जब प्रेशर कुकर की सीटी बंद हो जाती है, तो अंदर पक रहा खाना अक्सर ढक्कन के किनारे लगी रबर से बाहर निकलने लगता है. 20 जुलाई को मध्य दिल्ली की सड़कों का नज़ारा भी कुछ ऐसा ही था.
उस दोपहर जंतर-मंतर पर जुटे छात्र प्रदर्शनकारियों ने ‘चलो संसद’ मार्च शुरू किया. उनकी मांग थी कि 2026 नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें और सार्वजनिक परीक्षाओं की व्यवस्था में बड़े सुधार किए जाएं. इससे एक रात पहले ही दिल्ली पुलिस ने संसद जाने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेड लगा दिए थे और मेटल डिटेक्टर व कैमरों को बंद कर दिया था. पुलिस का रुख साफ था—किसी भी प्रदर्शनकारी को संसद तक मार्च करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
लेकिन पुलिस की उम्मीद के विपरीत, लोग हर दिशा से सड़कों पर उतरने लगे.
हालात कब बदले
17 जुलाई तक CJP के आंदोलन में सिर्फ कुछ सौ लोग ही शामिल हो रहे थे, लेकिन जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने सफेद चादरों की आड़ में जबरन हटाया, तो प्रदर्शन में लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी. 18 जुलाई की दोपहर तक छात्र, रिटायर्ड शिक्षक, प्रोफेसर, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार और अभिभावक पूरी रात जंतर-मंतर पहुंचते रहे.
सोमवार सुबह तक जंतर-मंतर का प्रदर्शन स्थल लोगों से पूरी तरह भर चुका था. लोग सड़कों पर थे, पेड़ों पर चढ़े हुए थे, पुलिस बसों पर चढ़े थे, दिल्ली पुलिस मुख्यालय के पीछे और राज्य सरकार के दफ्तरों के अंदर भी मौजूद थे. उनकी संख्या दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों से भी ज्यादा हो गई थी.
सुबह 9 बजे के करीब CJP के मंच के पास मौजूद प्रदर्शनकारी ऊंचे बैरिकेड की ओर बढ़ने लगे, लेकिन बैरिकेड के दूसरी तरफ बॉडी कैमरा लगाए और सादे कपड़ों में बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस के जवान, RAF की टुकड़ियां, आंसू गैस से लैस कई दंगा-रोधी वाहन और हिरासत में लिए गए लोगों को ले जाने के लिए निजी बसें तैनात थीं.
RAF के ज्यादातर जवानों ने अपने नेम टैग नहीं लगाए हुए थे. जैसे ही छात्र बैरिकेड पार कर संसद मार्ग की ओर बढ़ने लगे, दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आदेश दिया, “जिनके पास गैस है, वे आगे आएं.”
करीब 500 मीटर दूर, केरल हाउस के पास भारी बैरिकेडिंग, RAF की टुकड़ियों, वाटर कैनन और दंगा-रोधी वाहनों ने मार्च को रोक दिया. जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड पार करने की कोशिश की, तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस छोड़ी और लाउडस्पीकर से चेतावनी दी. इस दौरान RAF के कुछ जवानों ने पेलेट गन भी चलाई.
सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में अतिरिक्त डीसीपी संदीप लांबा एक महिला को थप्पड़ मारते हुए दिखाई दिए.
वकील ऋषिकेश कुमार ने एक्स पर लिखा, “अतिरिक्त DCP संदीप लांबा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह संज्ञेय अपराध है, फिर FIR क्यों दर्ज नहीं हुई?”
बाद में दिल्ली पुलिस ने सफाई दी कि अधिकारी “अपना आपा खो बैठे थे.” उन्हें प्रदर्शन स्थल से हटा दिया गया, लेकिन उनके खिलाफ न तो कोई कानूनी कार्रवाई हुई और न ही विभागीय कार्रवाई शुरू की गई.
सोशल मीडिया पर यह आरोप भी लगाए गए कि दिल्ली पुलिस सार्वजनिक जगहों पर छात्रों को रोककर उन्हें प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोक रही थी. CJP की प्रवक्ता रत्ना सिंह ने एक्स पर आरोप लगाया कि छात्रों को हिरासत में लिया जा रहा है. उन्होंने लिखा, “लोधी रोड और निजामुद्दीन में चेकपोस्ट लगाकर पुलिस ऑटो और कैब से यात्रा कर रहे युवाओं को रोक रही है. वकीलों के साथ भी बदसलूकी की जा रही है.”
