जब छात्रों ने पहली बार दिल्ली के जंतर-मंतर के पास सड़कों पर उतरना शुरू किया, तो इंस्टाग्राम या X स्क्रॉल करना लगभग नामुमकिन हो गया था बिना ऐसे वीडियो देखे जिन पर लिखा होता था, “सबसे ज्यादा गैर-सीरियस पीढ़ी”. कई सालों बाद पहली बार सत्ता में बैठे लोगों पर मजाक वापस आया, न कि उन लोगों पर जो दबे हुए हैं. प्रदर्शनकारियों के बनाए मीम, पोस्टर और तख्तियां ऐसे लग रहे थे जैसे वे सीधे सत्ता व्यवस्था पर तंज कस रहे हों.
कई प्रदर्शनकारी महात्मा गांधी और बीआर आंबेडकर के रूप में तैयार होकर आए थे. इंस्टाग्राम पर कैप्शन लिखा था, “Season 1 players respawned”. यहां Season 1 का मतलब आजादी का आंदोलन था. हमने हाल के समय के सबसे प्रभावशाली आंदोलन में कई स्पाइडर-मैन और कॉकरोच को भी प्रदर्शन में शामिल देखा. इन पोशाकों और तैयार की गई प्रस्तुतियों के पीछे हमने एक ऐसी पीढ़ी देखी जो असल समय में दुख और त्रासदी से निपटने के लिए हास्य का इस्तेमाल कर रही थी.
लोगों की प्रतिक्रियाएं मोटे तौर पर दो हिस्सों में बंटी हुई थीं. पहला हिस्सा कहता था कि यह कोई हंसी-मजाक का मामला नहीं है. हिंसा, भूख हड़ताल और छात्रों की मौत जैसी चीजें पूरी गंभीरता मांगती हैं. यही वह सोच है जिसके आधार पर कुछ लोग इस आंदोलन को कमजोर बताने की कोशिश भी कर रहे थे.
दूसरा हिस्सा छात्रों की इसी बात के लिए तारीफ कर रहा था कि वे गंभीर और उदास बने रहने से इनकार कर रहे हैं. वे खुद भी इस मजाक में शामिल हो रहे थे और उनकी बेपरवाही को लोकतांत्रिक विरोध के प्रति अपनी तरह की प्रतिबद्धता के रूप में देख रहे थे.
जिन बातों के चारों ओर ये मजाक बनाए गए
अगर आप काफी देर तक स्क्रॉल करते रहें, तो आंदोलन से जुड़ी खास चीजें अपने आप एक अलग तरह की श्रेणी जैसी लगने लगती हैं. लोग मजाक कर रहे थे कि प्रदर्शन के लिए निकलते समय उन्हें मार पड़ने की उम्मीद है, लेकिन उसी समय वे “रेट माय आउटफिट” (मेरे आउटफिट को रेट करो) वाला वीडियो भी रिकॉर्ड कर रहे थे.
मोबाइल गेम Subway Surfers का बैकग्राउंड म्यूजिक जब पुलिस से भागते प्रदर्शनकारियों के वीडियो के साथ जोड़ा गया, तो पुलिस की पीछा करने वाली घटना तुरंत एक मीम बन गई. हिरासत में लिए जाते समय भी लोग वायरल ऑडियो पर लिप-सिंक वीडियो बना रहे थे. उनके चेहरे के भाव और शरीर की भाषा दोनों ही सच्चे लग रहे थे.
एक वायरल वीडियो में मजाकिया अंदाज में बताया गया कि “प्रदर्शन में क्या-क्या लेकर जाना चाहिए“. उसमें तैरने वाले चश्मे को S-tier में रखा गया था. जानकारी इस तरह साझा की जा रही थी कि वह भारी और समझने में मुश्किल न लगे. एक पत्रकार ने तो दिल्ली पुलिस के लिए Gen Z की भाषा समझाने वाला वीडियो भी बनाया.
इस प्रदर्शन को खास बनाने वाली बात यह थी कि इन मजाक के पीछे कुछ बड़े प्रतीक मौजूद थे. छात्रों ने उन्हीं प्रतीकों की भाषा अपनाई, जिन पर राज्य अपना अधिकार जताता है. उन्होंने संविधान को ऊपर उठाया और राष्ट्रीय ध्वज को ढाल की तरह अपने ऊपर रखा.
भीड़ ने दिल्ली पुलिस को आगे बढ़ने से रोकने की रणनीति के रूप में राष्ट्रगान गाना शुरू कर दिया. यह राष्ट्रीय प्रतीकों को वापस अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का एक समझदार तरीका था, ताकि सत्ता में बैठे लोगों से जवाब मांगा जा सके.
