नई दिल्ली: दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल और बिहार समेत कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन में शामिल लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों की समीक्षा करने या उन्हें वापस लेने के निर्देश दिए हैं. लेकिन सिर्फ सरकार के आदेश से FIR एक ही रात में बंद नहीं हो सकती.
सरकार ने CJP की यह मांग मान ली है कि प्रदर्शन करने वालों पर आपराधिक मामले नहीं चलने चाहिए. इसके बाद पुलिस अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है. लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में क्लोजर “सबूतों की कमी” के आधार पर नहीं होगा. इसके बजाय 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का सहारा लिया जाएगा, जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले और जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी. या फिर बाद में सरकार की ओर से जारी निर्देशों का आधार लिया जाएगा.
आखिरी फैसला अदालत का होगा. जांच एजेंसी जो भी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करेगी, उसे अदालत जांचेगी और मंजूरी देगी. अदालत चाहे तो उसे स्वीकार कर सकती है या खारिज भी कर सकती है. कई विशेषज्ञों ने दिप्रिंट को यह बात बताई.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “एक बार FIR दर्ज हो जाए तो वह अदालत की संपत्ति मानी जाती है. FIR वापस लेने का कोई प्रावधान नहीं है. या तो क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी होगी या हाई कोर्ट जाकर FIR रद्द करवानी होगी. यह सब कानून में तय प्रक्रिया के अनुसार ही होगा. सिर्फ सरकार के आदेश से यह अपने आप लागू नहीं हो जाता.”
अगर सरकार किसी मामले में आगे मुकदमा नहीं चलाना चाहती, तो यह फैसला सरकारी वकील यानी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के जरिए अदालत तक पहुंचता है. सरकार के आदेश का हवाला देते हुए सरकारी वकील अदालत से कह सकता है कि राज्य अब इस मामले में मुकदमा आगे नहीं चलाना चाहता.
कानून में मुकदमा वापस लेने का प्रावधान भी है. यह प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 360 में है. इसके अनुसार पब्लिक प्रॉसिक्यूटर या असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर फैसला आने से पहले किसी भी समय अदालत की अनुमति लेकर मुकदमा वापस ले सकता है. अगर आरोप तय होने से पहले मुकदमा वापस लिया जाता है तो आरोपी को डिस्चार्ज कर दिया जाता है. अगर आरोप तय होने के बाद मुकदमा वापस लिया जाता है तो आरोपी बरी माना जाता है.
सीनियर एडवोकेट मनींदर सिंह ने दिप्रिंट से कहा कि सरकार की राजनीतिक घोषणा से आपराधिक मामला अपने आप खत्म नहीं हो जाता.
उन्होंने कहा, “इससे सिर्फ सरकारी वकील को अधिकार मिलता है कि वह अदालत में आवेदन देकर मुकदमा वापस लेने की अनुमति मांगे. इसके बाद मजिस्ट्रेट कानून में तय प्रक्रिया का पालन करेगा.”
उन्होंने आगे कहा कि जब अदालत इस आवेदन पर विचार करेगी, तब दिल्ली पुलिस सरकार के आदेश का हवाला देते हुए केस बंद करने की मांग कर सकती है. अदालत कानून के मुताबिक प्रक्रिया अपनाएगी और मामले के पीड़ित को बुलाकर उसकी सहमति या आपत्ति सुनेगी.
सिंह ने कहा कि अगर पीड़ित मुकदमा वापस लेने का विरोध करता है तो वह अदालत में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल कर सकता है. ऐसी स्थिति में अदालत सरकार की मांग खारिज कर सकती है या मामले के तथ्यों के आधार पर आगे जांच का आदेश दे सकती है. “इसलिए सभी मामलों को एक साथ वापस नहीं लिया जा सकता.”
उन्होंने कहा, “फौजदारी न्याय व्यवस्था सिर्फ सरकार के फैसलों से नहीं चलती. एक बार आपराधिक मामला शुरू हो जाए तो आगे की प्रक्रिया कानून के अनुसार चलती है और उसकी निगरानी अदालत करती है. सरकार का प्रेस बयान सिर्फ उसकी मंशा बताता है. वह BNSS में तय कानूनी प्रक्रिया की जगह नहीं ले सकता.”
एडवोकेट विजय अग्रवाल ने दिप्रिंट से कहा, “मुकदमा वापस लेने का प्रावधान है और इसका इस्तेमाल अक्सर होता है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कई मामले वापस लिए गए हैं. लेकिन वहां भी पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है. अदालत की मंजूरी के बिना मुकदमा वापस नहीं लिया जा सकता.”
एक अधिकारी ने फिर दोहराया कि कानूनी प्रक्रिया तभी खत्म होती है जब अदालत क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने का आदेश देती है. “उससे पहले सरकार का आदेश सिर्फ यह संकेत देता है कि राज्य अब इस मामले में मुकदमा आगे बढ़ाने का इच्छुक नहीं है. इससे आरोपियों को कुछ राहत जरूर मिलती है.”
