जब मैंने यूक्रेन में अपने सहयोगियों से पूछा कि स्टारलिंक पर लगाई गई नई पाबंदियां कितनी गंभीर हैं, तो उनका जवाब काफी नपा-तुला था. उन्होंने बताया कि इससे सामरिक और ऑपरेशनल मिशनों में दिक्कतें आएंगी, लेकिन देश के ‘डीप-स्ट्राइक’ ऑपरेशनों पर इसका वैसा असर नहीं पड़ेगा. बाद में 14 अक्टूबर को, मिखाइलो फेदोरोव ने घोषणा की कि 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार से चलने वाले उपकरणों के लिए कनेक्टिविटी बहाल कर दी गई है. इस सीमा के भीतर स्ट्राइक और इंटरसेप्टर ड्रोन फिर से उड़ान भर सकते थे, लेकिन अगला काम ‘स्टारशील्ड’ (स्पेसएक्स की सैन्य-केंद्रित सैटेलाइट सेवा) से पाबंदियों को पूरी तरह से हटाना था.
इन पाबंदियों से यूक्रेन के कुछ ड्रोन मिशन प्रभावित हुए थे. 7वीं रैपिड रिएक्शन कॉर्प्स ने बताया कि कनेक्शन 10–20 सेकंड तक टूटे और कभी-कभी यह उस तय रफ्तार की सीमा से भी नीचे हुआ. संयोग से इसका समय राजनीतिक रूप से संवेदनशील था. डॉनल्ड ट्रंप कीव पर रूसी तेल ढांचे पर हमले रोकने का दबाव बना रहे थे और यूक्रेनी अधिकारियों ने सवाल उठाया कि क्या संचार पर लगी पाबंदियां उसी दबाव से जुड़ी थीं. इस बात का कोई सार्वजनिक सबूत नहीं है कि ट्रंप ने इन्हें लगाने का आदेश दिया था और मस्क ने अपनी तरफ से कहा कि सैन्य नेटवर्क अमेरिकी सरकार के नियंत्रण में था, उनके नहीं. फिर बदलाव को मंजूरी किसने दी, यह अब भी साफ नहीं है. कुछ घंटों के भीतर इस रुकावट को कुछ हद तक वापस लिया गया, लेकिन इतनी जल्दी इसे वापस लेने से मुद्दा और गंभीर हो गया: यूक्रेन की कमान से बाहर कोई व्यक्ति बहुत कम समय में युद्ध के मैदान में इस्तेमाल होने वाली संचार सेवा की पहुंच बदल सकता था.
यह अनिश्चितता एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि यूक्रेन का अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध लगातार अस्थिर हो रहे हैं. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई खास ड्रोन किसी खास रफ्तार पर उड़ सकता है या नहीं. सवाल यह है कि क्या कोई देश सैन्य अभियानों के लिए जरूरी संचार पर उस समय भरोसा कर सकता है, जब सेवा देने वाला, उसे चलाने वाला और राजनीतिक अधिकार रखने वाला उसके कमान तंत्र से बाहर हो.
स्टारलिंक ने युद्धक्षेत्र को क्यों बदल दिया?
स्टारलिंक के आने से बहुत पहले भी सेनाएं रेडियो, केबल, फील्ड टेलीफोन, रिले और सैन्य उपग्रहों का उपयोग करके युद्ध लड़ती थीं. स्टारलिंक ने युद्धक्षेत्र संचार का आविष्कार नहीं किया. इसने हजारों निम्न-पृथ्वी-कक्षा उपग्रहों से जुड़े पोर्टेबल टर्मिनलों के माध्यम से अपेक्षाकृत तेज़ ब्रॉडबैंड उपलब्ध कराया, जिसमें वे क्षेत्र भी शामिल थे जहां जमीनी बुनियादी ढांचा नष्ट हो चुका था. इसकी लो लेटेंसी का मतलब है कि वीडियो, निर्देशांक और निर्देश इतनी तेज़ी से स्थानांतरित हो सकते हैं कि युद्ध के दौरान लिए जाने वाले निर्णयों को प्रभावित कर सकें. यह अंतर विशेष रूप से विशाल मोर्चे पर बिखरे हुए मोबाइल समूहों के लिए स्पष्ट है, जहां नए फाइबर बिछाना या स्थिर संचार नोड्स की सुरक्षा करना खतरनाक और धीमा हो सकता है. हालांकि, पोर्टेबल टर्मिनल पूरी तरह से अभेद्य नहीं हैं, एक ऑपरेटर पारंपरिक सैन्य दूरसंचार साइट का निर्माण शुरू से किए बिना कनेक्शन स्थापित या स्थानांतरित कर सकता है.
