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Saturday, 1 August, 2026
होमफीचरबैडमिंटन, दोस्त, नींद... IIT-NEET का सपना पूरा करने के लिए 16 साल के बच्चों ने क्या-क्या छोड़ा

बैडमिंटन, दोस्त, नींद… IIT-NEET का सपना पूरा करने के लिए 16 साल के बच्चों ने क्या-क्या छोड़ा

डर पर बनी और कॉम्पिटिशन से चलने वाली भारत की कोचिंग इंडस्ट्री और एंट्रेंस एग्ज़ाम की कभी न खत्म होने वाली लाइन बच्चों का बचपन छीन रही है. 'दिप्रिंट' ने सात शहरों में 16 साल के बच्चों की ज़िंदगी को ट्रैक किया.

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लखनऊ, चेन्नई, कोलकाता, नई दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद: बेहतर भविष्य की शुरुआत अक्सर कुछ चीजें छोड़ने से होती है.

वरदान ने सबसे पहले बैडमिंटन छोड़ा. बचपन में उसकी हर शाम बैडमिंटन कोर्ट पर गुजरती थी. वह जिला स्तर के टूर्नामेंट और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग जगह जाता था. उसे यह खेल इतना पसंद था कि वह इसे गंभीरता से खेलता था. लेकिन जैसे-जैसे पढ़ाई का दबाव बढ़ा, बैडमिंटन उसकी जिंदगी से गायब हो गया. इसके बाद बास्केटबॉल भी छूट गया. फिर स्कूल का बैंड भी छूट गया, जहां वह बैगपाइप बजाता था. जो समय पहले खेल, शौक और लखनऊ के विकास नगर में दोस्तों के साथ यूं ही घूमने-फिरने में बीतता था, अब वह कोचिंग क्लास, असाइनमेंट और प्रैक्टिस पेपर में गुजरता है.

वरदान की कहानी बताती है कि भारत के बच्चे अपने सपनों के लिए क्या-क्या छोड़ रहे हैं. उसमें कोई असाधारण बात नहीं है. बस उसने अपना समय, आराम और 16 साल की उम्र की सामान्य जिंदगी छोड़ने का फैसला किया है. वह उन लाखों छात्रों में से एक है जो अपनी किशोरावस्था बंद कमरों और खुली किताबों के बीच बिता रहे हैं. कोई JEE की तैयारी कर रहा है, कोई NEET, कोई CLAT और अब तेजी से CUET की भी. स्कूल, प्रतियोगी परीक्षाओं और तेजी से बदलते शिक्षा सिस्टम के बीच भारत में किशोरावस्था का मतलब ही बदल गया है. अब एक किशोर की जिंदगी स्कूल, दोस्तों और बड़े होने के अनुभवों के बजाय कॉलेज में एडमिशन की तैयारी के इर्द-गिर्द घूमती है.

अपनी मां के साथ करीब एक साल बाद सिर्फ 10 मिनट बैडमिंटन खेलना. करीब आठ महीने पहले दोस्तों के साथ बाहर जाना. थोड़ा रिलैक्स होने के लिए वेब सीरीज Breaking Bad के कुछ एपिसोड देखना. इसके अलावा बेंगलुरु की छात्रा तनिष्का के. को याद नहीं कि उसने हाल के समय में मौज-मस्ती के लिए कुछ किया हो.

वह कहती है, “जब भी मैं Breaking Bad देखती थी, सिर्फ 10 या 20 मिनट ही देख पाती थी. करीब ढाई महीने में मैं सिर्फ दो सीजन ही देख पाई.”

उस पर अपनी और अपने माता-पिता दोनों की उम्मीदों का इतना दबाव है कि वह उससे बाहर नहीं निकल सकती. वह सुबह 4 बजे उठकर NEET का छूटा हुआ सिलेबस पूरा करती है. सुबह 7.15 बजे स्कूल बस पकड़ती है. दोपहर करीब 3 बजे घर लौटते ही NEET कोचिंग के लिए निकल जाती है, जो रात 9 बजे तक चलती है. इसके बाद 11.30 बजे तक होमवर्क और प्रोजेक्ट पूरे करती है. ऐसे में उसे मुश्किल से चार घंटे की नींद मिलती है.

जाह्नवी की जिंदगी में भी बहुत कुछ छूट गया है, लेकिन अलग तरीके से. चेन्नई की यह कक्षा 10 की छात्रा सुबह 6 बजे उठती है और रात 11 बजे के बाद ही उसका दिन खत्म होता है. उसे पेंटिंग करना बहुत पसंद है, लेकिन 17 घंटे लंबे रोज के शेड्यूल में उसके लिए समय नहीं बचता. उसे साइंस और मैथ्स में दिक्कत होती है. इसलिए बेहतर अंक लाने के लिए वह अपने माता-पिता और ट्यूशन की मदद लेती है.

Jahnvi studies with her mother, Poornima Jeyaraj, who helps her prepare after school and tuition classes | Photo: Shweta Tripathi | ThePrint
जाह्नवी स्कूल और ट्यूशन के बाद अपनी मां पूर्णिमा जयराज के साथ पढ़ाई करती है, जो उसकी तैयारी में मदद करती हैं. | फोटो: श्वेता त्रिपाठी | दिप्रिंट

बेंगलुरु की युक्ता की कहानी भी ऐसी ही है. वह खुद को “स्पोर्टी बच्ची” बताती है. लेकिन पढ़ाई पर पूरा ध्यान देने के लिए उसे बैडमिंटन, टेनिस, योग और भरतनाट्यम जैसी अपनी सभी एक्स्ट्रा करिकुलर गतिविधियां छोड़नी पड़ीं.

वरदान की पढ़ाई की मेज उसकी रोजमर्रा की जिंदगी दिखाती है. उस पर कोचिंग के मोटे-मोटे मॉड्यूल रखे हैं. साथ में गणनाओं से भरी स्पाइरल कॉपियां हैं. किताबों के बीच फॉर्मूला शीट रखी हुई हैं. लेकिन इन्हीं सबके बीच एक ऐसी चीज भी रखी है जिसका इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा से कोई संबंध नहीं है. एक बांसुरी.

उसने यूट्यूब के ट्यूटोरियल देखकर खुद बांसुरी बजाना सीखा. जब भी उसे 15 या 20 मिनट मिलते हैं, वह यूट्यूब पर बांसुरी के कवर सुनता है और किसी नए बॉलीवुड गाने की धुन निकालने की कोशिश करता है. अब यह उसका शौक नहीं रहा. यह बस एक ऐसी चीज है जो अब भी पूरी तरह उसकी अपनी है. जब उसे लगता है कि धुन ठीक बन गई है, वह बांसुरी रख देता है और फिर रोटेशनल डायनेमिक्स की फिजिक्स पढ़ने बैठ जाता है. बांसुरी की आवाज जल्दी ही पेन की खरोंच और पंखे के नीचे किताबों के पन्ने पलटने की आवाज में खो जाती है.

वरदान ने यूट्यूब ट्यूटोरियल देखकर खुद बांसुरी बजाना सीखा. जिन चीजों को उसने छोड़ दिया, उनमें सिर्फ यही एक चीज है जिसे उसने अब तक संभालकर रखा है. | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

वरदान की बातों में कहीं भी नाराजगी नहीं दिखती. वह IIT बॉम्बे के बारे में ऐसे उत्साह से बात करता है जैसे वह खुद को पहले ही वहां देख चुका हो. सिर्फ डिग्री के लिए नहीं, बल्कि वहां की जिंदगी के लिए भी. हॉस्टल, क्लब, फेस्ट और पूरे भारत से आए नए लोगों से मिलने के लिए.

