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Wednesday, 30 September, 2026
होममत-विमतनागालैंड ने नया राज्य बनाए बिना पुरानी मांग का जवाब खोज लिया है. क्या FNTA काम करेगा?

नागालैंड ने नया राज्य बनाए बिना पुरानी मांग का जवाब खोज लिया है. क्या FNTA काम करेगा?

फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) ने बोडोलैंड और दार्जिलिंग के मॉडल से कुछ चीजें ली हैं, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कोहिमा इसे वास्तव में कितनी ताकत, पैसा और राजनीतिक जगह देता है.

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सिलीगुड़ी यानी ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर को पार करने के बाद जब कोई उत्तर बंगाल से पूर्व की ओर असम में ब्रह्मपुत्र की तरफ जाता है, तो वह 1873 के बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन से चले आ रहे इनर लाइन परमिट सिस्टम तक पहुंचता है. यह नागालैंड की सीमा को चिन्हित करता है. भारत की पूर्वी सीमा के इस जुड़े हुए हिस्से में तीन राज्य सरकारों के सामने एक जैसी समस्या रही है: बिना राज्य का नक्शा बदले, जातीय मांगों का जवाब कैसे दिया जाए?

तीनों ने इसके लिए एक क्षेत्रीय संस्था का रास्ता चुना. गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) 2011 में बना, बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) 2003 में बना. 2020 के समझौते के बाद इसका नाम बदलकर बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन कर दिया गया. अब फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) भी इसी रास्ते पर है.

भाई-बहन या दूर के रिश्तेदार?

कागज़ पर तीनों एक जैसे लगते हैं, लेकिन कानून और व्यवहार में ये दूर के रिश्तेदार हैं. तीनों को साथ रखकर देखने से भारत में अलग-अलग स्तर की संघीय व्यवस्था यानी असिमेट्रिक फेडरलिज्म की संभावनाओं और सीमाओं के बारे में काफी कुछ पता चलता है.

सबसे पहला और सबसे बड़ा अंतर यह है कि हर संस्था को अपनी ताकत कहां से मिलती है. BTC संविधान की छठी अनुसूची के तहत बना है. इसकी शक्तियां खुद संविधान में दी गई हैं. दिसपुर यानी असम सरकार इन शक्तियों को कानून बनाकर खत्म नहीं कर सकती. काउंसिल का आकार या उसका क्षेत्र बदलने के लिए संसद को संविधान में संशोधन करना होगा. यही संवैधानिक सुरक्षा इसकी ताकत है, लेकिन यही इसकी कमजोरी भी है. 2020 के समझौते में काउंसिल की सीटें बढ़ाकर 60 करने का वादा किया गया था. इसके लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत है, लेकिन यह प्रक्रिया इतनी धीमी है कि घोंघा भी इससे तेज चल सकता है.

दूसरी तरफ, GTA और FNTA दोनों ही तीन पक्षों के बीच हुए समझौतों से बने हैं और इन्हें राज्य के कानून के जरिए लागू किया गया है. इससे इनकी व्यवस्था कमजोर हो जाती है, क्योंकि जो विधानसभा कानून बना सकती है, वह उसे खत्म भी कर सकती है. राज्य सरकार सिर्फ चुनाव न कराकर भी अथॉरिटी को काम करने से रोक सकती है. GTA के मामले में चुनाव पांच साल तक टाल दिए गए थे.

FNTA की कानूनी स्थिति थोड़ी अलग है. बिल में इसे 46 ट्रांसफर किए गए विषयों पर कानून, नियम और नियमावली बनाने की ताकत दी गई है. हालांकि, इसके लिए राज्य स्तर की तय प्रक्रिया और राज्यपाल की मंजूरी ज़रूरी होगी. दरअसल, FNTA के कानून को लागू करने में देरी इसलिए हुई क्योंकि सॉलिसिटर जनरल ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि क्या राज्य विधानसभा सामान्य कानून के जरिए कानून बनाने की पूरी शक्ति किसी संस्था को दे सकती है. गृह मंत्रालय भी इस राय से सहमत था. इसलिए FNTA की ‘कानून बनाने’ की शक्ति को असल में ऐसी शक्ति के तौर पर समझना बेहतर है, जो राज्य सरकार से दी गई है और जिसे स्वायत्तता की भाषा में पेश किया गया है.

