वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 पिछले कुछ साल में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले मुद्दों में से एक है. अब सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के राज्य वक्फ बोर्ड पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने से इनकार कर दिया है. इससे संशोधित कानून एक बार फिर सार्वजनिक बहस में आ गया है.
अदालत ने अभी यह फैसला नहीं किया है कि बोर्ड का गठन कानूनी है या नहीं. इस सवाल का जवाब बाद में दिया जाएगा, लेकिन केरल हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश में दखल देने से इनकार करके सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि संशोधित वक्फ कानून को लागू करने को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है.
विवाद वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने की नई शर्त को लेकर है. केरल हाई कोर्ट ने इस मुद्दे को इतना गंभीर माना कि अंतिम फैसला आने तक बोर्ड को बड़े नीतिगत फैसले लेने से रोक दिया. जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उसने हाई कोर्ट के आदेश के इस हिस्से को नहीं बदला. उसने केवल यह शर्त हटाई कि बोर्ड को राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में काम करना होगा. बाकी प्रतिबंध जारी रखने की अनुमति दी गई.
इस आदेश से राजनीतिक बहस खत्म होने के बजाय बहुत कम बदलाव आया है. बीजेपी इसे संशोधित कानून के पक्ष में न्यायपालिका के समर्थन के रूप में देख रही है, जबकि विपक्ष यह कह रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इस कानून के संवैधानिक रूप से सही होने या न होने पर फैसला नहीं दिया है.
समस्या यह है कि वक्फ प्रशासन में सुधार की हर कोशिश—जो असल में शासन-व्यवस्था का सवाल है जल्द ही पहचान की बहस में बदल जाती है. मुस्लिम नेतृत्व, जिसमें अशरफ अभिजात वर्ग शामिल है, वक्फ कानूनों में किसी भी बदलाव को धार्मिक स्वतंत्रता या खुद समुदाय पर हमले के रूप में पेश करता है. दूसरी ओर, बीजेपी का राजनीतिक संदेश ऐसा लगता है कि वक्फ बोर्डों पर अपने दम पर काम करने के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता. इसलिए उन पर सरकार की ज्यादा निगरानी और गैर-मुस्लिम सदस्यों की मौजूदगी जरूरी बताई जाती है. मैं सरकार की निगरानी की जरूरत को समझता हूं. यह हर संस्था के लिए जरूरी है—निगरानी और संतुलन हमेशा जरूरी होते हैं, लेकिन यह बात साफ नहीं है कि गैर-मुस्लिम सदस्यों को कानून के जरिए शामिल करने से यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा.
इन दोनों में से कोई भी तरीका आम मुसलमानों के हित में सही मायने में काम नहीं करता. यह पूछने के बजाय कि वक्फ संस्थाएं कितनी पारदर्शी और जवाबदेह हैं, बहस को राजनीति और पहचान तक सीमित कर दिया जाता है.
ट्रांसपेरेंसी की ज़रूरत
वक्फ इस्लाम की सबसे पुरानी धर्मार्थ परंपराओं में से एक है. इतिहास में वक्फ की संपत्तियों से स्कूल, अस्पताल, लाइब्रेरी, अनाथालय, पानी की सुविधाएं और गरीबों की मदद के काम किए जाते थे. विचार सरल लेकिन अच्छा था—धन को हमेशा के लिए जनता की भलाई के लिए समर्पित करना.
लेकिन अच्छे इरादे ही काफी नहीं हैं. 21वीं सदी में धर्मार्थ संस्थाओं को यह भी दिखाना होगा कि वे कितना अच्छा काम कर रही हैं.
वक्फ की संपत्तियां भारत के हर हिस्से में फैली हुई हैं और ये देश की सबसे बड़ी धर्मार्थ संपत्तियों में से एक हैं. इससे एक सीधा सवाल उठता है. अगर वक्फ संस्थाओं के पास भारत की तीसरी सबसे बड़ी ज़मीन की संपत्ति है, तो मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अब भी शिक्षा, आर्थिक और सामाजिक मामलों में पीछे क्यों है?
While speaking on the Waqf (Amendment) Bill in the parliament, Union Minister of Parliamentary Affairs Kiren Rijiju mentioned that the largest waqf landholding in the world is in India. After Railway and Defence services, the Waqf board has the largest landbank. https://t.co/9WxXWvgSn1
— infoindata (@infoindata) April 2, 2025
क्या वक्फ की संपत्तियों का सही तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है? क्या इसमें भ्रष्टाचार या गलत तरीके से काम करना हो रहा है? क्या इन संपत्तियों से वह फायदा मिल रहा है, जिसके लिए इन्हें बनाया गया था? ये ऐसे सवाल हैं जिनके ईमानदार जवाब मिलने चाहिए, न कि इन्हें वक्फ संस्था पर हमला माना जाना चाहिए. धर्मार्थ संस्थाओं को इस आधार पर परखा जाना चाहिए कि वे उन लोगों की कितनी अच्छी तरह मदद कर रही हैं, जिनकी मदद के लिए उन्हें बनाया गया था.
