“बंगाल जल रहा है”—यह वाक्य याद है?
जब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में सत्ता में थी, तब राज्य में होने वाली कोई भी थोड़ी-बहुत तनाव वाली घटना राष्ट्रीय आपातकाल जैसी बन जाती थी. टीवी स्टूडियो में ममता बनर्जी के इस्तीफे की मांग होने लगती थी. प्रतिनिधिमंडल राजभवन तक मार्च करते थे. राज्यपाल को याचिकाएं दी जाती थीं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता तुरंत राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करते थे. मुख्यधारा का मीडिया बंगाल को अराजकता वाली जगह के रूप में दिखाता था. यह तब भी होता था जब राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बार-बार कोलकाता को भारत का सबसे सुरक्षित महानगर बताते थे.
लेकिन आज हैरानी की बात है कि बंगाल राष्ट्रीय नज़रों से और टीवी स्क्रीन से जैसे गायब हो गया है. विपक्षी पार्टियों पर लगातार हमले हो रहे हैं और उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. विपक्षी पार्टियों के दफ्तरों में तोड़फोड़ की जा रही है और उम्मीदवारों को गिरफ्तार किया जा रहा है. छात्रों को धमकाया जा रहा है. तीन बार की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बार-बार सार्वजनिक कार्यक्रम करने से रोका जा रहा है. टीएमसी कार्यकर्ताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है. लेकिन पहले जैसी लगातार टीवी कवरेज और गुस्से में बोलने वाले टीवी पैनलिस्ट कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं. “बंगाल जल रहा है” वाली भाषा अब बंद हो गई है. क्यों? क्योंकि अब बंगाल में बीजेपी की सरकार है.
बंगाल में जो हो रहा है, वह सिर्फ राजनीतिक सत्ता में बदलाव नहीं है. यह बंगाल को बीजेपी की अपनी पसंद की राजनीतिक प्रयोगशाला की तरह बनाने की कोशिश है. इसमें राज्य की बहुत ज्यादा ताकत, आक्रामक हिंदुत्व, पूरे विपक्ष को कमजोर करना, पुलिस का दुरुपयोग और पसंदीदा कॉरपोरेट हितों के करीब रहना शामिल है.
इसके साथ राज्य की तरफ से शाकाहारी भोजन को बढ़ावा देने के संकेत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में बड़ी बढ़ोतरी और गॉडमैन और बाबाओं को आधिकारिक पहचान मिलना भी जुड़ गया है. यह परेशान करने वाला बदलाव एक नई और चिंताजनक प्रवृत्ति है. इसे बंगाल का “गुजरातीकरण” कहा जा सकता है.
यहां “गुजरातीकरण” का मतलब गुजरात के लोगों के बारे में किसी तरह की टिप्पणी करना नहीं है. गुजरात के लोगों की पहचान मेहनत और कारोबार करने की अच्छी भावना और उम्मीद भरे रवैये से होती है. इसके बजाय यहां “गुजरातीकरण” से मतलब बीजेपी के बनाए शासन के एक मॉडल से है. इसके हिस्सों में राज्य की ताकत के सहारे चलने वाली सख्त बहुसंख्यकवादी राजनीति शामिल है. बंगाल की विविधता वाली और हर मुद्दे पर बहस करने वाली संस्कृति को पीटकर एक जैसी ‘हिंदुत्व’ वाली सोच में ढालने की कोशिश हो रही है.
इस ‘गुजरातीकरण’ मॉडल की एक बड़ी पहचान असहमति को अपराध की तरह देखना है. गुजरात में धारा 144 और उससे जुड़े पुलिस कानूनों के तहत रोक लगाने वाले आदेश इतनी बार लगाए गए हैं कि आपातकालीन शक्तियां नागरिक जीवन का लगभग स्थायी हिस्सा बन गई हैं. शांतिपूर्ण प्रदर्शन को संवैधानिक अधिकार के तौर पर नहीं, बल्कि पुलिस की अनुमति पर निर्भर विशेषाधिकार के तौर पर देखा जाता है. प्रदर्शनों को खत्म कराया जा सकता है और आलोचकों को हिरासत में लिया या उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है.
गुजरात हाई कोर्ट को खुद अहमदाबाद पुलिस की ओर से बार-बार लगाए गए धारा 144 के आदेशों को रद्द करना पड़ा. ये आदेश 2019 के CAA विरोधी प्रदर्शनों से लेकर 2025 तक लगाए गए थे. इनका इस्तेमाल लोगों को इकट्ठा होने से रोकने और नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए किया गया था. कोर्ट ने कहा कि इतनी व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता, जैसा कि गुजरात की बीजेपी सरकार करती है.
पिछले साल गुजरात के देवभूमि द्वारका कलेक्टरेट ने सरकारी दफ्तरों के पास धरना, भूख हड़ताल, बैठक, जुलूस और चार से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था.
