बारह अक्टूबर को हुई दो घटनाओं ने बांग्लादेश की आर्थिक और रणनीतिक नीतियों में विरोधाभास को सामने ला दिया. एक तरफ, सबसे कम विकसित देश (LDC) का दर्जा हासिल करने के बाद बांग्लादेश ने भारत से मांग की है कि उसके सामान के निर्यात पर बिना शुल्क की सुविधा जारी रखी जाए. दूसरी तरफ, उसने मोंगला बंदरगाह को आधुनिक बनाने के लिए चीन से 33.58 करोड़ डॉलर का कर्ज लेने का समझौता किया है. यह बंदरगाह भारतीय सीमा से केवल 80 किलोमीटर दूर है.
इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग देखें तो इनमें कुछ भी असामान्य नहीं लगता. बांग्लादेश को अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने, विदेशी निवेश हासिल करने और दूसरे देशों के साथ अपने रिश्ते बढ़ाने का पूरा अधिकार है, लेकिन जब इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखा जाता है, तो एक बुनियादी सवाल उठता है. क्या बांग्लादेश अपने लिए ज़रूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए चीन पर ज्यादा निर्भर होते हुए भारत पर अपनी भौगोलिक और आर्थिक निर्भरता को नजरअंदाज कर सकता है?
बांग्लादेश के लिए बेहतर होगा कि वह ऐसे रिश्तों में फर्क समझे, जो उसे तुरंत पैसा उपलब्ध कराते हैं और उन रिश्तों में भी, जो उसकी लंबे समय की खुशहाली, स्थिरता और सुरक्षा के लिए ज़रूरी हैं.
LDC का दर्जा और आर्थिक समझदारी की जरूरत
बांग्लादेश को 24 नवंबर 2026 को सबसे कम विकसित देश (LDC) का दर्जा मिलने वाला है. यह उसकी अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम पड़ाव होगा, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियां भी आएंगी. दूसरे देशों के साथ हुए ऐसे व्यापार समझौतों से, जिनमें बांग्लादेश के सामान पर कम या कोई शुल्क नहीं लगता, उसके निर्यात पर निर्भर उद्योगों को काफी मदद मिली है. इनमें खास तौर पर कपड़ा और रेडीमेड कपड़ों का उद्योग शामिल है. लेकिन अब धीरे-धीरे ऐसी सुविधाएं कम होती जाएंगी.
बांग्लादेश ने अनुरोध किया है कि उसे नए दर्जे के लिए तैयार होने का ज्यादा समय दिया जाए. इस पर फैसला करने का अधिकार संयुक्त राष्ट्र के पास है. इसके साथ ही उसने भारत से भी अपील की है कि LDC का दर्जा मिलने के बाद भी उसे व्यापार में पहले की तरह तरजीह दी जाती रहे.
व्यापार से जुड़े मुद्दों पर 8-9 अक्टूबर को नई दिल्ली में बांग्लादेश-भारत संयुक्त कार्यकारी समूह की 16वीं बैठक हुई. इसमें बांग्लादेश ने मांग की कि भारतीय जमीनी बंदरगाहों के जरिए उसके सामान के निर्यात पर लगी पाबंदियों में ढील दी जाए, एंटी-डंपिंग शुल्क हटाया जाए और नेपाल तथा भूटान के बाजारों तक पहुंचना आसान बनाया जाए.
बांग्लादेश की इन मांगों के पीछे वजह भी है. भारत उसके पड़ोस में मौजूद एक बड़ा बाजार है. भारत के साथ व्यापार करने से परिवहन का खर्च कम होता है और बांग्लादेश के सामान दूसरे देशों के सामान के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनते हैं. लेकिन भारत की ओर से एकतरफा तौर पर दी जाने वाली व्यापार की खास सुविधाएं अनिश्चित समय तक जारी नहीं रह सकतीं. बांग्लादेश को यह समझना होगा कि भारत के भी अपने जायज व्यापारिक हित हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी है.
LDC का दर्जा मिलने के बाद दोनों देश आपसी सहमति, पारदर्शिता और दोनों को आर्थिक फायदा पहुंचाने के सिद्धांत पर व्यापार की नई व्यवस्था बना सकते हैं.
