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Monday, 19 October, 2026
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भारत के नए इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स चीन नहीं बल्कि पाकिस्तान के खिलाफ ज्यादा प्रभावी

सवाल है कि कोई सेना आधुनिक युद्ध की मांगों के मद्देनजर किस स्तर की क्षमता में वृद्धि करे? यह केवल इससे नहीं तय होगा कि युद्धभूमि का स्वरूप कैसा है या दुश्मन कौन है.

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भारतीय सेना ने कई दशकों के बाद हाल में अपने संगठन के सबसे निर्णायक पुनर्गठन की शुरुआत की. उसने चीन का सामना करने वाले XVII माउंटेन स्ट्राइक कोर के अंदर पहले ‘इंटिग्रेटेड बैटल ग्रुप्स’ (IBG) का गठन किया. सेना के पारंपरिक डिवीजनों के मुक़ाबले छोटे और तेज IBG में सेना की इन्फैन्ट्री, आर्मर, आर्टिलरी, एयर डिफेंस, इंजीनियर्स, और सिगनल्स शाखाओं को मिशन के लिहाज से एकीकृत किया गया है और इस ग्रुप के साथ कोर स्तर का फायर सपोर्ट ग्रुप जुड़ा होगा.

लेकिन यह पुनर्गठन ऐसे समय में हुआ है जब ऑपरेशन से संबंधित माहौल बिलकुल बदल गया है और इसमें ड्रोन के जरिए गहरी टोही कार्रवाई की जा रही है, साइबर एवं इलेक्ट्रोनिक युद्ध हो रहे हैं, और लंबी दूरी तक सटीक मार करने वाली मिसाइलों ने रणक्षेत्र का सूचना को लेकर होड़ के कारण विस्तार कर दिया है.

हाल में हुईं लड़ाइयों ने संगठन को लेकर एक विरोधाभास सामने ला दिया है: सामरिक फॉरमेशंस (समूहों) का आकार छोटा होना चाहिए और वे अपना वजूद बचाए रखने के लिए फैले हुए हों, लेकिन यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि मुख्यालय उनका एकीकरण करता रहे.

इससे यह बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि कोई सेना आधुनिक युद्ध की मांग के मद्देनजर किस स्तर की या टोली की क्षमता में वृद्धि करे? इसका जवाब एकीकरण की मांग और मुहिम की कार्रवाइयों के अनुसार तय होगा, केवल इससे नहीं कि युद्धभूमि का स्वरूप कैसा है या दुश्मन कौन है. पाकिस्तान के खिलाफ छोटी, तेज, और तनावपूर्ण मुहिम के लिए तो IBG कोर का ढांचा उपयुक्त होगा लेकिन चीन के मोर्चे पर आज युद्ध की जो गति हो सकती है उसकी मजबूत मांग यह होगी कि IBG के ऊपर एक डिवीज़नल मुख्यालय जरूर रखा जाए.

गति का मतलब

IBG की अवधारणा 2001 में ऑपरेशन पराक्रम के दौरान उजागर हुईं ढांचागत खामियों का सीधा जवाब देती है. उस ऑपरेशन में आक्रमणकारी फॉरमेशन्स को तैयार और सक्रिय  करने में करीब तीन सप्ताह लग गए थे. इसके कारण कूटनीतिक कार्रवाई करने में दिक्कत आई और राजनीतिक तेजी नहीं हासिल की जा सकी. इसके बाद ‘कोल्ड स्टार्ट’ जैसे सिद्धांत आए, जिसके तहत जवाबी कार्रवाई में तेजी लाने की बातें की गईं लेकिन यह बुनियादी चुनौती बनी रही कि तुरंत सक्रियता कैसे लाई जाए और एकीकरण में वृद्धि कैसे की जाए. IBG इस चुनौती का समाधान सेना की शाखाओं को पहले ही एकजुट करके, समूहों को संकट आने से पहले ही उच्च स्तर की तैयारी के साथ सक्रिय करके देता है, जबकि कूटनीति और आम लोगों के बीच प्रचार जारी रहता है.

