एक रूसी सैनिक बंदूक उठाए, धूसर राख से भरे इलाके को पार करते हुए सामने वाले दुश्मन के बंकर की ओर बढ़ता है. उसे पता नहीं है कि अंदर मौजूद सैनिक उसे देख रहे हैं. वे गोली नहीं चलाते. तभी पटरी वाले धातु के एक गोले जैसी मशीन तेजी से उसकी ओर बढ़ती है, जिसके पंजे घूम रहे हैं. वह उस पर गोली चलाता है. एक और मशीन सामने आ जाती है, फिर तीसरी और इसी तरह कई और.
बाद में अमेरिकी अधिकारी मेजर हेंड्रिक्स को बंजर इलाके में डेविड नाम का एक लड़का मिलता है और उसे उस पर दया आती है. डेविड एक गंदा टेडी बियर लेकर उसके पीछे-पीछे चलता है. सोवियत सैनिक उस लड़के पर गोली चलाते हैं. हेंड्रिक्स को लगता है कि उन्होंने एक बच्चे को मार दिया है. तभी उसके छोटे शरीर से धातु का एक पहिया बाहर लुढ़कता है. वह लड़का इंसान जैसा दिखने वाला रोबोट था.
यह फिलिप के. डिक की साइंस फिक्शन लघु उपन्यासिका ‘सेकंड वैरायटी’ की कहानी थी. 1953 में लिखी गई यह कहानी अमेरिका और सोवियत संघ के बीच लंबे समय से चल रहे युद्ध के एक बर्बाद युद्धक्षेत्र से शुरू होती है.
डिक की कहानी पर 1995 में अंग्रेजी भाषा की कनाडाई फिल्म ‘स्क्रीमर्स’ बनी. इसके बाद 2009 में इसका सीक्वल ‘स्क्रीमर्स. द हंटिंग’ आया. युद्ध से तबाह इस ग्रह पर दुश्मन सैनिकों को मारने के लिए बनाई गई मशीनें अपना रूप बदलती थीं और इंसानों की पहचान करने और उन पर दया करने की आदतों का फायदा उठाती थीं.
युद्ध में ऑटोमेशन और इंसानी भूमिका पर रिसर्च करते समय मुझे यह कहानी मिली. मैंने इसे रूस के यूक्रेन के खिलाफ युद्ध पर तैयार की जा रही अपनी पढ़ने की सूची में तुरंत शामिल कर लिया. अब यह युद्ध अपने पांचवें साल में है और आधिकारिक तौर पर ऐसे दौर में पहुंच चुका है, जहां मशीनों, ऑटोमेशन और इंसानी भूमिका का ऐसा मेल देखने को मिल रहा है, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया. इससे यह सवाल खुला हुआ है कि कभी साइंस फिक्शन मानी जाने वाली कहानी असल दुनिया में कितनी दूर तक आगे बढ़ सकती है.
ड्रोन की सेना के बाद
26 सितंबर को यूक्रेन के पूर्व रक्षा मंत्री मिखाइलो फेडोरोव ने “रोबोट्स की सेना” बनाने की घोषणा की. यह 2022 में शुरू की गई ड्रोन की सेना का अगला कदम है. यह कोई नई सैन्य टुकड़ी नहीं है, बल्कि ऑटोमेशन को और ज्यादा बढ़ाने की कोशिश है.
फेडोरोव निजी क्षेत्र के साथ मिलकर एक वेंचर फंड, नई डिफेंस-टेक कंपनियां और एक R&D यूनिट बनाने का प्रस्ताव दे रहे हैं. इसका मकसद वही काम करना है जो यूक्रेन के लोग पहले से कर रहे हैं. सैनिकों के सामने आने वाली समस्या पहचानना, एक टीम को मदद देना, युद्ध के मोर्चे पर उसकी मशीन का परीक्षण करना, जो मशीन काम करती रहे उसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल करना और दुश्मन उसके खिलाफ नई रणनीति अपनाए तो उसमें बदलाव करना.