व्यापार दोनों तरफ से होना चाहिए
बांग्लादेश के राष्ट्रीय राजस्व बोर्ड के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में बांग्लादेश ने भारत को 1.75 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि भारत से 10.96 अरब डॉलर का सामान आयात किया. दोनों देशों के बीच व्यापार में यह एक बड़ा अंतर है. हालांकि, व्यापार घाटा होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि व्यापार गलत या अनुचित तरीके से हो रहा है.
भारत बांग्लादेश को कपास, धागा, मशीनें, रसायन और दूसरे ऐसे सामान निर्यात करता है, जिनका इस्तेमाल आगे दूसरे उत्पाद बनाने में होता है. इससे बांग्लादेश के कारखानों और निर्यात पर निर्भर उद्योगों को मदद मिलती है.
फिर भी, बांग्लादेश भारत के सामान पर ऐसी पाबंदियां जारी रखते हुए भारतीय बाजारों में अपने सामान के लिए खुली पहुंच की उम्मीद नहीं कर सकता, जिन्हें आसानी से हटाया जा सकता है.
भारत ने शिकायत की है कि बांग्लादेश उसके फलों, चावल, लोहे और इस्पात समेत दूसरे सामान पर ऊंचा आयात शुल्क लगाता है. भारत ने उत्तर-पूर्वी राज्यों में सीमा पर मौजूद चौकियों के जरिए होने वाले व्यापार पर लगी पाबंदियों को लेकर भी चिंता जताई है.
उत्तर-पूर्व की कई व्यापारिक चौकियों पर ‘पॉजिटिव लिस्ट सिस्टम’ लागू है. इसमें केवल सूची में शामिल सामान के व्यापार की अनुमति होती है. इसके मुकाबले पश्चिम बंगाल के रास्ते व्यापार में ज्यादा छूट है, जहां ‘नेगेटिव लिस्ट सिस्टम’ लागू है. इसमें सूची में शामिल प्रतिबंधित सामान को छोड़कर दूसरे सामान का व्यापार किया जा सकता है. यह अंतर खास तौर पर भेदभाव करने वाला है.
बांग्लादेश को धीरे-धीरे इन असमानताओं को खत्म करना चाहिए. भारत बांग्लादेश के कपड़ों और दूसरे ऐसे सामान को अपने बाजार में खास सुविधा देने पर विचार कर सकता है, जिनके उत्पादन में ज्यादा लोगों की जरूरत होती है, लेकिन इसके लिए बांग्लादेश को भी बदले में सहयोग दिखाना होगा. उसे आयात शुल्क में उचित कमी करनी होगी, सीमा शुल्क से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाना होगा, सामान के मानकों को सरल करना होगा और गैर-शुल्क वाली व्यापारिक रुकावटों को कम करना होगा.
आपसी सहयोग का मतलब यह नहीं है कि हर सामान पर दोनों देशों को एक जैसा शुल्क लगाना होगा या पैसों के हिसाब से दोनों देशों के व्यापार को बराबर करना होगा. इसका मतलब यह है कि दोनों देशों को व्यापार बढ़ाने के उचित अवसर मिलने चाहिए.
सीमा पर लगने वाले हाट फिर शुरू हों: छोटी पहल, बड़े फायदे
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में आई गिरावट का एक दुखद नतीजा यह हुआ है कि सीमा पर लगने वाले हाट यानी स्थानीय बाज़ारों की व्यवस्था बिगड़ गई है. खास तौर पर मेघालय और त्रिपुरा की सीमाओं पर लगने वाले ये पारंपरिक बाज़ार सदियों से स्थानीय लोगों की मदद करते आए हैं. इन इलाकों के लोगों के आर्थिक और सांस्कृतिक रिश्ते अंतरराष्ट्रीय सीमाएं तय होने से पहले से चले आ रहे हैं.
इन बाज़ारों का महत्व केवल छोटी-मोटी खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है.
ये हाट लोगों की रोजी-रोटी का जरिया थे. यहां खेती से मिलने वाली उपज और हाथ से बनी चीजें बेचने के लिए आसानी से बाज़ार मिल जाता था. इनसे तस्करी को रोकने में भी मदद मिलती थी और दोनों तरफ के पड़ोसी समुदायों के लोगों को नियमित रूप से मिलने-जुलने का मौका मिलता था.
