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Sunday, 26 July, 2026
होमदेशयुद्ध में जान गंवाई, लेकिन सैनी सरकार ने 'शहीद' नहीं माना: ब्रिगेडियर के बेटे को HC क्यों जाना पड़ा?

युद्ध में जान गंवाई, लेकिन सैनी सरकार ने ‘शहीद’ नहीं माना: ब्रिगेडियर के बेटे को HC क्यों जाना पड़ा?

लद्दाख में सेवा देने के बाद सेरेब्रल वीनस थ्रोम्बोसिस होने से ब्रिगेडियर अभिमन्यु सिंह राठौड़ का निधन हो गया. उनके बेटे ने मानवीय आधार पर नौकरी मांगी, लेकिन हरियाणा सरकार ने तीन बार इसे अस्वीकार कर दिया.

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गुरुग्राम: हरियाणा के रहने वाले सक्षम राठौड़ के पिता, ब्रिगेडियर अभिमन्यु सिंह राठौड़ भारतीय सेना में सेवा दे रहे थे, जब 30 जुलाई 2023 को चंडीगढ़ के कमांड अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. उन्हें सेरेब्रल वेनस थ्रॉम्बोसिस था, यानी दिमाग में खून का थक्का जम गया था.

उनकी यह बीमारी लेह में शुरू हुई थी, जहां वह पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीनी घुसपैठ के जवाब में सेना के ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के दौरान तैनात थे. जनवरी 2024 में सेना ने उन्हें आधिकारिक तौर पर बैटल कैजुअल्टी घोषित किया.

लेकिन जब बी.कॉम और MBA कर चुके सक्षम ने हरियाणा सरकार की बैटल कैजुअल्टी के आश्रितों के लिए बनी नीति के तहत दया आधार पर सरकारी नौकरी मांगी, तो नायब सिंह सैनी सरकार ने कहा कि उनके पिता की मौत “बीमारी” से हुई थी, युद्धभूमि में नहीं. साथ ही यह भी कहा गया कि वह “शहीद” नहीं थे. उनकी मांग तीन बार खारिज की गई. दो बार 2024 में और एक बार 2025 में.

अब पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया है.

इस महीने की शुरुआत में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के तीनों खारिज करने वाले आदेश रद्द कर दिए और सक्षम की याचिका स्वीकार कर ली. 16 जुलाई के आदेश में जस्टिस निधि गुप्ता ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह 2018 और 2023 की अपनी नीतियों के तहत सक्षम को बैटल कैजुअल्टी क्लास-1 अधिकारी के बेटे के रूप में योग्य माने और उन्हें दया आधार पर नौकरी दे.

सरकार को फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा कि इनकार करने वाले आदेश बिना ठोस कारण बताए गए थे और हर बार अलग-अलग तथा एक-दूसरे से विरोधाभासी वजहें दी गईं. अदालत ने सरकार को आदेश का पालन करने के लिए चार महीने का समय दिया है.

हरियाणा सरकार की दलीलें और अदालत ने क्या कहा

हाई कोर्ट में राज्य सरकार के वकील ने दो दलीलें दीं. पहली, हरियाणा की दया आधार पर नौकरी देने वाली नीति सिर्फ “शहीदों” के आश्रितों पर लागू होती है, “बैटल कैजुअल्टी” के आश्रितों पर नहीं. दूसरी, ब्रिगेडियर राठौड़ की मौत ड्यूटी के दौरान कार्रवाई में नहीं, बल्कि “बीमारी” से हुई थी.

जस्टिस गुप्ता ने दोनों दलीलें खारिज कर दीं.

पहली दलील पर अदालत ने राज्य की नीति के इतिहास को देखा. हरियाणा की 2014 की मूल योजना में “शहीद” शब्द का इस्तेमाल किया गया था. अदालत ने कहा कि सशस्त्र बल आधिकारिक तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि इसमें “राजनीतिक और धार्मिक अर्थ” जुड़े हुए हैं. ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले सैनिकों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता. सेना आधिकारिक तौर पर “बैटल कैजुअल्टी” शब्द का इस्तेमाल करती है.

इसी बात को मानते हुए हरियाणा सरकार ने 2018 में अपनी नीति में बदलाव किया था और साफ तौर पर बैटल कैजुअल्टी के आश्रितों को भी इसका लाभ देने का प्रावधान किया था. 2023 की नई नीति में भी इसे दोबारा शामिल किया गया. इसमें ड्यूटी निभाते समय जान गंवाने वाले कर्मियों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया था. अदालत ने माना कि यह परिभाषा सीधे तौर पर ब्रिगेडियर राठौड़ के मामले पर लागू होती है.

जहां तक सरकार की दूसरी दलील का सवाल है कि ब्रिगेडियर की मौत बीमारी से हुई थी, किसी कार्रवाई में नहीं, इस पर अदालत ने काफी सख्त टिप्पणी की.

जस्टिस गुप्ता ने सरकार के इस दावे को “बेतुका” बताया. उन्होंने कहा कि ब्रिगेडियर राठौड़ को ऊंचाई वाले इलाके में ड्यूटी के दौरान दिमाग में खून का घातक थक्का बना था. चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ऐसी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी के कारण हाइपोक्सिया, शरीर में पानी की कमी और खून का जरूरत से ज्यादा जमना जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

अदालत ने कहा, “अगर इसे बीमारी भी माना जाए, तो यह ऐसी बीमारी थी जो एक सैनिक को सक्रिय युद्ध क्षेत्र में ड्यूटी करते समय हुई.”

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का सीधी और स्पष्ट नीति को “शब्दों के खेल और कानूनी तकनीकी बातों” के जरिए उलझाने वाला रवैया देखकर वह “गहरे दुखी और हैरान” है.

‘यह पहली बार नहीं है’

जस्टिस गुप्ता ने हाई कोर्ट के पहले दिए गए कई फैसलों का भी जिक्र किया. इनमें जय देव बनाम हरियाणा राज्य (2025), जिसे बाद में डिवीजन बेंच ने भी सही माना, रीता सैकिया (2017), मेजर अरविंद कुमार सुहाग (2010) और पुष्पलता (2024) शामिल हैं.

इन सभी फैसलों में एक ही सिद्धांत माना गया था. अगर सेना किसी मौत को बैटल कैजुअल्टी घोषित कर देती है, तो राज्य सरकार उस वर्गीकरण पर सवाल उठाकर लाभ देने से इनकार नहीं कर सकती. साथ ही, कल्याणकारी नीतियों की व्याख्या संकीर्ण नहीं बल्कि उदार तरीके से की जानी चाहिए.

अदालत ने कहा, “राज्य सरकार यह कहने की स्थिति में नहीं है कि मामला कुछ और है.” अदालत ने दोहराया कि बैटल कैजुअल्टी का मतलब सिर्फ ऐसी मौत नहीं है जो सीधे युद्ध या बम धमाके में हुई हो.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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