इंजीनियरों और कंपनियों के लिए आवेदन खुले हैं और वह फिलहाल एक तकनीकी प्रमुख की भर्ती कर रहे हैं.
जमीनी रोबोटिक्स के अलावा उनकी व्यापक तकनीकी योजना में सेंसर, जेट इंजन वाले शाहेद ड्रोन के खिलाफ सस्ती मिसाइलें और AI से चलने वाले हमले के हथियार भी शामिल हैं.
तुरंत सवाल यह है कि फेडोरोव की घोषणा से क्या बदलेगा, क्योंकि यूक्रेन पहले से ही जमीन पर चलने वाले रोबोट इस्तेमाल कर चुका है.
तुरंत होने वाला बदलाव संख्या में बड़ी बढ़ोतरी का होगा. इसका मतलब है ज्यादा संख्या और ज्यादा तेजी से सामान पहुंचाना, लोगों को निकालना, बारूदी सुरंगें साफ करना और बिछाना, और ज्यादा सैन्य टुकड़ियों को हथियारों से मदद देना.
लेकिन मेरे लिए बड़ी कहानी एक गुणात्मक बदलाव की होगी. इसका मतलब है कि अभी जो जमीनी वाहन पैदल सैनिकों की मदद करते हैं, उनसे आगे बढ़कर ऐसे रोबोट इस्तेमाल किए जाएं जो पैदल सैनिकों के पहुंचने से पहले हमले का सबसे खतरनाक हिस्सा अपने ऊपर ले लें.
फेडोरोव चाहते हैं कि छह महीने के अंदर इंसान जैसे दिखने वाला रोबोट युद्ध के मैदान में काम का नतीजा देने लगे और एक साल के अंदर ऐसा रोबोट हमला दल तैयार हो जाए जिसमें उसके साथ पैदल सैनिक न हों.
ये फिलहाल वादे हैं. लेकिन चल रहे ऑपरेशन विवाल्डी की कामकाज से जुड़ी जानकारी को देखते हुए, जिसमें ड्रोन से हवा में गिराए गए बंदूक और ग्रेनेड वाले जमीनी रोबोटों ने रूस की रक्षा पंक्ति के पीछे हमला किया, जबकि पैदल सैनिक सामने से अंदर घुसे, रोबोटों की सेना का रूप पहले से बनना शुरू हो चुका है.
आंकड़े काफी बड़े हैं. यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, जनवरी से अगस्त 2026 के बीच जमीनी रोबोटों ने 1,00,000 से ज्यादा लॉजिस्टिक्स और सैनिकों को निकालने वाले मिशन किए. 22,000 से ज्यादा जमीनी मानवरहित वाहनों के लिए कॉन्ट्रैक्ट भी किए गए.
इनमें से कई पटरी वाले वाहन हैं, जो ड्रोन की निगरानी वाले रास्तों से पानी, गोला-बारूद और घायल सैनिकों को ले जाते हैं. फेडोरोव की घोषणा का मकसद इस मुश्किल से हासिल किए गए अनुभव को ऐसी उत्पादन और सीखने की प्रक्रिया में बदलना है, जिसे बार-बार दोहराया जा सके और फिर उससे भी आगे बढ़ा जा सके.
लाइमन के पास चार मौसम
ऑपरेशन विवाल्डी दिखाता है कि ऐसी महत्वाकांक्षा जमीन पर कैसे काम कर सकती है. डोनेट्स्क में लाइमन के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में थर्ड आर्मी कॉर्प्स ने संपर्क रेखा के आसपास उस इलाके में लड़ाई लड़ी, जहां हर तरफ ड्रोन मौजूद थे. यहां किसी भी गतिविधि को देखा और निशाना बनाया जा सकता है. इसे “किल जोन” कहा जाता है.
इस इलाके की चौड़ाई अलग-अलग जगहों पर अलग है. रॉयटर्स ने कुछ जगहों पर इसकी चौड़ाई करीब 30 किलोमीटर बताई है. मोर्चे से आने वाली दूसरी जानकारी के अनुसार, कुछ इलाकों में ड्रोन का खतरा एक तरफ 50 किलोमीटर तक अंदर हो सकता है.