भारत और बांग्लादेश ने ऐसे चार बाज़ार शुरू किए थे और इनका विस्तार करने की व्यवस्था बनाने पर सहमति जताई थी. अब इन्हें दोबारा शुरू करना प्राथमिकता होनी चाहिए.
दोनों सरकारों को पहले से मौजूद ऐसे हाटों को फिर से चालू करना चाहिए, जहां यह संभव है. उन्हें ऐसे और स्थानों की पहचान करनी चाहिए, जहां नए बाज़ार लगाए जा सकें. साथ ही, व्यापार के साफ और पारदर्शी नियम लागू करने चाहिए और इन बाजारों को बड़े आर्थिक कामकाज से जोड़ना चाहिए.
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में ये सीमावर्ती हाट लोगों को रोजगार और कमाई का साधन दे सकते हैं. इससे उनका भरोसा भी बढ़ सकता है. बांग्लादेश के लिए ये पास के भारतीय बाज़ारों तक सीधे पहुंचने का रास्ता हैं. इसके लिए बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च करने की जरूरत नहीं है. थोड़े से निवेश से कम लागत पर समाज को बड़े फायदे मिल सकते हैं.
भूगोल: बांग्लादेश की सबसे बड़ी रणनीतिक सच्चाई
बांग्लादेश की भारत के साथ 4,000 किलोमीटर लंबी जमीनी सीमा है. वह तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है, जबकि बंगाल की खाड़ी उसे समुद्र के रास्ते व्यापार करने की सुविधा देती है. चीन के पास बड़ी आर्थिक और सैन्य ताकत है, लेकिन बांग्लादेश की उसके साथ कोई जमीनी सीमा नहीं लगती. यह भौगोलिक अंतर बुनियादी महत्व रखता है.
नेपाल और भूटान तक जमीन के रास्ते पहुंचने के लिए बांग्लादेश को भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरना पड़ता है. क्षेत्र में सामान पहुंचाने और लाने के एक बड़े केंद्र के रूप में बांग्लादेश की संभावनाएं भी काफी हद तक भारत के सहयोग पर निर्भर करती हैं.
दोनों देशों के बीच भाषा की समानता, साझा ऐतिहासिक अनुभव, परिवारों के आपसी संबंध, खानपान और सांस्कृतिक नजदीकियां भी उतनी ही अहम हैं. ये संबंध अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों तरफ लोगों को जोड़ते हैं.
1971 में बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान भारतीय सैनिकों और बांग्लादेश के मुक्ति योद्धाओं ने मिलकर बलिदान दिया था. यह इतिहास दोनों देशों के रिश्तों का एक अहम आधार है. कोई दूसरा निवेश इन सभी फायदों की बराबरी नहीं कर सकता.
चीन किसी बंदरगाह के निर्माण के लिए पैसा दे सकता है, राजमार्ग बनवा सकता है या उद्योगों के लिए मशीनें और दूसरे सामान उपलब्ध करा सकता है. लेकिन वह भारत और बांग्लादेश के बीच रोज होने वाले आर्थिक और सामाजिक संपर्क की बराबरी नहीं कर सकता.
भूगोल ऐसी सच्चाई बनाता है, जो लंबे समय तक बनी रहती है. इसके उलट, देशों की कूटनीतिक प्राथमिकताएं अक्सर बदलती रहती हैं.
जल सुरक्षा: सामने खड़ा बड़ा संकट
बांग्लादेश के लिए बंदरगाहों का विकास नहीं, बल्कि मीठे पानी की उपलब्धता और उसका सही प्रबंधन शायद लंबे समय की सबसे बड़ी चुनौती बनने वाला है. बांग्लादेश उन देशों में शामिल है, जिन्हें जलवायु और पानी से जुड़े बदलावों का सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है.
यहां बहुत बड़ी आबादी नदी के डेल्टा वाले इलाके में रहती है. इस इलाके को एक तरफ ज्यादा बारिश के कारण बाढ़ का सामना करना पड़ता है, तो दूसरी तरफ सूखे मौसम में मीठे पानी की कमी हो जाती है. ये दोनों समस्याएं एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन दोनों ही बड़ी चुनौती पैदा करती हैं.
समुद्र का जलस्तर बढ़ने, खारा पानी जमीन और नदियों में घुसने, नदी के किनारों के कटने, नदियों में गाद जमा होने और जमीन के नीचे मौजूद पानी के प्रदूषित होने से यह संकट और गंभीर हो रहा है.