प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस प्रदर्शनकारियों का डेटाबेस तैयार करने के लिए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) का इस्तेमाल कर रही है.
वकील कवलप्रीत कौर ने लिखा, “दिल्ली पुलिस किस कानून के तहत लोगों को बिना वजह रोकने, घंटों हिरासत में रखने, उनकी तस्वीरें लेने, आधार कार्ड मांगने, सोशल मीडिया हैंडल इकट्ठा करने, मोबाइल की गैलरी देखने और उनसे #JantarMantar प्रदर्शन में शामिल होने के बारे में पूछताछ करने का अधिकार होने का दावा करती है? पुलिस का काम कानून लागू करना है, लोगों की निजी जिंदगी की जांच करना या उनकी नागरिकता तय करना नहीं. हमें यह जानने का अधिकार है कि आखिर किस कानूनी प्रावधान के तहत दिल्ली पुलिस पिछले तीन दिनों से दिल्ली में यह सब कर रही है.”
‘आंसू गैस और लाठीचार्ज आखिरी विकल्प होना चाहिए’
दिप्रिंट से बातचीत में दिल्ली पुलिस के एक पूर्व आयुक्त ने कहा कि मौके पर तैनात पुलिस अधिकारियों को भीड़ के साथ लगातार बातचीत करनी चाहिए थी.
उन्होंने कहा, “आंसू गैस छोड़ना और संगठित तरीके से लाठीचार्ज करना आखिरी विकल्प होना चाहिए. सबसे पहले पुलिस को संसद जाने वाले सभी रास्तों पर कुछ-कुछ दूरी पर दोहरी बैरिकेडिंग करनी चाहिए थी, ताकि छात्रों और प्रदर्शनकारियों के बीच पर्याप्त दूरी बनी रहे.” उन्होंने यह भी कहा कि खुफिया जानकारी साझा करने में गंभीर चूक हुई.
पूर्व अधिकारी ने कहा, “पुलिस सिर्फ झुंझलाहट में या लोगों को जल्दी सड़क से हटाने के लिए लाठी का इस्तेमाल नहीं कर सकती. अगर पुलिस को लगता है कि प्रदर्शनकारी दोबारा इकट्ठा हो सकते हैं, तो उन्हें वहां से हटाना चाहिए, लेकिन बिना ज़रूरी वजह के लाठी नहीं चलानी चाहिए.”
इससे पहले भी दिल्ली पुलिस को 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान निष्क्रिय रहने और 2019 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों पर बल प्रयोग को लेकर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था. बाद में तत्कालीन पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक को “अक्षम” बताते हुए हटा दिया गया और उनकी जगह एस.एन. श्रीवास्तव को नियुक्त किया गया.
दिल्ली दंगों के दौरान पटनायक पर आरोप लगे थे कि लाठी, कुल्हाड़ी और पेट्रोल बम से लैस भीड़ के हिंसा फैलाने, संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने, मस्जिदों और मुस्लिम कब्रिस्तानों को अपवित्र करने, स्कूलों और दुकानों में आग लगाने के बावजूद पुलिस ने समय पर कार्रवाई नहीं की. आरोप था कि जब तक “ऊपर से आदेश” आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और दर्जनों लोगों की जान जा चुकी थी.
इसी तरह, जामिया मिल्लिया इस्लामिया परिसर में दिल्ली पुलिस के प्रवेश कर छात्रों की पिटाई करने की घटना के बाद भी पटनायक सवालों के घेरे में आ गए थे. पुलिस पर आरोप लगा था कि उसने कैंपस के अंदर छात्र-छात्राओं को पीटा और सीसीटीवी कैमरे भी तोड़ दिए.