विवाल्डी ने इस घातक इलाके की चुनौती का सामना रूस की निगरानी करने वाले साधनों, ऑपरेटरों, ईंधन और सप्लाई के रास्तों पर हमला करके किया. साथ ही कम संख्या में उपलब्ध यूक्रेनी सैनिकों की आवाजाही को ड्रोन विरोधी गोलीबारी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और वैकल्पिक संचार व्यवस्था के जरिए सुरक्षित रखा गया.
पहले “सीजन” में ब्रिगेडियर जनरल एंड्री बिलेत्स्की ने कहा कि उनके कॉर्प्स ने 75 वर्ग किलोमीटर इलाके से घुसपैठियों को हटाया और 10 वर्ग किलोमीटर का एक और इलाका अपने नियंत्रण में लिया. इसमें सेरेदनी के आसपास और लाइमन के उत्तर-पश्चिम के गांव शामिल थे.
धोखे और सूचना पर रोक लगाने से रूसी रडार और जैमर यूक्रेनी आगे बढ़ने की जानकारी नहीं पा सके. यूक्रेन के मध्यम दूरी के हमलों ने रूसी मोर्चे के एक हिस्से को अलग कर दिया. बताया गया कि शुरुआत में इसे मोर्चे से 50 किलोमीटर तक और बाद में 120 किलोमीटर तक पीछे अलग किया गया.
फिलहाल यह अलग-अलग चीजों का मेल था. निगरानी, दुश्मन की सप्लाई और गतिविधियों को रोकना, इंजीनियर, मशीनें और पैदल सैनिक. इसी मेल ने हमले के लिए जगह बनाई. किसी रोबोट हमला दल ने अकेले इलाके पर कब्जा नहीं किया.
यूक्रेनी सूत्रों के अनुसार, दूसरे सीजन में शांड्रीहोलोव और डेरिलोव पर कब्जा किया गया और ड्रोबिशेवे को सुरक्षित किया गया. इसकी NC-13 यूनिट ने भारी हवाई बाबा यागा ड्रोन से विस्फोटक जमीनी वाहनों को रूसी मोर्चे से 10 किलोमीटर तक पीछे गिराया.
इन वाहनों ने कमांड सेंटर और रास्तों के लिए खतरा पैदा किया और बताया गया कि इससे रूसी सैनिकों में तोड़फोड़ का डर पैदा हुआ. दूसरे रोबोटों ने सैनिकों तक सामान पहुंचाया, रास्ते साफ किए और घायल सैनिकों को बाहर निकाला.
कॉर्प्स के अनुसार, रोबोटिक वाहनों ने 15,700 से ज्यादा मिशन किए और 3,300 टन सामान पहुंचाया. उसका कहना है कि पहले चरण में उसके इलेक्ट्रॉनिक युद्ध ने दुश्मन के 20,000 से ज्यादा ड्रोन मिशनों को बाधित किया.
ध्यान रखना चाहिए कि ये आंकड़े यूक्रेनी पक्ष की ओर से दिए गए हैं.
तीसरे सीजन में एक झूठे हमले ने रूसी रिजर्व सैनिकों को शांड्रीहोलोव और जेलेना डोलिना की ओर खींच लिया. इसी दौरान मुख्य हमला नोवे और उसके आसपास की ऊंची जगहों पर किया गया.
कॉर्प्स का कहना है कि उसने नोवे, रिडकोडुब और कैटेरिनिवका को आजाद कराया, कारपिवका और नोवोमिखाइलिवका पर फिर से नियंत्रण स्थापित किया और 51 वर्ग किलोमीटर का एक और इलाका यूक्रेन के नियंत्रण में वापस लाया.
यूक्रेन ने बदले हुए BTR-60 वाहनों को विस्फोटक रोबोट की तरह इस्तेमाल किया और उन्हें किलेबंदी की ओर भेजा. इसके बाद उसके पैदल सैनिक अंदर गए. अब तक कुल 176 वर्ग किलोमीटर इलाका साफ कराकर आजाद कराया जा चुका है.
