20 जुलाई की दोपहर कुछ अलग ही थी. हजारों लोग, जिन्हें अक्सर “राजनीति से दूर” और सोशल मीडिया में डूबे रहने वाला बताया जाता था, उस दिन सड़कों पर उतर आए और बदलाव और व्यवस्था में जवाबदेही की मांग करने लगे.
यह भीड़ जमीन पर मौजूद सुरक्षा बलों से कई हजार ज्यादा थी और संसद की ओर बढ़ रही थी, जहां मानसून सत्र चल रहा था. उनकी सबसे बड़ी मांग थी कि उस समय के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें.
प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ दिए और उन्हें हटाकर आगे बढ़ने लगे. वे नए बने संसद परिसर के गेट तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे. इसके बाद केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की क्विक रिस्पॉन्स टीम को आपात स्थिति में सक्रिय होना पड़ा.
कार्रवाई बहुत तेजी से हुई और प्रदर्शनकारी भी उतनी ही जल्दी उस संवेदनशील जगह से पीछे हट गए. सुरक्षा बलों और बड़े अधिकारियों को शायद लगा कि उन्होंने एक बड़े टकराव को टाल दिया है, लेकिन इसके बाद जो हुआ उसे लेकर उन्हें काफी आलोचना और सवालों का सामना करना पड़ा.
दोपहर 3 बजे तक प्रदर्शन लुटियंस दिल्ली के अंदरूनी इलाकों से बाहर फैल चुका था. नए समूह कनॉट प्लेस में इकट्ठा हो गए थे, जो आमतौर पर बड़े ब्रांडों और रेस्तरां के लिए जाना जाता है, न कि बड़े प्रदर्शनों के लिए. इसी समय के आसपास रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने प्रदर्शनकारियों पर प्लास्टिक और धातु वाली पेलेट गोलियां चलाईं, जिसमें कम से कम चार लोग घायल हुए.
दिल्ली पुलिस ने शुरुआत में इस आरोप पर ज्यादा कुछ नहीं कहा कि प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन चलाई गई. लेकिन जल्द ही उसने मीडिया रिपोर्टों के जवाब में सोशल मीडिया पर साफ तौर पर इससे इनकार करना शुरू कर दिया. हालांकि मेडिकल-लीगल रिपोर्ट और पीड़ितों के बयान इतने मजबूत थे कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. इससे पुलिस के उस सीधे इनकार पर सवाल खड़े हो गए जिसमें उसने उन हथियारों के इस्तेमाल से मना किया था जिन्हें आधिकारिक तौर पर “गैर-घातक” हथियार कहा जाता है.
इन्हीं कारणों से RAF और उसका पेलेट गन का इस्तेमाल दिप्रिंट का न्यूज़मेकर ऑफ द वीक बना.
‘संवेदनशील पुलिसिंग के साथ मानवता की सेवा’
RAF का गठन केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के अंदर एक विशेष इकाई बनाने के उद्देश्य से किया गया था. अक्टूबर 1992 में इसकी शुरुआत हुई और तब से यह लगातार मजबूत होती गई है. इसे शुरुआत में देश में दंगे, सांप्रदायिक तनाव या सामाजिक अशांति जैसी कानून-व्यवस्था की स्थितियों से निपटने के लिए एक तेज कार्रवाई करने वाली फोर्स के रूप में तैयार किया गया था.
समय के साथ RAF को कई उपलब्धियों का श्रेय दिया गया और इसे हमेशा एक निष्पक्ष और पेशेवर फोर्स माना गया. राज्य पुलिस के अधिकारी इसे ऐसी फोर्स बताते हैं “जो उपद्रवियों के चेहरे और पहचान को देखे बिना कार्रवाई करती है.”
लेकिन 20 जुलाई की घटनाओं ने RAF की छवि को इतना नुकसान पहुंचाया है कि इसके मूल मंत्र “संवेदनशील पुलिसिंग के साथ मानवता की सेवा” पर भी सवाल उठने लगे हैं. प्रदर्शन स्थलों से सामने आए वीडियो और तस्वीरों में कड़ी कार्रवाई दिखाई देती है. कुछ जवान प्रदर्शनकारियों को गिराते हुए या लाठीचार्ज से बचकर भाग रहे लोगों का रास्ता रोकते हुए दिखाई देते हैं.