यह भी ध्यान देने योग्य है कि स्टारलिंक जीपीएस नहीं है. जीपीएस, रूस का ग्लोनास, चीन का बेईडू और भारत का नेविक स्थिति और समय निर्धारित करने में मदद करते हैं. वे लाइव ड्रोन फीड साझा करने या दूरस्थ ऑपरेटर के कनेक्शन को बनाए रखने के लिए आवश्यक दो-तरफा ब्रॉडबैंड ट्रैफिक नहीं ले जाते हैं. स्टारलिंक एक संचार लिंक प्रदान करता है; नेविगेशन उपग्रह एक अलग भूमिका निभाते हैं. पूर्व-निर्धारित मार्ग पर उड़ान भरने वाला लंबी दूरी का ड्रोन मुख्य रूप से नेविगेशन, जड़त्वीय सेंसर और ऑनबोर्ड स्वायत्तता पर निर्भर हो सकता है, जबकि लाइव वीडियो के माध्यम से नियंत्रित ड्रोन को एक उपयोगी संचार लिंक की आवश्यकता होती है. यह अंतर यह समझने में सहायक होता है कि नवीनतम प्रतिबंधों का यूक्रेनी हथियारों के प्रत्येक वर्ग पर समान प्रभाव क्यों नहीं पड़ा.
उदाहरण के लिए, एक यूक्रेनी टोही ड्रोन को लें जो एक रूसी तोपखाने की स्थिति का पता लगाता है. इसकी छवियां और निर्देशांक एक कमांड पोस्ट तक पहुंचते हैं, जो जानकारी की जांच करता है और इसे तोपखाने की बैटरी या स्ट्राइक-ड्रोन टीम को भेजता है. यूक्रेन की डेल्टा प्रणाली सेंसर रिपोर्टों को एक साझा चित्र में संयोजित करने में मदद करती है; उपग्रह ब्रॉडबैंड इन रिपोर्टों को दूर-दूर तक फैले उपयोगकर्ताओं के बीच पहुंचा सकता है. न तो डेल्टा और न ही स्टारलिंक अकेले मनचाहे रिजल्ट देते हैं. उनका महत्व इस बात में है कि वे एक साथ कैसे काम करते हैं. इससे यूक्रेन को छोटी इकाइयों के समन्वय और लक्ष्य का पता लगाने और उस पर हमला करने के बीच के समय को कम करने में मदद मिली, एक ऐसा लाभ जिसकी बराबरी करने में रूसी सैन्य टुकड़ियों को शुरू में कठिनाई हुई. यह प्रणाली निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी विकेंद्रीकृत करती है: अग्रिम पंक्ति की टीमें किसी एक बड़े मुख्यालय द्वारा जानकारी एकत्र करने की प्रतीक्षा किए बिना ऊपर की ओर जानकारी भेज सकती हैं, जबकि कमांडर मोर्चे पर कई बिंदुओं से रिपोर्ट देख सकते हैं.