भारत और बांग्लादेश की सीमाओं के आर-पार 54 नदियां बहती हैं. गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियां बांग्लादेश की खेती, देश के भीतर नावों से सामान लाने-ले जाने, मछली पालन और मीठे पानी की उपलब्धता के लिए बहुत अहम हैं.
जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून और नदियों में पानी के बहाव में मौसम के हिसाब से होने वाले बदलाव इस संकट को और गंभीर बना सकते हैं.
मीठे पानी की कमी बांग्लादेश के लिए सिर्फ खेती की समस्या नहीं है. इससे बाढ़ का खतरा, पीने के पानी की उपलब्धता, औद्योगिक विकास और लाखों लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है.
बांग्लादेश के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में खारे पानी का घुसना खास तौर पर चिंता की बात है. इससे खेती और घरों में इस्तेमाल के लिए मीठे पानी की कमी हो रही है. आगे चलकर इन समस्याओं के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ सकता है.
इसलिए बांग्लादेश की भविष्य की आर्थिक सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह पानी से जुड़े मुद्दों पर दूसरे देशों के साथ कैसे बातचीत करता है और विदेशी निवेश का इस्तेमाल किस तरह करता है.
बांग्लादेश की जल सुरक्षा में भारत क्यों अहम है
गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई संधि दिसंबर 2026 में खत्म हो जाएगी. इस संधि को आगे बढ़ाना दोनों देशों के लिए तुरंत ध्यान देने वाला कूटनीतिक मुद्दा है.
तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे का प्रस्ताव भी कई साल से अटका हुआ है. इससे पता चलता है कि दोनों देशों के बीच पानी की जरूरतों को लेकर किस तरह मतभेद बने हुए हैं. इसके साथ ही, दोनों देशों के भीतर पानी की अपनी-अपनी जरूरतें भी इस मामले को मुश्किल बनाती हैं.
बांग्लादेश को यह समझना होगा कि भारत से होकर बहने वाली नदियों के पानी के बंटवारे में चीन भारत की जगह नहीं ले सकता.
चीन बांध बनाने, नदियों से गाद निकालने, पानी जमा करने के लिए भंडार बनाने और नदी प्रबंधन से जुड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए पैसा दे सकता है. वह ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी हिस्से से पानी के बहाव की जानकारी देने में भी भूमिका निभा सकता है.
लेकिन चीन की कोई भी इंजीनियरिंग परियोजना सूखे मौसम में बांग्लादेश को तीस्ता या गंगा से ज्यादा पानी नहीं दे सकती. इसके लिए बांग्लादेश को भारत से ही बातचीत करनी होगी.
इसलिए दोनों देशों के बीच बातचीत सिर्फ पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. उन्हें नदी घाटियों के पूरे क्षेत्र का मिलकर प्रबंधन करने, बाढ़ आने से पहले चेतावनी देने, नदियों में गाद के प्रबंधन, मौसम के हिसाब से पानी के बहाव, नदियों की देखभाल और जलवायु परिवर्तन के अनुसार जरूरी बदलाव करने जैसे मुद्दों पर भी बात करनी चाहिए.
भारत को भी बांग्लादेश की पानी से जुड़ी जायज जरूरतों को समझना चाहिए और अपने राज्यों के हितों का ध्यान रखते हुए उचित व्यवस्था करनी चाहिए.
गंगा के पानी को लेकर संधि आगे बढ़ाने पर होने वाली बातचीत दोनों देशों को एक और मौका देगी. वे समय-समय पर उठने वाले विवादों को सुलझाने के लिए लंबे समय तक सहयोग करने की व्यवस्था बना सकते हैं.
इसलिए, पानी की सुरक्षा के मामले में बांग्लादेश का भारत के साथ सहयोग करना केवल उम्मीद की बात नहीं है, बल्कि दोनों देशों की भौगोलिक स्थिति के कारण जरूरी भी है.
मोंगला बंदरगाह: विकास या रणनीतिक गलती?
चीन के साथ हुए नए वित्तीय समझौते के तहत बांग्लादेश के दूसरे सबसे बड़े समुद्री बंदरगाह मोंगला के विस्तार और उसे आधुनिक बनाने के लिए करीब 33.58 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया जा रहा है.