अनुच्छेद 371A और छठी अनुसूची

यहां एक साफ सवाल उठता है. अगर छठी अनुसूची संवैधानिक सुरक्षा देती है, तो ईस्टर्न नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) ने 2011 में दिए गए चार स्वायत्त जिला परिषदों के प्रस्ताव को क्यों ठुकरा दिया था? इसके साथ राज्य की तरफ से 500 करोड़ रुपये और केंद्र की तरफ से 300 करोड़ रुपये का पैकेज भी दिया गया था.

इसका जवाब अनुच्छेद 371A में है. यह पहले से ही नागाओं की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं, पारंपरिक कानून और प्रक्रिया, पारंपरिक कानून के अनुसार दिए जाने वाले न्याय और ज़मीन और उसके संसाधनों के मालिकाना हक और उनके ट्रांसफर की सुरक्षा करता है.

इसलिए, छठी अनुसूची के तहत बनी कोई काउंसिल, जैसे मोन में कोन्याक समुदाय के लिए, उन्हें वे शक्तियां बनाए रखने देती जो उनके पास पहले से थीं. लेकिन इसके साथ एक ऐसी निगरानी व्यवस्था भी आती, जो राज्यपाल के प्रति जवाबदेह होती. इसके अलावा, कोहिमा के लिए चार अलग-अलग काउंसिल के साथ काम करना एक संयुक्त टेरिटोरियल अथॉरिटी के मुकाबले आसान होता.

तीनों को क्या नहीं दिया गया

यह देखना भी ज़रूरी है कि तीनों राज्यों ने इन संस्थाओं को क्या-क्या शक्तियां नहीं दीं. इनमें से किसी भी संस्था के पास पुलिस या कानून-व्यवस्था का नियंत्रण नहीं है. किसी के पास वरिष्ठ अधिकारियों का अपना कैडर नहीं है. कोई भी अपने नाम से कर्ज नहीं ले सकती. नागालैंड में भूविज्ञान और खनन अब भी पूरी तरह राज्य सरकार के पास है. यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि अनुच्छेद 371A के तहत तेल और खनिजों को लेकर लंबे समय से विवाद चलता रहा है.

ऑटोनॉमी का असली मतलब

राज्य बनने का इतिहास एक सावधान करने वाला उदाहरण देता है. तेलंगाना के आंध्र के साथ विलय से पहले 1956 के जेंटलमैन एग्रीमेंट में एक क्षेत्रीय परिषद, रोजगार और शिक्षा में सुरक्षा और खर्च में उचित हिस्से का वादा किया गया था, लेकिन धीरे-धीरे इन सभी आश्वासनों को कमजोर कर दिया गया. इसका नतीजा 1969 का आंदोलन रहा और आखिरकार 2014 में राज्य का बंटवारा हुआ. इससे यह सीख मिलती है कि अगर किसी व्यवस्था की सुरक्षा किसी बड़े राजनीतिक बहुमत की इच्छा पर निर्भर हो, तो वह धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है. जिस शिकायत को दूर करने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी, वह फिर वापस आ सकती है.

नागालैंड का भी कुछ ऐसा ही इतिहास रहा है. जब 1963 में नागालैंड राज्य बना था, तब अनुच्छेद 371A के तहत शुरू में 10 साल के लिए तुएनसांग के लिए राज्यपाल को विशेष जिम्मेदारी दी गई थी और एक क्षेत्रीय परिषद बनाई गई थी. इसके साथ तुएनसांग मामलों के लिए एक मंत्री भी था. 1970 के दशक में यह व्यवस्था खत्म कर दी गई. आज जिस शिकायत का समाधान करने की कोशिश हो रही है, वह काफी हद तक इसी व्यवस्था को खत्म करने से पैदा हुई थी. FNTA की भी 10 साल बाद समीक्षा होनी है. अगर तब तक पर्याप्त प्रगति नहीं हुई, तो ENPO समीक्षा वाले प्रावधान को अलग राज्य की मांग की ओर जाने के लिए खुला दरवाजा मान सकता है.

पैसे का हिसाब

तीनों मामलों में आखिरकार ऑटोनॉमी का आधार पैसा ही है. तीनों में एक जैसी कमी है: पैसा राज्य के खजाने के जरिए जाता है.