नया साल, वही कहानी
छह साल बाद एक और दिल्ली पुलिस आयुक्त को जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन से निपटने में “अक्षम” माना गया और उन्हें हटा दिया गया. 17 जुलाई को अनुराग कुमार ने दिल्ली पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा की जगह संभाली. इसके एक दिन बाद ही सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से जबरन हटाया गया. दो दिन बाद नए पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के नेतृत्व में दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लगातार लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. इस दौरान कई जगह पुलिस पर महिलाओं के साथ बदसलूकी करने के आरोप भी लगे.
बारिश शुरू होने के बाद प्रदर्शनकारी पेड़ों के नीचे खड़े होकर बचने की कोशिश कर रहे थे. कुछ लोग घास पर बैठे थे, कुछ पार्क की बेंच पर और कुछ खड़े थे. इसी दौरान, जब प्रदर्शनकारी थोड़ी राहत लेने की कोशिश कर रहे थे, पुलिस ने उनकी ओर आंसू गैस के गोले छोड़ने शुरू कर दिए.
“मेरी नाक जल रही है”, “मेरा चेहरा जल रहा है”, “मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा”, “मेरा गला जल रहा है” जैसी आवाज़ें चारों तरफ गूंजने लगीं, क्योंकि पुलिस हर दिशा से आंसू गैस के गोले दाग रही थी. जब प्रदर्शनकारी इधर-उधर भागने लगे, तो पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया. जो लोग झाड़ियों या पेड़ों के पीछे छिपने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें पुलिस और RAF के जवान बाहर निकालकर पीटने लगे.
कई कॉलेज और स्कूल के छात्रों ने पुलिस से हाथ जोड़कर कहा, “कृपया हमें बता दीजिए कि इस गली से बाहर कैसे निकलें. प्लीज सर…प्लीज अंकल…” लेकिन जवाब में उन्हें सिर्फ और लाठियां मिलीं.
राज्य की इस सख्ती के बीच भी प्रदर्शनकारी एक-दूसरे को कपड़े के मास्क बांटते रहे. अनजान लोग जलन कम करने के लिए पानी दे रहे थे. लोग एक-दूसरे को लाठीचार्ज से बचा रहे थे, घायलों को उठाकर अस्पताल पहुंचाने के लिए गाड़ियां रोक रहे थे. दिप्रिंट ने जिन-जिन जगहों का दौरा किया, वहां हिंसा की जगहें लोगों के एक-दूसरे की मदद करने के केंद्र बन गई थीं.
जब पुलिस ने जंतर-मंतर के आसपास की गलियां खाली कराईं और CJP का मंच हटा दिया, तब भी सड़कों पर प्रदर्शन के कई निशान बचे हुए थे—एक अकेली चप्पल, टूटा हुआ मोबाइल फोन, कुछ पत्थर जिनके बारे में आरोप था कि अलग-अलग घटनाओं में प्रदर्शनकारियों और पुलिस दोनों पर फेंके गए थे और मौजूदा सरकार के खिलाफ गुस्सा जताने वाले कई पोस्टर.
उधर, कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर के आसपास पुलिस की एक आधिकारिक गाड़ी लाउडस्पीकर से लोगों से घर लौटने की अपील कर रही थी और चेतावनी दे रही थी कि ऐसा नहीं करने पर उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे. वहीं दूसरी ओर, अलग-अलग रैंक के पुलिस अधिकारी और RAF के जवान प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई कर रहे थे. पुलिस निजी कैफे, कनॉट प्लेस की घुमावदार गलियों और दुकानों तक पहुंच गई. वहां मौजूद लोगों को भी पीटा गया, क्योंकि पुलिस को लगता था कि उस इलाके में मौजूद हर व्यक्ति प्रदर्शन के समर्थन में आया है.
एक घटना में पुलिस कनॉट प्लेस के एन ब्लॉक स्थित प्लम कैफे में घुस गई. वहां सीढ़ियों पर शरण लिए हुए कई प्रदर्शनकारियों को बाहर निकालकर उन पर लाठीचार्ज किया गया. एक अन्य घटना में फुटपाथ पर चल रहे एक व्यक्ति को बिना कोई सवाल पूछे या वजह बताए पीट दिया गया.
लेकिन कुछ ही देर बाद प्रदर्शनकारी फिर सड़कों पर लौट आए. वे न डरे, न पीछे हटे. उनके बीच सिर्फ एक ही आवाज़ गूंज रही थी—”हमें जवाबदेही चाहिए.”
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