पिछले कुछ सालों में भारत के यूनिफाईड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) ने बड़ी तेज़ी से ऐसी अर्थव्यवस्था को डिजिटल भुगतान की ओर पहुंचाया है, जहां काफी हद तक नकद पैसे का इस्तेमाल होता था. सिर्फ इस साल मई में ही UPI के जरिए 23.2 अरब ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 30 लाख करोड़ रुपये थी, लेकिन इतने बड़े स्तर के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ जिम्मेदारी भी आती है. वित्तीय नियमों में एक ऐसी बात है, जो इस स्थिति पर बिल्कुल लागू होती है. भारत ने इसे लगभग हर जगह लागू किया है, लेकिन यहां नहीं. इसे कंसंट्रेशन रिस्क यानी किसी एक जगह बहुत ज्यादा निर्भरता का जोखिम कहा जाता है.
कंसंट्रेशन रिस्क तब पैदा होता है, जब किसी सिस्टम में बहुत ज्यादा निर्भरता बहुत कम लोगों या संस्थाओं पर हो. इसका मतलब यह नहीं है कि वे कुछ संस्थाएं खराब तरीके से काम कर रही हैं. इसका मतलब सिर्फ यह है कि अगर उनमें से कोई एक काम करना बंद कर दे, तो क्या हो सकता है.
भारत के पेमेंट सिस्टम में इस तरह का जोखिम तीन स्तरों पर है और ये तीनों एक-दूसरे के ऊपर हैं.
पहला, देश में होने वाले हर 10 डिजिटल रिटेल पेमेंट में से 8 से ज्यादा अब एक ही सिस्टम, यूपीआई, के जरिए होते हैं. दूसरा, इस सिस्टम को एक ही संस्था, नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI), तैयार करती है, चलाती है और इसका संचालन करती है. तीसरा, इसी सिस्टम पर दो ऐप्स, फोनपे और गूगल पे, करीब चार-पांचवें यानी लगभग 80% ट्रैफिक को संभालते हैं. मई 2026 में दोनों की कुल हिस्सेदारी 79% थी. यह पहली बार था जब उनकी संयुक्त हिस्सेदारी 80% से नीचे आई.
5 नवंबर 2020 को NPCI ने एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें किसी भी एक थर्ड-पार्टी ऐप को UPI के कुल मासिक ट्रांजैक्शन के 30% से ज्यादा हिस्से की अनुमति नहीं दी गई थी. NPCI ने कहा था कि वह ऐसा “जोखिमों से निपटने और UPI सिस्टम की सुरक्षा के लिए” कर रहा है. उस समय इस सीमा से ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाले पुराने ऐप्स को इसे लागू करने के लिए दिसंबर 2022 तक का समय दिया गया था. इस समयसीमा को दो बार आगे बढ़ाया जा चुका है और अब यह 31 दिसंबर 2026 तक कर दी गई है. लेकिन एक सवाल का अब तक पर्याप्त जवाब नहीं दिया गया है कि ऐसा क्यों किया गया.
अनचाहे असर
सोचिए कि जब UPI काम करना बंद कर देता है तो क्या होता है. 2025 के दौरान UPI कई बार बंद हुआ. इनमें से सिर्फ एक बार, 12 अप्रैल को, NPCI ने सही तरीके से बताया कि ऐसा क्यों हुआ था. किसी वेतन पाने वाले व्यक्ति के लिए चार घंटे तक UPI का काम न करना सिर्फ परेशानी की बात है, लेकिन ठेले वाले या ऑटो ड्राइवर के लिए इसका मतलब एक दिन की कमाई का नुकसान हो सकता है क्योंकि उनके पास कार्ड मशीन नहीं होती, दूसरा ऐप नहीं होता और कोई दूसरा विकल्प भी नहीं होता.
इसके बाद धोखाधड़ी का मामला आता है. इस मामले में हमारा रिकॉर्ड जितना खराब है, हम उतना मानते नहीं हैं. यहां भी कुछ गिने-चुने प्लेटफॉर्म पर ज्यादा निर्भरता पूरे सिस्टम की कमजोरियों को बढ़ा सकती है. सरकार ने संसद में दिए अपने जवाब में बताया है कि नवंबर 2025 तक UPI से जुड़ी 10.64 लाख धोखाधड़ी की घटनाएं हुईं, जिनमें 805 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. वहीं, पांच साल में डिजिटल पेमेंट से जुड़ी करीब 5.86 लाख धोखाधड़ी के मामले सामने आए, जिनमें 3,590 करोड़ रुपये की रकम शामिल थी.
क्या इस बात का कोई सबूत है कि कंसंट्रेशन से ही कंज्यूमर्स के लिए हालात और खराब होते हैं, न कि सिर्फ अस्त-व्यस्त होने से? हां, और यह सबूत एक ऐसे देश से आया है जो भारत से भी आगे इस रास्ते पर चल चुका है. 2024 की एक स्टडी, ‘फिनटेक मोनोपॉली एंड सिस्टमिक रिस्क’ में, चीन के रिसर्चर्स ने तर्क दिया कि रेगुलेटर्स को फिनटेक के दबदबे पर रोक लगानी चाहिए और फेयर कॉम्पिटिशन को बढ़ावा देना चाहिए. इस बात की ओर इशारा करते हुए कि चीन के डिजिटल पेमेंट मार्केट में दो मोबाइल एप्लिकेशन्स का 94 परसेंट हिस्सा है, वे “गंभीर रिस्क कंटेजियन” की चेतावनी देते हैं, जहां एक प्लेटफॉर्म पर परेशानी पूरे फाइनेंशियल सिस्टम में फैल जाती है.
