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Saturday, 25 July, 2026
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छात्र आंदोलन के 2 साल बाद बांग्लादेश के सामने सवाल, खून-खराबे से आखिर हासिल क्या हुआ?

जुलाई 2024 के विद्रोह के बांग्लादेश को एकजुट न कर पाने की एक बड़ी वजह यह लगातार बना हुआ शक है कि इसकी अगुवाई किसने की—और क्यों?

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ढाका: जुलाई का महीना बांग्लादेश के लिए काफी अहम होता है. यह देश के आत्ममंथन का भी महीना है. 2024 में जुलाई के दौरान पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैले छात्र आंदोलन ने अगस्त की शुरुआत तक तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिरा दी थी.

उसके बाद से बीते दोनों जुलाई महीनों में राष्ट्रीय स्तर पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम हुए. सरकार के सबसे वरिष्ठ अधिकारियों ने श्रद्धांजलि दी. वहीं 2024 के आंदोलन से निकली छात्र नेताओं की नई पार्टी नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) समेत कई दलों ने शहीद मीनार जैसे प्रमुख स्थानों पर रैलियां कीं.

लेकिन इस जुलाई कुछ बदल गया है. अब “जुलाई” शब्द के साथ अपमानजनक गाली वाला शब्द “जुलाई CDI” जुड़ गया है. एक तरफ NCP और बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी अब साथ आ गए हैं. दूसरी तरफ बांग्लादेश सिर्फ शेख हसीना के सवाल से नहीं, बल्कि एक बड़े सवाल से जूझ रहा है. आखिर जुलाई 2024 में इतना खून-खराबा किस लिए हुआ था?

‘जुलाई CDI’ और हसीना की वापसी की चर्चा

इस साल 1 जुलाई को बांग्लादेश की मशहूर अभिनेत्री और निर्देशक मेहर अफरोज शाओन ने सोशल मीडिया पर 2024 के छात्र आंदोलन को “जुलाई CDI” कहा. “CDI” बंगाली भाषा का एक आम गाली वाला शब्द है, जिसका इस्तेमाल बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल दोनों जगह होता है.

4 जुलाई को द डेली स्टार ने खबर दी कि शाहबाग पुलिस स्टेशन में तीन महिलाओं. अभिनेत्री मेहर अफरोज शाओन, माहिया माही और शांता फरजाना. के खिलाफ जनरल डायरी दर्ज कराई गई है. उन पर सोशल मीडिया पर जुलाई आंदोलन का मजाक उड़ाने और उसके स्मारक का अपमान करने का आरोप है.

द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, “शिकायत में कहा गया है कि शांता फरजाना ने जुलाई स्मारक पर जूता फेंका. वहीं शाओन ने जुलाई आंदोलन को ‘पहले से तय किया गया कार्यक्रम’ बताया, जबकि माहिया माही ने इस आंदोलन में शामिल लोगों और संगठनों का मजाक उड़ाया.”

इसके बाद से बांग्लादेश के सोशल मीडिया पर कई लोग छात्र आंदोलन को “जुलाई CDI” कहने लगे हैं. फेसबुक पर वायरल एक पोस्ट में जॉयतुर्जा चौधरी नाम का यूजर “जुलाई CDI” कहते हुए इस आंदोलन के समर्थकों को मिडिल फिंगर दिखाता नजर आता है. वह उन लोगों का भी विरोध करता है जो बांग्लादेश के 1971 के स्वतंत्रता संग्राम, उसके नेताओं और जमात-ए-इस्लामी समेत दूसरे कट्टरपंथी संगठनों को नजरअंदाज करते हैं.

दूसरी तरफ जवाब में “मुजीब CDI” शब्द भी इस्तेमाल किया जाने लगा है. इसका इस्तेमाल छात्र आंदोलन का मजाक उड़ाने वालों पर हमला करने के लिए किया जा रहा है. मशहूर यूट्यूबर इलियास हुसैन ने पोस्ट कर कहा कि जो लोग “जुलाई CDI” कह रहे हैं, उन्हें जवाब देने के लिए अब “मुजीब CDI” और “हसीना CDI” कहा जाएगा.

बांग्लादेश के सेवानिवृत्त राजनयिक मोहम्मद हारून अल राशिद का मानना है कि सोशल मीडिया पर जुलाई आंदोलन के खिलाफ बढ़ती नाराजगी और इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है क्योंकि लोगों को अब लगने लगा है कि छात्र आंदोलन की आड़ में इस्लामिक ताकतें मजबूत हो गईं.

