमेंटों को बांटने पर सहमति जताई. छह यूनिट भारतीय सेना का हिस्सा बनीं, जबकि चार यूनिट ब्रिटेन को दे दी गईं.
चौहान ने कहा, “और इसी वजह से उन्हें समान वेतन और समान पेंशन मिलती है. वास्तव में, अगर उन्हें नेपाल में कुछ नहीं मिलता है और घर जाने के बाद भी उन्हें सुविधाएं नहीं मिलती हैं, तो इसकी वजह यह है कि नेपाल सरकार ने उन्हें उन सुविधाओं से वंचित किया है, जो हम अपने सैनिकों को देते हैं…क्योंकि वे ऐसा नहीं चाहते. इसलिए कुछ चुनौतियां रही हैं. तो, हमारी तरफ से हमने अपने समझौते का एक हिस्सा पूरा किया है.”
जनरल चौहान ने कहा कि अब काठमांडू को यह तय करना है कि वह अपने सैनिकों को अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में नौकरी करने के लिए भेजेगा या नहीं. उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल के नागरिकों के लिए एक योजना और भारतीय नागरिकों के लिए दूसरी योजना नहीं हो सकती.
जनरल चौहान और उनके पूर्ववर्ती जनरल बिपिन रावत, दोनों को 11वीं गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला था.
नेपाल से भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती का मुद्दा नई दिल्ली और काठमांडू के बीच संबंधों में लगातार तनाव का कारण बना हुआ है. 2022 में भारत ने अग्निपथ योजना के तहत सेना में भर्ती की पूरी व्यवस्था बदल दी थी. सैनिकों की भर्ती चार साल के लिए की जाएगी. इनमें से 25 प्रतिशत सैनिकों को 15 साल के लिए सेना में रखा जाएगा, जबकि बाकी 75 प्रतिशत अग्निवीरों को एक तय राशि के साथ घर भेज दिया जाएगा.
इस योजना का उद्देश्य सेना में काम करने वाले सैनिकों की औसत उम्र कम करना और सेना को भविष्य की ज़रूरतों के लिए तैयार करना है. इस तरह की चार साल की सेवा वाली भर्ती ने कमीशन प्राप्त अधिकारी से नीचे के रैंक वाले सैनिकों की पारंपरिक सेवा व्यवस्था को बदल दिया है. इसमें 15 साल की सेवा के बाद पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलती थीं.
नेपाल ने अब तक इस योजना को स्वीकार करने से इनकार किया है. उसका कहना है कि भारत ने बिना बातचीत किए इस योजना को लागू किया, जिससे त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन हुआ.
हालांकि, भारत, ब्रिटेन और नेपाल के बीच 1 मई 1947 को हुए और उसी साल बाद में मंजूर किए गए त्रिपक्षीय समझौते में नेपाल के नागरिकों के साथ उसी तरह का व्यवहार करने की बात कही गई है, जैसा मूल सेनाओं के सैनिकों के साथ किया जाता है.
गोरखा रेजिमेंटों ने दोनों विश्व युद्धों में हिस्सा लिया है. आजादी के बाद भारत द्वारा लड़े गए कई युद्धों में भी उन्होंने हिस्सा लिया. 1.22 लाख से ज्यादा नेपाली नागरिकों को सेना में उनकी सेवा के कारण भारत सरकार से पेंशन मिलती है. नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए पेंशन और वेतन काफी महत्वपूर्ण हैं. कुछ अनुमानों के मुताबिक, पेंशन पाने वालों को भेजी जाने वाली रकम नेपाल की कुल जीडीपी का करीब तीन प्रतिशत है.
राजनीतिक गतिरोध के कारण कई नेपाली युवा पूर्वी यूरोप पहुंच गए हैं और यूक्रेन के युद्ध के मैदानों में नजर आते हैं. रूसी सेना उनके सेना में शामिल होने के सपने को पूरा करने का एक रास्ता बन गई है. काठमांडू का अनुमान है कि 200 से ज्यादा नेपाली रूस की सेना में शामिल होने के लिए रूस गए हैं. कई भारतीय नागरिक भी ऐसा कर चुके हैं.
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