हमें वक्फ बोर्डों से ट्रांसपेरेंसी और जवाबदेही चाहिए. अगर कोई संस्था किसी समुदाय की मदद के लिए दी गई बहुत बड़ी धर्मार्थ संपत्तियों का मैनेज करती है, तो उस समुदाय के लोगों को यह देखने का अधिकार होना चाहिए कि इन संपत्तियों का प्रबंधन कैसे किया जा रहा है.
करोड़ों आम मुसलमानों को कुछ बुनियादी सवाल पूछने का अधिकार है. वक्फ की संपत्तियों से हर साल कितनी आय होती है? इसमें से कितने पैसे छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सेवाओं, विधवाओं, अनाथालयों और गरीब परिवारों की मदद पर खर्च किए जाते हैं? कौन-सी संपत्तियां अदालत में विवाद में हैं? किन संपत्तियों पर अवैध कब्जा हो चुका है? किन संपत्तियों की लीज पारदर्शी तरीके से दी गई और किनकी नहीं?
एक बेहतर बहस के लिए जगह बनाना
संशोधित कानून में किए गए बदलावों में से एक वक्फ की संपत्तियों का रिकॉर्ड रखने और उन पर नज़र रखने के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल सिस्टम बनाने का प्रस्ताव है. अगर इसे सही तरीके से लागू किया जाता है, तो रिकॉर्ड की जांच करना आसान हो सकता है, उनमें छेड़छाड़ की गुंजाइश कम हो सकती है और जनता को यह साफ तौर पर पता चल सकता है कि वक्फ संस्थाओं के पास वास्तव में कितनी और कौन-कौन सी संपत्तियां हैं. ऐसी व्यवस्था को सीधे तौर पर सरकार का हस्तक्षेप कहकर खारिज नहीं करना चाहिए. इससे आम मुसलमानों को फायदा हो सकता है, क्योंकि इससे धर्मार्थ संस्थाएं जवाबदेह बनेंगी.
लेकिन रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने से सबसे बड़ी समस्या हल नहीं होगी. सबसे बड़ी समस्या यह है कि वक्फ की 58 प्रतिशत संपत्तियां कानूनी विवादों में फंसी हुई हैं या उन पर कब्ज़ा हो चुका है. अगर संस्थाएं अपनी आधी से ज्यादा संपत्तियों का इस्तेमाल ही नहीं कर सकतीं, तो रिकॉर्ड बेहतर बनाने से सीमित ही फायदा होगा.
इन विवादों को सुलझाना प्राथमिकता होनी चाहिए. यह ऐसा क्षेत्र है जहां सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है. विवादों को जल्दी सुलझाने, जमीन के रिकॉर्ड को ज्यादा साफ करने और कानून को प्रभावी तरीके से लागू करने से वक्फ संस्थाएं यह सही तरीके से पता कर पाएंगी कि उनके पास कितने संसाधन हैं और उनसे वास्तव में कितनी आय हो सकती है. इसके बाद ही जनता सही तरीके से यह तय कर पाएगी कि वक्फ बोर्ड संपत्तियों का अच्छा प्रबंधन कर रहे हैं या नहीं और जिस धर्मार्थ उद्देश्य के लिए उन्हें बनाया गया था, उसे पूरा कर रहे हैं या नहीं.
ट्रांसपेरेंसी से सिर्फ जनता को फायदा नहीं होता. इससे संस्था की भी सुरक्षा होती है. जब रिकॉर्ड खुले और सही होते हैं, तो अफवाह और अटकलों की गुंजाइश कम हो जाती है. इससे बेहतर और स्वस्थ बहस के लिए जगह बनती है. अच्छे काम सामने आते हैं और गलत प्रबंधन के आरोपों को राजनीतिक सोच के बजाय तथ्यों के आधार पर परखा जा सकता है.
कई मुसलमान वक्फ बोर्डों में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति की शर्त को बीजेपी की बड़ी राजनीतिक सोच का हिस्सा मानते हैं. इन चिंताओं को सुना जाना चाहिए, लेकिन विडंबना यह है कि सरकार संविधान के दायरे से बाहर जाकर काम नहीं कर रही है. जिस संवैधानिक व्यवस्था का इस्तेमाल मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व और समुदाय के कई प्रभावशाली लोगों (अशरफ) ने लंबे समय से अलग कानूनी व्यवस्था की मांग करने के लिए किया है, अब उसी संवैधानिक व्यवस्था का इस्तेमाल बीजेपी मुस्लिम धर्मार्थ संस्थाओं में समुदाय से बाहर के दो सदस्यों को शामिल करने के लिए कर रही है.
कड़वी सच्चाई यह है कि अगर वक्फ संस्थाओं ने लगातार ट्रांसपेरेंसी, जवाबदेही और अच्छे प्रबंधन का उदाहरण पेश किया होता, तो सरकार को इसमें दखल देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.
वक्फ बोर्डों का भविष्य सिर्फ बाहर से थोपी गई चीजों का विरोध करने पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि यह दिखाने पर भी निर्भर करेगा कि वे खुद को इस तरह चला सकते हैं कि समुदाय और आम जनता, दोनों का भरोसा जीत सकें. क्या आम मुसलमानों, खासकर गरीबों, को इन धर्मार्थ संपत्तियों का पूरा फायदा मिल रहा है या नहीं, यह एक असली चिंता है. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वक्फ को सुधार करना होगा—वरना आखिरकार यह खत्म भी हो सकता है.
आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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