राशिद ने दिप्रिंट से फोन पर कहा, “पहले मोहम्मद यूनुस ने जमात-ए-इस्लामी और दूसरे कट्टरपंथी संगठनों को खुली छूट दी. अब तारिक रहमान भी इसी नीति पर चल रहे हैं और इस्लामिक ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं. ऐसे में देश का एक बड़ा वर्ग बांग्लादेश जिस दिशा में जा रहा है, उससे नाराज है.”

बांग्लादेश के राजनीतिक पत्रकार साहिदुल हसन खोकों का कहना है कि जुलाई आंदोलन की दूसरी बरसी पर भी शेख हसीना का सवाल बांग्लादेश का पीछा नहीं छोड़ रहा.

खोकों ने दिप्रिंट से कहा, “हसीना ने कहा है कि वह इस दिसंबर में बांग्लादेश लौटेंगी. इससे देश बंटा हुआ है. तारिक रहमान सरकार दबाव में है. एक अदालत ने हसीना को फांसी की सजा सुनाई है, लेकिन इसके बावजूद सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर उन्हें काफी समर्थन मिल रहा है.”

उन्होंने कहा कि “जुलाई CDI” शब्द की लोकप्रियता यह दिखाती है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब उन लोगों से निराश हो चुका है, जिन्हें लगता था कि हसीना को हटाने से बांग्लादेश बेहतर हो जाएगा.

खोकों ने कहा, “सरकार की कार्रवाई के बावजूद अब पूरे बांग्लादेश में हसीना के समर्थन में खुलेआम जुलूस निकल रहे हैं. यह तब हो रहा है, जब तारिक रहमान सरकार ने अवामी लीग की चुनावी राजनीति में वापसी के लगभग सभी कानूनी रास्ते बंद कर दिए हैं.”

क्रांति का क्या हुआ?

जुलाई आंदोलन पूरे बांग्लादेश को एकजुट नहीं कर पाया. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि आज भी लोगों के मन में सवाल है कि इस आंदोलन की अगुवाई किसने की और इसका मकसद क्या था. हर क्रांति का एक चेहरा होता है. 2024 के जुलाई आंदोलन का चेहरा उस समय 23 साल के अबू सईद थे. 16 जुलाई को सईद रंगपुर की बेगम रोकेया यूनिवर्सिटी के सामने प्रदर्शन कर रहे छात्रों में शामिल थे, जहां उनका सामना शेख हसीना की पुलिस से हुआ.

सईद बाकी प्रदर्शनकारियों से आगे खड़े थे और सामने खड़े पुलिसकर्मी की सीधी फायरिंग लाइन में थे. कई मीडिया संस्थानों के कैमरों में रिकॉर्ड हुए वीडियो में दिखा कि पुलिस ने सईद पर रबर की गोलियां चलाईं, जिससे वह घायल हो गए. वह जमीन पर गिर पड़े. साथी प्रदर्शनकारी उन्हें रंगपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

सईद की मौत ने जुलाई आंदोलन को नई ताकत दी. उनकी तस्वीर, जिसमें उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर पुलिस को गोली चलाने की चुनौती दी थी, छात्रों के आंदोलन की पहचान बन गई. यह तस्वीर सीमाओं के पार कोलकाता तक पहुंची और वहां छात्रों, कलाकारों और कई मशहूर लोगों ने भी इसका समर्थन किया. लेकिन अबू सईद आखिर थे कौन?

सईद की मौत के एक महीने बाद मुझे दिल्ली के एक बड़े थिंक टैंक में बंद कमरे में हुई एक बैठक में बुलाया गया, जहां बांग्लादेश के घटनाक्रम पर चर्चा हो रही थी. तब तक हसीना सरकार गिर चुकी थी. उनके पिता शेख मुजीब की मूर्तियां भी हिंसक भीड़ ने गिरा दी थीं. भीड़ अवामी लीग और उससे जुड़ी हर चीज को निशाना बना रही थी.

चैथम हाउस नियम के तहत हुई इस बैठक में भारत के बांग्लादेश में रह चुके दो पूर्व राजदूत, भारतीय सेना के दो सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल और एक रिटायर्ड खुफिया अधिकारी मौजूद थे. उस अधिकारी ने कहा कि भारत को अबू सईद के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित होना चाहिए.