ग्लोबल रिसर्च हमें क्या बताती है
जुलाई में पब्लिश हुए दो पेपर्स भारत के लिए काम के पॉइंटर्स देते हैं—‘रिटेल डिजिटल पेमेंट्स में कॉम्पिटिशन’ पर बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) का बुलेटिन पेपर और ‘फाइनेंशियल सर्विसेज़ में बिगटेक’ पर IMF का टेक्निकल नोट.
BIS के पेपर में UPI का उदाहरण एक ऐसे सिस्टम के तौर पर दिया गया है, जो खुला है और अलग-अलग ऐप्स के बीच काम करता है. लेकिन इसके बावजूद यूजर्स के सामने वाले बाज़ार में करीब 80% हिस्सेदारी अभी भी दो कंपनियों की है. IMF ने इससे जुड़ी एक और चिंता पर ध्यान दिया है. बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां नेटवर्क के असर का फायदा उठाकर लोन समेत दूसरी वित्तीय सेवाओं में भी अपना कारोबार बढ़ा सकती हैं.
इन दोनों रिसर्च से भारत के लिए ये बातें सामने आती हैं:
1. सिर्फ अलग-अलग ऐप्स के बीच काम करने की सुविधा से प्रतिस्पर्धा की गारंटी नहीं होती
UPI को शुरुआत से ही अलग-अलग ऐप्स के बीच काम करने वाला सिस्टम बनाया गया था. यूजर्स किसी दूसरे ऐप का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को पैसे भेज सकते हैं और दुकानदार अलग-अलग ऐप्स से पेमेंट ले सकते हैं, लेकिन इससे बाजार में कुछ ही कंपनियों का दबदबा बनने से नहीं रुका. ऐसा क्यों?
क्योंकि पेमेंट ऐप्स को नेटवर्क का फायदा मिलता है. ग्राहक उस ऐप का इस्तेमाल करना चाहते हैं, जिसे हर जगह स्वीकार किया जाता है. दुकानदार उस ऐप को स्वीकार करना चाहते हैं, जिसका इस्तेमाल ग्राहक पहले से कर रहे हैं. एक बार कोई ऐप आगे निकल जाता है, तो उसके लिए और बड़ा होना आसान हो जाता है. अलग-अलग ऐप्स के बीच काम करने की सुविधा प्रतिस्पर्धा के लिए ज़रूरी है, लेकिन जब बाजार पहले ही कुछ बड़ी कंपनियों की तरफ झुक चुका हो, तो सिर्फ इससे प्रतिस्पर्धा पैदा करना शायद काफी नहीं होता.
2. पेमेंट ऐप्स दूसरी वित्तीय सेवाओं तक पहुंचने का जरिया बन सकते हैं
IMF ने चेतावनी दी है कि पेमेंट के क्षेत्र में BigTech कंपनियों का दबदबा सिर्फ पेमेंट तक सीमित नहीं रह सकता. बड़े पेमेंट प्लेटफॉर्म अपने बड़े स्तर, डेटा और पहले से मौजूद यूजर्स का इस्तेमाल करके दूसरी वित्तीय सेवाओं में भी जा सकते हैं. इससे ऐसी निर्भरता पैदा हो सकती है, जिसे बाद में खत्म करना मुश्किल हो.
IMF ने “loss-leader” रणनीति के जोखिम की भी बात कही है. इसमें कंपनियां ज्यादा यूजर्स और बड़ा कारोबार हासिल करने के लिए अपनी सेवाएं बहुत कम कीमत पर देती हैं, लेकिन बाद में इससे प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है और ग्राहकों के पास विकल्प कम हो सकते हैं.
चिंता सिर्फ इस बात की नहीं है कि आज पेमेंट के क्षेत्र में किसका दबदबा है, बल्कि यह भी है कि कल उस दबदबे से क्या-क्या किया जा सकता है.
3. कुछ ही कंपनियों पर निर्भरता रणनीतिक सवाल खड़े करती है
सबसे बड़े दो ऐप्स, फोन पे और गूगल पे, ऐसी कंपनियों के नियंत्रण में हैं, जिनका मुख्यालय भारत के बाहर है. इनमें से एक अमेरिका की एक रिटेल कंपनी के नियंत्रण में है और दूसरा अमेरिका की एक टेक्नोलॉजी कंपनी के नियंत्रण में है.
