नई दिल्ली: दिल्ली और देशभर में हजारों प्रदर्शनकारियों ने शनिवार शाम अपना प्रदर्शन खत्म कर दिया, क्योंकि सरकार ने आखिरकार उनकी मांगें मान लीं. इनमें जवाबदेही, पारदर्शिता और भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी शामिल थी.
इन प्रदर्शनों की अगुवाई करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने खासकर दिल्ली में सिर्फ युवाओं ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति को एक मंच दिया जो अपने देश से सही काम करने की मांग करना चाहता था.
जंतर-मंतर लोगों से भरा हुआ था. भारतीय ऊंची आवाज में अपनी बात रख रहे थे और उनके दिल उम्मीद से भरे हुए थे. वे वही कर रहे थे जो उनसे पहले कई पीढ़ियां करती आई हैं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जो सबसे स्वाभाविक है. विरोध-प्रदर्शन.
प्रदर्शन करना भारत की सबसे पुरानी और मजबूत सामाजिक परंपराओं में से एक है. इस हफ्ते की घटनाएं एक बार फिर दिखाती हैं कि 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले इस देश की बुनियाद में यह परंपरा आज भी कितनी गहराई से मौजूद है.
यहीं से एक सवाल उठता है. आखिर किन मुद्दों ने पहले भारतीयों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया? और सबसे अहम बात, इन बड़े जन आंदोलनों से क्या हासिल हुआ?
आइए, आजाद भारत के इतिहास के 15 सबसे महत्वपूर्ण जन आंदोलनों पर समय के क्रम में एक नजर डालते हैं. साथ ही समझते हैं कि कौन-सी शिकायतें, मांगें और उम्मीदें लोगों को सड़कों पर लेकर आईं.
आंध्र राज्य आंदोलन और पोट्टी श्रीरामुलु का अनशन: 1952-1953
तेलुगु भाषा बोलने वालों के लिए अलग राज्य की मांग, आजाद भारत के सामने सबसे शुरुआती बड़ी चुनौतियों में से एक थी. यह सवाल था कि नया भारत अपनी इतनी बड़ी भाषाई विविधता को कैसे संभालेगा. उस समय के संयुक्त मद्रास राज्य में रहने वाले तेलुगु भाषी लोगों का मानना था कि राजनीतिक ताकत, सरकारी नौकरियां और प्रशासन पर तमिल भाषी राजधानी मद्रास का जरूरत से ज्यादा कब्जा है.
इसी समय गांधीवादी कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामुलु सामने आए. उन्होंने अलग आंध्र राज्य की मांग को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया, जब उन्होंने इसके लिए अनशन शुरू किया. दिसंबर 1952 में 58 दिन तक बिना खाना खाए रहने के बाद उनकी मौत हो गई. इसके बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, हड़तालें, अशांति और जवाहरलाल नेहरू सरकार पर भारी दबाव बना.
नेहरू शुरुआत में भाषाई आधार पर राज्य बनाने के खिलाफ थे. उन्हें डर था कि इससे नए-नए एकजुट हुए देश में क्षेत्रीय पहचान मजबूत होगी और राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ सकती है. लेकिन आंदोलन के दबाव में सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा. 1953 में आंध्र राज्य बनाया गया. इसके बाद इस विवाद के चलते राज्यों के पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ और 1956 में राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम को लागू किया गया.
इस आंदोलन ने यह तय किया कि भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करना पूरी तरह जायज है. इसके बाद महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और कई दूसरे राज्यों के आंदोलन भी इसी रास्ते पर आगे बढ़े.
आज भारत का जो नक्शा है, उसे पोट्टी श्रीरामुलु के अनशन और उनकी मौत के बाद हुए जन आंदोलन को समझे बिना नहीं समझा जा सकता.
तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन: 1965
हिंदी विरोधी आंदोलन इसलिए शुरू हुआ क्योंकि लोगों को डर था कि संविधान में तय अंतरिम अवधि खत्म होने के बाद केंद्र सरकार हिंदी को केंद्रीय प्रशासन की मुख्य भाषा बना देगी और अंग्रेजी की जगह ले लेगी.