2003 के समझौते के तहत BTC को केंद्र से हर साल 100 करोड़ रुपये का पैकेज मिला था और 2020 के समझौते के तहत 1,500 करोड़ रुपये मिले. GTA को केंद्र की ओर से तीन साल तक हर साल 200 करोड़ रुपये देने का वादा किया गया था. इसके बाद वह राज्य सरकार से मिलने वाले फंड पर निर्भर रहा. भर्ती और कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर विवाद भी पैसे से जुड़े विवादों जितने ही नुकसानदायक रहे हैं.

कम से कम कागज पर FNTA दोनों से आगे है. राज्य के बजट में इसके लिए अलग मेजर सब-हेड होगा. इससे इसके लिए तय पैसा साफ दिखाई देगा और इसे चुपचाप किसी दूसरे काम में नहीं लगाया जा सकेगा. पैसे का बंटवारा आबादी और क्षेत्रफल को मिलाकर तय किए गए फॉर्मूले के आधार पर होगा. बड़े और कम आबादी वाले क्षेत्र के लिए यह महत्वपूर्ण है. इसके खातों की CAG जांच करेगा.

विधानसभा का गणित

राजनीतिक ताकत सबसे कम चर्चा में आने वाला मुद्दा है और शायद सबसे महत्वपूर्ण भी. दार्जिलिंग की पहाड़ियों से पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यों वाली विधानसभा में सिर्फ 3 विधायक आते हैं. यानी विधानसभा का करीब 1 प्रतिशत. बोडोलैंड के विधायक असम की 126 सदस्यों वाली विधानसभा में सिर्फ 10 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा हैं. पूर्वी नागालैंड के 20 विधायक 60 सदस्यों वाली विधानसभा का एक-तिहाई हैं.

यही ‘एक-तिहाई’ FNTA की असली ताकत है. कोहिमा की कोई भी सरकार इसे आसानी से नजरअंदाज नहीं कर सकती. यह उसे ऐसी सुरक्षा देता है, जो गोरखाओं के पास कभी नहीं थी. बिल में इसका कुछ ध्यान रखा गया है. 20 विधायक अथॉरिटी में पदेन सदस्य होंगे, लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होगा. इससे उन्हें फैसलों की मेज पर जगह मिलेगी, लेकिन वे अकेले अथॉरिटी पर हावी नहीं हो सकेंगे, लेकिन इससे एक संभावित टकराव भी पैदा होता है: चीफ एग्जीक्यूटिव मेंबर और उन्हीं जिलों के विधायक और मंत्री. कोकराझार और दार्जिलिंग दोनों में इस तरह के टकराव के उदाहरण देखे गए हैं.

काम करने में तालमेल की समस्या

FNTA सचिवालय का प्रमुख एक IAS अधिकारी होगा. बेहतर होगा कि वह एडिशनल चीफ सेक्रेटरी स्तर का हो और प्रिंसिपल सेक्रेटरी से नीचे का न हो. BTC और GTA में भी इसी तरह की व्यवस्था है. तीनों मामलों में अधिकारी के करियर से जुड़े फायदे राज्य की राजधानी से ज्यादा जुड़े होते हैं, क्षेत्रीय संस्था से नहीं. मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि जब नबन्ना में राजनीतिक नेतृत्व और GTA के बीच टकराव होता है, तो काम पूरी तरह रुक जाता है.

FNTA की नींव ज्यादा मजबूत है

FNTA की एक खास बात है, जिसका बाकी दोनों में कोई उदाहरण नहीं मिलता. FNTA मौजूदा गांव की परिषदों, गांव बुराओं और जनजातीय होहो के ऊपर बनाई गई है, उन्हें हटाकर नहीं. 1873 का बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन और पंचायती राज से मिली छूट भी जारी रहेगी. इसके उलट, दार्जिलिंग में तीन-स्तरीय पंचायत व्यवस्था खत्म होने के बाद GTA और गांव के बीच एक खाली जगह बन गई.

एक्ट ईस्ट या पूर्वी सीमा पर बाड़?

FNTA के पक्ष में रणनीतिक तर्क देना आसान है. पूर्वी जिलों की म्यांमार के साथ करीब 215 किलोमीटर लंबी सीमा है और लॉन्गवा, पांगशा और अवाखुंग में तीन अधिसूचित व्यापार केंद्र हैं. कोन्याक समुदाय के रिश्तेदारी के नेटवर्क सीमा के दोनों तरफ हैं. एक मजबूत स्थानीय अथॉरिटी ऐसी सड़कें बना सकती है, जो इन सीमा केंद्रों को चिन्डविन घाटी तक जाने वाले रास्तों में बदल दें.

