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Saturday, 1 August, 2026
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राज्यसभा में BJP सांसद संजय भाटिया ने गुरुग्राम में पंजाब और हरियाणा HC की बेंच की मांग उठाई

संजय भाटिया ने गुरुग्राम के 'टावर ऑफ़ जस्टिस' के उद्घाटन के महीनों बाद राज्यसभा में यह बात उठाई, लेकिन वकीलों का कहना है कि बेंच के लिए औपचारिक प्रक्रिया असल में कभी शुरू ही नहीं हुई.

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गुरुग्राम: बीजेपी के राज्यसभा सांसद संजय भाटिया ने गुरुवार को संसद में ज़ीरो आवर के दौरान केंद्र सरकार से गुरुग्राम में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की एक सर्किट बेंच बनाने की मांग की. यह मांग हरियाणा के कानूनी और राजनीतिक हलकों में लगभग तीन दशक से उठती रही है.

भाटिया ने सदन में कहा कि गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, पलवल, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ के मुकदमे लड़ने वाले लोग, वकील, MSMEs और कॉरपोरेट कंपनियों को हाई कोर्ट के हर मामले के लिए चंडीगढ़ जाना पड़ता है, क्योंकि हाई कोर्ट सिर्फ चंडीगढ़ से ही काम करता है.

उन्होंने कहा कि इससे मुकदमा लड़ने का खर्च बढ़ता है, आने-जाने में ज्यादा समय लगता है और लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता. उन्होंने कहा कि यह इलाका अब देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट और फाइनेंशियल हब में से एक बन चुका है.

सांसद ने कहा कि गुरुग्राम की आर्थिक अहमियत को देखते हुए यहां से बड़ी संख्या में कमर्शियल विवाद, लेबर मामलों, जमीन अधिग्रहण के केस, आर्बिट्रेशन, टैक्स विवाद और दिवालिया मामलों से जुड़े केस आते हैं.

उन्होंने हाल ही में शुरू हुए गुरुग्राम के “टावर ऑफ जस्टिस” का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि यह आधुनिक न्यायिक परिसर है, जिसमें डिजिटल कोर्टरूम और ई-कोर्ट की सुविधाएं हैं और यहां सर्किट बेंच आसानी से चलाई जा सकती है.

भाटिया ने संविधान के अनुच्छेद 39A का हवाला दिया, जिसमें सभी को समान रूप से न्याय दिलाने की जिम्मेदारी राज्य पर डाली गई है. उन्होंने अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जल्दी न्याय के अधिकार का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि गुरुग्राम में हाई कोर्ट की पहुंच बढ़ाना सिर्फ प्रशासनिक सुविधा नहीं बल्कि संवैधानिक जरूरत है.

उन्होंने केंद्र सरकार से कहा कि वह हरियाणा सरकार, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट और दूसरे संबंधित पक्षों से सलाह लेकर इस पर एक व्यवहार्यता अध्ययन (फीजिबिलिटी स्टडी) शुरू करे.

सर्किट बेंच क्या होती है

सर्किट बेंच हाई कोर्ट की ऐसी अस्थायी या समय-समय पर लगने वाली बेंच होती है, जो मुख्य सीट से अलग किसी दूसरे शहर में बैठती है. इसका मकसद यह होता है कि लोगों को अपने मामलों की सुनवाई के लिए मुख्य हाई कोर्ट तक लंबा सफर न करना पड़े.

स्थायी बेंच के विपरीत, सर्किट बेंच तय अंतराल पर बैठती है. जैसे हर हफ्ते, हर पंद्रह दिन या हर महीने. मुख्य हाई कोर्ट के जज वहां जाकर मामलों की सुनवाई करते हैं. हालांकि, कई सर्किट बेंच बाद में मामलों की संख्या बढ़ने पर स्थायी बेंच भी बन गई हैं.

भारत में इसके कई उदाहरण हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट की बेंच नागपुर, औरंगाबाद और पणजी में है. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट जबलपुर के अलावा ग्वालियर और इंदौर में भी बैठता है. राजस्थान हाई कोर्ट की मुख्य सीट जोधपुर में है, जबकि उसकी एक बेंच जयपुर में है.

सर्किट बेंच बनाने के लिए भारत के चीफ जस्टिस, संबंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और संबंधित राज्य सरकारों के बीच सलाह-मशविरा जरूरी होता है. क्योंकि यह कोई अलग अदालत नहीं होती, बल्कि उसी हाई कोर्ट की एक अतिरिक्त बैठक होती है.

करीब 10 साल पुरानी मांग

सर्किट बेंच की मांग नई नहीं है. इसकी शुरुआत 1990 के दशक के आखिर और 2000 की शुरुआत में हुई थी, जब गुरुग्राम तेजी से औद्योगिक शहर बन रहा था. उस समय गुरुग्राम जिला बार एसोसिएशन ने कई प्रस्ताव पास करके हाई कोर्ट की बेंच बनाने की मांग उठाई थी.