लेकिन यह एक्सेस कुछ शर्तों के साथ मिला था. स्पेसएक्स ने 2023 में स्वीकार किया कि ड्रोन के कुछ आक्रामक इस्तेमाल पर पाबंदियां थीं. 2025 की एक जांच में आरोप लगाया गया कि 2022 में यूक्रेन के खेरसॉन जवाबी हमले के दौरान मस्क ने स्टारलिंक कवरेज बंद करने का आदेश दिया था; स्पेसएक्स ने इस दावे का खंडन किया. इससे पहले, फरवरी 2022 में रूस द्वारा वियासैट (Viasat) के KA-SAT सैटेलाइट नेटवर्क पर किए गए हमले से यह साफ हो गया था कि संचार व्यवस्था कितनी जल्दी युद्ध का निशाना बन सकती है. वहीं, ‘स्टारशील्ड’ (Starshield) को राष्ट्रीय सुरक्षा के कामों के लिए पेश किया गया है, जिसमें सुरक्षित संचार और सरकारी पेलोड (विशेष उपकरण) शामिल हैं. अमेरिका और खबरों के अनुसार ब्रिटेन ने भी स्टारशील्ड की सेवाएं ली हैं. मुख्य समस्या यह है कि हथियार होने का मतलब यह नहीं है कि आप उन कड़ियों (लिंक्स) को भी नियंत्रित कर सकते हैं, जो उन हथियारों को उपयोगी बनाती हैं.
यूरोप पैसे दे रहा है, लेकिन अभी नेटवर्क की जगह नहीं ले सकता
यूक्रेन को स्टारलिंक सिर्फ मुफ्त में नहीं मिल रहा है. पोलैंड ने 2022 से 2024 के बीच 24,500 से ज्यादा टर्मिनल और सब्सक्रिप्शन पर करीब 8.4 करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च किए और 2025 में डिलीवरी के लिए 5,000 और टर्मिनल का खर्च उठाया. इससे पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की की हाल की पाबंदियों पर आपत्ति को समझा जा सकता है: यूरोपीय सरकारें ऐसी सेवा का खर्च उठा रही हैं, जिसकी सैन्य इस्तेमाल की शर्तों को वे जरूरी नहीं कि खुद तय कर सकें.
यूरोप ने यूक्रेन की रक्षा का ज्यादा आर्थिक बोझ उठाया है. इसमें 2026-27 के लिए यूरोपीय संघ की 90 अरब यूरो की सहायता-ऋण व्यवस्था भी शामिल है, लेकिन उपकरणों के लिए पैसे देना और उनके लिए जरूरी ढांचे पर नियंत्रण रखना एक ही बात नहीं है. यूटेलसैट का वनवेब नेटवर्क एक विकल्प देता है, लेकिन उसका सैटेलाइट समूह, टर्मिनल और सेवा व्यवस्था रातों-रात यूक्रेन की ज़रूरत के स्तर पर स्टारलिंक की जगह नहीं ले सकते. यूरोपीय संघ की IRIS² सुरक्षित-कनेक्टिविटी परियोजना ऐसी निर्भरता कम करने के लिए बनाई गई है, लेकिन इसके पहले प्रक्षेपण 2029 के लिए तय हैं. यूक्रेन में स्टारलिंक सेवाओं का खर्च उठाकर यूरोप असल में समय खरीद रहा है.
चीनी मदद से तैयार रूस का स्टारलिंक जवाब
युद्ध के मैदान में रूस का शुरुआती संचार असमान था. इसके बाद उसने इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, रिले, व्यावसायिक रेडियो और फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन के जरिए खुद को बदला है. इन ड्रोन की भौतिक नियंत्रण केबल सामान्य रेडियो-फ्रीक्वेंसी जामिंग से बचती हैं. इनमें से कोई भी वह व्यापक क्षेत्र वाला सैटेलाइट ब्रॉडबैंड उपलब्ध नहीं कराता, जिसकी रूस के पास कमी रही है. इसका प्रस्तावित जवाब रासवेत है, जो कम-पृथ्वी-कक्षा में काम करने वाला सैटेलाइट समूह है और इसे एक्स होल्डिंग की कंपनी ब्यूरो 1440 ने विकसित किया है. रूस ने मार्च 2026 में उत्पादन श्रेणी के 16 रासवेत सैटेलाइट लॉन्च किए और जुलाई में 16 और लॉन्च किए.