उन्होंने कहा, “अबू सईद की फेसबुक पोस्ट से पता चलता था कि वह खुद को एक खास मिशन पर मानते थे. उन्हें इस्लामी इतिहास, जिहाद और शहादत से प्रेरणा मिलती थी. वह जमात-ए-इस्लामी के नेता और प्रचारक मौलाना देलवार हुसैन सईदी के समर्थक थे, जिन्हें 1971 के युद्ध अपराधों में दोषी ठहराया गया था. क्या आप जानते हैं कि 2013 में बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने सईदी को हत्या, बलात्कार और धार्मिक उत्पीड़न समेत 20 में से 8 मामलों में दोषी पाया था?”

लेकिन वह अबू सईद के फेसबुक अकाउंट पर नजर क्यों रख रहे थे?

उन्होंने कहा, “भारत की खुफिया एजेंसियां हसीना के खिलाफ चल रहे इस तथाकथित छात्र आंदोलन के सभी नेताओं पर नजर रख रही थीं. अबू सईद अचानक चे ग्वेरा जैसी छवि वाले नेता बन गए थे. इसलिए हमें उनके बारे में गहराई से जांच करनी पड़ी. वह बांग्लादेश इस्लामी छात्रशिबिर से जुड़े थे, जो जमात-ए-इस्लामी का छात्र संगठन माना जाता है. और सिर्फ सईद ही नहीं, पूरे आंदोलन को शुरू से ही जमात का समर्थन था. आरक्षण विरोधी आंदोलन सिर्फ एक बहाना था. असली मकसद हसीना को हटाकर देश को उनके कट्टर विरोधियों के हाथों में सौंपना था. हसीना को पहले ही इसकी चेतावनी दी गई थी.”

यह सिर्फ अबू सईद की बात नहीं थी. जुलाई आंदोलन और उसके बाद की घटनाओं पर लिखी मेरी किताब इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ एन अनफिनिश्ड रिवोल्यूशन के लिए मैंने बांग्लादेश के स्वतंत्र फिल्म निर्माता और लेखक एफएम शाहीन से बात की थी. उन्होंने कहा था कि इस आंदोलन ने “डिजिटल रजाकारों” की एक नई पीढ़ी तैयार कर दी है, जो सोशल मीडिया के जरिए अपने विचार फैलाती है.

शाहीन ने कहा, “डिजिटल रजाकार हर जगह हैं. कॉलेज कैंपस में, कॉफी शॉप में, निजी और सरकारी नौकरियों में, मीडिया और एनजीओ में. उनसे बचना मुश्किल है. वे कभी शेख मुजीब का घर गिराने पहुंच जाते हैं, कभी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने के लिए इकट्ठा होते हैं. फिर अपने रोजमर्रा के जीवन में लौटकर सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप ग्रुप में इस्लामी वर्चस्व की बातें करते हैं. यह एक डरावनी नई दुनिया है.”

दिलचस्प बात यह है कि जुलाई आंदोलन से बनी राजनीतिक पार्टी एनसीपी ने फरवरी 2026 के आम चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी के साथ चुनावी गठबंधन कर लिया. इस गठबंधन के बाद एनसीपी के कई बड़े नेताओं ने इस्तीफा दे दिया, जिससे पार्टी के भीतर संकट पैदा हो गया. इसके बाद यह शक और गहरा हो गया कि जुलाई आंदोलन शुरू से ही देश की सत्ता पर कब्जा करने की एक इस्लामवादी साजिश था.

अब, जुलाई आंदोलन की दूसरी बरसी पर बांग्लादेश एक बड़े सवाल का सामना कर रहा है. आखिर इतने खून-खराबे से हासिल क्या हुआ?

डेली वादा के लिए शफीकुल इस्लाम ने लिखा, “ढाका की सड़कों पर लोगों ने सिर्फ एक शोषक सत्ता को हटाकर दूसरी शोषक सत्ता लाने के लिए अपनी जान जोखिम में नहीं डाली थी.”

उन्होंने लिखा, “लोगों की उम्मीदें इससे कहीं बड़ी थीं. वे चाहते थे कि देश बदले की राजनीति के पुराने चक्र से बाहर निकले और एक जवाबदेह व्यवस्था बने.” लेकिन उनके मुताबिक जुलाई आंदोलन सिर्फ सरकार बदलने तक सीमित रह गया. शासन चलाने का तरीका और उसकी सोच में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया.

जिस आंदोलन में 1,400 लोगों की मौत हुई और 20,000 से ज्यादा लोग घायल हुए, उससे लोगों को इससे कहीं ज्यादा उम्मीदें थीं.

दीप हल्दर एक लेखक और दिप्रिंट में कॉन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर हैं. वे @deepscribble पर ट्वीट करते हैं. ये उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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