वैश्वीकरण से पीछे हटने के कारण देशों के बीच लोगों की आवाजाही पर लगातार ज्यादा पाबंदियां लग रही हैं. इससे दुनिया में प्रवासन, रोजगार और यात्रा का पूरा परिदृश्य बदल रहा है. डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने और टैरिफ यानी आयात शुल्क को दबाव बनाने के एक तरीके के रूप में इस्तेमाल करने के बाद दुनियाभर में सामान और सेवाओं का व्यापार भी प्रभावित होगा.
इसके बाद क्या हो सकता है? अमीर देश दूसरे देशों के साथ पूंजी की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही पर भी पाबंदियां लगा सकते हैं. विकासशील देशों में पूंजी पर इस तरह के नियंत्रण लंबे समय से आम रहे हैं.
इस तरह के बड़े और अब तक लगभग अकल्पनीय कदम के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका हो सकती है. अमेरिका में बड़ी कंपनियों की बढ़ती उधारी और सरकार के बड़े बजट घाटे के बीच टकराव बढ़ रहा है. टेक्नोलॉजी और AI की दौड़ में आगे चल रही बड़ी कंपनियां कुछ समय पहले तक अपनी कमाई से नए निवेश का खर्च उठा रही थीं. लेकिन अब ऐसा नहीं है, क्योंकि उनकी निवेश योजनाएं बहुत बड़ी हो गई हैं.
अब ये कंपनियां बाज़ार से कर्ज ले रही हैं और बड़ी मात्रा में कर्ज ले रही हैं. अमेरिका में कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करने की मात्रा दो साल में 80 फीसदी बढ़ गई है. वहीं, अमेरिका का बजट घाटा बढ़कर GDP का 7 फीसदी हो गया है और इसके जल्द कम होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं.
अमेरिका की अपनी बचत इन बड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कहीं भी पर्याप्त नहीं है. यही वजह है कि अमेरिका कई दशकों से दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज लेने वाला देश रहा है. लेकिन दूसरे देशों से पूंजी की उसकी बढ़ती ज़रूरत के सामने एक और समस्या है. लगभग सभी बड़े देश अब अमेरिकी सिक्योरिटीज में निवेश से पीछे हट रहे हैं.
पिछले कुछ साल में चीन ने अमेरिकी सिक्योरिटीज में अपनी हिस्सेदारी आधी कर दी है. वहीं, जापान, जो अब अमेरिकी सिक्योरिटीज का सबसे बड़ा धारक है, उसने भी इससे दूरी बनानी शुरू कर दी है. बाज़ार में बिकने वाले अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में विदेशी हिस्सेदारी अब कुल हिस्सेदारी की 30 फीसदी रह गई है, जो 2015 में 50 फीसदी थी.
केंद्रीय बैंक जहां अपने डॉलर भंडार को कम कर रहे हैं, वहीं उन्होंने अपने रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा दी है. पिछले साल सोने ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की जगह लेकर केंद्रीय बैंकों के लिए सबसे बड़ी रिजर्व संपत्ति का स्थान हासिल कर लिया. एक साल में सोने की कीमत 25 फीसदी बढ़ी है और भारतीय अभी भी बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे हैं.
महंगाई से कर्ज को नियंत्रित करने की लड़ाई
इस तरह के कर्ज की मांग कम होने के बावजूद डॉलर में लगातार ज्यादा कर्ज जारी किया जा रहा है. ऐसे में जो होना था, वही हुआ. ब्याज दरें बढ़ गईं. अमेरिका की ट्रेजरी बॉन्ड की ब्याज दरें अब पिछले दो दशकों के सबसे ऊंचे स्तर पर हैं और अभी भी बढ़ रही हैं. इसके बावजूद, नए अमेरिकी कर्ज को खरीदने वाले अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की हिस्सेदारी पहले के मुकाबले कम हो गई है.