एक दूसरे अधिकारी ने कहा कि आम तौर पर जब सरकार मुकदमा वापस लेने की मांग करती है, तो मजिस्ट्रेट पहले मामले की प्रकृति देखता है. अगर मामला ऐसा हो जिसमें खुद राज्य ही मुख्य पीड़ित हो, जैसे सरकारी संपत्ति को नुकसान, दंगा या पुलिसकर्मियों को चोट पहुंचाना, तो अदालत सरकार की मांग पर ज्यादा सकारात्मक रुख अपना सकती है.
लेकिन अगर मामले में निजी पीड़ित भी हों, तो अदालत फैसला लेने से पहले उनकी बात भी सुनेगी.
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अभय एस. ओका ने कहा कि केंद्र सरकार दिल्ली पुलिस के दर्ज मामलों को बंद करने का भरोसा दे सकती है, क्योंकि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है. लेकिन दूसरे राज्यों में पुलिस राज्य सरकार के नियंत्रण में होती है. उन्होंने यह भी कहा, “एक बार FIR दर्ज हो जाए तो उसे रद्द या खत्म नहीं किया जा सकता.”
‘सभी राज्यों के आदेश एक जैसे नहीं’
दिलचस्प बात यह है कि अलग-अलग राज्यों के आदेश एक जैसे नहीं हैं. दिल्ली के आदेश में कहीं भी FIR वापस लेने की बात साफ तौर पर नहीं कही गई है. इसमें सिर्फ 28 जुलाई के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दोहराया गया है. पुलिस से कहा गया है कि शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ संयम बरता जाए. साथ ही यह भी साफ किया गया है कि जिन लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड है, उन्हें यह राहत नहीं मिलेगी.
इसके विपरीत बिहार जैसे राज्यों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने का साफ निर्देश दिया है. वहीं महाराष्ट्र ने अभी तक इस बारे में कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया है, हालांकि इस पर चर्चा जारी है.
हर मामले की अलग-अलग जांच और समीक्षा करनी होगी. ऊपर बताए गए अधिकारी ने कहा, “दिल्ली सरकार का आदेश बहुत सोच-समझकर लिखा गया है. इसमें सभी मामलों को एक साथ वापस लेने का निर्देश नहीं है.”
उन्होंने कहा, “इसके बजाय इसमें गिरफ्तारी और मामलों की समीक्षा की बात कही गई है. यह काफी हद तक सुप्रीम कोर्ट के 28 जुलाई के आदेश को दोहराता है, जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ संयम बरतने को कहा गया था.”
अगर पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करती है, तो वह सबूतों की कमी का हवाला नहीं देगी. बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सरकार के निर्देश का आधार लेगी. “पुलिस अपनी रिपोर्ट में जांच की बात नहीं करेगी. वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सरकार के निर्देश का हवाला देकर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करेगी.”
दिल्ली सरकार के आदेश में गिरफ्तारी से जुड़ा प्रावधान भी सिर्फ “गिरफ्तारियों की समीक्षा” और रिहाई पर विचार करने की बात करता है. इसमें यह नहीं कहा गया कि सभी आरोपियों को तुरंत रिहा किया जाए या हर मामला वापस लिया जाए.
अधिकारी ने कहा, “आदेश सिर्फ यह कहता है कि पहले हुई गिरफ्तारियों की समीक्षा होगी और उसके बाद रिहाई पर फैसला लिया जाएगा. यानी यह पुलिस पर छोड़ दिया गया है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में रखा जाए या नहीं.”
बिहार सरकार का आदेश इससे एक कदम आगे है. उसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की बात साफ तौर पर कही गई है.
अधिकारी ने कहा, “बिहार में जांच अधिकारी सरकार के आदेश का हवाला देते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकता है और कह सकता है कि अब आगे जांच की जरूरत नहीं है. सरकारी वकील अदालत में इसका समर्थन करेगा. इसके बाद अदालत तय करेगी कि रिपोर्ट स्वीकार करनी है या नहीं.”
अधिकारी ने यह भी कहा कि जिन FIR में आरोपी “अज्ञात” हैं और किसी की पहचान नहीं हुई है, उन्हें अपेक्षाकृत जल्दी बंद किया जा सकता है. लेकिन जिन मामलों में लोगों के नाम दर्ज हैं या उनकी पहचान हो चुकी है, उनमें मामला वापस लेने के लिए ज्यादा लंबी कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी. इसलिए सभी FIR को एक साथ और एक ही रात में बंद करना “लगभग नामुमकिन” है.
बिहार पुलिस ने 64 FIR दर्ज की हैं. महाराष्ट्र में 17 मामले दर्ज हुए हैं. कोलकाता में कम से कम 7 मामले दर्ज किए गए हैं. वहीं दिल्ली में दंगा, तोड़फोड़, हत्या की कोशिश और सरकारी कर्मचारी को ड्यूटी करने से रोकने जैसी धाराओं में 13 FIR दर्ज की गई हैं.
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