कई मायनों में वह अपनी किशोरावस्था को टाल रहा है. उसे उम्मीद है कि कॉलेज में जाकर वह उसे फिर से जी पाएगा.

वह कहता है, “स्कूल वाली जिंदगी कक्षा 10 तक थी. उसके बाद सब कुछ बदल गया.”

वह कहता है कि एक चीज की कमी उसे उम्मीद से ज्यादा महसूस हुई.

“कक्षा 10 के बाद मेरी लड़कियों से लगभग कोई बातचीत नहीं होती. लोग इस बारे में नहीं सोचते, लेकिन यह भी बड़े होने का एक हिस्सा है.”

तीसरी जगह

लेकिन वरदान ने सबसे बड़ी चीज जो छोड़ी, वह थी स्कूल.

आज वरदान उस व्यवस्था में पढ़ता है जिसे कोचिंग संस्थान ‘स्कूल इंटीग्रेटेड प्रोग्राम (SIP)’ कहते हैं. इसे आम भाषा में डमी स्कूल कहा जाता है. कागजों पर वह एक स्कूल में दाखिल है, लेकिन उसकी असली पढ़ाई पूरी तरह कोचिंग पर आधारित है.

डमी स्कूल में जाने का फैसला उस पर थोपा नहीं गया था. यह घर में बातचीत के बाद लिया गया. उसने अपने सीनियर छात्रों को भी यही रास्ता अपनाते देखा था. उसके पिता ने ऐसे कई छात्रों को देखा था जिन्होंने बोर्ड परीक्षा में 99 प्रतिशत अंक तो हासिल किए, लेकिन JEE पास नहीं कर पाए. क्योंकि उनकी तैयारी स्कूल की पढ़ाई तक ही सीमित रही थी.

सुबह 7.30 बजे, जब ज्यादातर 16 साल के बच्चे अभी नींद से उठ रहे होते हैं या ऑनलाइन अपना दिन शुरू कर रहे होते हैं, तब हैदराबाद का नकुल घर से निकल चुका होता है. उसका ठिकाना अब वह खुला-खुला दिल्ली पब्लिक स्कूल नहीं है, जहां उसने 10 साल पढ़ाई की. पिछले चार महीने से उसकी दुनिया Score 99 नाम का JEE कोचिंग सेंटर है. चार मंजिला यह इमारत बाहर से घर जैसी दिखती है, लेकिन इसका सिर्फ एक ही मकसद है. JEE पास करना और IIT में दाखिला लेना.

कक्षा 10 पूरी करने के सिर्फ एक हफ्ते बाद उसने Score 99 जॉइन कर लिया.

नकुल कहता है, “मैं ब्रेक नहीं लेना चाहता था. मैं आराम भी नहीं करना चाहता था. मैं जल्दी जॉइन करना चाहता था क्योंकि कुछ बच्चे कक्षा 6 से ही फाउंडेशन कोर्स कर रहे थे. अगर मैं बाद में आता तो मुझे बहुत ज्यादा तैयारी पूरी करनी पड़ती.”

लेकिन IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचने के लिए छात्रों को ऐसे कोचिंग सिस्टम से गुजरना पड़ता है जो किशोरों की सहनशक्ति की पूरी परीक्षा लेता है. Score 99 में दिन सुबह 8 बजे शुरू होता है. अगर कोई छात्र 10 मिनट से ज्यादा देर से पहुंचे तो उसे क्लास में आने की अनुमति नहीं मिलती.

Gayatri with her sons, Nakul and his 10-year-old brother Ayush, at their home in Hyderabad | Photo: Deepika Amirapu | ThePrint
गायत्री अपने बेटों नकुल और 10 साल के आयुष के साथ हैदराबाद स्थित घर में. | फोटो: दीपिका अमीरापु | दिप्रिंट

नकुल याद करते हुए कहता है, “पहले दो-तीन महीने बहुत मुश्किल थे. सुबह उठने का मन नहीं करता था. जाने का मन नहीं करता था. इतनी देर तक क्लास में पूरा ध्यान लगाने की आदत नहीं थी.”

सामान्य स्कूल की जिंदगी से सीधे इस माहौल में आना उसके लिए बड़ा झटका था. पहले स्कूल में हर हफ्ते टेस्ट होते थे. यहां हर दिन पिछले वर्षों के प्रतियोगी परीक्षा के सवालों पर आधारित 30 मिनट का कठिन टेस्ट होता है. सिर्फ फिजिक्स में ही 30 चैप्टर हैं जिन्हें रटकर नहीं, बल्कि समझकर पढ़ना पड़ता है. बाकी छात्रों के साथ बराबरी बनाए रखना भी अपने आप में चुनौती है.

वह कहता है, “एक ही क्लास में कोई छात्र सिंगल डिजिट में अंक ला रहा होता है और कोई ट्रिपल डिजिट में.”

मानसिक दबाव पहले ही दिन से शुरू हो जाता है, जब टीचर नए छात्रों को बताते हैं कि कई सहपाठी कई सालों से फाउंडेशन कोचिंग कर रहे हैं.

आजकल ज्यादातर 15 साल के बच्चे और उनके माता-पिता मिडिल स्कूल से ही ट्यूशन या कोचिंग का सहारा लेने लगे हैं. वजहें लगभग एक जैसी हैं. पीछे छूट जाने का डर, स्कूल में पढ़ाई की कमी, किसी खास प्रवेश परीक्षा की तैयारी और साथियों का दबाव. जाह्नवी साफ कहती है, “स्कूल और कई ट्यूशन सेंटर में सिर्फ अच्छे नंबर लाने वाले बच्चों पर ध्यान दिया जाता है. जो बच्चे अच्छा प्रदर्शन नहीं करते, उनकी परवाह ही नहीं की जाती.”

उसकी मां पूर्णिमा जयराज, जो आर्किटेक्ट और एनवायरमेंटल प्लानर हैं, माता-पिता की परेशानी भी बताती हैं. उनके मुताबिक स्कूल भारी फीस लेते हैं, लेकिन पढ़ाई में कई कमियां रह जाती हैं. इन्हें पूरा करने के लिए परिवारों को ऑनलाइन क्लास, अलग-अलग विषयों के ट्यूटर और घर पर लगातार पढ़ाई करवानी पड़ती है. अगर नंबर कम आएं और ट्यूटर बदलना पड़े, तो उसका खर्च भी बहुत ज्यादा होता है.

जाह्नवी की मैथ्स टीचर जी. वसंथी कहती हैं कि उन्हें ऐसे छात्रों में एक जैसा पैटर्न दिखाई देता है.

वह कहती हैं, “खासकर जहां माता-पिता दोनों फुल टाइम नौकरी करते हैं, उन्हें लगता है कि उनका बच्चा घर की तुलना में ट्यूशन में बेहतर पढ़ सकता है, क्योंकि वे खुद पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाते. आजकल कई माता-पिता कक्षा 8 से ही बच्चों को कोचिंग में भेजना शुरू कर देते हैं. इन बच्चों की पढ़ाई के अलावा कोई जिंदगी नहीं बचती.”

स्कूल, कोचिंग और घर के बीच किशोरों के पास जाने के लिए लगभग कोई दूसरी जगह नहीं बचती. हर दोपहर लखनऊ में हजारों छात्र यही सफर तय करते हैं. वे भारी स्कूल बैग, अधूरा होमवर्क और पूरे दिन की थकान लेकर हजरतगंज, गोमती नगर और अलीगंज के कोचिंग हब पहुंचते हैं. क्लास शुरू होने तक वे पहले ही पूरी तरह थक चुके होते हैं.