कई तमिल भाषी लोगों को लगा कि अगर ऐसा हुआ तो गैर-हिंदी भाषी लोगों को केंद्र सरकार की नौकरियों, शिक्षा और राष्ट्रीय राजनीति में नुकसान होगा. 1965 के आंदोलन में सबसे आगे छात्र थे. उनके साथ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), लेखक, बुद्धिजीवी और तमिल समाज के कई दूसरे वर्ग भी शामिल हुए.
लोगों ने प्रदर्शन, हड़ताल, बंद और यहां तक कि आत्मदाह जैसे तरीके अपनाए. सरकार ने जवाब में गिरफ्तारियां कीं, धारा 144 जैसे प्रतिबंध लगाए और पुलिस बल का इस्तेमाल किया.
लगातार बढ़ते विरोध के बाद केंद्र सरकार को भरोसा देना पड़ा कि गैर-हिंदी राज्यों के लिए अंग्रेजी, हिंदी के साथ जारी रहेगी. 1967 में आधिकारिक भाषा अधिनियम में संशोधन करके इस समझौते को कानूनी रूप दिया गया.
राजनीतिक रूप से भी इस आंदोलन का बड़ा असर हुआ. 1967 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में DMK ने कांग्रेस को हरा दिया. इसके साथ ही राज्य में कांग्रेस का लंबे समय से चला आ रहा शासन खत्म हो गया और उसके बाद से कांग्रेस कभी भी अपने दम पर वहां सरकार नहीं बना सकी. इस आंदोलन ने साफ कर दिया कि भारत की एकता किसी एक भाषा पर निर्भर नहीं हो सकती.
नक्सलबाड़ी और नक्सली-माओवादी आंदोलन: 1967-अभी तक
नक्सली आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में किसानों के विद्रोह से हुई. लेकिन बाद में यह भारतीय राज्य के सामने एक बहुत बड़ा और लंबे समय तक चलने वाला क्रांतिकारी आंदोलन बन गया. शुरुआती समर्थकों का कहना था कि संसदीय लोकतंत्र, जमीन के असमान बंटवारे, जमींदारों के दबदबे, मजदूरों के शोषण और जातिगत अन्याय जैसी समस्याओं को खत्म करने में नाकाम रहा है.
बाद में माओवादी संगठनों ने जंगलों वाले इलाकों में अपना सबसे मजबूत आधार बनाया, जहां आदिवासी समुदायों को विस्थापन, खनन परियोजनाओं, जंगलों तक सीमित पहुंच और सरकारी सेवाओं की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था. आंदोलन सिर्फ प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रहा. इसमें जमीन पर कब्जा, हथियारबंद दस्ते, गुरिल्ला युद्ध और समानांतर सत्ता व्यवस्था जैसी गतिविधियां भी शामिल हो गईं.
सरकार ने इसे मुख्य रूप से आंतरिक सुरक्षा का मुद्दा माना. इसके जवाब में गिरफ्तारियां, प्रतिबंध, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई, खुफिया अभियान और बुनियादी ढांचे का विस्तार किया गया. साथ ही कल्याण और विकास योजनाएं भी चलाई गईं.
इस आंदोलन की वजह से भूमि सुधार, वन अधिकार, आदिवासी स्वायत्तता, विस्थापन और खनन जैसे मुद्दे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बने. इसकी सबसे अलग बात यह रही कि यह भारत के बाकी बड़े आंदोलनों की तरह केवल शांतिपूर्ण जन प्रदर्शन नहीं था, बल्कि इसमें सशस्त्र संघर्ष भी शामिल था.
चिपको आंदोलन जिसने भारत में पर्यावरण आंदोलनों की दिशा बदल दी: 1973-1980 का दशक
चिपको आंदोलन उस समय के उत्तर प्रदेश, जो अब उत्तराखंड है, के हिमालयी इलाकों में शुरू हुआ. गांव के लोग उन सरकारी नीतियों का विरोध कर रहे थे जिनके तहत बाहर की कंपनियों को जंगल काटने की अनुमति दी गई थी, जबकि उन्हीं जंगलों पर निर्भर स्थानीय लोगों को चारा, ईंधन और पानी के लिए सीमित पहुंच मिल रही थी. लोगों का मानना था कि जंगलों की कटाई से मिट्टी का कटाव, भूस्खलन, बाढ़, पानी की कमी और महिलाओं पर रोजमर्रा के जरूरी संसाधन जुटाने का बोझ बढ़ रहा है.