बिलेत्स्की ने अभी यह पुष्टि नहीं की है कि विवाल्डी के चौथे सीजन में चोर्नी जेरेबेट्स नदी तक पहुंचना लक्ष्य है या नहीं.
यूक्रेन के ड्रोन प्रमुख रॉबर्ट “माद्यार” ब्रोव्दी ने अलग से अपनी मानवरहित (autonomous) सिस्टम्स फोर्सेज से बिलेत्स्की की टुकड़ी के साथ करीबी तालमेल करने को कहा है. इसका मकसद सेंसर से लेकर निशाना लगाने वाले हथियार तक की दूरी और समय को कम करना है.
यूक्रेनी अधिकारियों ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल को बताया कि रूस ने ब्रोव्दी के ठिकाने की जानकारी देने के लिए 2 करोड़ डॉलर की पेशकश की थी.
इन सभी बातों से एक दिशा साफ होती है. विवाल्डी पहले किए गए किसी ऑपरेशन जैसा नहीं है और इसकी सफलताओं ने रूस के सामने अपनी रणनीति बदलने की चुनौती खड़ी कर दी है. “किल जोन” में जिस पक्ष के पास हालात की बेहतर जानकारी और जानकारी से कार्रवाई तक पहुंचने वाला तेज सिस्टम होता है, वह बेहतर प्रदर्शन कर सकता है.
युद्ध में अभी भी रणनीति से जुड़े कई अचानक बदलाव और ऑटोमेशन से जुड़े नए प्रयोग देखने को मिल रहे हैं. युद्ध के उस “किल जोन” में जिस पक्ष के पास हालात की बेहतर जानकारी और जानकारी से कार्रवाई तक पहुंचने का तेज सिस्टम होता है, वह बेहतर प्रदर्शन कर सकता है.
DELTA: एक छिपा हुआ तंत्र
इस तरह का तालमेल अचानक नहीं बना है. मानव संसाधन की कमी से जूझते हुए यूक्रेन ने कई सालों में ड्रोन से मिलने वाली जानकारी, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, निशाना तय करने और युद्ध के मैदान से मिलने वाली रिपोर्टों को अलग-अलग स्तरों पर फैसले लेने की प्रक्रिया से जोड़ा है.
DELTA वह डिजिटल सिस्टम है, जो इस काम को यूक्रेन की अलग-अलग ड्रोन यूनिटों, बटालियनों और ब्रिगेडों के बीच आसानी से पहुंचाने में मदद करता है.
इसके चार मॉड्यूल पर खास ध्यान देना जरूरी है. मॉनिटर साझा नक्शा है. Vezha युद्ध के मैदान की वीडियो जानकारी लेता है और उसका विश्लेषण करता है. टारगेट हब हमले के मिशन तय करता है और यह सुनिश्चित करता है कि अलग-अलग हमलों के बीच टकराव न हो. मिशन कंट्रोल मानवरहित सिस्टम की गतिविधियों की योजना बनाता है और उनका रिकॉर्ड रखता है.
यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यह डिजिटल सिस्टम हवाई और जमीनी सिस्टम, सैटेलाइट और रडार को एक साथ जोड़ता है. इससे किसी लक्ष्य का पता चलने से लेकर उस पर कार्रवाई करने तक का समय घंटों या दिनों से घटकर कुछ मिनट रह गया है.
लेकिन DELTA रोबोटों के लिए एक फीडबैक सिस्टम भी है. यह जमीनी वाहनों के सामान पहुंचाने और लोगों को निकालने वाले मिशनों की पुष्टि करता है. वहीं मिशन कंट्रोल ऑपरेटरों की रिपोर्ट को ऐसे डैशबोर्ड में बदलता है, जिन्हें कमांड के अलग-अलग स्तरों पर देखा जा सकता है.
Vezha का AI की मदद से होने वाला विश्लेषण लक्ष्य का पता लगाने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है. लेकिन अभी भी यह इंसान ही तय करता है कि किसी लक्ष्य पर हमला करना है या नहीं.