Lucknow's coaching hubs draw thousands of students preparing for competitive entrance examinations every day | Photo: Vitasta Kaul | ThePrint
लखनऊ के कोचिंग हब हर दिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हजारों छात्रों को अपनी ओर खींचते हैं. | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

विद्यामंदिर क्लासेस में मैथ्स पढ़ाने वाले पवन सिंह कहते हैं, “क्लास 4.15 बजे शुरू होती है, लेकिन हम अक्सर तुरंत पढ़ाना शुरू नहीं करते. उनके चेहरे देखकर समझ में आ जाता है कि वे सुबह से स्कूल में थे. हम उनसे कहते हैं, ‘दस मिनट आराम कर लो. पानी पी लो. फिर शुरू करते हैं.'”

अब कोचिंग संस्थान सिर्फ मुश्किल विषय समझाने की जगह नहीं रह गए हैं. वे एक तरह से “तीसरी जगह” बन गए हैं. यानी घर और स्कूल के अलावा वह जगह जहां आज के युवा अपना सबसे ज्यादा समय बिताते हैं.

शिक्षकों का कहना है कि छात्र सिर्फ पढ़ाई से जुड़े सवाल लेकर नहीं आते.

जयदीप विद्यार्थी कहते हैं, “वे ऐसे सवाल पूछते हैं जिनकी उम्मीद नहीं होती. वे सिर्फ मैथ्स सीखने नहीं आते. वे ऐसे सवाल लेकर आते हैं जो कहीं और नहीं पूछ सकते. कैलकुलस का क्या फायदा है. क्या यह चैप्टर असल जिंदगी में कभी काम आएगा. वे सिर्फ सिलेबस नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी की दिशा भी समझना चाहते हैं.”

बच्चे अपने माता-पिता से हुए झगड़ों की बात करते हैं. वे पूछते हैं कि क्या उन्हें परीक्षा का एक और प्रयास करना चाहिए. वे सोचते हैं कि क्या इंजीनियरिंग सच में उनके लिए सही है. कुछ बच्चे सिर्फ चाहते हैं कि कोई उनकी बात सुन ले.

Jaideep Vidyarthi and Pawan Singh at Vidyamandir Classes in Lucknow | Photo: Vitasta Kaul | ThePrint
जयदीप विद्यार्थी और पवन सिंह, विद्यामंदिर क्लासेस, लखनऊ. | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

लखनऊ सेंटर के प्रमुख जयदीप विद्यार्थी कहते हैं, “मेरे पास छात्र मैसेज करके कहते हैं, ‘सर, आज मेरी पापा से लड़ाई हो गई. क्या आप उन्हें समझा सकते हैं?’ माता-पिता हमें फोन करके अपने बच्चों को समझने की कोशिश करते हैं. बच्चे हमें कहते हैं कि हम उनके माता-पिता से बात करें. कहीं न कहीं हम दोनों के बीच पुल बन जाते हैं.”

उनके मुताबिक यह भूमिका अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गई है, क्योंकि माता-पिता और किशोर एक-दूसरे को समझने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं.

विद्यार्थी कहते हैं, “आज सबसे बड़ी समस्या सिर्फ IQ नहीं है. असली समस्या EQ है. बच्चों को पहले से ज्यादा जानकारी है, लेकिन उनमें से कई लोग निराशा, आलोचना या तनाव का सामना करने में कठिनाई महसूस करते हैं. कई बार उन्हें एक और लेक्चर की जरूरत नहीं होती. उन्हें सिर्फ किसी ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो उनसे कहे कि सब ठीक हो जाएगा.”

खराब मार्क्स आने के बाद एक स्टूडेंट का कोचिंग टीचर को भेजा गया WhatsApp मैसेज, जिसमें उनसे परिवार से बात करने के लिए कहा गया | फोटो: विशेष व्यवस्था

न दिखने वाले जख्म

तनिष्का के लिए इसका असर अब उसके शरीर पर भी साफ दिखने लगा है. डॉक्टर ने उसे चेतावनी दी है कि बचपन में जो दौरे (सीजर्स) उसे पड़ते थे, वे तनाव की वजह से फिर से शुरू हो सकते हैं. लेकिन उसके लिए आराम करना कोई विकल्प नहीं है.

दिल्ली के बवाना इलाके के बरवाला गांव में रहने वाला हिमांशु दुबे सुबह 4 बजे उठकर स्कूल जाने से पहले पढ़ाई करता है. इसके बाद वह भीड़ से भरी DTC बस में सफर करके साढ़े चार घंटे की ट्यूशन करता है. उसे सिर्फ तीन घंटे की नींद मिलती है. वह मूड स्विंग और ध्यान लगाने में परेशानी से भी जूझ रहा है.

स्कूल से ट्यूशन जाते समय अपना बैग पकड़े हुए हिमांशु कहता है, “मेरे परिवार ने मेरी पढ़ाई पर इतना पैसा खर्च किया है. मुझे डर लगता है कि कहीं मैं उनकी उम्मीदों पर खरा न उतर पाऊं.”

वह अपने परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर करना चाहता है.

हिमांशु कहता है, “मेरा पहला लक्ष्य है कि मैं अपने परिवार को बड़े घर में शिफ्ट कर सकूं. मैं कुछ साल सरकारी अस्पताल में काम करना चाहता हूं.”

वह आगे कहता है, “आखिर में मेरा सपना है कि मैं उत्तर प्रदेश के अपने शहर सुल्तानपुर वापस जाऊं और वहां एक छोटा चैरिटेबल अस्पताल खोलूं.”

Himanshu Dubey spends hours each day commuting between school and coaching classes in New Delhi | Photo: Himanshi Aggarwal | ThePrint
हिमांशु दुबे हर दिन स्कूल और कोचिंग के बीच आने-जाने में कई घंटे बिताते हैं. | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

कोलकाता में के. गांगुली का दिन सुबह 5.30 बजे शुरू होता है और जैसा वह कहती हैं, “2X स्पीड” से चलता है.

वह कहती हैं, “कई बार मैं स्कूल बस में ही अपना लंच खत्म कर लेती हूं ताकि घर पहुंचकर कुछ मिनट सो सकूं. मैं पढ़ना चाहती हूं, गाना भी गाना चाहती हूं और अपने लिए भी थोड़ा समय चाहती हूं. लेकिन अब सब कुछ एक दौड़ जैसा लगता है.”

कुछ छात्रों के लिए तो आराम करना भी अपराधबोध लेकर आता है.

रोज 10 घंटे की पढ़ाई और कोचिंग के बीच खुद को पूरी तरह थकने से बचाने के लिए नकुल ने कोचिंग संस्कृति के उस दबाव का सामना करना सीखा, जिसमें हर समय सिर्फ पढ़ाई करने की उम्मीद की जाती है. शुरुआत में उसने अपने साथियों की तरह देर रात तक रुककर सेल्फ स्टडी करने की कोशिश की. लेकिन इससे वह बहुत ज्यादा थक गया. अब वह अपने वीकेंड को पूरी तरह सुरक्षित रखता है. शनिवार और रविवार को वह फिल्में देखता है, जिम जाता है या परिवार के साथ समय बिताता है.

लेकिन कोचिंग का यह सिस्टम ऐसे जख्म छोड़ जाता है जो दिखाई नहीं देते.

नकुल कहता है, “वीकेंड पर जब मैं आराम करता हूं, तब भी मुझे परेशानी होती है. मैं खुद से कहता हूं, ‘नहीं, मुझे यह नहीं करना चाहिए. बाकी लोग तो पढ़ाई कर रहे होंगे.'”