इस योजना के तहत दो कंटेनर टर्मिनल बनाए जाएंगे. कंटेनरों को संभालने और उनके इस्तेमाल के लिए सुविधाएं तैयार की जाएंगी. इनके साथ जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर भी बनाया जाएगा.
इस कर्ज पर 2 प्रतिशत ब्याज लगेगा और इसे 20 साल में चुकाना होगा. भुगतान की अवधि को पांच साल तक और बढ़ाया जा सकता है. पहली नजर में ये शर्तें अच्छी लगती हैं.
मोंगला बंदरगाह को आधुनिक बनाने की जरूरत भी है. वहां सामान लाने-ले जाने की बेहतर सुविधाएं बनने से बांग्लादेश का समुद्री व्यापार बढ़ सकता है, उद्योगों को बढ़ावा मिल सकता है और चट्टोग्राम बंदरगाह पर दबाव कम हो सकता है.
लेकिन यह फैसला रणनीतिक रूप से इसलिए भी अहम हो गया है, क्योंकि इससे पहले बांग्लादेश ने मोंगला के पास भारत के सहयोग से आर्थिक क्षेत्र बनाने की योजना रद्द कर दी थी.
अधिकारियों के अनुसार, यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि इस परियोजना के लिए चुना गया विकासकर्ता अपना काम धीमी गति से कर रहा था.
भारत की पहल को पूरी तरह रद्द करने के बजाय बांग्लादेश इस परियोजना को नया रूप दे सकता था. वह दूसरे भारतीय निवेशकों को इसमें शामिल कर सकता था या दोनों देशों के साझा निवेश से उद्योगों और सामान की आवाजाही के लिए एक गलियारा बना सकता था.
भारत और बांग्लादेश के बीच पहले से ही एक समझौता है, जिसके तहत भारत मोंगला और चट्टोग्राम बंदरगाहों का इस्तेमाल खास तौर पर अपने उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए सामान लाने-ले जाने में कर सकता है.
भारत के सहयोग से तैयार इस व्यापारिक व्यवस्था से बंदरगाह पर सामान की आवाजाही बढ़ सकती थी और क्षेत्रीय संपर्क मजबूत हो सकता था. साथ ही, इस व्यवस्था पर नियंत्रण बांग्लादेश के पास ही रहता.
इस तरह बांग्लादेश ने सिर्फ भारतीय निवेश का मौका नहीं गंवाया, बल्कि बंदरगाह के विकास को उन क्षेत्रीय बाजारों से जोड़ने का अवसर भी खो दिया, जहां तक पहुंचना सबसे आसान है.
क्या मोंगला में चीनी निवेश से भारत को खतरा है?
चीन के साथ हुए समझौते से भारत के रणनीतिक मामलों से जुड़े लोगों में चिंता पैदा होना स्वाभाविक है, लेकिन इस खतरे का आकलन वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए.
किसी व्यापारिक बंदरगाह के लिए पैसा देने से चीन को अपने आप वहां सैन्य अड्डा बनाने या बंदरगाह के कामकाज पर नियंत्रण करने का अधिकार नहीं मिल जाता.
फिलहाल ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है कि मोंगला बंदरगाह के लिए दिए जा रहे कर्ज के समझौते में वहां चीनी नौसैनिक अड्डा बनाने की कोई शर्त शामिल है.
फिर भी, समुद्र से जुड़े संवेदनशील इन्फ्रास्ट्रक्चर में चीन की लंबे समय तक मौजूदगी उसे कई तरह की जानकारी हासिल करने का मौका दे सकती है. इसमें व्यापार से जुड़ी गोपनीय जानकारी, जहाजों की आवाजाही का ब्योरा और समुद्र के सर्वेक्षण से जुड़ी जानकारी शामिल है. इससे चीन को भविष्य में इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े फैसलों पर असर डालने का मौका भी मिल सकता है.
ऐसे खतरे तब ज्यादा बढ़ जाते हैं, जब आर्थिक मदद के बदले लंबे समय तक बंदरगाह चलाने के अधिकार या दूसरी रणनीतिक सुविधाएं देने की शर्तें जुड़ी हों.
इसलिए भारत को तत्काल खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर देखने के बजाय इन घटनाओं पर सावधानी से नजर रखनी चाहिए.
बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना की मौजूदगी, समुद्री क्षेत्र पर नजर रखने की उसकी क्षमता और भारत की भौगोलिक स्थिति उसे काफी फायदा देती है.
इसके अलावा, मोंगला बंदरगाह का कामकाज पशुर नदी में जहाजों की आवाजाही की स्थिति और उसके आसपास के व्यापारिक इलाके पर निर्भर करता है. सिर्फ भारत के पास होने से यह बंदरगाह अपने आप सैन्य इस्तेमाल के योग्य नहीं हो जाता.
भारत को किसी तुरंत पैदा होने वाले सैन्य खतरे से ज्यादा इस बात की चिंता करनी चाहिए कि चीन का रणनीतिक प्रभाव भविष्य में बढ़ सकता है.
कर्ज का जाल
कर्ज पर कम ब्याज होने का मतलब यह नहीं है कि वह आर्थिक रूप से हमेशा फायदेमंद होगा.
कर्ज फायदेमंद है या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करता है. जैसे, परियोजना से कितनी कमाई होगी, कर्ज किस मुद्रा में चुकाना होगा, निर्माण पर कितना खर्च आएगा, रखरखाव में कितना पैसा लगेगा और कर्ज लेने वाले देश की कुल आर्थिक स्थिति कैसी है.
बांग्लादेश के पास सरकारी राजस्व सीमित है. उसे बड़े आर्थिक दबावों, बैंकिंग क्षेत्र की कमजोरियों, महंगाई और वित्तीय संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ रहा है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के जनवरी 2026 के आकलन के अनुसार, बांग्लादेश को विदेशी और दूसरे कर्जों से जुड़े सामान्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है. किसी आर्थिक झटके या संकट को झेलने की उसकी क्षमता भी सीमित है.
इसका मतलब यह नहीं है कि बांग्लादेश चीन के कर्ज के जाल में फंस चुका है या मोंगला बंदरगाह का कर्ज उसके लिए बहुत भारी साबित होगा. फिर भी, भविष्य में पैदा होने वाली मुश्किलों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है.
अगर बंदरगाह से होने वाली कमाई उम्मीद से कम रहती है, निर्माण का खर्च बढ़ जाता है या चीनी मुद्रा रेनमिन्बी के मुकाबले बांग्लादेशी टका की कीमत गिर जाती है, तो कर्ज चुकाने का बोझ बढ़ जाएगा.
कर्ज चुकाने की अवधि पांच साल बढ़ाने से मूलधन का भुगतान कुछ समय के लिए टल सकता है, लेकिन इससे कुल देनदारियां कम नहीं होंगी.
कर्ज के समझौते में विवाद सुलझाने की प्रक्रिया, सरकार की गारंटी, तय कंपनियों से सामान खरीदने की शर्तें, गोपनीयता, कर्ज को दोबारा वित्तीय मदद से चुकाने की संभावना और दूसरे संबंधित समझौते भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.
‘एडडाटा’ के शोध में चीन की ओर से दूसरे देशों को दिए गए कर्जों के समझौतों में गोपनीयता की शर्तों, भुगतान की सुरक्षा और कर्ज देने वाले की स्थिति मजबूत करने वाली शर्तों की पहचान की गई है.
मोंगला बंदरगाह के समझौते में भी ऐसी शर्तें हैं या नहीं, इसका पता तभी चलेगा जब समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी.
इसलिए बांग्लादेश को इस परियोजना का स्वतंत्र व्यापारिक आकलन करवाना चाहिए और समझौते की अहम शर्तों को सार्वजनिक करना चाहिए.
हंबनटोटा से मिले सबक याद रखें
श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इस बात का उदाहरण है कि जब इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की बड़ी योजनाएं व्यापार और पैसों से जुड़ी वास्तविकताओं को ध्यान में रखे बिना बनाई जाती हैं, तो क्या हो सकता है.
चीन के कर्ज से शुरू की गई इस परियोजना को व्यापार के मामले में मुश्किलों का सामना करना पड़ा. 2017 में श्रीलंका ने इस बंदरगाह के व्यावसायिक अधिकार चीन की कंपनी चाइना मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स को 99 साल की लीज पर दे दिए.