सिर्फ एक महीने में पांच साल के ट्रेजरी बॉन्ड की ब्याज दर 0.64 फीसदी बढ़ गई है. अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने पिछले कुछ हफ्तों में बाजार को शांत करने के लिए कई तरह की कोशिशें की हैं, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.
अगर ज्यादा ब्याज दरों के बावजूद अमेरिका को दूसरे देशों से अपनी जरूरत के मुताबिक पूंजी नहीं मिलती है, तो वह सीधे डॉलर छाप सकता है. इससे बाजार में पैसे की मात्रा बढ़ेगी और वही सामान खरीदने के लिए ज्यादा पैसा लगेगा. इससे महंगाई बढ़ेगी और वास्तविक रूप से यानी महंगाई को ध्यान में रखने के बाद अमेरिका का कर्ज का बोझ कम हो जाएगा.
भारत दशकों से ऐसा करता आया है. वास्तव में, जैसे-जैसे पश्चिमी देशों का कर्ज बढ़ा है, पिछले पांच साल में अमेरिका में महंगाई पिछले दशक के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा रही है. यूरोप में यह तीन गुना और जापान में पांच गुना ज्यादा रही है. इसे आप कर्ज को नियंत्रित करने के लिए महंगाई की लड़ाई कह सकते हैं.
इस बात की भी संभावना है. हालांकि, अभी यह दूर की बात लगती है लेकिन पूरी तरह से असंभव नहीं है, कि अमेरिका व्यापार की तरह पूंजी के मामले में भी दबाव बनाने वाला रुख अपना सकता है. ट्रंप पहले ही कुछ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में निवेश की प्रतिबद्धताओं को शामिल कर चुके हैं. आज वह दूसरे देशों से अमेरिका में निवेश लाने के लिए दबाव बना रहे हैं. कल वह अमेरिका से पैसा बाहर जाने पर भी रोक लगा सकते हैं.
इसी आशंका को देखते हुए कुछ देशों ने बचाव के कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. नीदरलैंड ने पिछले कुछ महीनों में न्यूयॉर्क से 78 टन सोना लंदन भेजा है. इसकी वजह संभावित “भू-राजनीतिक अस्थिरता” बताई गई. इससे कुछ समय पहले फ्रांस ने अपना पूरा सोना अमेरिका से बाहर निकाल लिया था. जर्मनी में भी ऐसा ही करने की मांग उठ रही है. कुछ समय पहले तक जिस बात के बारे में सोचना भी मुश्किल था, अब अमेरिका के पूंजी बाजार के लगातार खुले रहने को लेकर भरोसा थोड़ा कम होने लगा है.
इस बीच, यूरोप के विशेषज्ञों ने यूरोपीय पूंजी को अमेरिका जाने से हतोत्साहित करने की मांग की है, क्योंकि यूरोप को खुद में निवेश करने की जरूरत है. यूरोप की ओर से ऐसा कोई भी कदम उठाए जाने पर वॉशिंगटन की ओर से भी लगभग निश्चित रूप से जवाबी कदम उठाया जाएगा. यही वजह है कि सितंबर की शुरुआत में फाइनेंशियल टाइम्स की एक हेडलाइन में कहा गया था, “पूंजी की लड़ाई आने वाली है.”
भारत के लिए चिंता की बात
इन सभी घटनाओं से भारत को गंभीर चिंता होनी चाहिए. पिछले कुछ वर्षों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का पैसा भारत से बाहर जा रहा है और रुपये की कीमत में बड़ी गिरावट आई है. RBI के लगातार दखल के बावजूद रुपये की कीमत 13 फीसदी गिर गई है. वहीं, ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का असर व्यापार संतुलन पर भी पड़ रहा है.
यही वजह है कि शेयर बाजार के मुख्य सूचकांक अब करीब ढाई साल पहले के स्तर पर वापस आ गए हैं. इससे पहले आखिरी बार शेयर बाजार ने निवेशकों को लंबे समय तक निराश 2008 के वित्तीय संकट के बाद किया था.