प्रदर्शनकारियों ने गांधीवादी तरीकों का इस्तेमाल किया. उन्होंने मार्च निकाले, गीत गाए, बैठकें कीं और शांतिपूर्ण विरोध किया. सबसे प्रसिद्ध तरीका था पेड़ों से लिपट जाना ताकि उन्हें काटा न जा सके. चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा इस आंदोलन के राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले नेता बने. लेकिन गांव की महिलाओं, खासकर गौरा देवी और रेणी गांव की महिलाओं की भूमिका इसकी सफलता में सबसे महत्वपूर्ण रही.
1980 में इंदिरा गांधी सरकार ने हिमालय के कुछ इलाकों में हरे पेड़ों की कटाई पर लंबे समय के लिए रोक लगा दी. इस आंदोलन ने वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के लिए भी माहौल मजबूत किया. आज जब सरकार भारत को एक वैश्विक ताकत बनाने की बात करती है, तब भी यह आंदोलन एक सवाल छोड़ता है. विकास का फायदा किसे मिलता है, और उसकी कीमत कौन चुकाता है?
गुजरात का नव निर्माण आंदोलन: 1973-1974
आज के CJP प्रदर्शनों की तरह नव निर्माण आंदोलन भी छात्रों की शिक्षा से जुड़ी शिकायतों से शुरू हुआ था. लेकिन बहुत जल्दी यह सरकार से जवाबदेही की मांग करने वाला बड़ा आंदोलन बन गया.
इसकी शुरुआत 1973 के आखिर में अहमदाबाद के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में खाने और हॉस्टल फीस बढ़ाए जाने के विरोध से हुई. बाद में यह महंगाई, भ्रष्टाचार और मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की कांग्रेस सरकार के खिलाफ पूरे राज्य का आंदोलन बन गया.
छात्रों ने हड़ताल, प्रदर्शन, बंद और बहिष्कार किए. बाद में व्यापारी, पेशेवर लोग और विपक्षी दल भी इसमें शामिल हो गए.
सरकार ने जवाब में गिरफ्तारियां कीं, कर्फ्यू लगाया और पुलिस बल का इस्तेमाल किया. जैसे-जैसे आंदोलन पूरे गुजरात में फैलता गया, आम जनजीवन भी प्रभावित होने लगा. इस आंदोलन में लगभग 103 लोगों की मौत हुई, जिनमें से 88 लोग पुलिस फायरिंग में मारे गए. जैसे-जैसे हिंसा और राजनीतिक संकट बढ़ा, फरवरी 1974 में चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा. राज्य विधानसभा पहले निलंबित की गई और बाद में भंग कर दी गई, जिसके बाद नए चुनाव कराए गए.
हालांकि बाद में चिमनभाई पटेल अपनी नई पार्टी किसान मजदूर लोक पक्ष के नेता के रूप में फिर सत्ता में लौटे, लेकिन इस आंदोलन ने दिखा दिया कि लगातार जन आंदोलन किसी चुनी हुई राज्य सरकार को भी सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर सकता है. नव निर्माण आंदोलन ने बिहार में शुरू हुए जयप्रकाश नारायण आंदोलन की भी जमीन तैयार की. इसने महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ स्थानीय गुस्से को कांग्रेस शासन और इंदिरा गांधी सरकार के बढ़ते केंद्रीकरण के खिलाफ राष्ट्रीय चुनौती में बदल दिया.
जयप्रकाश नारायण आंदोलन: 1974-1975
बिहार में महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, खाद्यान्न की कमी और प्रशासनिक नाकामी के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन, आगे चलकर इंदिरा गांधी सरकार के सामने सबसे बड़ी जन चुनौती बन गया.
वरिष्ठ समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण, जिन्हें लोग प्यार से जेपी कहते थे, ने “संपूर्ण क्रांति” का नारा देकर इस आंदोलन को राष्ट्रीय दिशा दी. उनका कहना था कि सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और नैतिक जीवन में भी बड़े बदलाव की जरूरत है.