लेकिन समय बीतने के साथ गति की परिभाषा भी बड़ी हो गई है. अब इसका मतलब सिर्फ सेना के एक फॉरमेशन को तेजी से युद्ध के लिए रवाना करना नहीं रह गया है, इसका अर्थ है दुश्मन की पहचान करके तुरंत फैसला करना, उसकी जवाबी कार्रवाई को झेलते हुए तेजी से आक्रमण करना. आधुनिक जमीनी युद्ध के लिए ऐसी फोर्स चाहिए जो अपना वजूद बचाने के लिए फैल जाए और जीत हासिल करने के लिए एकजुट होकर काम कर सके. मुख्यालय ऐसा चाहिए जो निगरानी की कार्रवाई के सीमित साधन का आवंटन करे, इलेक्ट्रोनिक आक्रमणों में तालमेल कायम करे, भीड़ भरे एयर स्पेस का इस्तेमाल करे, और सामरिक टोही कार्रवाई का ऑपरेशन के तहत हो रहे हमलों से तालमेल बिठाए. संस्थागत फैसले लेने में कई वर्ष लगते हैं  और युद्धक्षेत्र के मद्देनजर बदलाव करने में महीने लग जाते हैं, ऐसे में IBG से जुड़े कमांड ढांचे को लागू करने उसका निरंतर आकलन होते रहना चाहिए.

दुनिया भर के युद्धों के सबक

दूसरी बड़ी सेनाएं भी एकीकरण की इस चुनौती का सीधा सामना कर रही हैं. रूस के ‘बटालियन टैक्टिकल ग्रुप्स’ को निरंतर जारी युद्ध के लिए इन्फैन्ट्री की भारी कमी महसूस हुई और वह बिखरी हुई साबित हुई, जिसके कारण रूस को मजबूरन पारंपरिक रेजीमेंट और डिवीजन के ढांचे फिर से तैयार करने पड़े.

सबक साफ है: सामरिक कार्रवाई के तत्व के आकार और एकीकरण की कोशिश करने वाले मुख्यालयों के आकार मेल नहीं खाते. इस बीच, अमेरिकी सेना ने ‘आर्मी 2030 इनीशिएटिव’ पहल के तहत डिवीजन को बहुक्षेत्रीय ऑपरेशंस के लिए प्राथमिक सामरिक यूनिट के रूप में फिर से बहाल किया है ताकि जमीन, हवा, समुद्र, अंतरिक्ष, और साइबरस्पेस में क्षमताओं का एकीकरण किया जा सके.

यूक्रेन ने शुरू में अस्थायी ग्रुपों द्वारा समन्वय के बूते स्वतंत्र ब्रिगेडों के जरिए लड़ाई लड़ी लेकिन अब वह कई स्थायी कोर का गठन कर रहा है.

ये अलग-अलग उपाय इस एक निष्कर्ष पर पहुंचाते हैं कि एक फॉरमेशन को खत्म करने से एकीकरण की जरूरत नहीं खत्म होती. इससे सिर्फ बड़ी संख्या में स्टाफ का और समन्वय के प्रयासों का तबादला होता है. इसके बाद सेना को यह तय करना पड़ता है कि मुख्यालय को परेशान किए बिना किस समूह की क्षमता का समावेश किया जाए.

विविध मोर्चे

भारत को संगठन संबंधी इस दुविधा का दो स्पष्ट मोर्चों पर सामना करना है, क्योंकि इसके प्रतिद्वंद्वी ऑपरेशन के मामले में अलग-अलग तरह की चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं.

पाकिस्तान के मामले में केंद्रीय समस्या है संक्षिप्तीकरण. मुहिम जानबूझकर छोटी और उथली रखी जाती है और जोरदार कूटनीतिक तथा परमाण्विक दबावों के कारण कुछ ही दिनों के अंदर सीमित मकसद पूरा कर लेने का लक्ष्य रखा जाता है. इस सीमित गुंजाइश के मद्देनजर IBG-कोर वाला ढांचा काफी उपयुक्त होगा, क्योंकि कोर मुख्यालय IBG को सीधे कमांड कर सकता है, और इसके साथ-साथ रिजर्व्स तथा ऑपरेशन के तहत हमलों को कुशलता से संचालित कर सकता है.