यह समझने में मदद करता है कि यूक्रेन किस तरह जानकारी जुटाने, कार्रवाई करने, उससे मिले नतीजे को देखने और फिर उसमें सुधार करने की प्रक्रिया को एक साथ जोड़ पा रहा है, जबकि इंसानी भूमिका अभी भी इस पूरी व्यवस्था में बनी हुई है.
हालांकि, रूस भी अपनी रणनीति बदल रहा है और यूक्रेन की इस साइंस फिक्शन जैसी दुनिया में अभी सब कुछ तय या व्यवस्थित नहीं हुआ है.
रुबिकॉन की परीक्षा
रूस के रुबिकॉन सेंटर का रिकॉर्ड मिला-जुला और महत्वपूर्ण रहा है. 2025 में रॉब ली और दिमित्रो पुतियाता ने कहा था कि रुबिकॉन की अच्छी तरह संसाधनों से लैस हवाई ड्रोन टीमों ने यूक्रेन की कुर्स्क में घुसपैठ को पीछे हटाने और पोक्रोव्स्क तथा दूसरी जगहों के आसपास सप्लाई और ड्रोन टीमों को बाधित करने में मदद की थी. इसके पास जमीनी वाहनों की जांच करने वाली एक टुकड़ी भी है, लेकिन अभी तक उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार इसकी युद्धक क्षमता मुख्य रूप से हवाई क्षेत्र में है. उनके आकलन में तेजी से विस्तार की एक कीमत भी बताई गई है. भर्ती के मानक कमजोर होना, सहायता व्यवस्था पर दबाव बढ़ना और कुशल ऑपरेटरों के नियमित सैन्य दलों से दूर चले जाने का खतरा.
विवाल्डी ने जो बात सामने लाई है, वह किसी रणनीतिक बड़ी सफलता से ज्यादा स्थानीय कमजोरी का फायदा उठाना है. यूक्रेन के थर्ड कॉर्प्स का कहना है कि रुबिकॉन के लॉन्च ठिकानों, ऑपरेटरों और लॉजिस्टिक्स पर हमलों के कारण उसकी टुकड़ी को लाइमन-बोरोवा क्षेत्र से हटना पड़ा. दूसरी तरफ, रूस का ग्लाज/ग्रोज़ा सॉफ्टवेयर भी कुछ चुनी हुई सैन्य इकाइयों में निशाना तय करने का समय घटाकर कुछ मिनट कर सकता है, ऐसा बताया गया है. लेकिन उसके प्रस्तावित स्वोद सिचुएशनल-अवेयरनेस सिस्टम ने अभी तक DELTA जैसी व्यापक क्षमता नहीं दिखाई है.
इसलिए दोनों के बीच अंतर यह है कि दबाव के बीच तकनीक के तेज विकास के साथ सिस्टम को जोड़ने और नई परिस्थितियों के हिसाब से बदलने की क्षमता एक जैसी नहीं है. रुबिकॉन अभी भी सही परिस्थितियां मिलने पर यूक्रेन की किसी भी खुली कमजोरी या सप्लाई के रास्ते का फायदा उठा सकता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तकनीक इंसानी सोच की उस रफ्तार से भी तेज बदल रही है, जितनी तेजी से इंसान उसके बदलाव को समझ पा रहा है.
अब आगे क्या होगा
बदलाव की शुरुआती रफ्तार ने इसे देखने वालों को हैरान कर दिया है. 2004 में अमेरिका की डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी, यानी DARPA, ने बिना ड्राइवर वाले जमीनी वाहनों को मोजावे रेगिस्तान के 142 मील रास्ते को पार करने की चुनौती दी थी. कोई भी वाहन पूरा रास्ता नहीं कर पाया. सबसे अच्छा वाहन सिर्फ 7.5 मील चला था.
2026 तक आते-आते रूस-यूक्रेन युद्ध ने हर असफल मिशन और हर गलती को तुरंत सीखने और सुधार करने की प्रक्रिया में बदल दिया है. बताया जाता है कि यूक्रेन में कुछ डिजाइन से लेकर युद्ध के मैदान में इस्तेमाल तक के चक्र सिर्फ चार से पांच हफ्तों में पूरे हो रहे हैं.