छात्रों, विपक्षी दलों, ट्रेड यूनियनों और नागरिक संगठनों ने मार्च निकाले, हड़तालें कीं और सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया. साथ ही वे चुनी हुई राज्य विधानसभाओं को भंग कर नए चुनाव कराने की मांग भी कर रहे थे.
सरकार ने तुरंत गिरफ्तारियां कीं, लाठीचार्ज कराया और पुलिस फायरिंग करवाई. खुद जयप्रकाश नारायण भी पुलिस कार्रवाई में घायल हुए. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी का 1971 का चुनाव रद्द कर दिया, जिसके बाद टकराव और बढ़ गया. आखिरकार देश में आपातकाल लागू कर दिया गया.
25 जून 1975 को इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल घोषित किया. विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और राजनीतिक गतिविधियों को दबा दिया गया. शुरुआत में यह आंदोलन दबा दिया गया, लेकिन इसकी सबसे बड़ी जीत 1977 में मिली, जब जनता ने चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी केंद्र सरकार बनी.
इसके बाद 44वें संविधान संशोधन के जरिए आपातकाल से जुड़े अधिकारों पर और मजबूत सुरक्षा प्रावधान जोड़े गए. आज भी जब प्रदर्शनकारी, पत्रकार या विपक्षी नेता लोकतंत्र के कमजोर होने या सरकार के जरूरत से ज्यादा ताकतवर होने की बात करते हैं, तो जयप्रकाश नारायण आंदोलन का जिक्र अक्सर किया जाता है.
असम आंदोलन: 1979-1985
छह साल तक यह आंदोलन हड़तालों, बंद, बड़ी रैलियों, सविनय अवज्ञा, चुनाव बहिष्कार और सरकारी कामकाज के विरोध के रूप में चलता रहा. केंद्र सरकार कभी बातचीत करती थी और कभी सख्ती अपनाती थी. भारी बहिष्कार के बावजूद सरकार ने 1983 का विधानसभा चुनाव भी कराया.
इस दौरान भयानक जातीय हिंसा भी हुई. सबसे कुख्यात घटना 18 फरवरी 1983 का नेल्ली नरसंहार था, जिसमें करीब 3,000 लोगों की हत्या हुई. इनमें ज्यादातर बंगाली भाषी मुसलमान थे.
1985 के असम समझौते में 24 मार्च 1971 को राज्य में नागरिकता तय करने की मुख्य कट-ऑफ तारीख माना गया. साथ ही असमिया पहचान की रक्षा के लिए संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक सुरक्षा देने का वादा किया गया. इसके बाद आंदोलन के नेताओं ने असम गण परिषद बनाई और विधानसभा चुनाव जीत लिया. 33 साल की उम्र में प्रफुल्ल कुमार महंत भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने.
भारत नागरिकता, प्रवास और मतदान के अधिकार जैसे मुद्दों को सीमावर्ती राज्यों की सांस्कृतिक और जनसंख्या से जुड़ी चिंताओं के साथ कैसे संतुलित करे, यह सवाल आज भी देश की राजनीति में उतना ही महत्वपूर्ण बना हुआ है.
राम जन्मभूमि आंदोलन और हिंदुत्व की राजनीति का उभार: 1980-2024
राम जन्मभूमि आंदोलन ने अयोध्या के एक विवादित धार्मिक स्थल को इतिहास, आस्था और भारतीय पहचान से जुड़े राष्ट्रीय अभियान का केंद्र बना दिया. हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों का कहना था कि बाबरी मस्जिद भगवान राम की जन्मभूमि पर पहले मौजूद मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी. उन्होंने मांग की कि उस जमीन पर राम मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए.
विश्व हिंदू परिषद (VHP), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उनसे जुड़े संगठनों ने धार्मिक यात्राओं, जनसभाओं, पूजित ईंट अभियान और 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के जरिए लोगों को जोड़ा.
लगातार बदलती सरकारों ने कभी समझौते की कोशिश की, कभी बातचीत की, कभी अदालत का सहारा लिया और कभी सख्ती दिखाई. रथ यात्रा के दौरान आडवाणी को गिरफ्तार किया गया, लेकिन आंदोलन जारी रहा. 6 दिसंबर 1992 को कार सेवकों ने सुरक्षा का भरोसा दिए जाने के बावजूद बाबरी मस्जिद गिरा दी. इसके बाद पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई.
