नई दिल्ली: 1990 में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की स्थापना CPI(ML) लिबरेशन के छात्र संगठन के रूप में हुई थी. इसका उद्देश्य कांग्रेस की “जनविरोधी” आर्थिक नीतियों और नवउदारवादी सुधारों का विरोध करना था.
आज इस संगठन के कुछ सबसे सफल छात्र नेता उसी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं, जिसके खिलाफ AISA बनाई गई थी. वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की मदद और सलाह देने का काम कर रहे हैं, उनकी बहन और नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के भाषण लिख रहे हैं, पार्टी के चुनाव अभियान को संभाल रहे हैं और सोशल मीडिया संचालन भी देख रहे हैं.
यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से निकली सबसे खास राजनीतिक यात्राओं में से एक है, जहां AISA लंबे समय तक चुनाव जीतती रही है.
1990 से अब तक AISA ने 13 नेताओं के जरिए JNU छात्र संघ (JNUSU) का अध्यक्ष पद 14 बार जीता है. जहां कुछ नेता CPI(ML) लिबरेशन के साथ जुड़े रहे, वहीं कई नेताओं ने कैंपस राजनीति छोड़कर प्रोफेसर और शोधकर्ता के रूप में शिक्षा के क्षेत्र को चुना. कुछ राजनीतिक सलाहकार बने और कम से कम तीन लोग बाद में कांग्रेस में चले गए.
AISA एक बार फिर चर्चा में तब आई, जब इसकी मौजूदा अध्यक्ष नेहा बोरा ने पिछले महीने नई दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व वाले छात्र प्रदर्शनों के दौरान 23 दिन की भूख हड़ताल खत्म की.
ब्राह्मणवाद, RSS और बीजेपी के खिलाफ उनके भाषणों और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल में उनकी भागीदारी ने उन्हें देश के सबसे पहचाने जाने वाले छात्र नेताओं में शामिल कर दिया है. लेकिन बोरा उस संगठन का सिर्फ नया चेहरा हैं, जिसने तीन दशकों से ज्यादा समय तक JNU की राजनीति को प्रभावित किया है.
यहां देखते हैं कि AISA के पूर्व JNUSU अध्यक्षों ने विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद क्या किया.
चंद्रशेखर प्रसाद (अध्यक्ष 1994-95 और 1995-96)
AISA के कुछ ही नेता ऐसे हैं जिन्हें चंद्रशेखर प्रसाद, जिन्हें प्यार से चंदू कहा जाता था, जितना सम्मान मिला. उन्होंने 1993-94 में पहले JNUSU के उपाध्यक्ष के रूप में काम किया और फिर लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गए. एक शानदार वक्ता के रूप में चंदू ने JNU कैंपस में AISA को एक मजबूत राजनीतिक ताकत बनाने में अहम भूमिका निभाई.
उन्हें सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ बोलने, मंडल आयोग का समर्थन करने और इस बात पर जोर देने के लिए जाना जाता था कि छात्र राजनीति को विश्वविद्यालय के बाहर मजदूरों, किसानों और अन्य वंचित समुदायों के संघर्षों से जुड़ा रहना चाहिए.
JNU छोड़ने के बाद चंदू अपने गृह राज्य बिहार लौट गए और CPI(ML) लिबरेशन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए. सीवान में रहते हुए उन्होंने भूमिहीन मजदूरों और दलित समुदायों के साथ काम किया. उन्होंने सामंती ताकतों और क्षेत्र के ताकतवर अपराधी-राजनेता गठजोड़ का सामना किया.
31 मार्च 1997 को एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते समय दिनदहाड़े उनकी और दो अन्य लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई. उनकी हत्या के बाद कई विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन हुए. 2012 में एक विशेष CBI अदालत ने तीन हमलावरों को उम्रकैद की सजा सुनाई.
हालांकि CPI(ML) लिबरेशन लगातार उनकी हत्या को आरजेडी के दिवंगत बाहुबली नेता और गैंगस्टर मोहम्मद शहाबुद्दीन से जोड़ती रही है, लेकिन जांच में इसे साबित नहीं किया जा सका.
आज चंद्रशेखर प्रसाद AISA के सबसे बड़े प्रतीक नेताओं में से एक हैं और उन्हें वामपंथी छात्र आंदोलन के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है.
मोना दास (अध्यक्ष 2004-05 और 2005-06)
JNUSU अध्यक्ष पद दो बार जीतने वाली कुछ AISA नेताओं में से एक मोना दास उस पीढ़ी की छात्र नेता थीं, जिन्होंने कैंपस राजनीति को पढ़ाई और शोध के साथ जोड़ा. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने सार्वजनिक शिक्षा, छात्रों की लोकतांत्रिक भागीदारी और लैंगिक समानता पर ध्यान दिया. साथ ही उन्होंने कैंपस में AISA के प्रभाव को मजबूत करने में मदद की.