उसका लक्ष्य 2027 तक करीब 292 और लंबे समय में 900 से ज्यादा सैटेलाइट का है. वादे और प्रदर्शन के बीच अभी भी काफी अंतर है. स्वतंत्र ट्रैकिंग में पहले 32 अंतरिक्ष यानों में कुछ के संभावित रूप से खराब होने की जानकारी दी गई. परीक्षण और छोटा नेटवर्क लगातार युद्धक्षेत्र कवरेज के बराबर नहीं हैं. बैन, सामान की कमी और बजट पर दबाव भी इस कार्यक्रम को मुश्किल बनाते हैं. बजट में कटौती का रासवेत पर क्या असर पड़ा, इसका कोई साफ सार्वजनिक विवरण नहीं है. सैकड़ों सैटेलाइट की योजनाएं तभी काम की हैं जब रूस उन्हें लगातार बना सके, सैटेलाइट खराब होने पर उनकी जगह नए सैटेलाइट लॉन्च कर सके और सैनिकों को काम करने वाले ग्राउंड टर्मिनल दे सके. एक काम करने वाली सेवा के लिए पूरा ढांचा चाहिए. सिर्फ सैटेलाइट से यह सेवा नहीं मिल सकती.
प्रतिबंधों के बावजूद रूस तकनीक कहां से ले रहा है, इस पर एक और ज्यादा अहम कहानी सामने आती है. यूक्रेन के सेंटर फॉर डिफेंस रिफॉर्म्स की एक जांच, जिसे RBC-Ukraine ने रिपोर्ट किया, ने ब्यूरो 1440 के सप्लाई नेटवर्क में 1,300 से ज्यादा कंपनियों का पता लगाया. इसमें बताया गया कि 2025 में आयातित सामान के लिए करीब 6.8 करोड़ डॉलर का विदेशी मुद्रा भुगतान किया गया. कुछ सप्लायरों ने अपने 90 प्रतिशत से ज्यादा सामान चीन से आयात किए. रो़डे एंड श्वार्ज, कीसाइट और टॉप्टिका से जुड़े पश्चिमी मूल के टेस्ट और माप उपकरण भी चीन और तुर्किये के सप्लायरों के जरिए रूस पहुंचने की जानकारी दी गई. यह प्रतिबंधों से बचने का एक खास उदाहरण है, जिसमें खरीद पूरी तरह बंद करने के बजाय उसका रास्ता बदल दिया गया. चीनी और पश्चिमी, दोनों तरह के आयातित सामान रूसी सैटेलाइट निर्माताओं तक पहुंचने से पहले तीसरे पक्ष के नागरिक वितरकों के जरिए जा सकते हैं.
जांच में एक खास उपकरण की पहचान की गई: शंघाई मॉडर्न एयरोटेक द्वारा बनाए गए SMA-D-6 रिएक्शन व्हील, जिन्हें रूसी बिचौलिया मैटेरिक के जरिए आयात किया गया. ये व्हील सैटेलाइट की दिशा तय करते हैं, ताकि एंटीना और सोलर पैनल सही दिशा में रहें. बताया गया कि ब्यूरो 1440 ने मैटेरिक को 14.2 लाख डॉलर का भुगतान किया. भले ही इस बारे में जानकारी अभी अलग-अलग जगहों पर बिखरी हुई है, लेकिन यह उदाहरण दिखाता है कि चीनी सप्लायर एक कथित रूप से संप्रभु रूसी अंतरिक्ष कार्यक्रम में कितनी गहराई से शामिल हो रहे हैं. यह ऐसे औद्योगिक निर्भरता के सबूत हैं, जिसे प्रतिबंधों ने और बढ़ा दिया है. इससे यूक्रेन चिंतित है. 3 अक्टूबर को जेलेंस्की ने रासवेत से जुड़ी रूसी और चीनी कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. इससे पता चलता है कि कीव इस पर इतनी बारीकी से नजर क्यों रख रहा है: काम करने वाला रूसी ब्रॉडबैंड सैटेलाइट समूह रूसी ड्रोन और अलग-अलग जगहों पर तैनात सैनिकों के बीच तालमेल बेहतर कर सकता है. रूस चीनी सप्लाई चेन की बढ़ती मदद से अमेरिकी संचार में अपनी कमी को दूर करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इससे अकेले चीनी महत्वाकांक्षाओं की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती.