गांगुली को जिंदगी की तेज रफ्तार से भी ज्यादा इस बात का डर लगता है कि कहीं वह अपने माता-पिता को निराश न कर दे.

वह कहती हैं, “अगर मुझे पता हो कि मैंने अपनी पूरी कोशिश की है, तो मुझे कम नंबर आने से फर्क नहीं पड़ता. लेकिन मुझे अपने माता-पिता को बताने से डर लगता है. मैं सोचती रहती हूं कि वे निराश हो जाएंगे. यही बात मैं संभाल नहीं पाती.”

Notebooks belonging to K Ganguly, filled with class notes and exam preparation | Photo: Nootan Sharma | ThePrint
के. गांगुली की कॉपियां, जिनमें क्लास नोट्स और परीक्षा की तैयारी लिखी हुई है. | फोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

दिप्रिंट से बात करने वाले कई स्कूल काउंसलर कहते हैं कि आज की पीढ़ी पहले से कहीं ज्यादा जागरूक है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके लिए असफलता से उबरना आसान हो गया है.

कोलकाता के गार्डन हाई स्कूल की स्कूल काउंसलर चैताली घोष कहती हैं, “आज के छात्रों के पास 10 साल पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जानकारी है. लेकिन मुझे उनकी सहनशक्ति की चिंता होती है. पहले बच्चे मुश्किल हालात का बेहतर सामना कर लेते थे. आज वे ऐसी दुनिया में बड़े हो रहे हैं जहां हर चीज तुरंत मिल जाती है. इसलिए असफलता या झटकों को संभालना उनके लिए और मुश्किल हो गया है.”

NEET से जुड़े छात्र आत्महत्याओं की घटनाओं के बाद कई स्कूलों ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अपना नजरिया बदलना शुरू किया है. अब स्कूल अपने सपोर्ट सिस्टम में काउंसलरों को शामिल कर रहे हैं और शिक्षकों को यह सिखाया जा रहा है कि वे किन संकेतों पर ध्यान दें. जैसे अचानक पढ़ाई में गिरावट, लोगों से दूर रहने की आदत या गुस्से से जुड़ी समस्याएं.

मुंबई के विले पार्ले की वरिष्ठ शिक्षिका रेणु धोटरे ने अपने 10 छात्रों के साथ “मेंटरशिप ग्रुप” नाम का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है. यह ऐसा ग्रुप है जहां छात्र बिना झिझक अपने डर और परेशानियां साझा करते हैं. जब उनके नंबर कम आते हैं या वे खुद को बहुत दबाव में महसूस करते हैं, तो वे लिखते हैं, “वाइब नहीं आ रही है” या “कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा.”

वह आज के माता-पिता की तुलना पहले की पीढ़ी के माता-पिता से करती हैं. उनका मानना है कि आज के माता-पिता पहले से ज्यादा समझदार हो गए हैं. लेकिन बच्चों में आए बदलाव को लेकर वह चिंतित भी हैं.

वह कहती हैं, “आज के माता-पिता पहले से ज्यादा शांत और समझदार हैं. लेकिन यह पीढ़ी ज्यादा नाजुक हो गई है. इनमें घमंड, अधिकार जताने की भावना और अहंकार भी ज्यादा है. हमें बीच का रास्ता निकालना होगा.”

मनोवैज्ञानिक अब इस पूरे पैटर्न को समझने लगे हैं. किशोरों के साथ काम करने वाले कई विशेषज्ञ कहते हैं कि पिछले 10 साल में प्रतियोगिता का दबाव कई गुना बढ़ गया है.

बच्चों पर कक्षा 8 से ही अपने करियर का फैसला करने का दबाव आने लगता है. धीरे-धीरे नींद की समस्या और मूड स्विंग शुरू होते हैं. गंभीर मामलों में यही परेशानी चिंता, डिप्रेशन और यहां तक कि सीजर्स तक पहुंच सकती है. चेन्नई की मनोवैज्ञानिक और काउंसलर वंदना कहती हैं कि माता-पिता पहले की तुलना में ज्यादा समझदार हैं, लेकिन साथियों का दबाव अब भी बहुत ज्यादा है और उससे निपटना आसान नहीं होता.

जाह्नवी कहती हैं, “ज्यादातर शिक्षक छात्रों की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखते. इसी वजह से हममें से कई खुद को नजरअंदाज महसूस करते हैं. मुझे लगता है कि शिक्षकों को छात्रों के साथ ज्यादा दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए. इससे हमारे और उनके बीच अच्छा रिश्ता बनेगा और हम क्लास में ज्यादा सहज होकर सवाल पूछ पाएंगे और अपनी शंकाएं दूर कर पाएंगे.”

वंदना उस समय हैरान रह गईं जब 14 साल का एक छात्र, जो क्लास में टॉपर बनने के दबाव की वजह से बहुत ज्यादा नींद की समस्या से जूझ रहा था, अपने माता-पिता के साथ उनके सेंटर में मानसिक स्वास्थ्य की मदद लेने पहुंचा.

वंदना कहती हैं, “छात्रों के पास शौक या खेल के लिए बिल्कुल समय नहीं है. अगर वे कुछ करते भी हैं, तो वह भी बहुत प्रतिस्पर्धी हो जाता है. बहुत कम छात्र खेलों में सक्रिय रहते हैं. छात्रों को दूसरे करियर विकल्पों की जानकारी नहीं होती. वे अपने आसपास जो देखते हैं, उसकी वजह से खुद को कम आंकने लगते हैं. पहले परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के सामने ध्यान भटकाने वाली चीजें कम होती थीं. आज छात्रों को हर चीज में आगे रहना पड़ता है ताकि वे जिंदगी के हर क्षेत्र में सक्रिय बने रहें.”

बेंगलुरु की युक्ता के लिए इस सबकी कीमत सिर्फ थकान से कहीं ज्यादा रही.

जब वह कक्षा 9 में थी, तभी उसने डॉक्टर बनने का फैसला किया. उसके पिता IT में काम करते हैं और उसकी मां पेशे से वकील हैं. दोनों ने उसका सपना पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश की.

लेकिन इस तनाव की वजह से उसके शरीर में ऑटोइम्यून रिएक्शन शुरू हो गया और अब उसे रूमेटॉयड आर्थराइटिस है. वह कहती है कि उसके साथ पढ़ने वाले कई छात्र अब नियमित एक्स्ट्रा करिकुलर गतिविधियों की जगह बार-बार मनोचिकित्सक, थेरेपिस्ट, डॉक्टर और काउंसलर के पास जाते हैं. साथ ही हर हफ्ते एक दिन बीमार होने की छुट्टी भी लेते हैं, “सिर्फ किसी तरह खुद को संभालने के लिए.”

वह कहती है, “हम ऐसे बहुत से लोगों को जानते हैं जिन्होंने अपनी जान लेने की कोशिश की.”

जब सिस्टम में ही कमी हो

सालों तक छात्रों से कहा गया कि अगर वे मेहनत करेंगे तो सफलता जरूर मिलेगी. लेकिन अब कई छात्रों को इस बात पर भरोसा नहीं रहा.

तनिष्का कहती है कि NEET पेपर लीक की घटनाओं ने उसका मनोबल बहुत गिरा दिया है. लेकिन अब रास्ता बदलना भी उसके लिए आसान नहीं है.

वह कांपती आवाज में कहती है, “पेपर लीक के बाद तनाव और बढ़ गया है. अब पढ़ाई करने का भी मन नहीं करता क्योंकि हमें इस पूरी प्रक्रिया पर भरोसा नहीं रहा. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हम कोई दूसरा करियर चुन लें, जो शायद इससे भी ज्यादा तनाव वाला हो.”