केंद्र सरकार ने बीजेपी शासित राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया, कुछ संगठनों पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया और लिब्रहान आयोग का गठन किया. इस आंदोलन का सबसे बड़ा असर राजनीति पर पड़ा. इसने बीजेपी को सीमित संसदीय पार्टी से देश की बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बना दिया और हिंदुत्व को भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया. 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर मंदिर निर्माण की अनुमति दी, लेकिन मस्जिद गिराए जाने को गैरकानूनी बताया.
इस आंदोलन की विवादित विरासत आज भी चुनावों, हिंदू-मुस्लिम राजनीति और भारतीय लोकतंत्र में धार्मिक राष्ट्रवाद की भूमिका और उसके असर को लेकर होने वाली बहसों को प्रभावित करती है.
उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ बनाने वाले आंदोलन: 1970-2000
साल 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्यों का गठन अलग-अलग क्षेत्रीय आंदोलनों का नतीजा था. इन सभी आंदोलनों का मानना था कि मौजूदा राज्य सरकारों ने दूर-दराज के इलाकों और वहां रहने वाले लोगों की लगातार अनदेखी की है.
उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में उत्तराखंड आंदोलन के समर्थकों का कहना था कि मैदानों के नेताओं के प्रभाव वाला प्रशासन पहाड़ों में रोजगार, पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं, बुनियादी सुविधाओं और सांस्कृतिक पहचान पर ध्यान नहीं देता.
इस आंदोलन में मार्च, हड़ताल, रैलियां और राजनीतिक संगठन का सहारा लिया गया. इस दौरान पुलिस की कड़ी कार्रवाई भी हुई, खासकर 1994 की रामपुर तिराहा घटना.
झारखंड में आदिवासी संगठनों और क्षेत्रीय दलों ने खनिज संपदा से भरपूर इलाके पर स्थानीय लोगों का अधिकार मांगा. उनका कहना था कि आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही है, खनन के कारण उन्हें विस्थापित होना पड़ रहा है और इलाका लगातार पिछड़ा हुआ है.
छत्तीसगढ़ के समर्थकों का भी कहना था कि मध्य प्रदेश के भीतर रहते हुए उनके क्षेत्र की भाषा, प्राकृतिक संसाधनों और विकास की जरूरतों की अनदेखी की जा रही है.
कई दशकों की देरी के बाद संसद ने 2000 में मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम और बिहार पुनर्गठन अधिनियम पारित किए. इसके तहत क्रमशः छत्तीसगढ़, उत्तराखंड जिसे शुरुआत में उत्तरांचल कहा गया, और झारखंड राज्य बनाए गए.
इन राज्यों के बनने से यह साबित हुआ कि भारत अलग-अलग क्षेत्रों की मांगों को देश के अंदर नई सीमाएं बनाकर पूरा कर सकता है. हर अलग पहचान की मांग को अलगाववाद मानना जरूरी नहीं है.
हालांकि नए राज्य बनने के बाद भी वे सभी समस्याएं खत्म नहीं हुईं जिनकी वजह से ये आंदोलन शुरू हुए थे. आज भी इन तीनों राज्यों में खनन, वन अधिकार, पलायन और असमान विकास को लेकर विवाद जारी हैं.
मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होना और आरक्षण विरोधी आंदोलन: 1990
1990 में प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का फैसला लिया. इसके तहत केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया. इससे सरकारी व्यवस्था में OBC की भागीदारी काफी बढ़ी और चुनावी राजनीति में जाति आधारित लामबंदी भी तेज हो गई.
OBC संगठनों का मानना था कि यह लंबे समय से सरकारी संस्थानों और नौकरियों में ऊंची जातियों के दबदबे की भरपाई करने की जरूरी पहल है. वहीं कई ऊंची जाति के छात्र, खासकर उत्तर भारत में, इसे योग्यता और अपने रोजगार के अवसरों पर हमला मानते थे.
देश के कई शहरों में विश्वविद्यालय बंद हुए, सड़कें जाम की गईं, हड़तालें और प्रदर्शन हुए. इस दौरान आत्मदाह की कई कोशिशें भी हुईं. इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में रहा.