इससे श्रीलंका को यह सबक मिला कि अगर किसी देश का इन्फ्रास्ट्रक्चर आर्थिक रूप से कमजोर हो और उससे पर्याप्त कमाई न हो, तो उस देश को अपनी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संपत्ति पर लंबे समय के व्यापारिक अधिकार छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.
अगर बांग्लादेश इस संभावना को पूरी तरह खारिज करता है, तो यह उसकी गलती होगी.
उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि मोंगला बंदरगाह पर सामान की आवाजाही इतनी हो कि निवेश से होने वाला फायदा उचित लगे. कर्ज से जुड़ी देनदारियां भी तय सीमा में रहें. साथ ही, अगर भविष्य में आर्थिक मुश्किलें आती हैं, तो कोई उनका फायदा उठाकर बांग्लादेश से व्यापारिक या रणनीतिक रियायतें न ले सके.
हंबनटोटा का असली सबक यह है कि जिन इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का सही आकलन नहीं किया जाता, वे किसी देश की अपने आर्थिक फैसले खुद लेने की आजादी को गंभीर रूप से सीमित कर सकती हैं.
चीन के कर्ज: खतरे की घंटी
इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए चीन से मिलने वाले कर्ज की मदद से कई विकासशील देशों में उपयोगी संपत्तियां बनाई गई हैं. लेकिन चीन का अनुभव यह भी दिखाता है कि बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के लिए जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं.
लाओस इसका एक अहम उदाहरण है. इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के बड़े वादों और विदेशों से लिए गए भारी कर्ज के कारण वहां कर्ज का बोझ बढ़ गया. इसके चलते लाओस को चीन का कर्ज चुकाने में देरी हुई. IMF लगातार आकलन करता रहा है कि लाओस पर कर्ज का बोझ असहनीय हो गया है.
चीन के कर्ज से बने मोंटेनेग्रो के राजमार्ग की परियोजना ने भी ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के खतरों को सामने रखा, जिन पर बहुत ज्यादा खर्च होता है लेकिन उनसे पर्याप्त आर्थिक फायदा मिलने की उम्मीद नहीं होती.
इस परियोजना से आर्थिक दबाव इतना बढ़ गया कि आगे का निर्माण जारी रखने के फैसले पर दोबारा विचार करना पड़ा.
मलेशिया ने ईस्ट कोस्ट रेल लिंक परियोजना पर जिस तरह दोबारा विचार किया, उससे भी एक अहम सबक मिलता है. चीन से कर्ज लेने वाले देशों के लिए जरूरी नहीं है कि वे चीनी कंपनियों की ओर से बताई गई कीमत और समझौते की शुरुआती शर्तों को बिना सवाल किए स्वीकार कर लें.
इन अनुभवों से पता चलता है कि परियोजना का सही चुनाव करना, खरीदारी में पारदर्शिता रखना, कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी समझना, बड़े कर्जदाताओं पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न होना और बातचीत में अपनी स्थिति मजबूत रखना कितना जरूरी है.
अगर किसी परियोजना में पैसा देने, निर्माण करने, मशीनें और सामान खरीदने तथा आगे उसका संचालन करने का पूरा काम चीनी कंपनियों के हाथ में हो, तो कर्ज लेने वाले देश को अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा पर खास ध्यान देना चाहिए.
बांग्लादेश को कोई नया समझौता करने से पहले दूसरे देशों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए.
भारत की ‘पड़ोस पहले’ नीति: एक विकल्प
भारत की ‘पड़ोस पहले’ नीति इस सोच पर आधारित है कि भारत की अपनी सुरक्षा और खुशहाली उसके पड़ोसी देशों की सुरक्षा और खुशहाली से जुड़ी हुई है.
बांग्लादेश उन देशों में शामिल है, जिन्हें भारत के विकास में साझेदारी करने से काफी फायदा मिला है.
भारत ने सड़क, रेलवे, बंदरगाह और दूसरी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए करीब 8 अरब डॉलर की राशि कर्ज देने की व्यवस्था यानी ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ के तहत उपलब्ध कराई है.
इसके अलावा, भारत संपर्क बढ़ाने वाली योजनाओं में मदद के लिए अनुदान और तकनीकी सहायता भी देता है.