लेकिन सरकार की बाकी नीतियां इसके उलट दिशा में जाती हैं. 2024 में फ्री मूवमेंट रिजीम को खत्म कर दिया गया और उसकी जगह एक पास सिस्टम लागू किया गया, जो सात दिन और 10 किलोमीटर तक के लिए मान्य है. सीमा पर करीब 31,000 करोड़ रुपये की लागत से बाड़ लगाई जा रही है. व्यापार केंद्र असल में खराब सड़कों के आखिर में बने छोटे शेड से ज्यादा कुछ नहीं हैं. वहीं सीमा के दूसरी तरफ गृह युद्ध से जूझ रहा एक देश है. FNTA भारत की तरफ की सड़क ठीक कर सकता है, लेकिन वह सीमा नीति नहीं बदल सकता और न ही म्यांमार की स्थिति बदल सकता है.

अरुणाचल, असम, मेघालय और मणिपुर में असर

अरुणाचल प्रदेश के तिराप, चांगलांग और लोंगडिंग जिले ENPO के शुरुआती नक्शे का हिस्सा थे. यहां भी वही जनजातियां, वही भौगोलिक स्थिति और वही शिकायतें हैं. मणिपुर के कुकी-जो समुदाय सवाल करेगा कि अगर पूर्वी नागाओं के लिए राजनीतिक समझौता हो सकता है, तो उनके लिए क्यों नहीं. कार्बी आंगलोंग, दीमा हसाओ और गारो हिल्स भी अपनी स्थिति बेहतर करने की मांग कर सकते हैं.

लेकिन FNTA को दोहराना उतना आसान नहीं है, जितना इसे लेकर ‘डोमिनो इफेक्ट’ की बात से लगता है. FNTA कुछ असामान्य परिस्थितियों की वजह से संभव हुआ: एक ही संगठन ने मांग रखी, आंदोलन हिंसक नहीं था, क्षेत्र को लेकर कोई दूसरी दावेदारी नहीं थी, राज्य सरकार सहयोग कर रही थी और संविधान में ऐसी व्यवस्था के लिए पर्याप्त जगह थी. मणिपुर में इनमें से कोई भी स्थिति मौजूद नहीं है.

तीन सबसे ज़रूरी बातें

बोडोलैंड और दार्जिलिंग से यह सीख मिलती है कि ऐसे समझौतों का भविष्य आमतौर पर सिर्फ उनके लिखे हुए नियम तय नहीं करते. तीन चीजें ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं: क्या पैसा समय पर मिलता है, क्या अधिकारी क्षेत्रीय संस्था के प्रति जवाबदेह होते हैं और क्या क्षेत्रीय और राज्य के नेता एक ही राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा होते हैं.

FNTA के पास दोनों पुराने उदाहरणों के मुकाबले पैसों को लेकर ज्यादा साफ व्यवस्था है, लेकिन BTC के मुकाबले इसकी कानूनी सुरक्षा कमजोर है. इसका भविष्य इसके 46 विषयों से नहीं, बल्कि कोहिमा के पहले बजट से तय होगा. यह भी महत्वपूर्ण होगा कि तुएनसांग में FNTA सचिवालय का प्रशासनिक प्रमुख कोहिमा के मुख्यमंत्री का भरोसा बनाए रख पाता है या नहीं.

हां, यह एक चुनौती है, लेकिन ऐसी चुनौती है जिसे दूर किया जा सकता है.

यह हिमालयी क्षेत्र दार्जिलिंग-कलिम्पोंग और आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों में राजनीतिक समझौतों पर चार कॉलम की सीरीज़ का आखिरी लेख है, जिन्हें अब अष्टलक्ष्मी कहा जाता है—धन और समृद्धि की आठ बहनें.

संजीव चोपड़ा सेंटर फॉर कंटेंपररी स्टडीज़, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी (PMML), नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं, जहां उनकी फेलोशिप का टॉपिक है बॉर्डर्स, बाउंड्रीज़ एंड ब्लूवाटर्स ऑफ भारत. वे पद्मश्री मेजर बॉब खाथिंग की बायोग्राफी पर भी काम कर रहे हैं, जो नगालैंड के पूर्व चीफ सेक्रेटरी और बर्मा में भारत के एम्बेसडर थे. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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