लेकिन चीन वाला मोर्चा जटिल तैयारी की मांग करता है. उसकी सीमा पर वास्तविक नियंत्रण रेखा ऐसे विशाल, अलग-अलग क्षेत्रों से गुजरती है जहां आना-जाना प्रतिबंधित है. हरेक फॉरमेशन के लिए अत्याधुनिक निगरानी व्यवस्था, इलेक्ट्रोनिक युद्ध, विमानन, और स्पेशल संभार तंत्र को दोहराना आर्थिक रूप से और संभार व्यवस्था के लिहाज से संभव नहीं है. पहाड़ी क्षेत्र में युद्ध के शुरुआती चरण के लिए IBG उपयुक्त तो है, जहां ऑपरेशन सड़कों और घाटियों से होकर किया जाता है और युद्ध आगे बढ़ता है तो कमांड-कंट्रोल ज्यादा जटिल होता जाता है. एक IBG सफल होता है और दूसरा विफल हो जाता है, हमले का निशाना बदल जाता है, इंजीनियरों की अलग से तैनाती की जाती है, एयर डिफेंस की प्राथमिकता बदली जाती है, और संभार तंत्र मूल योजना पर ज़ोर देने की जगह सफलता पर ज़ोर देने लगता है.

भौगोलिक विस्थापन, समर्थक क्षमताओं की विविधता, संसाधन के बार-बार स्थानांतरण, और आवश्यक स्तर के संयुक्त एकीकरण के लिए विशाल स्टाफ चाहिए. ऑर्गेनिक क्षमताओं के साथ सेना के पांच समूहों का संयुक्त मोर्चा कमांड के लिए एक समस्या है. अलग-अलग पहाड़ी इलाकों में बिखरे पांच फॉरमेशंस, जो सीमित निगरानी व्यवस्था, गोला-बारूद, इलेक्ट्रोनिक युद्ध, एयर डिफेंस, और विमानन व्यवस्था हासिल करने के लिए होड़ करते हैं, तो यह दूसरी समस्या है. चीनी मोर्चे पर बहुक्षेत्रीय ऑपरेशन के लिए उच्च स्तरीय तालमेल चाहिए क्योंकि वहां स्पेस, साइबर, इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक और गहरी मार करने वाली क्षमताएं कोर स्तर से ऊपर की हैं.

सेना में थिएटरीकरण का जो प्रस्ताव सरकार के सामने है उसमें उत्तरी थिएटर कमांड को उस स्तर का बनाया जाएगा जिस स्तर पर संयुक्त एवं राष्ट्रीय साधन आवंटित किए जाते हैं. यह कोर के लिए नया ‘इंटरफेस’ तैयार करेगा जिसकी अपनी मांगें होंगी जिन्हें कोर को पूरा करना होगा. थिएटर का मुख्यालय साधनों का आवंटन करेगा, लेकिन सेना के एक फॉरमेशन को उन्हें समाहित करना बाकी है.

मोर्चों के बीच तुलना काफी कुछ बताता है: चीनी सेना का पश्चिमी थिएटर कमांडर रॉकेट फोर्स, साइबरस्पेस, एरोस्पेस, और सूचना व्यवस्था पर प्रत्यक्ष कमांड रखता है, जबकि भारतीय कमांडर को तीनों सेना की एजेंसियों और राष्ट्रीय अधिकारियों के कब्जे में जो साधन हैं उनके लिए उनसे तालमेल करना पड़ता है. बहुक्षेत्रीय ऑपरेशन कोर मुख्यालयों पर उनकी जिम्मेदारियों के अतिरिक्त ऐसे समय में ऊपर से बोझ डालते हैं जब IBG का ढांचा निचले स्तर पर सामरिक जिम्मेदारियों का बोझ डालता है.

फुटप्रिंट्स की कमजोरियां

इन सामरिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए कोर मुख्यालय के विस्तार से इसके भौतिक और इलेक्ट्रोनिक फुटप्रिंट्स में वृद्धि होगी. अतिरिक्त स्टाफ, संचार के केंद्रों, और डाटा सिस्टम्स को इकट्ठा करने से इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक उत्सर्जन होगा जो, एक अमेरिकी अध्ययन के मुताबिक, आधुनिक टोही व्यवस्था और सटीक निशानेबाजी की क्षमता के कारण काफी कमजोरी पैदा करेगा.