लखनऊ की वर्णिमा कहती हैं कि दिल्ली के जंतर-मंतर और दूसरी जगहों पर हुए छात्रों के प्रदर्शन सिर्फ एक पेपर लीक के खिलाफ नहीं थे.

वह कहती हैं, “यह युवाओं के लिए था. अगर कोई इतने दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठा है और सरकार जिम्मेदारी नहीं ले रही, तो इस पर बात होनी चाहिए. हम नहीं चाहते कि यह फिर से हो. अगर बार-बार पेपर लीक हो रहे हैं, तो इसका मतलब है कि सिस्टम में कहीं न कहीं गड़बड़ी है. हम यह दिखावा नहीं कर सकते कि सब कुछ ठीक है.”

वर्णिमा के स्कूल और JEE की तैयारी के लिए बनाए गए व्यवस्थित नोट्स. | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

वह कहती हैं कि इन प्रदर्शनों ने एक और बात भी साफ कर दी.

“यह एक तरह का फिल्टर बन गया. मुझे समझ आया कि लोग कितनी अलग-अलग तरह से सोचते हैं. हमारी बहसें हुईं. उन बातचीतों की वजह से कुछ दोस्तियां भी बदल गईं.”

यह मुद्दा उनके लिए इसलिए भी व्यक्तिगत है क्योंकि वह जानती हैं कि कई साल की मेहनत आखिर में ऐसी चीजों पर निर्भर कर सकती है जो किसी छात्र के बस में नहीं होती.

वह कहती हैं, “आप एक परीक्षा के लिए सालों मेहनत करते हैं. फिर अचानक पेपर लीक जैसी घटना हो जाती है. हम छात्र इसे रोक नहीं सकते. हम सिर्फ अपनी तरफ से सबसे अच्छी तैयारी कर सकते हैं.”

कोचिंग संस्थानों के बड़े-बड़े होर्डिंग और टॉपर्स की तस्वीरें जिस सपने का वादा करते हैं, वह अब कई छात्रों के लिए जाल बन गया है. इन होर्डिंग पर यह कभी नहीं लिखा होता कि कितने छात्र सफल नहीं हो पाए.

बेंगलुरु की युक्ता का पहला NEET प्रयास पेपर लीक की वजह से बेकार हो गया. इसके सिर्फ चार हफ्ते बाद उसे दोबारा परीक्षा देनी पड़ी. कई दूसरे छात्रों की तरह उसने भी एक साल का ड्रॉप लिया, जिसका मतलब है पूरे समय सिर्फ परीक्षा की तैयारी करना. उसके कोचिंग सेंटर में हर हफ्ते दो मॉक टेस्ट होते हैं. एक सोमवार को और दूसरा शनिवार को.

लेकिन पेपर लीक जैसी घटनाएं भी कई छात्रों और उनके माता-पिता का NEET का सपना खत्म नहीं कर पातीं.

बेंगलुरु के एक IT सॉल्यूशंस आर्किटेक्ट हाल ही में अपनी बेटी को वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से वापस लेकर आए. उसने बायोमेडिकल इंजीनियरिंग की सीट जॉइन करने के सिर्फ एक महीने बाद छोड़ दी. दोबारा हुए NEET में उसके नंबर कम आए थे. इसके बाद उसने JEE दी और समझौते के तौर पर VIT में दाखिला लिया. लेकिन उसने वह सीट भी छोड़ दी ताकि एक बार फिर NEET की तैयारी कर सके. उसके पिता इस फैसले का समर्थन करते हैं. उनका कहना है कि बच्चे ऐसे झटकों को अलग तरीके से संभालते हैं.

वह कहते हैं, “मैं जिंदगी देख चुका हूं. भावनाओं से गुजरा हूं. जल्दबाजी में फैसले भी लिए हैं. लेकिन इस उम्र के बच्चों में हार्मोनल बदलाव होते हैं. उनकी डाइट अलग होती है. वे देर रात तक पढ़ते हैं. मोबाइल फोन भी इस्तेमाल करते हैं. दबाव से निपटने का उनका अपना तरीका होता है.”

उन्हें पता है कि आखिर में बहुत कम छात्र सफल होंगे. फिर भी वे एक बार और कोशिश करने को तैयार हैं.

इस अनिश्चितता ने परिवारों की सोच भी बदल दी है. पहले NEET और JEE को ही अंतिम रास्ता माना जाता था. लेकिन अब कई किशोर अपने लिए दूसरा विकल्प भी तैयार रखने लगे हैं. उन्हें अपनी लंबी मेहनत पर भरोसा है. लेकिन उन्हें इस बात पर भरोसा नहीं कि सिस्टम भी उनका साथ देगा.

असमान दौड़

हर 16 साल का बच्चा एक जैसी शुरुआत नहीं करता.

मुंबई के अंधेरी वेस्ट की एक बस्ती में 300 वर्ग फुट के छोटे से घर में मानसी NEET की तैयारी करती है. वह अपने बिस्तर के पास बनी छोटी-सी जगह पर बैठकर हर दिन 4 से 5 घंटे तक एनाटॉमी और ऑर्गेनिक केमिस्ट्री याद करती है. अब उसे प्रेशर कुकर की सीटी, बाहर गलियों में खेलते बच्चों की आवाज और बस्ती का शोर सुनने की आदत हो गई है.

उसका परिवार उसके पिता की 20,000 रुपये महीने की जिम ट्रेनर की नौकरी पर चलता है. घर में ज्यादातर आलू और प्याज का खाना बनता है. वहीं, उसके दादा अपनी जमा पूंजी से उसकी कोचिंग की फीस भरते हैं.

मानसी कहती है, “मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं ताकि अपने परिवार को इस बस्ती से निकालकर किसी ऊंची इमारत वाले फ्लैट में ले जा सकूं.”

Mansi's mother, who studied until Class 12, is her biggest supporter | Photo: Triya Gulati | ThePrint
मानसी की मां, जिन्होंने कक्षा 12 तक पढ़ाई की है, उसकी सबसे बड़ी समर्थक हैं. | फोटो: त्रिया गुलाटी | दिप्रिंट

हर दिन वह 3 किलोमीटर दूर आकाश इंस्टीट्यूट जाती है. वहां वह उन्हीं बेंचों पर बैठती है जहां अंग्रेजी बोलने वाले और आईफोन इस्तेमाल करने वाले दूसरे छात्र बैठते हैं. उसके लिए योग्यता अभी भी सबको बराबरी पर लाने वाली चीज है. लेकिन NEET पेपर लीक के बाद उसने दूसरे करियर विकल्पों के बारे में भी सोचना शुरू कर दिया है.

मानसी कहती है, “पेपर लीक होने का सबसे बड़ा नुकसान हमारे जैसे बच्चों को होता है.”

अब जबकि यह भरोसा नहीं कि परीक्षा निष्पक्ष होगी, उसके परिवार ने तय किया है कि अगर NEET नहीं हुआ तो फार्मेसी सबसे अच्छा दूसरा विकल्प होगा. कुछ दूसरे छात्र नर्सिंग या एलाइड हेल्थ सर्विसेज की तरफ भी सोच रहे हैं.

अक्सर किसी छात्र का सामाजिक और आर्थिक स्तर ही तय करता है कि उसका दूसरा विकल्प कैसा होगा. जिनके पास सुविधाएं हैं, उनके लिए दूसरा रास्ता आसान होता है. लेकिन कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए प्लान B सिर्फ आखिरी उम्मीद होता है, ताकि परिवार की सालों की मेहनत और त्याग बेकार न जाए.

