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Sunday, 26 July, 2026
होमदेशन्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा खाली कुर्सियां: जिला और हाई कोर्ट में 23% जजों के पद रिक्त

न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा खाली कुर्सियां: जिला और हाई कोर्ट में 23% जजों के पद रिक्त

सरकार की ओर से संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, ज़िला अदालतों में कर्नाटक में 58% की भारी कमी है. वहीं, हाई कोर्ट्स में J&K और लद्दाख हाई कोर्ट में 52% पद खाली हैं, और इसके बाद झारखंड का नंबर आता है जहां 48% पद खाली हैं.

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नई दिल्ली: इस साल 17 जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार, भारत की जिला अदालतों में स्वीकृत न्यायिक पदों में से लगभग एक-चौथाई पद खाली हैं. 23 जुलाई को संसद में दी गई इस जानकारी ने न्याय मिलने की रफ्तार को लेकर चिंता बढ़ा दी है. वहीं, पूरे देश के हाई कोर्टों में स्वीकृत जजों के करीब एक-तिहाई पद भी फिलहाल खाली हैं.

जिला अदालतों के आंकड़े, जिन्हें कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में एक अतारांकित प्रश्न के जवाब में दिया, बताते हैं कि कुल 30,868 स्वीकृत न्यायिक अधिकारियों के पदों में से अभी सिर्फ 23,558 अधिकारी ही काम कर रहे हैं. इसका मतलब है कि पूरे देश में 7,310 पद खाली हैं. यानी कुल रिक्ति दर 23.68 प्रतिशत है.

जहां चंडीगढ़ और दमन एवं दीव जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में एक भी पद खाली नहीं है, वहीं कुछ राज्यों में 50 प्रतिशत से ज्यादा पद खाली हैं. कर्नाटक सबसे ज्यादा संकट में है, जहां 58 प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं. यह बड़े राज्यों में सबसे अधिक रिक्ति दर है.

उत्तर प्रदेश, जहां देश में सबसे ज्यादा न्यायिक पदों की जरूरत है, वहां 1,000 से ज्यादा न्यायिक पद खाली हैं. वहां रिक्ति दर 29.24 प्रतिशत है. ओडिशा में यह दर 27.81 प्रतिशत है.

इन आंकड़ों में इन कमियों को दूर करने के लिए दी गई वित्तीय सहायता की जानकारी भी शामिल है.

उदाहरण के लिए, ओडिशा को पिछले पांच वर्षों में न्यायिक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए केंद्र प्रायोजित योजना के तहत 146.42 करोड़ रुपये मिले हैं. मौजूदा वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य में अदालतों के बुनियादी ढांचे के विकास को जारी रखने के लिए 25.37 करोड़ रुपये का अस्थायी आवंटन किया गया है.

देशभर के हाई कोर्टों के लिए दिए गए आंकड़ों के अनुसार, स्वीकृत जजों के करीब एक-तिहाई पद खाली हैं. यह न्याय व्यवस्था के ऊपरी स्तर के लिए एक बड़ी चुनौती है.

मेघवाल द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, 1 जुलाई 2026 तक देश के सभी हाई कोर्टों में जजों के कुल 1,122 स्वीकृत पद हैं. लेकिन अभी सिर्फ 781 जज कार्यरत हैं. यानी पूरे देश में 341 पद खाली हैं. यह कुल 30.39 प्रतिशत रिक्ति दर है.

सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति, जो संविधान के अनुच्छेद 217 और 224 के तहत होती है, 1998 में तय की गई मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) के अनुसार की जाती है.

MoP के तहत नियुक्ति का प्रस्ताव शुरू करने की जिम्मेदारी संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की होती है. उन्हें इसके लिए हाई कोर्ट के दो सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों से सलाह करनी होती है. हालांकि MoP के अनुसार किसी पद के खाली होने से कम से कम छह महीने पहले सिफारिश भेज दी जानी चाहिए, लेकिन सरकार ने कहा कि इस समय सीमा का “शायद ही कभी पालन किया जाता है.”

आंकड़ों में ऐसे कई “हॉटस्पॉट” बताए गए हैं जहां न्यायिक पदों की रिक्ति 40 प्रतिशत से ज्यादा है. इससे उन क्षेत्रों में न्याय मिलने की रफ्तार प्रभावित हो सकती है.

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा 52 प्रतिशत पद खाली हैं. इसके बाद झारखंड में 48 प्रतिशत, ओडिशा में 45.45 प्रतिशत और कलकत्ता हाई कोर्ट में 43.06 प्रतिशत पद खाली हैं.

इलाहाबाद और मद्रास जैसे बड़े हाई कोर्ट, जहां मामलों का बोझ भी बहुत ज्यादा है, वहां भी 32 प्रतिशत या उससे अधिक पद खाली हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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