चीनी सेना के ऑपरेशन का सिद्धांत प्रतिद्वंद्वी के लड़ाकू समूह से ज्यादा उसके कमांड और सेन्सिंग नेटवर्क को नष्ट करने पर ज़ोर देता है इसलिए इस एक उभरे हुए कोर केंद्र को नाकाम करने पर मोर्चे तैनात सभी IBG से तुरंत संपर्क टूट जाएगा. मुख्यालयों को छोटे केंद्रों में बांटने से भौतिक खतरा तो दूर हो जाएगा लेकिन संचार नेटवर्क पर दबाव बढ़ेगा.

डिवीजन के पुनर्गठन की जरूरत

डिवीजन दोनों चुनौतियों का समाधान करता है और जरूरी नहीं कि उन्हें पारंपरिक, सुस्त स्वरूप में रखा जाए. युद्ध के लिए छोटा, गतिशील, और अनुशासित मुख्यालय दो या तीन IBG को कमांड कर सकता है, आपस में जुड़े इलाकों में तात्कालिक लड़ाई लड़ते हुए एक साथ सामरिक खुफियागीरी और आक्रमण कर सकता है और इलेक्ट्रोनिक युद्ध, एयर डिफेंस, इंजीनियरिंग तथा संभार व्यवस्था के बीच समन्वय कर सकता है. यह कोर को रोज-रोज के सामरिक प्रबंधन की ज़िम्मेदारी से बचा सकता है. तब कोर ऑपरेशन संबंधी मुहिम चलाने के लिए मुक्त हो जाएगा यानी मुख्य प्रयास, सघन युद्ध, फायर सपोर्ट ग्रुप, संयुक्त कार्रवाई, रिजर्व्स, और थिएटर मुख्यालय के साथ मिलकर बहुक्षेत्रीय ऑपरेशन्स को आगे बढ़ा सकेगा.

कार्रवाई करने वाले छोटे फॉरमेशन्स और मध्यवर्ती मुख्यालय एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक होंगे, छोटे फॉरमेशन्स सामरिक गति प्रदान करेंगे और मध्यवर्ती मुख्यालय ऑपरेशन को सुसंगत बनाएंगे. सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियां यह स्पष्ट नहीं करतीं कि XVII माउंटेन स्ट्राइक कोर में चार IBG होंगे या पांच, हालांकि वे यह पुष्टि करती हैं कि एक अलग फायर सपोर्ट ग्रुप सीधे कोरमुखयालय के अधीन होगा. उस मुख्यालय का आंतरिक ढांचा स्पष्ट नहीं किया गया है लेकिन स्पेशलिस्ट स्टाफ और मजबूत डाटा व्यवस्था से लैस नवगठित कोर मुख्यालय इन नयी जिम्मेदारियों को निभा सकता है. इस प्रस्ताव की कड़ी परीक्षा अभ्यासों और ‘सिमुलेशन’ के दौरान होगी.

क्या टोली का स्वरूप एकीकरण की मांगों और मुहिम के मद्देनजर बनाया जाना चाहिए? सबसे छोटी टोली कैसी हो सकती है, जो एक विशेष थिएटर की मांग के अनुरूप क्षमताओं का एकीकरण कर सके और उस पर ज्यादा बोझ भी न पड़े ?

थिएटर के गठन और टोली को लेकर बहस ऐसा सवाल है जिसे विभिन्न स्तरों के लिहाज से उठाया जाता है, कि एकीकरण किस स्तर पर प्रभावी होगा. इस तर्क से, चीन के मोर्चे पर डिवीजन वाली व्यवस्था को खत्म करने से ज्यादा उसे बनाए रखने की जरूरत दिखती है. आधुनिक युद्ध की जटिलताएं ऊपरी स्तर पर एकीकरण की जरूरत पर ज़ोर दे रही हैं, जबकि वजूद का सवाल मुख्यालयों को फैले हुए केंद्रों की ओर आगे बढ़ने की जरूरत पर जोर दे रहा है. जाहिर है, डिवीजन का मामला इन दो दबावों के बीच फंसा है और यह कहता है कि जो सेना अपने पंजे सटीक बनाना चाहती है उसे ऐसे मुख्यालयों की भी जरूरत होगी जो उन्हें कमांड कर सकें.

ब्रिगेडियर अनिल रमन (रिटायर्ड) ‘दि तक्षशिला इंस्टीट्यूशन’ में रिसर्च फेलो हैं. वे @8Gorkhascholar पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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