पुलिस ने गिरफ्तारियां कीं और बल प्रयोग किया, लेकिन सरकार ने फैसला वापस नहीं लिया. 1992 में इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण को सही ठहराया. साथ ही क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने और सामान्य तौर पर कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत बनाए रखने की बात कही.
मंडल आयोग का सबसे बड़ा असर राजनीति पर पड़ा. इससे बिहार, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में OBC नेताओं और क्षेत्रीय दलों का तेजी से उभार हुआ. इसके कारण ऊंची जातियों और कांग्रेस के लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक वर्चस्व को बड़ा झटका लगा.
आज जाति जनगणना, उप-वर्गीकरण और आरक्षण पर जो बहस हो रही है, उसकी जड़ें मंडल आयोग से आए इसी राजनीतिक बदलाव में हैं. मंडल आयोग की सिफारिशों ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दायरा बदला और यह भी बदल दिया कि उत्तर भारत का प्रतिनिधित्व करने का दावा कौन कर सकता है.
सूचना का अधिकार आंदोलन: 1990 का दशक-2005
सूचना का अधिकार आंदोलन राजस्थान के गांवों से शुरू हुआ. वहां मजदूरों ने देखा कि सरकारी रिकॉर्ड में मजदूरी दिए जाने और विकास कार्य पूरे होने की बात लिखी हुई थी, जबकि जमीन पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था. लोगों को भ्रष्टाचार का शक तो था, लेकिन सरकारी हाजिरी रजिस्टर, बिल और खर्च के रिकॉर्ड देखने का कोई कानूनी और व्यावहारिक अधिकार नहीं था.
अरुणा रॉय, निखिल डे, शंकर सिंह और स्थानीय मजदूरों से जुड़े मजदूर किसान शक्ति संगठन ने इसका जवाब जन सुनवाइयों के जरिए दिया. इन बैठकों में सरकारी रिकॉर्ड सबके सामने पढ़कर सुनाए गए और गांव वालों की गवाही से उनका मिलान किया गया. इससे सरकारी कागजों में छिपी बातें सबके सामने जांची जा सकने वाली सच्चाई बन गईं.
धरनों और अभियानों के जरिए धीरे-धीरे यह मांग पूरे देश में फैल गई कि अगर लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों का सही इस्तेमाल करना है, तो उन्हें जानकारी तक पहुंच का अधिकार मिलना जरूरी है. शुरुआत में अधिकारी प्रशासनिक गोपनीयता का हवाला देकर जानकारी देने से बचते रहे. लेकिन बाद में राजस्थान और कई दूसरे राज्यों ने सूचना से जुड़े कानून बनाए. इसके बाद 2005 में संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया.
इस कानून के तहत केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग बनाए गए. सरकारी विभागों में सूचना अधिकारी नियुक्त करना जरूरी किया गया और बिना वजह जानकारी देने में देरी या इनकार करने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया. आज इसके महत्व को बढ़ा-चढ़ाकर बताना भी मुश्किल है. पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने RTI के जरिए भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के कई मामलों का खुलासा किया.
इंडिया अगेंस्ट करप्शन और अन्ना हजारे आंदोलन: 2011-2013
इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन की शुरुआत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार से जुड़े कई भ्रष्टाचार मामलों पर जनता के गुस्से के बीच हुई. इसकी सबसे बड़ी मांग एक मजबूत और स्वतंत्र लोकपाल की थी, जो बड़े सरकारी अधिकारियों की भी जांच कर सके.
गांधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे भूख हड़तालों के जरिए इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बने. वहीं अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण और दूसरे कार्यकर्ताओं ने संगठन और जन अभियान में अहम भूमिका निभाई.
इस आंदोलन में अनशन, रैलियां और सार्वजनिक जगहों पर धरने शामिल थे. साथ ही लगातार टीवी कवरेज और तेजी से बढ़ते सोशल मीडिया का भी आंदोलन के पक्ष में इस्तेमाल किया गया.
दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली सभाओं ने लोकपाल की मांग को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बना दिया. प्रस्तावित अनशन से पहले अन्ना हजारे की थोड़े समय के लिए गिरफ्तारी से सरकार की और ज्यादा आलोचना हुई.