अमेरिकी मरीन कॉर्प्स के रिटायर्ड बम निष्क्रिय करने वाले ऑपरेटर जॉर्ज रिवेरो को याद है कि अफगानिस्तान की एक संकरी घाटी में एक रोबोट को चलाने में उन्हें करीब 40 मिनट लगे थे, क्योंकि उसके कैमरे उसकी पटरी के नीचे की जमीन को नहीं दिखा पाते थे. यूक्रेन से उन्होंने जो सबक सीखे हैं, उनमें संचार, मरम्मत और अलग-अलग सिस्टम को एक साथ जोड़ना शामिल है.
अमेरिकी नौसेना के पूर्व सैनिक जेफ्री वेल्स का कहना है कि घायल लोगों को निकालने वाले रोबोट युद्ध के लिए वास्तव में बड़ा बदलाव ला सकते हैं. लेकिन उन्हें इतना सस्ता भी होना चाहिए कि अगर वे नष्ट हो जाएं तो उन्हें खोना और उनकी जगह नया रोबोट लाना संभव हो.
अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ वॉर पीट हेगसेथ ने बुधवार को ऑटोनॉमस वारफेयर कमांड बनाने की घोषणा की. उन्होंने पूरी संयुक्त सैन्य ताकत में रोबोटिक क्षमताओं की जरूरत पर जोर दिया.
यूरोप ने भी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है. यूरोपीय संघ और यूक्रेन का एक रक्षा-नवाचार कार्यक्रम यूक्रेन के युद्धक्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से उपकरणों का परीक्षण कर रहा है. एस्टोनिया की कंपनी मिलरेम और नीदरलैंड की कंपनी VDL ने यूक्रेन के लिए बनाए जाने वाले THeMIS जमीनी वाहनों की एक उत्पादन लाइन नीदरलैंड में शुरू की है.
चीन के रोबोट-वुल्फ प्रदर्शनों पर भी उसकी औद्योगिक क्षमता के कारण ध्यान देना चाहिए. यह क्षमता काफी बड़ी है, भले ही बीजिंग के पास यूक्रेन जैसी युद्ध में आजमाई हुई तकनीक होने का दावा नहीं है. हालांकि, अगर रूस से मिले सीधे और गोपनीय सैन्य सबक को इसमें शामिल किया जाए, तो तस्वीर अलग हो सकती है.
रूस-यूक्रेन युद्ध को देखने वाला हर व्यक्ति इससे अपने-अपने सबक ले रहा है. तकनीकी बदलाव किस दिशा में जा रहा है, इस पर भले ही कोई विवाद न हो, लेकिन अलग-अलग परिस्थितियों में उसके जवाब अलग होंगे.
यूक्रेन अपना जवाब ऐसी मशीनों से तैयार कर रहा है जो पूरी तरह सही नहीं हैं, गलतियों से सीख रहा है, तेजी से इकट्ठी और साझा की जाने वाली जानकारी का इस्तेमाल कर रहा है और ऐसे विशेषज्ञों पर भरोसा कर रहा है जो इन सभी चीजों से सीखते हैं.
भारत के लिए संकेत साफ हैं. सवाल सिर्फ अलग-अलग स्रोतों से ज्यादा ड्रोन और रोबोटिक क्षमताएं खरीदने या केवल भारतीय स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने का नहीं है. असली सवाल यह है कि अगला युद्ध कैसा होगा, इसे लेकर लंबे समय से चली आ रही अपनी धारणाओं को कैसे बदला जाए.
इसके बाद की दिशा इस बात से तय होगी कि भारतीय सैन्य रणनीतिकार इस सवाल का क्या जवाब निकालते हैं.
स्वस्ति राव ‘दिप्रिंट’ में कंसल्टिंग एडिटर (इंटरनेशनल और स्ट्रैटेजिक अफेयर्स) हैं. वह @swasrao पर ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.
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