उसी बस्ती से सिर्फ आधे घंटे की दूरी पर एक ऊंची इमारत में रहने वाली कक्षा 11 की छात्रा नासेहा शेख JEE की तैयारी कर रही है. लेकिन इंजीनियरिंग उसके लिए सिर्फ कई विकल्पों में से एक है. एक संपन्न कारोबारी परिवार से आने वाली नासेहा भवन्स कॉलेज से अपनी सबसे अच्छी दोस्त का हाथ पकड़कर हंसते हुए बाहर निकलती है. उसे प्रवेश परीक्षा का तनाव परेशान नहीं करता.

नासेहा कहती है, “अगर मेरा एडमिशन नहीं हुआ तो मैं इवेंट मैनेजमेंट कर लूंगी.”

Naseha Shaikh (left) and her friend Ayesha outside their college in Mumbai | Photo: Triya Gulati | ThePrint
नासेहा शेख (बाएं) अपनी दोस्त आयशा के साथ मुंबई में अपने कॉलेज के बाहर. | फोटो: त्रिया गुलाटी | दिप्रिंट

माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ाई में अच्छा करें. लेकिन वे भी ऐसे समाज के दबाव में रहते हैं जहां सफलता को रैंक और पेशे से मापा जाता है. जाह्नवी की मां पूर्णिमा ने उसके लिए इंजीनियरिंग का विकल्प पहले ही खारिज कर दिया है. वह चाहती हैं कि अगर जाह्नवी चाहे तो पॉलिटिकल साइंस या डिजाइन पढ़ सकती है. लेकिन परिवार के सफल रिश्तेदार और “कम महत्व वाले” विषय का टैग अब भी मेडिकल की ओर धकेलता है.

सरकारी स्कूल की एक और छात्रा प्रियदर्शिनी ने डॉक्टर बनने का सपना नहीं छोड़ा. उसने दो साल का गैप लिया. उसने अपनी मां को, जो पड़ोसियों के कपड़े सिलकर घर चलाती हैं, मनाया कि वह उसे एक और बार NEET की तैयारी करने दें.

प्रियदर्शिनी कहती है, “हमारी परिवार की मासिक आय 20,000 रुपये थी. ऐसे में प्राइवेट कोचिंग संभव नहीं थी. मेरी मां ने मेरी ग्रेजुएशन के लिए 50,000 रुपये बचाकर रखे थे. उन्होंने वही पैसे मेरी NEET कोचिंग के लिए दे दिए.”

वह पहले प्रयास में सिर्फ 30 नंबर से पीछे रह गई. दूसरे ड्रॉप ईयर के दौरान उसे अकेलापन महसूस होने लगा क्योंकि उसके दोस्त कॉलेज चले गए थे.

आंसू रोकते हुए वह कहती है, “दूसरों को जिंदगी में आगे बढ़ते, कॉलेज के दूसरे साल में पहुंचते या डांस और सेल्फ ग्रूमिंग के वीडियो पोस्ट करते देखना बहुत दर्द देता है. जबकि मैं वहीं खड़ी हूं और NEET की तैयारी कर रही हूं.”

प्रियदर्शिनी ने बताया कि कोचिंग में सरकारी स्कूल के छात्र की जिंदगी कैसी होती है.

वह कहती है, “मैं धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल पाती. मुझे लगने लगा कि क्या मैं NEET देने लायक भी हूं. यही फर्क मेरे अंदर असुरक्षा पैदा करता था. ऐसा लगता था कि मैं उन छात्रों से मुकाबला कर रही हूं जिनके माता-पिता हर सुविधा दे सकते हैं.”

समय के साथ प्रियदर्शिनी ने महसूस किया कि कोचिंग में पढ़ने वाले लगभग 85 प्रतिशत छात्र अपने माता-पिता के दबाव में मेडिकल की तैयारी कर रहे थे.

वह कहती है, “सिर्फ 15 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि वे अपनी इच्छा से NEET देना चाहते हैं. तब मुझे समझ आया कि असली मुकाबला उन्हीं से है.”

बड़े शहरों में अपनी तरह की मुश्किलें जरूर हैं, लेकिन वहां करियर के विकल्प भी ज्यादा होते हैं. किशोर काउंसलर आदित्य सुंदराय, जिन्होंने NEET की तैयारी करने वाले छात्रों के साथ लंबे समय तक काम किया है, कहते हैं कि टियर-1, टियर-2 और टियर-3 शहरों के बीच सबसे बड़ा फर्क इस बात में है कि छात्र NEET पास न होने का मतलब कैसे देखते हैं.

वह कहते हैं, “टियर-1 शहरों के छात्रों को आमतौर पर करियर के ज्यादा विकल्प देखने को मिलते हैं. वे लोगों को कानून, मैनेजमेंट, रिसर्च, डिजाइन, मीडिया, उद्यमिता और सिविल सेवा जैसे क्षेत्रों में जाते हुए देखते हैं. इससे NEET का दबाव खत्म नहीं होता, लेकिन उन्हें दूसरा भविष्य सोच पाना आसान हो जाता है.”

भिलाई में बड़े हुए आदित्य सुंदराय कहते हैं कि उन्होंने खुद महसूस किया कि सीमित शिक्षा व्यवस्था बच्चों की सोच को कितना सीमित कर देती है.

वह कहते हैं, “उस समय पूरे शहर में सिर्फ एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ह्यूमैनिटीज की पढ़ाई होती थी. इससे मुझे समझ आया कि शिक्षा का माहौल किसी बच्चे की सफलता की सोच को कितनी गहराई से प्रभावित करता है. परीक्षा तो सबके लिए एक जैसी होती है, लेकिन सफलता और असफलता का मतलब उस माहौल, अवसर और उम्मीदों से तय होता है जिसमें बच्चा बड़ा होता है.”

NEET के खिलाफ तमिलनाडु का मामला

डॉक्टर या इंजीनियर बनने का दबाव यूं ही नहीं बना. इन दोनों पेशों को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है. जबकि दूसरे करियर विकल्पों को उतनी पहचान नहीं मिलती. कई छात्रों को दूसरे कोर्सों की जानकारी बहुत देर से मिलती है या कभी मिलती ही नहीं.

चेन्नई के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 17 साल के युगन के लिए स्थिति और मुश्किल है. उसके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है. इसलिए अच्छी कोचिंग उसके लिए पहुंच से बाहर है.

अंग्रेजी में बोलने की कोशिश करते हुए युगन कहता है, “शुरुआत में मेरा ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता था. फिर मैंने खुद पढ़कर और अपने प्राइवेट ट्यूटर की मदद से पूरी कोशिश की. लेकिन जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि मैं मेडिकल में नहीं जा पाऊंगा. स्टेट बोर्ड की पढ़ाई में थ्योरी पर ज्यादा जोर होता है. NEET देने के बाद मुझे महसूस हुआ कि एप्लिकेशन आधारित सवालों के लिए मैं तैयार नहीं था. इसलिए मैंने इंजीनियरिंग के लिए आवेदन कर दिया. मुझे हर समय यह डर लगा रहता है कि अगर एक और साल खराब हुआ तो परिवार निराश होगा. वे चाहते हैं कि मैं उनका नाम रोशन करूं.”

Students attend a government school in Cuddalore, Tamil Nadu. Teachers say many state-board students struggle to compete with NEET aspirants from better-resourced schools | Photo: Shweta Tripathi | ThePrint
तमिलनाडु के कुड्डालोर के एक सरकारी स्कूल में छात्र. शिक्षक कहते हैं कि स्टेट बोर्ड के कई छात्रों के लिए बेहतर संसाधनों वाले स्कूलों के NEET छात्रों से मुकाबला करना मुश्किल होता है. | फोटो: श्वेता त्रिपाठी | दिप्रिंट

वह आगे कहता है कि ICSE और CBSE बोर्ड के छात्रों से मुकाबला करने की असुरक्षा ने दबाव और बढ़ा दिया है.