केंद्र सरकार ने कार्यकर्ताओं से बातचीत की, संयुक्त मसौदा समिति बनाई और कानून के अलग-अलग मसौदे पेश किए. आखिरकार 2013 में संसद ने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम पारित किया. हालांकि इसमें कार्यकर्ताओं के पूरे जन लोकपाल प्रस्ताव को शामिल नहीं किया गया और इसे लागू होने में भी देरी हुई.
इस आंदोलन का एक अप्रत्याशित नतीजा भी निकला. अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थकों ने आम आदमी पार्टी बनाई, जो बाद में दिल्ली की प्रमुख राजनीतिक ताकत बन गई. यह आंदोलन आज भी इस बात का बड़ा उदाहरण है कि व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ अभियान खुद चुनावी व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है.
निर्भया आंदोलन और यौन हिंसा पर भारत की बड़ी बहस: 2012-2013
16 दिसंबर 2012 को दिल्ली की एक बस में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उस पर जानलेवा हमला हुआ. इस घटना के बाद पूरे देश में यौन हिंसा, पीड़िता को दोष देने की सोच, महिलाओं के लिए असुरक्षित सार्वजनिक जगहों और पुलिस तथा न्याय व्यवस्था की नाकामी के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा फूट पड़ा.
छात्र, महिला संगठन और आम नागरिक दिल्ली समेत देश के कई शहरों में मार्च, कैंडल मार्च और प्रदर्शनों में शामिल हुए. दिल्ली का इंडिया गेट और राजधानी की कई दूसरी जगहें प्रदर्शन का केंद्र बन गईं. लोग तेज सुनवाई, कड़े कानून और सरकार की ज्यादा जवाबदेही की मांग कर रहे थे. दिल्ली पुलिस ने बैरिकेड लगाए, पानी की बौछारें कीं, आंसू गैस छोड़ी, लाठीचार्ज किया और कई जगह प्रदर्शन स्थलों तक पहुंच भी रोक दी.
लेकिन जनता के इस बड़े गुस्से ने सरकार को जल्दी कदम उठाने पर मजबूर कर दिया. सरकार ने न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा समिति बनाई. इस समिति ने नागरिक समाज से सुझाव लिए और कई बड़े सुधारों की सिफारिश की. इसके बाद संसद ने 2013 का आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम पारित किया. इसमें यौन अपराधों की कानूनी परिभाषा का दायरा बढ़ाया गया, पीछा करना, झांकना और एसिड अटैक जैसे अपराधों को कानून में शामिल किया गया और सजा भी कड़ी की गई. कुछ मामलों के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें बनाई गईं और निर्भया फंड की स्थापना की गई.
सरकार ने वर्मा समिति की हर सिफारिश नहीं मानी. खासकर वैवाहिक बलात्कार और कमांड जिम्मेदारी से जुड़ी सिफारिशें स्वीकार नहीं की गईं. फिर भी इस आंदोलन ने यह पूरी तरह बदल दिया कि भारत में घरों, मीडिया, अदालतों और संसद में यौन हिंसा पर कैसे बात की जाती है.
इस आंदोलन ने यह स्थापित किया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा सिर्फ महिलाओं का निजी मुद्दा नहीं है. यह पूरे समाज की जिम्मेदारी और बराबरी की नागरिकता का सवाल है. इसके लिए सरकार को पूरी तरह जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.
CAA-NRC विरोधी आंदोलन और नागरिकता की लड़ाई: 2019-2020
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ आंदोलन तब शुरू हुआ, जब संसद ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई प्रवासियों के लिए नागरिकता पाने का आसान रास्ता बनाया.
इसका देशभर में विरोध हुआ. आलोचकों का कहना था कि नागरिकता देने के लिए धर्म को आधार बनाना भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान की भावना के खिलाफ है. लोगों को यह भी डर था कि अगर इस कानून को पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के साथ लागू किया गया, तो जरूरी दस्तावेज न होने की स्थिति में बड़ी संख्या में भारतीय मुसलमान नागरिकता से वंचित हो सकते हैं या उन्हें देशविहीन होने का खतरा हो सकता है.