इन हालात में RBI की सबसे बड़ी पहल अनिवासी भारतीयों यानी NRIs को एक बड़ा फायदा देना था. इसके तहत उन्हें अच्छी ब्याज दरों के साथ मुद्रा सुरक्षा भी दी गई. हो सकता है कि RBI ने इस मामले में जरूरत से ज्यादा कदम उठा दिया हो, क्योंकि इस योजना से उम्मीद से दोगुना पैसा आया. यह रकम 130 अरब डॉलर से भी ज्यादा थी.
NRIs जब उन्हें मुफ्त का फायदा दिया जाता है, तो उसे पहचानना अच्छी तरह जानते हैं. इस योजना की RBI पर लागत इस बात पर निर्भर करेगी कि मुद्रा की कीमतें किस तरह बदलती हैं. पूरी योजना के दौरान इसकी लागत 10 अरब डॉलर से 20 अरब डॉलर के बीच हो सकती है.
भारत को बड़े सुरक्षा कवच की ज़रूरत
स्वाभाविक रूप से, आलोचकों ने दो तर्क दिए हैं.
पहला, भारत के पास विदेशी मुद्रा का भंडार अच्छी स्थिति में है. ऐसा उस समय नहीं था, जब पहले मिलेनियम बॉन्ड्स और रिसर्जेंट इंडिया बॉन्ड्स के जरिए NRIs को आकर्षक ब्याज दरों पर जमा की सुविधा दी गई थी.
दूसरा, इस बार जो ऑफर दिया गया, उसकी शर्तें जरूरत से ज्यादा अच्छी थीं. दूसरा तर्क पहले से ज्यादा सही लगता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों में अनिश्चितता और तनाव को देखते हुए किसी तरह का सावधानी वाला कदम उठाना जरूरी था.
इसे ऐसे समझिए कि फरवरी के अंत से, जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था, अगस्त के अंत तक के छह महीनों में RBI का विदेशी मुद्रा भंडार 50 अरब डॉलर से थोड़ा ज्यादा बढ़ा. हालांकि, इस दौरान फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) यानी FCNR(B) जमा के रूप में करीब 130 अरब डॉलर आए थे.
न तो चालू खाते का घाटा और न ही कुल पूंजी प्रवाह इस 80 अरब डॉलर के अंतर की पूरी वजह बता सकता है. पूंजी के देश से बाहर जाने के दौरान RBI ने रुपये को संभालने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर खर्च किए हैं. इसलिए सुरक्षा के लिए कुछ अतिरिक्त डॉलर जुटाना नुकसान की बात नहीं है.
अब दो स्थितियां बन सकती हैं. अगर AI में निवेश का बुलबुला फूटता है, तो दुनियाभर में बहुत बड़ा संकट आ सकता है, क्योंकि दुनिया के कुल शेयर बाजार मूल्य में अमेरिकी शेयर बाजार की हिस्सेदारी दो-तिहाई से ज्यादा है.
अगर ऐसा नहीं होता और सरकारों और कंपनियों की लगातार कर्ज लेने की रफ्तार जारी रहती है, तो पूंजी के लिए पहले कभी न देखी गई प्रतिस्पर्धा हो सकती है. इससे महंगाई और बढ़ सकती है और/या अलग-अलग देशों के बीच पूंजी के आने-जाने पर पाबंदियां लग सकती हैं.
इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना, बजट घाटे और सरकारी कर्ज को कम करके आर्थिक सुरक्षा बढ़ाना और देश को निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक बनाना सही कदम होगा.
अतिरिक्त विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल रुपये में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने और देश से बाहर जाने वाली पूंजी की जरूरत को पूरा करने के लिए किया जा सकता है. इसका इस्तेमाल उस समय अर्थव्यवस्था की बाहरी वित्तीय स्थिति को लेकर भरोसा बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है, जब किसी को ठीक-ठीक पता नहीं है कि आगे हालात किस दिशा में जाएंगे.
टीएन नायनन बिजनेस स्टैंडर्ड के पूर्व एडिटर हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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