अखौरा-अगरतला रेलवे लिंक, अंदरूनी जलमार्गों पर सहयोग, सीमा पार बिजली की व्यवस्था और सामान की आवाजाही से जुड़े समझौते दिखाते हैं कि दोनों देशों की भौगोलिक नजदीकी से कितना व्यावहारिक फायदा मिल सकता है.
भारत की ओर से दी जाने वाली मदद में व्यापारिक हितों का ध्यान रखा गया है और न ही सभी परियोजनाएं बिना देरी के पूरी हुई हैं.
लेकिन भारत के साथ साझेदारी का एक बड़ा फायदा यह है कि वह पास में है, दोनों देशों के बीच पहले से संस्थाएं और व्यवस्थाएं मौजूद हैं, संस्कृति में समानताएं हैं और दोनों देशों को आर्थिक फायदे में भागीदारी करने का मौका मिलता है.
यह रिश्ता केवल विदेशों से कर्ज लेने पर आधारित नहीं है. भारत और बांग्लादेश का सहयोग ऐसी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है, जो सीमा के दोनों तरफ रोज होने वाले व्यापार और लोगों के संपर्क से मजबूत होती हैं.
आगे का रास्ता
बांग्लादेश को भारत के साथ रिश्ते बनाए रखने और चीन से निवेश लेने के बीच किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है. वह दोनों देशों के साथ संबंध रख सकता है.
लेकिन इन संबंधों की शर्तें राजनीतिक संकेतों के बजाय आर्थिक वास्तविकताओं के आधार पर तय होनी चाहिए.
पांच बातों पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है:
- LDC का दर्जा मिलने के बाद व्यापार की आपसी शर्तों पर बातचीत करना.
2. सीमा पर लगने वाले हाट को दोबारा शुरू करना और उनका विस्तार करना.
3. पानी के बंटवारे की ऐसी व्यवस्था बनाना, जो दोनों देशों के लिए उचित हो और जलवायु परिवर्तन के असर को भी ध्यान में रखे.
4. मोंगला बंदरगाह परियोजना में पूरी पारदर्शिता रखना और उसके व्यापारिक नतीजों के लिए जवाबदेही तय करना.
5. भारत के सहयोग से संपर्क और निवेश बढ़ाने वाली योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना.
भारत को बांग्लादेश में चीन के हर निवेश को अपनी रणनीतिक हार मानना बंद करना चाहिए. इसके बजाय उसे परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने, भरोसेमंद निवेश सहयोग और व्यावहारिक आर्थिक अवसरों की पेशकश करनी चाहिए.
बांग्लादेश के नेतृत्व को समझना चाहिए कि देश की आजादी और अपने फैसले खुद लेने की क्षमता की सबसे अच्छी सुरक्षा मजबूत अर्थव्यवस्था, अलग-अलग देशों के साथ साझेदारी और विदेशी कर्ज पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचने में है.
चीन पैसा, इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीक दे सकता है. लेकिन भारत कुछ ऐसी बुनियादी चीजें देता है, जिनकी जगह लेना मुश्किल है. इनमें भौगोलिक नजदीकी, साझा इतिहास, सांस्कृतिक समानता, एक-दूसरे से जुड़ी अर्थव्यवस्थाएं और साझा भविष्य शामिल हैं, जिससे बचा नहीं जा सकता.
बांग्लादेश के लिए मुख्य सवाल यह नहीं है कि चीन मोंगला बंदरगाह बनाने में मदद करेगा या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या इस साझेदारी से देश की खुशहाली बढ़ेगी, और क्या ऐसा करते हुए उसकी आर्थिक आजादी तथा अपने सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक पड़ोसी के साथ रिश्ते कमजोर नहीं होंगे?
आखिरकार, बांग्लादेश का भविष्य उससे दूर मौजूद मदद करने वाले देशों की ताकत से कम और अपने पड़ोसी के साथ रिश्ते को समझदारी से संभालने की उसकी क्षमता से ज्यादा तय होगा.
लेफ्टिनेंट जनरल प्रदीप सी. नायर (सेवानिवृत्त) असम राइफल्स के पूर्व महानिदेशक हैं. वह फिलहाल हैदराबाद की सेंट मैरीज़ रिहैबिलिटेशन यूनिवर्सिटी के कुलपति हैं. उनका एक्स हैंडल @LtGenPCN है. ये लेख उनके निजी विचार हैं.
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