JNU छोड़ने के बाद चुनावी राजनीति में जाने के बजाय दास ने शिक्षा के क्षेत्र को चुना. वह वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाती हैं और लोकतंत्र, संवैधानिक मूल्यों और लैंगिक मुद्दों पर लिखना और पढ़ाना जारी रखती हैं.
अपने कई समकालीन नेताओं से अलग, वह सक्रिय पार्टी राजनीति से काफी दूर रही हैं और सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी सीमित रही है.
संदीप सिंह (अध्यक्ष 2007-08)
बहुत कम पूर्व AISA नेताओं ने संदीप सिंह जितनी लंबी राजनीतिक यात्रा की है, वह भी मुख्यधारा की राजनीति में. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले से आने वाले सिंह ने पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति शुरू की और बाद में JNU आए.
JNU छोड़ने के बाद सिंह धीरे-धीरे वामपंथी राजनीति से दूर हुए और कांग्रेस से जुड़े. 2019 लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने राहुल गांधी के साथ करीबी से काम किया. उन्होंने भाषण तैयार करने, चुनावी रणनीति और गठबंधन राजनीति में सलाह देने में मदद की.
बाद में वह प्रियंका गांधी वाड्रा की मुख्य टीम का हिस्सा बने. अब ऐसा लगता है कि उन्हें किनारे कर दिया गया है, लेकिन कई वर्षों और चुनावों तक वह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के काफी करीब रहे.
आज सिंह खुद को राजनीतिक सलाहकार, शोधकर्ता और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के शिक्षक के रूप में बताते हैं. वह अभी भी राजनीतिक संचार के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. यह भी कहा जाता है कि बाद में उन्होंने पूर्व JNUSU अध्यक्ष अकबर चौधरी को भी पार्टी में शामिल कराया.
सुचेता डे (अध्यक्ष 2011-12)
सुचेता डे उस समय JNUSU की अध्यक्ष बनीं, जब कई सालों के बाद कैंपस चुनाव दोबारा शुरू हुए थे. उन्होंने AISA को फिर से छात्र राजनीति के केंद्र में ला दिया. उन्होंने लोकतांत्रिक छात्र प्रतिनिधित्व, सबके लिए शिक्षा की उपलब्धता और उच्च शिक्षा के बढ़ते निजीकरण के विरोध पर ध्यान दिया.
कई पूर्व अध्यक्षों के विपरीत, डे कैंपस छोड़ने के बाद भी पूरी तरह वामपंथी आंदोलन के साथ जुड़ी रहीं. वह अब CPI(ML) लिबरेशन की केंद्रीय समिति की सदस्य हैं और देशभर में संगठनात्मक काम, नागरिक अधिकार अभियानों और लोकतांत्रिक अधिकार आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.
उन्हें CJP का सक्रिय समर्थन करते हुए भी देखा गया था.
अकबर चौधरी (अध्यक्ष 2013-14)
अकबर चौधरी का करियर कैंपस राजनीति से निकलकर चुनाव प्रबंधन तक पहुंचा. JNU में अपने समय के बाद वह राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की टीम से जुड़े और उन्होंने कई बड़े चुनाव अभियानों पर काम किया, जिनमें बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव भी शामिल थे.
अकबर चौधरी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाया.
बाद में उन्होंने अपनी खुद की कंसल्टेंसी, मैट्रिक्स इंटेलिजेंस शुरू की. इसने कई राजनीतिक अभियानों को संभाला है, जिसमें 2022 के हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस का अभियान भी शामिल है.
राजनीतिक सलाहकार के काम के साथ-साथ उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाया है. 2016 में JNU की यौन उत्पीड़न के खिलाफ जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी ने दो साल पहले लगाए गए उत्पीड़न के आरोपों से उन्हें मुक्त कर दिया था.
आशुतोष कुमार यादव (अध्यक्ष 2014-15)
आशुतोष कुमार यादव ने छात्र राजनीति छोड़ने के बाद एक शांत रास्ता चुना. अध्यक्ष पद संभालने के बाद उन्होंने JNU से अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी की और फिर दरभंगा की ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर के रूप में शामिल हुए.
आज उनका काम सक्रिय राजनीति की जगह पढ़ाने और अकादमिक शोध पर केंद्रित है. इस तरह वह उन कई पूर्व JNUSU नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने चुनावी राजनीति में जाने के बजाय उच्च शिक्षा के क्षेत्र को चुना.
मोहित कुमार पांडे (अध्यक्ष 2016-17)
मोहित कुमार पांडे भी वामपंथी छात्र राजनीति से कांग्रेस में चले गए. JNU छोड़ने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीतिक टीम के साथ करीबी से काम किया. इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश कांग्रेस के सोशल मीडिया संचालन की जिम्मेदारी संभाली.