छात्रों, महिलाओं, मुस्लिम संगठनों, नागरिक समाज समूहों और धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं ने मार्च निकाले, विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन किए और लंबे समय तक धरने दिए. दिल्ली का शाहीन बाग सबसे बड़ा प्रतीक बन गया, जहां महिलाओं ने लगातार धरना जारी रखा.
प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक रूप से संविधान पढ़ा, राष्ट्रीय ध्वज लहराया और कला के जरिए यह संदेश दिया कि उनका विरोध भारत के मूल संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए है.
पुलिस विश्वविद्यालय परिसरों में गई, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और बल प्रयोग किया. कई जगह इंटरनेट बंद किया गया और आपराधिक मामले दर्ज किए गए. आंदोलन CAA को रद्द नहीं करा सका और कोरोना महामारी के कारण इसका जमीनी अभियान अचानक खत्म हो गया.
फिर भी संविधान के प्रति देशभक्ति, महिलाओं की अगुवाई और अलग-अलग जगहों पर लंबे धरनों की जो शैली इस आंदोलन ने अपनाई, उसका असर आज भी नागरिकता, अल्पसंख्यक अधिकारों और सरकारी शक्तियों से जुड़े आंदोलनों पर दिखाई देता है.
किसान आंदोलन जिसने तीन कृषि कानून वापस करवाए: 2020-2021
किसान आंदोलन तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुआ. इन कानूनों का उद्देश्य कृषि बाजार को उदार बनाना, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देना और भंडारण से जुड़े कुछ नियमों में ढील देना था. सरकार का कहना था कि इससे किसानों के पास ज्यादा विकल्प होंगे, निजी निवेश बढ़ेगा और किसान सरकारी मंडियों के बाहर भी अपनी फसल बेच सकेंगे.
खासकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को डर था कि इन सुधारों से धीरे-धीरे कृषि उपज मंडी समितियां कमजोर हो जाएंगी. इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यावहारिक सुरक्षा खत्म हो सकती है और छोटे किसान बड़ी कंपनियों के सामने कमजोर पड़ जाएंगे.
किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर सिंघु, टिकरी और गाजीपुर में लंबे समय तक डेरा डाला. वहां सामुदायिक रसोई, चिकित्सा सुविधाएं और मंच बनाए गए, जिससे आंदोलन करीब एक साल तक चलता रहा. किसानों ने ट्रैक्टर रैलियां निकालीं, हाईवे जाम किए, गांव-गांव अभियान चलाया और देशव्यापी बंद भी किए.
सरकार ने कई दौर की बातचीत की, लेकिन शुरुआत में कानून वापस लेने से इनकार कर दिया. वहीं पुलिस ने बैरिकेड लगाए, आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया, आपराधिक मामले दर्ज किए और कुछ जगह इंटरनेट भी बंद किया.
नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की. इसके बाद 30 नवंबर 2021 को संसद ने कृषि कानून निरसन अधिनियम पारित किया. इस आंदोलन ने दिखाया कि लगातार संगठन और सरकार पर बने दबाव से मजबूत बहुमत वाली सरकार भी संसद से पारित राष्ट्रीय कानून वापस लेने पर मजबूर हो सकती है.
प्रदर्शन लोकतंत्र की जीवनरेखा हैं
जन आंदोलन भारत की पहचान का एक हिस्सा है. आखिर भारत खुद भी एक ऐसे देशव्यापी आंदोलन से बना, जिसका मकसद आजाद भारत का निर्माण था. जन आंदोलन लोकतंत्र की जीवनरेखा है. जब लोकतंत्र को सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब यही आंदोलन उसे फिर से लोगों के केंद्र में लाते हैं.
दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले और सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत ने बार-बार जन आंदोलनों का सहारा लिया है. यही वह माध्यम रहा है जिसके जरिए हर वर्ग के लोग अपनी जरूरतें, अपनी उम्मीदें और सरकार से अपनी मांगें खुलकर रख सके हैं. प्रदर्शन सत्ता में बैठे लोगों को याद दिलाता है कि वे जनता के प्रति जवाबदेह हैं. जनता ही उन्हें सत्ता तक पहुंचाती है और आखिरकार वे जनता की सेवा करने के लिए ही काम करते हैं.
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