वह कहता है, “सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षाएं ज्यादा कठिन होती हैं. अगर मुझे कॉन्सेप्ट अच्छे से समझ नहीं आते तो मैं NEET में कुछ नहीं कर सकता. मैं सिर्फ कोचिंग की मदद से NEET निकाल सकता था, लेकिन मेरी स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं तैयारी के लिए एक और साल ले पाता.”

कई छात्र स्टेट बोर्ड की पढ़ाई और कोचिंग दोनों साथ लेकर चलने की कोशिश करते हैं, लेकिन थककर स्कूल छोड़ देते हैं. कुछ छात्र, जैसे युगन, आखिर में वही चुनते हैं जो उनकी परिस्थितियां उन्हें करने देती हैं.

सरकारी स्कूलों के शिक्षक एक अलग तस्वीर बताते हैं. तमिलनाडु में कई बार स्कूलों में अतिरिक्त कोचिंग भी दी जाती है. लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं का सिलेबस काफी हद तक NCERT पर आधारित है, जिसे स्टेट बोर्ड की कक्षाओं में पूरी तरह नहीं पढ़ाया जाता. कुड्डालोर के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक कहते हैं कि कोचिंग कुछ छात्रों की मदद जरूर करती है, लेकिन तैयारी की जल्दी शुरुआत और संसाधनों की कमी बराबरी का मुकाबला लगभग नामुमकिन बना देती है.

Students leave a coaching centre in Chennai after classes. Coaching has become a parallel education system for many teenagers preparing for competitive exams | Photo: Shweta Tripathi | ThePrint
चेन्नई में कोचिंग सेंटर से बाहर निकलते छात्र. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कई किशोरों के लिए कोचिंग अब समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है. | फोटो: श्वेता त्रिपाठी | दिप्रिंट

सरकारी स्कूल के छात्रों को पढ़ाने वाले प्राइवेट ट्यूटर नित्यानंद साफ शब्दों में कहते हैं.

वह कहते हैं, “बहुत बड़ी संख्या में छात्र अपने परिवार में पहली पीढ़ी के पढ़ने वाले हैं. उनके पास CBSE और ICSE छात्रों जैसी सुविधाएं नहीं होतीं. मैं बच्चों पर NEET या JEE का दबाव नहीं डालता क्योंकि मुझे पता है कि मुकाबला बहुत कठिन है. मैं उनका मनोबल नहीं तोड़ना चाहता. लेकिन ये बच्चे एक साल का गैप भी नहीं ले सकते क्योंकि उनके माता-पिता उसका खर्च नहीं उठा सकते.”

यही वजह है कि तमिलनाडु में NEET का इतना ज्यादा विरोध होता है. वहां माना जाता है कि यह परीक्षा उन लोगों के पक्ष में है जो कई साल तक महंगी कोचिंग और NCERT आधारित तैयारी कर सकते हैं. वहीं स्टेट बोर्ड के छात्र, खासकर ग्रामीण और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों से आने वाले बच्चे, शुरुआत से ही पीछे रह जाते हैं.

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) का कहना है कि कक्षा 12 के बोर्ड परीक्षा के अंकों के आधार पर एडमिशन ज्यादा न्यायसंगत है और यह छात्रों की पढ़ाई का बेहतर मूल्यांकन करता है. खासकर तब, जब पेपर लीक के बाद NEET पर पहले से ज्यादा सवाल उठ रहे हैं.

तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) ने भी कहा कि NEET पर रोक लगनी चाहिए. पार्टी का कहना है कि इस परीक्षा ने कोचिंग उद्योग को बढ़ावा दिया है, CBSE और स्टेट बोर्ड के छात्रों के बीच असमानता बढ़ाई है और मेडिकल कॉलेजों में ग्रामीण तथा कमजोर वर्गों के छात्रों की संख्या घटाई है. इससे लंबे समय में राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है.

2017 से 2024 के बीच NEET से जुड़े कम से कम 26 छात्रों की मौत की खबरें सामने आई हैं. 2017 में तमिलनाडु के साधारण परिवार से आने वाली कक्षा 12 की टॉपर एस. अनीता ने स्टेट बोर्ड में बहुत अच्छे अंक हासिल किए थे, लेकिन वह NEET पास नहीं कर सकीं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा NEET रद्द करने की उनकी याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली. उनके भाई एस. मणिरत्नम कहते हैं कि परिवार ने कभी उन पर कोई खास पेशा चुनने का दबाव नहीं डाला था.

वह कहते हैं, “इन प्रवेश परीक्षाओं में कोई समानता नहीं है. कम सुविधाओं वाली शिक्षा व्यवस्था से आने वाले बच्चों को बहुत छोटी उम्र से ही लगता है कि वे पहले से पीछे हैं. कोचिंग सिस्टम ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है. जब समाज और माता-पिता का दबाव बहुत ज्यादा होता है, तब NEET जान भी ले सकता है.”

रात में कुछ घंटे

आखिरकार किताबें बंद हो जाती हैं. दिन का पूरा टाइमटेबल खत्म हो जाता है. घर में शांति छा जाती है. फिर अंधेरे कमरों में मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन जल उठती हैं.

कई किशोरों के लिए रात का समय ही ऐसा होता है जब वे अपनी जिंदगी का थोड़ा-सा हिस्सा फिर से अपने लिए जी पाते हैं. कुछ बच्चे जानबूझकर अपनी नींद कम कर देते हैं ताकि उन्हें थोड़ा खुला समय मिल सके. ऐसा समय जिसमें वे बिना किसी दबाव के बस थोड़ा आराम कर सकें.

कोलकाता के 16 साल के ऋतब्रत बंद्योपाध्याय कहते हैं कि वह “जल्दी” यानी रात 11 बजे सो जाते हैं. लेकिन अगर उनका फोन देख लिया जाए, तो दोस्तों के साथ उनकी चैट रात 3 बजे के बाद तक चलती रहती है.

किशोरों को लेकर एक आम धारणा है कि वे हर समय मोबाइल पर इंस्टाग्राम रील्स देखते रहते हैं. लेकिन उनकी ऑनलाइन जिंदगी में असल में ऐसा नहीं हो रहा.

कई छात्र अब सामान्य सोशल मीडिया छोड़कर डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर चले गए हैं. 15 साल के शौर्यशिश दास के लिए यह ऐप एक वर्चुअल चाय की दुकान जैसा है. यहां वॉइस चैनल हमेशा खुले रहते हैं. दोस्त फिजिक्स वाला के मॉड्यूल पढ़ते रहते हैं, नई Spider-Man फिल्म के पायरेटेड लिंक शेयर करते हैं, “ब्रेन रॉट” AI मीम भेजते हैं या जो भी ऑनलाइन हो, उसके लिए वीडियो गेम स्ट्रीम करते हैं.

दास कहते हैं, “इसमें वॉइस चैनल होते हैं. मैं बस उन्हें जॉइन कर लेता हूं. जिसे मुझसे बात करनी होती है, वह भी जुड़ जाता है. लोग देख सकते हैं कि मैं ऑनलाइन हूं और गेम खेल रहा हूं. वे चाहें तो गेम में शामिल हो सकते हैं या सिर्फ देख सकते हैं.”