चीन, पाकिस्तान और भारत का जुड़ा हुआ युद्धक्षेत्र
बीजिंग की अपनी महत्वाकांक्षाएं इससे भी बड़ी हैं. उसके गुओवांग और चिएनफान, या स्पेससेल, प्रोजेक्ट में क्रमशः करीब 13,000 और 15,000 से ज्यादा सैटेलाइट के समूह की योजना है. हालांकि, फिलहाल इन लक्ष्यों से तैनाती काफी दूर है. चीन और रूस ने मई 2026 में 2026-30 के लिए एक रोडमैप पर काम करने पर भी सहमति जताई, जिसमें बेइदौ और ग्लोनास के बीच सहयोग को जोड़ा जाना है. यह नेविगेशन और समय तय करने की व्यवस्था है, स्टारलिंक जैसी ब्रॉडबैंड सेवा नहीं, लेकिन दोनों स्तर नेटवर्क से जुड़े सैन्य अभियानों के लिए तुरंत महत्वपूर्ण हैं. चीन का अपना निवेश यूक्रेन युद्ध से पहले का है और यह सिर्फ स्टारलिंक की नकल नहीं है. ऐसा व्यावसायिक नेटवर्क जो जहाजों, विमानों, दूरदराज के ठिकानों और डेटा सेंटरों को जोड़ सकता है, ऐसा ढांचा भी बनाता है जिसका सैन्य इस्तेमाल हो सकता है और चीन के मामले में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है. सार्वजनिक रिकॉर्ड से यह साफ हो भी सकता है और नहीं भी कि उसके प्रस्तावित सैटेलाइट नेटवर्क स्टारलिंक के मौजूदा स्तर पर युद्धक्षेत्र में वही काम करने का लक्ष्य रखते हैं या नहीं. लेकिन आधिकारिक बयानों से अनुमान लगाना यहां मुख्य बात नहीं है.
पाकिस्तान एक और कारण है कि भारत को इस पर ध्यान देना चाहिए. चीन ने 2024 में पाकिस्तान के पाकसैट-MM1 संचार सैटेलाइट को विकसित करने और लॉन्च करने में मदद की थी और उसके रिमोट-सेंसिंग कार्यक्रमों में भी मदद की है.
इनकी संभावित सैन्य अहमियत इस बात में है कि सैटेलाइट संचार और तस्वीरों को हवा से निगरानी, सामरिक डेटा लिंक और हथियारों के साथ जोड़ा जा सकता है. ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के शोध में, जिसमें ब्रिगेडियर अंशुमान नारंग के पीएलए के वेस्टर्न थिएटर कमांड पर काम का इस्तेमाल किया गया है, ऐसे लिंक की बढ़ती अहमियत को बताया गया है. हालांकि, चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य स्तर पर कितना काम एक साथ हो रहा है, यह सार्वजनिक रूप से तय नहीं है. यह सावधानी हमें बताती है कि किसी चीनी सैटेलाइट को हासिल करना या तस्वीरें खरीदना और हर सेंसर को एयर-डिफेंस बैटरी या विमान से जोड़ने वाला सुरक्षित, कम देरी वाला नेटवर्क होना एक बात नहीं है. फिर भी चीन की लगातार मदद से पाकिस्तान को ऐसे ढांचे के कुछ हिस्से विकसित करने के मौके मिलते हैं.