शुरुआत में RAF और दिल्ली पुलिस की आलोचना इसलिए हुई क्योंकि उन पर शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा और असमान बल प्रयोग करने का आरोप लगा. लेकिन जैसे ही पेलेट गन के इस्तेमाल की खबरें सामने आईं, आलोचना और जांच काफी बढ़ गई.
शुरुआती खबरों में पेलेट गन चलाए जाने की बातें प्रदर्शनकारियों के अपुष्ट दावों के रूप में सामने आईं. लेकिन अगले कुछ दिनों में पीड़ितों के बयान और मेडिकल-लीगल रिपोर्ट एक के बाद एक सामने आने लगीं. दिल्ली पुलिस लगातार पेलेट गन के इस्तेमाल से इनकार करती रही, लेकिन सबूत इतने मजबूत हो गए कि उन्हें खारिज करना मुश्किल था.
इसके बाद, 20 जुलाई की हिंसा के दो दिन बाद, RAF की प्रमुख इंस्पेक्टर जनरल सीमा धुंधिया ने माना कि प्रदर्शन के दौरान “जरूरत से ज्यादा बल” का इस्तेमाल हुआ था और उन्होंने जमीन पर मौजूद जवानों और अधिकारियों को फटकार लगाई.
जहां घायल लोग जीवनभर के सदमे के साथ रह गए हैं, वहीं इस कार्रवाई ने दिल्ली पुलिस और RAF दोनों की छवि को नुकसान पहुंचाया है.
पेलेट गन के इस्तेमाल पर अदालतों का रुख
कागजों पर पेलेट गन को “गैर-घातक” हथियार माना जाता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में इससे हुई लंबे समय तक रहने वाली अपंगता, जैसे आंखों की रोशनी चले जाना, के कारण यह हमेशा विवादों में रही है. RAF की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के अनुसार गोलियों, जिनमें पेलेट भी शामिल हैं, का इस्तेमाल आखिरी विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए. लेकिन दिल्ली में इसके इस्तेमाल ने उन लोगों के बीच भी चिंता पैदा कर दी जो कभी देश की सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे.
2010 में कश्मीर में हुए प्रदर्शनों के दौरान 117 प्रदर्शनकारी मारे गए थे, जिसकी व्यापक आलोचना हुई थी. लंबे समय तक नुकसान पहुंचाने वाले इस “गैर-घातक” हथियार का इस्तेमाल 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद फिर सड़कों पर हुआ. सड़क हिंसा में 85 लोगों की मौत हुई और कई लोग पक्षियों का शिकार करने वाली छर्रे वाली गोलियों (बर्डशॉट) से हमेशा के लिए अंधे हो गए. इसके बाद जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की और 12-बोर पेलेट गन और/या पेलेट वाले किसी भी अन्य बोर और कारतूस के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की.
अपनी जनहित याचिका (PIL) में बार एसोसिएशन ने दावा किया कि 4,000 से ज्यादा लोग घायल हुए और 46 ऐसे लोगों की सूची दी गई जो अंधे हो गए थे. सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार, 510 मरीजों को इलाज के लिए देशभर के अस्पतालों में भेजा गया था.
फरवरी 2020 में हाई कोर्ट ने इस PIL को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2016 में कई याचिकाओं पर सुनवाई की थी और कहा था कि सुरक्षा बलों को पेलेट गन चलाने से पहले स्थिति पर विचार करना चाहिए. कोर्ट ने इसके बिना सोचे-समझे इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी थी.
दिल्ली में पेलेट से घायल हुए दो लोगों और पूर्व इंटेलिजेंस ब्यूरो स्पेशल डायरेक्टर यशोवर्धन झा आजाद की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लॉग बुक सुरक्षित रखने का आदेश दिया. हालांकि, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पेलेट गन के इस्तेमाल पर साफ तौर पर रोक नहीं लगाई और कहा कि यह असाधारण परिस्थितियों में फोर्स की चरणबद्ध प्रतिक्रिया का हिस्सा है.
संभव है कि सुप्रीम कोर्ट आगे चलकर “असाधारण परिस्थितियों” की सीमा तय करे. लेकिन दिल्ली पुलिस और CRPF की जांच यह तय करेगी कि क्या RAF के जवानों के सामने वास्तव में ऐसी असाधारण स्थिति थी जिसके कारण उन्होंने पेलेट गन का इस्तेमाल किया.
विचार निजी हैं.
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