सिर्फ इस वजह से UPI में उनकी मौजूदगी को समस्या नहीं कहा जा सकता. लेकिन UPI अब सिर्फ कोई दूसरा पेमेंट प्रोडक्ट नहीं है. यह देश का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बन चुका है और हर महीने 23 अरब से ज्यादा ट्रांजैक्शन प्रोसेस करता है. जब इतने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर का इतना बड़ा हिस्सा कुछ ही ऐप्स पर निर्भर हो, तो डेटा की व्यवस्था, सिस्टम की मजबूती और लगातार काम करते रहने जैसे सवालों पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है.
भारत ने UPI को कुछ हद तक इसलिए बनाया था ताकि विदेशी कार्ड नेटवर्क पर अपनी निर्भरता कम की जा सके. लेकिन अब पेमेंट ऐप्स के मामले में भी ऐसी ही निर्भरता बन गई है.
4. एक ऑपरेशनल जोखिम
कुछ ही कंपनियों पर निर्भरता सिर्फ प्रतिस्पर्धा का मामला नहीं है. अगर करीब आधे UPI ट्रांजैक्शन संभालने वाला कोई ऐप लंबे समय तक बंद हो जाए, साइबर हमले का शिकार हो जाए या किसी नियामकीय वजह से उसका काम रुक जाए, तो उस ट्रैफिक का क्या होगा?
सैद्धांतिक तौर पर यूजर्स आसानी से दूसरे ऐप पर जा सकते हैं, लेकिन असल में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि किसी संकट के बीच लाखों यूजर्स दूसरा UPI ऐप डाउनलोड करें, उसमें अपना अकाउंट बनाएं और उसे सेटअप करें.
इसलिए ज्यादा अलग-अलग ऐप्स वाला सिस्टम सिर्फ बेहतर प्रतिस्पर्धा के लिए जरूरी नहीं है. यह सिस्टम को संकट के समय मजबूत बनाए रखने का भी एक तरीका है.
वह प्रतियोगी जो कभी आया ही नहीं
यह याद रखना जरूरी है कि रिजर्व बैंक ने एक बार इस समस्या की बीच वाली लेयर को ठीक करने की कोशिश की थी. 2019 में उसने New Umbrella Entities का प्रस्ताव दिया था. ये ऐसे रिटेल पेमेंट नेटवर्क होते, जो NPCI के साथ-साथ काम करते, ताकि देश किसी एक ही ऑपरेटर पर निर्भर न रहे. 2020 में इसके लिए आवेदन मांगे गए थे, लेकिन अगले ही साल इस प्रक्रिया को चुपचाप रोक दिया गया.
संसद में भी यह चिंता नई नहीं है. संसदीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी की स्थायी समिति ने 2023 में बताया था कि भारत में ही विकसित BHIM UPI की UPI ट्रांजैक्शन में हिस्सेदारी संख्या के हिसाब से सिर्फ 0.22% थी. इसके मुकाबले गूगल पे की हिस्सेदारी 36.39% और फोनपे की 46.91% थी. गूगल और वॉलमार्ट दोनों विदेशी कंपनियां हैं और इन्हीं के पास इन दोनों ऐप्स का मालिकाना हक या बड़ी हिस्सेदारी है.
समिति ने यह भी कहा था कि जब ऐप्स का मालिकाना हक विदेश में हो और वे कई देशों के नियमों के तहत काम करते हों, तो नियामकों के लिए इन ऐप्स को जवाबदेह ठहराना ज्यादा मुश्किल हो जाता है. समिति ने फिनटेक क्षेत्र में भारतीय कंपनियों को बढ़ावा देने पर ज्यादा ध्यान देने की सिफारिश की थी.
दो साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी लगभग कुछ नहीं बदला है.
दिसंबर में क्या होना चाहिए
2020 में 30% की सीमा इसलिए तय की गई थी क्योंकि NPCI ने खुद माना था कि कुछ ही कंपनियों के पास ज्यादा हिस्सेदारी होना उसके चलाए जा रहे सिस्टम के लिए जोखिम है. लेकिन हर बार समयसीमा बढ़ाए जाने के साथ यह बहुत कम बताया गया है कि ऐसा क्यों किया गया और क्या बदला है. क्या अब यह जोखिम खत्म हो गया है? या फिर इसे किसी दूसरे तरीके से दूर कर दिया गया है?
अगर 30% की सीमा सही तरीका नहीं है, तो NPCI को साफ तौर पर यह बताना चाहिए, इस नियम को खत्म करना चाहिए और संसद, नियामक और इंडस्ट्री के साथ खुले तौर पर चर्चा शुरू करनी चाहिए. अगर यह सही तरीका है, तो इसे लागू किया जाना चाहिए.
UPI को शुरू हुए 10 साल हो चुके हैं. ऐसे में वित्त मंत्रालय को यह भी देखना चाहिए कि क्या कुछ ही कंपनियों पर निर्भरता सिर्फ सिस्टम की जगह ऐप्स के स्तर पर चली गई है. साथ ही, इसका प्रतिस्पर्धा, डेटा की व्यवस्था, सिस्टम की मजबूती और लगातार काम करते रहने की क्षमता पर क्या असर पड़ता है, इसकी भी जांच होनी चाहिए.
कार्ति पी. चिदंबरम शिवगंगा से सांसद हैं और ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं. उनका एक्स हैंडल @KartiPC है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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