Shourjashish Das with his father, Shivashish Das | Photo: Nootan Sharma | ThePrint
शौर्यशिश दास अपने पिता शिवाशिष दास के साथ. | फोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

इन छात्रों को दुनिया और नए विचारों को जानने की बहुत उत्सुकता होती है. लेकिन दिन में उनके पास इसके लिए समय नहीं होता. वे अपनी चैट में ‘nvm’ (नेवर माइंड) और ‘ngl’ (नॉट गॉना लाई) जैसे छोटे शब्द लिखते हैं, लेकिन उनके विचार काफी बड़े और गहरे होते हैं. उदाहरण के लिए, बंद्योपाध्याय रात को सोने से पहले नीत्शे और सुन त्ज़ू को पढ़ते हैं और राजनीति पर भी नजर रखते हैं.

कई दूसरे JEE छात्रों के विपरीत, वर्णिमा ने स्कूल की जिंदगी पूरी तरह छोड़ने से इनकार कर दिया है. जब भी मौका मिलता है, वह डिबेट प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती हैं. इस साल उन्होंने अपने स्कूल की ओर से एक क्षेत्रीय भाषण प्रतियोगिता में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में ग्रेटा थनबर्ग के भाषण के साथ हिस्सा लिया. वह अपने पहले मॉडल यूनाइटेड नेशंस (MUN) सम्मेलन की भी तैयारी कर रही हैं.

वह कहती हैं, “मुझे हमेशा से पब्लिक स्पीकिंग पसंद रही है. जब भी बोलने का मौका मिलता है, मैं तुरंत खड़ी हो जाती हूं. मुझे यह बहुत अच्छा लगता है.”

वह कहती हैं कि ये प्रतियोगिताएं उन कुछ जगहों में से हैं जहां उन्हें लगता है कि वह खुद जैसी महसूस करती हैं. लेकिन ऐसे पल निकालना आसान नहीं होता.

चोरी किए हुए कुछ मिनटों की बातचीत उन्हें राहत देती है. कभी दोस्तों से, कभी ऑनलाइन और कभी AI से.

वर्णिमा कहती हैं, “इतनी सारी चीजों के साथ चलना पड़ता है. अब मैं और मेरे दोस्त सिर्फ होमवर्क या स्कूल की बात नहीं करते. हम अपने सिलेबस से बाहर की किताबों, नारीवाद, आंदोलनों, आरक्षण, नास्तिकता और हर उस विषय पर बात करते हैं जिसमें हमारी रुचि होती है. इन चर्चाओं का हिस्सा बनने के लिए मुझे लगातार पढ़ना और सीखना पड़ता है. ज्यादातर यह सब ऑनलाइन या AI के जरिए होता है.”

इतनी भागदौड़ के बावजूद ये छात्र अपने विचार बनाते हैं और अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए समय निकाल ही लेते हैं. ज्यादातर यह काम भी ऑनलाइन होता है. उदाहरण के लिए, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन ने इस पीढ़ी के कई बच्चों का ध्यान खींचा है.

बंद्योपाध्याय कहते हैं, “CJP ने दिखाया कि मिलकर काम करने में कितनी ताकत होती है. जिस तरह युवाओं ने विरोध करने की हिम्मत दिखाई, वह काबिल-ए-तारीफ है. लेकिन हर चीज का एक अंत होता है. मुझे लगता है कि CJP अपना पूरा सफर तय कर चुका है. इसकी शुरुआत व्यंग्य से हुई थी. फिर यह गंभीर हुआ और इसने मजाक और हास्य के जरिए विरोध किया, जिससे उसे गंभीर नतीजे भी मिले.”

उम्मीदों की दीवार

प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कई छात्रों के लिए परिवार की उम्मीदों का बोझ अक्सर बिना कुछ कहे ही उनके साथ चलता है.

दिल्ली के कई कोचिंग संस्थानों में फिजिक्स पढ़ाने वाले ध्रुव बत्रा कहते हैं, “छात्र साफ देख रहे होते हैं कि उनकी कोचिंग, किताबों और स्कूल की फीस पर कितना पैसा खर्च हो रहा है. चाहे बच्चा कितना भी पढ़ ले, उसके मन में हमेशा यही चलता रहता है कि ‘मैं अभी भी पर्याप्त मेहनत नहीं कर रहा.’ यह अपराधबोध परीक्षा के डर से भी बड़ा होता है.”

अपने बच्चों को असफल होते देखने का डर, या कई बार उन्हें इस दौड़ में और आगे धकेलने का अपराधबोध, माता-पिता को भी सालों की बचत, कर्ज, त्याग और उम्मीदों के बोझ के बारे में सोचने पर मजबूर कर रहा है.

जब टीवी पर छात्रों की आत्महत्या की खबरें आने लगीं, तो मानसी के माता-पिता घबरा गए.

वे “आत्महत्या” शब्द तक नहीं बोल पाए. उन्होंने सिर्फ टीवी की तरफ इशारा करके कहा, “बेटा, ऐसी गलती मत करना. तुम्हें आमिर खान की फिल्म 3 Idiots याद है ना?”

माता-पिता का यह साथ भी अपने साथ एक अलग तरह का दबाव लेकर आता है. वे कहते हैं कि वे अपने बच्चों को तनाव से बचाना चाहते हैं. लेकिन परीक्षा में उनकी अपनी उम्मीदें और निवेश बच्चों के सामने उम्मीदों की एक ऐसी दीवार खड़ी कर देते हैं जिससे बचना मुश्किल होता है.

मुंबई में तन्वी आकाश इंस्टीट्यूट में पढ़ती हैं. देशभर के 300 केंद्रों में इस संस्थान के ढाई लाख से ज्यादा छात्र पढ़ते हैं. उनके पिता मनीष शिंदे एक चपरासी हैं और 35,000 रुपये महीने कमाते हैं.

वे कहते हैं, “परीक्षा या नंबर मायने नहीं रखते. हमारी बेटी ज्यादा जरूरी है. पेपर लीक हो या कुछ और, वह उसके हाथ में नहीं है.”

लेकिन परिवार के लिए NEET की तैयारी अपने आप में गर्व की बात है.

वे गर्व से कहते हैं, “मेरे पूरे परिवार में NEET की तैयारी करने वाली वह पहली बच्ची है.”

बेंगलुरु में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर एग्जीक्यूटिव गीशना के. भी अपनी कक्षा 11 में पढ़ने वाली बेटी के लिए ऐसा ही माहौल बनाने की कोशिश करती हैं.

वह कहती हैं, “घर में बिल्कुल भी दबाव वाला माहौल नहीं है. हमें पहले से पता है कि प्रतियोगिता के इस माहौल में छात्र कितना तनाव झेल रहे हैं. जितना कम तनाव होगा, वह उतना अच्छा प्रदर्शन कर पाएगी.” हालांकि वह यह भी मानती हैं कि अगले साल दबाव और बढ़ जाएगा.

गांगुली ने अपने माता-पिता से बात करने के लिए नोट्स बनाने वाला एक “दोस्त” ढूंढ लिया है: ChatGPT.

एक बार वह अपने पिता से कहना चाहती थीं कि लंबे समय में सिर्फ नंबर ही सफलता तय नहीं करते. उन्होंने अपने मन की सारी बातें ChatGPT में लिखीं और सिर्फ एक सवाल पूछा, “मैं यह बात अपने माता-पिता को कैसे बताऊं?”

चैटबॉट ने जवाब दिया, “बात करने के लिए शांत समय चुनिए. उन्हें बताइए कि आप अपनी पूरी कोशिश कर रही हैं और एक परीक्षा आपका पूरा भविष्य तय नहीं कर सकती. साथ ही उनकी चिंताओं को भी सुनिए और समझाइए कि यह दबाव आपकी मानसिक सेहत पर कैसे असर डाल रहा है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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