भारत के पास भी अपने कुछ हिस्से तैयार हैं. CMS-03, जिसे GSAT-7R भी कहा जाता है, नवंबर 2025 में नौसेना के संचार को मदद देने के लिए लॉन्च किया गया था. सेना ने 2023 में GSAT-7B के लिए भी करार किया था. यह याद रखना चाहिए कि संचार सैटेलाइट को नेविगेशन से अलग समझना चाहिए. जुलाई 2026 में सरकार ने माना था कि NavIC अब अपने दम पर पोजिशनिंग नहीं दे सकता, क्योंकि पोजिशनिंग वाले बहुत कम सैटेलाइट काम कर रहे थे. हालांकि, उसकी टाइमिंग सेवा जारी रही. फिलहाल सशस्त्र बल कई सैटेलाइट समूहों वाली नेविगेशन व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं.
असली परीक्षा यह है कि क्या भारत इन हिस्सों को भरोसेमंद तरीके से जोड़ सकता है. संजय जमीन और हवा से मिलने वाले सेंसरों की जानकारी को सुरक्षित डेटा और सैटेलाइट नेटवर्क का इस्तेमाल करके युद्धक्षेत्र की निगरानी की तस्वीर में जोड़ता है. आकाशतीर एयर-डिफेंस में पहचान, ट्रैकिंग और कार्रवाई के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ता है. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर हमले या सैटेलाइट लिंक खोने की स्थिति में इन दोनों का साथ में प्रदर्शन कड़ी जांच की मांग करता है, न कि सिर्फ अलग-अलग सिस्टम को सेना में शामिल किए जाने के आधार पर अनुमान. अगर दूर मौजूद सेंसर की रिपोर्ट फैसले लेने वाले व्यक्ति तक नहीं पहुंच सकती, या कोई हथियार समय पर निर्देश हासिल नहीं कर सकता, तो एक आधुनिक साझा तस्वीर का बहुत कम फायदा है. इसलिए भारत को सिर्फ अलग-अलग प्लेटफॉर्म और सॉफ्टवेयर की जांच नहीं करनी चाहिए, बल्कि यह भी जांचना चाहिए कि उसके कनेक्शन बाधा के बावजूद काम करते हैं या नहीं और जब वे काम न करें, तो सैनिकों को कैसे लड़ना है…और आखिर में, सुरक्षित संचार और संकेतों के लिए वे घरेलू या विदेशी तकनीक पर कितना निर्भर हैं.
भारत में स्टारलिंक के प्रस्तावित प्रवेश को लेकर हालिया विवाद इस चिंता को सिर्फ सैद्धांतिक नहीं रहने देता. हालांकि, इसमें सैन्य स्तर पर कोई सीधा मामला शामिल नहीं है. इसे शुरुआती लाइसेंस मिल चुके हैं, लेकिन सुरक्षा नियमों के पालन और अन्य मंजूरियों के कारण व्यावसायिक सेवा अभी शुरू नहीं हुई है. निगरानी और डेटा की संप्रभुता को लेकर भी सवाल हैं. यह मामला दिखाता है कि अपने देश का नियंत्रण क्यों जरूरी है. अगर कभी ऐसी कनेक्टिविटी को संवेदनशील रक्षा या खुफिया कामों से जोड़ा जाता है, तो भारत को पहुंच पर साफ अधिकार और भरोसेमंद विकल्पों की जरूरत होगी.
यूक्रेन का अनुभव दिखाता है कि हथियारों की तकनीक का मालिक होना और उन नेटवर्क पर नियंत्रण होना एक ही बात नहीं है, जिन पर वे हथियार निर्भर हैं. यह हर देश के लिए एक सबक है. यूरोप, चीन और रूस में स्टारलिंक के विकल्पों के विकास की रफ्तार दिखाती है कि यह नियंत्रण कितना महत्वपूर्ण हो गया है.
स्वस्ति राव दिप्रिंट में कंसल्टिंग एडिटर (इंटरनेशनल और स्ट्रैटेजिक अफेयर्स) हैं. उनका एक्स हैंडल @swasrao है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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