2008 से 2012 के बीच यह मांग और तेज हुई. उस समय गुरुग्राम, जिसे तब गुड़गांव कहा जाता था, देश का बड़ा BPO और IT हब बन चुका था. वकीलों के संगठनों ने हरियाणा सरकार, केंद्रीय कानून मंत्रालय और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को कई ज्ञापन दिए. लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा और कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया.

2015 में हरियाणा बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष मनोहर लाल खट्टर ने भी इस मांग का समर्थन किया था. उन्होंने कहा था कि दक्षिण हरियाणा के लोगों को हर सुनवाई के लिए लगभग 300 किलोमीटर का आना-जाना करना पड़ता है.

2014 से 2019 के बीच, जब हरियाणा और केंद्र दोनों जगह बीजेपी की सरकार थी, तब गुरुग्राम और फरीदाबाद बार एसोसिएशन, दक्षिण हरियाणा के वकीलों के संगठन और कई विधायकों ने लगातार यह मुद्दा उठाया. लेकिन फिर भी कोई औपचारिक प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया.

कोविड-19 महामारी के दौरान इस मांग को नया आधार मिला. समर्थकों ने कहा कि वर्चुअल सुनवाई शुरू होने से यह साबित हो गया कि अदालत का काम सिर्फ चंडीगढ़ तक सीमित रखने की जरूरत नहीं है. इसी दौरान गुरुग्राम बार एसोसिएशन ने फिर से अपनी मांग दोहराई.

2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद भी जनप्रतिनिधियों ने यह मुद्दा उठाया. उनका कहना था कि दक्षिण हरियाणा राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है, लेकिन उसके हिसाब से यहां न्यायिक सुविधाएं नहीं हैं.

गुरुवार को राज्यसभा में संजय भाटिया का यह हस्तक्षेप वकीलों के मुताबिक अब तक इस मांग के समर्थन में संसद में उठी सबसे मजबूत आवाज माना जा रहा है.

वकीलों का क्या कहना है

गुरुग्राम जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष संतोक सिंह ने दिप्रिंट से कहा कि सर्किट बेंच की मांग नई नहीं है. वकील कई सालों से इसके लिए प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे गुरुग्राम की आर्थिक ताकत बढ़ी है, वैसे-वैसे इस मांग की जरूरत भी और मजबूत हुई है. लेकिन आज तक बेंच बनाने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई.

गुरुग्राम जिला अदालत में प्रैक्टिस करने वाली वरिष्ठ वकील रितु भारियोक ने इससे भी ज्यादा जोर देकर अपनी बात रखी. उन्होंने ThePrint से कहा कि सर्किट बेंच की मांग अब सिर्फ मांग नहीं बल्कि जरूरत बन चुकी है. उन्होंने कहा कि समय पर न्याय मिलना सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी हिस्सा है. अगर न्याय मिलने में देरी हो या लोगों के लिए न्याय तक पहुंच मुश्किल बना दी जाए, तो यह न्याय से वंचित करने जैसा है.

भारियोक ने कहा कि लोगों को सिर्फ कुछ मिनट की सुनवाई या तारीख मिलने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर चंडीगढ़ नहीं जाना चाहिए. इससे परिवारों पर आर्थिक, मानसिक और पेशेवर बोझ बढ़ता है. उन्होंने कहा कि गुरुग्राम अब बड़ा आर्थिक केंद्र बन चुका है और यहां जरूरी न्यायिक ढांचा भी मौजूद है. ऐसे में सर्किट बेंच बनने से न्याय ज्यादा आसान और सस्ता होगा. इससे निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा और दक्षिण हरियाणा में कानून व्यवस्था और मजबूत होगी.

उन्होंने कहा, “हमारी जिम्मेदारी लोगों को न्याय देना है, न कि उनके लिए न्याय पाना और मुश्किल बनाना. गुरुग्राम में सर्किट बेंच समय की जरूरत है.”

अब तक मामला आगे क्यों नहीं बढ़ा

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट दो राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के लिए काम करता है. इसलिए सर्किट बेंच बनाने का फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच सलाह-मशविरा से होता है. यह प्रक्रिया किसी नई जिला अदालत की स्थापना से अलग और ज्यादा जटिल होती है.

वकीलों और अधिकारियों का कहना है कि हाई कोर्ट के दो राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के लिए होने, सभी पक्षों के बीच सहमति न बनने और न्यायपालिका की यह परंपरागत सोच कि मुख्य सीट को मजबूत किया जाए, कई बेंच न बनाई जाएं, इन्हीं वजहों से कई दशक की मांग के बावजूद यह मामला आगे नहीं बढ़ पाया.

समर्थकों का कहना है कि गुरुग्राम में बेंच बनने से मुकदमे लड़ने का खर्च कम होगा, यात्रा का समय बचेगा और दक्षिण हरियाणा में निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा.

हालांकि, विरोध करने वालों का कहना है कि ज्यादा बेंच बनने से हाई कोर्ट की एकरूपता प्रभावित हो सकती है, पहले से सीमित न्यायिक संसाधनों पर और दबाव पड़ेगा और प्रशासनिक खर्च भी बढ़ेगा. इन्हीं वजहों से अब तक यह प्रस्ताव सरकारी कार्रवाई की बजाय सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक ही सीमित रहा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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