बाद में उनका काम राजनीतिक संचार, चुनावी रणनीति, डिजिटल पहुंच और सार्वजनिक नीति तक फैल गया. संदीप सिंह की तरह पांडे भी उन पूर्व वामपंथी छात्र नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने आखिरकार कांग्रेस का रास्ता चुना, जबकि AISA लंबे समय से कांग्रेस के दौर की आर्थिक नीतियों का विरोध करती रही है.
गीता कुमारी (अध्यक्ष 2017-18)
JNUSU अध्यक्ष के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद गीता कुमारी का जुड़ाव शिक्षा क्षेत्र से बना रहा. वह अभी भी JNU के सेंटर ऑफ स्पैनिश, पुर्तगाली, इटालियन एंड लैटिन अमेरिकन स्टडीज में अपनी डॉक्टरेट रिसर्च जारी रखे हुए हैं. उनका काम साहित्य, दृश्य संस्कृति और लैटिन अमेरिकी अध्ययन से जुड़ा है.
अपने शोध के साथ-साथ वह स्वतंत्र प्रकाशनों के लिए साहित्यिक समीक्षाएं भी लिखती हैं और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों, कैंपस लोकतंत्र और उच्च शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर बोलती रहती हैं.
एन. साई बालाजी (अध्यक्ष 2018-19)
एन. साई बालाजी ने शिक्षा और लगातार राजनीतिक भागीदारी दोनों को साथ रखा है. 2024 से वह राजनीति विज्ञान पढ़ा रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों, जलवायु वार्ता, व्यापार और पर्यावरण राजनीति पर शोध कर रहे हैं.
वह अभी भी AISA से जुड़े हुए हैं और उच्च शिक्षा, लोकतांत्रिक अधिकारों और सार्वजनिक नीति से जुड़े मुद्दों पर होने वाली चर्चाओं में अक्सर भाग लेते हैं.
एन. साई बालाजी राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं.
धनंजय (अध्यक्ष 2023-24)
धनंजय ने कई सालों के बाद AISA की JNUSU अध्यक्ष पद पर वापसी कराई. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने फेलोशिप में देरी, हॉस्टल की कमी और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के लिए फंडिंग जैसे मुद्दे उठाए.
पद छोड़ने के बाद उन्होंने CPI(ML) लिबरेशन के साथ सक्रिय चुनावी राजनीति में कदम रखा और पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में गोपालगंज की भोरे सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए.
राजनीतिक काम के साथ-साथ वह JNU में थिएटर और परफॉर्मेंस स्टडीज में अपनी PhD भी जारी रखे हुए हैं. वह बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा जैसे मुद्दों पर अभियान चलाते हैं.
नीतीश कुमार यादव (अध्यक्ष 2024-25)
नीतीश कुमार यादव अभी भी JNU के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज में डॉक्टरेट के छात्र हैं, जहां उनका शोध जाति और न्यायपालिका पर आधारित है. उनके अध्यक्ष कार्यकाल के दौरान छात्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच टकराव बढ़ा.
JNU चुनाव में अध्यक्ष पद जीतने के बाद AISA के नीतीश कुमार.
फरवरी 2026 में JNU ने उन्हें दो सेमेस्टर के लिए निष्कासित कर दिया और बायोमेट्रिक अटेंडेंस और चेहरे की पहचान प्रणाली के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के बाद उनके कैंपस में प्रवेश पर रोक लगा दी.
इस अनुशासनात्मक कार्रवाई की कई छात्र संगठनों ने आलोचना की और यह साल के सबसे बड़े कैंपस विवादों में से एक बन गया. नीतीश अभी सरकार विरोधी प्रदर्शनों में दिखाई देते हैं और उन्होंने अपने निष्कासन को चुनौती दी है.
अदिति मिश्रा (अध्यक्ष 2025-26)
अदिति मिश्रा 2025 में JNUSU अध्यक्ष बनीं और उन्होंने AISA की चुनावी सफलता को आगे बढ़ाया. उनके अभियान का ध्यान सस्ती शिक्षा, फेलोशिप, हॉस्टल की कमी और छात्रों के कल्याण जैसे मुद्दों पर था.
इसके बाद वह देश की सबसे पहचानी जाने वाली छात्र नेताओं में से एक बनकर उभरी हैं. जाति, उच्च शिक्षा और सरकार की नीतियों के विरोध में दिए गए उनके भाषणों ने काफी ध्यान आकर्षित किया है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: भारत के Gen Z ने एक दरार बना दी है, यह BJP पर है कि उसे भरे या विपक्ष उसे और चौड़ा करे