अगर मीम्स के नीचे छिपी असली बात को देखें, तो एक ज्यादा गंभीर तस्वीर सामने आती है. फोन और इंटरनेट ने लोगों को अपनी कहानियां बताने की जो आसानी और ताकत दी है, उससे हमें पता चलता है कि प्रदर्शनकारी क्या दिखाना चाहते थे.
ऐसे लोगों की गवाही सामने आई जो प्रदर्शन स्थल पर खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे. वहां एक अनकही सामुदायिक भावना थी. अलग-अलग क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों के लोग एक साथ खड़े थे. ये दृश्य हमें उस शांतिपूर्ण साथ रहने और भाईचारे की याद दिलाते हैं जो भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की पहचान है.
हास्य ने इतना बड़ा ऑनलाइन पहुंच बना ली कि व्यक्तिगत पीड़ा, चोट और गिरफ्तारियों जैसी कहानियां भी लोगों की फीड के सबसे ऊपर आने लगीं. इससे समाज का वह हिस्सा भी इस मुद्दे से जुड़ने लगा जो शायद पहले इस पर ध्यान नहीं देता.
यही हास्य का असली काम है. यह एक ट्रोजन हॉर्स की तरह काम करता है. जो कंटेंट बहुत भारी, बहुत राजनीतिक या इतना आसान होता कि लोग उसे स्क्रॉल करके आगे बढ़ जाते, वही किसी ऐसे व्यक्ति की फीड तक पहुंच जाता है जो खुद को राजनीति से दूर मानता है.
मीम किसी खतरे की तरह महसूस नहीं होता. लोग उसे देखते हैं, शेयर करते हैं, हंसते हैं और उसी प्रक्रिया में यह भी समझ लेते हैं कि एक छात्र के साथ मारपीट हुई है.
हास्य पर ध्यान देने का मतलब यह नहीं है कि देश के लिए प्यार कम है.
मजेदार विरोध का लंबा इतिहास
हालांकि Gen Z ने हास्य का इस्तेमाल एक ऐसी सहजता के साथ किया है जो पहले कभी नहीं देखी गई, लेकिन यह कोई नई बात नहीं है. सामाजिक आंदोलनों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ लंबे समय से कहते आए हैं कि हास्य सिर्फ प्रदर्शन को सजाने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह असली राजनीतिक काम करता है.
2017 के एक लेख में Marjolein ‘t Hart ने बताया कि कैसे हंसी ने 16वीं सदी के ऑग्सबर्ग से लेकर ग्दांस्क के सॉलिडैरिटी आंदोलन तक प्रदर्शनकारियों का साथ दिया. उन्होंने इसे सच में “कमजोर लोगों का हथियार” बताया. व्यंग्य और हास्य ने प्रदर्शनकारियों को अपनी सामूहिक पहचान बनाने में मदद की और बड़े समाज के सामने अपने मुद्दे को रखने का तरीका दिया, यहां तक कि जब उन पर असली दमन हो रहा था.
हाल के प्रदर्शन में इस्तेमाल किया गया रणनीतिक हास्य इंटरनेट से पहले के आंदोलनों में इस्तेमाल की जाने वाली पुरानी रणनीतियों की ही अगली कड़ी है. जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों ने बस इसका इंटरनेट वाली नई भाषा में इस्तेमाल खोज लिया.
कमेंट सेक्शन में दिखने वाली बेचैनी शायद इसलिए है क्योंकि पुरानी पीढ़ी विरोध के इन नए तरीकों को समझने में कठिनाई महसूस करती है. या फिर इसलिए क्योंकि कुछ लोग इस समय की गंभीरता को लेकर सच में चिंतित हैं.
लेकिन सिर्फ इस वजह से आंदोलन को खारिज कर देना कि उसमें हास्य सबसे आगे दिखाई दे रहा है, असल बात को नजरअंदाज करना है. हास्य संदेश पहुंचाने का तरीका था, विश्वास की कमी नहीं.
25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफा दे दिया.
क्या आखिरकार सत्ता को झुकाने का कारण गंभीरता नहीं, बल्कि यह प्रदर्शन और उसका तमाशाई अंदाज था?
अंबिका शैलजा नैथानी ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ ससेक्स और मिरांडा हाउस से ग्रेजुएशन किया है. उनका X हैंडल @naithaniambica है और वे Instagram पर @ambicanaithani पर हैं. विचार निजी हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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