इसी तरह पुलिस वाला राज्य बनाया जाता है. इसके लिए जरूरी नहीं कि चुनावों को औपचारिक रूप से खत्म कर दिया जाए. इसके बजाय असहमति को व्यावहारिक रूप से असंभव बनाया जाता है. नागरिक वोट तो दे सकते हैं, लेकिन अक्सर वे खुले तौर पर इकट्ठा नहीं हो सकते. बोलने की आजादी का इस्तेमाल करने पर पुलिस की निगरानी, हिरासत या मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है. सत्ता में बैठे लोग हर जगह दिखाई देते हैं. विपक्ष में रहने वाले लोग, चाहे वे राजनीति में हों या सिविल सोसायटी में, उन्हें सार्वजनिक जगहों पर मौजूद रहने की अनुमति नहीं दी जाती और धीरे-धीरे वे दिखाई देना बंद हो जाते हैं.
राज्य की बहुत बड़ी ताकत और सख्त हिंदुत्व को मिलाने वाला यह ‘गुजरात मॉडल’ अब बंगाल में भी लाया जा रहा है.
‘गुजरातीकरण’ की पांच खास बातें
यहां बंगाल के ‘गुजरातीकरण’ के पांच उदाहरण दिए गए हैं.
‘गुजरातीकरण’ की पहली खास बात है डर. अक्टूबर में होने वाले नंदीग्राम उपचुनाव में तृणमूल के उम्मीदवार ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद अपना नाम वापस ले लिया. इसके कुछ मिनट बाद जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन किया, तो प्रधान को एक पुराने मामले में वारंट के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया. रेजीनगर में हुमायूं कबीर की पार्टी के पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया गया है. ममता बनर्जी को विरोध प्रदर्शन और बैठकें करने के लिए बार-बार पुलिस की अनुमति नहीं दी गई. श्रीरामपुर में एक कार्यक्रम करने के लिए भी उन्हें बार-बार हाई कोर्ट जाना पड़ा. यह गुजरात मॉडल का इस्तेमाल होते हुए दिखाता है. इसमें विपक्ष को लोकतांत्रिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि कुचलने और खत्म करने वाले दुश्मन के रूप में देखा जाता है. पूरे बंगाल में दर्जनों विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ गिरफ्तारियां, हमले और FIR दर्ज की गई हैं.
बंगाल के ‘गुजरातीकरण’ की दूसरी खास बात है पुलिस का बदलना. पुलिस कानून लागू करने वाली एजेंसी से राजनीतिक ताकत के एक साधन या उसकी चुपचाप मदद करने वाली बन रही है.
जब विपक्षी नेताओं पर अंडे फेंके जाते हैं, तो पुलिस अधिकारी कार्रवाई करने में असमर्थ दिखाई देते हैं. जब राजनीतिक दफ्तरों में तोड़फोड़ होती है, तो पुलिस बहुत देर से पहुंचती है या उसे हमले में कोई राजनीतिक मकसद नहीं मिलता. जब आनंद बाजार पत्रिका जैसे संस्थानों की दीवारों को भगवा रंग से रंगा गया, तब पुलिसकर्मी वहां खड़े दिखाई दिए. जब अभिषेक बनर्जी के कैमैक स्ट्रीट दफ्तर पर हमला हुआ और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो गया, लेकिन जब किसी विपक्षी उम्मीदवार के खिलाफ पुराने मामले में वारंट होता है, तो पुलिस और प्रशासन की मशीनरी अचानक बहुत तेजी से काम करने लगती है. जब खाकी वर्दी वाले लोग नजरें फेर लेते हैं, तो एक संदेश जाता है: अब कानून का राज भी किसी पार्टी के झंडे के साथ चल रहा है.
बंगाल के ‘गुजरातीकरण’ की तीसरी खास बात है सार्वजनिक जीवन का सख्त हिंदुत्व वाला रूप लेना. बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी खुद को तेजी से एक विविध राज्य के संवैधानिक प्रमुख के बजाय एक हिंदू नेता के रूप में पेश कर रहे हैं. उनकी राजनीतिक छवि में धार्मिक त्योहार, धार्मिक जुलूस, गॉडमैन और साधु प्रमुख हैं. “बांग्लादेशियों”, अजान और लाउडस्पीकर जैसे मुद्दों का इस्तेमाल लगातार ऐसा माहौल बनाने के लिए किया जाता है, जिसमें यह दिखे कि हिंदू संस्कृति खतरे में है. रेहड़ी-पटरी वाले और छोटे दुकानदार, जिनमें से कई मुस्लिम हैं, उनकी रोजी-रोटी को तोड़फोड़ और हटाने की कार्रवाई के जरिए निशाना बनाया जा रहा है.
अधिकारी ने हाल में कहा कि रेजीनगर और नंदीग्राम के उपचुनाव अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए एक “टेस्ट” होंगे. अधिकारी ने कहा है कि बंगाल का नया असामाजिक गतिविधियां विरोधी कानून या ‘गुंडा बिल’ “शुक्रवार वाले लोगों” के लिए है, यानी मुसलमानों के लिए. उन्होंने बंगाल में बीजेपी की जीत को हिंदुत्व की जीत बताया है.
मुसलमानों को एक साथ बदनाम किया जा रहा है, प्रशासनिक कार्रवाई का निशाना बनाया जा रहा है और राजनीतिक रूप से उनकी आवाज दबाई जा रही है. इसका मकसद उन्हें अलग-थलग करना है. मुसलमानों को लगातार डर में रखना, उन्हें अलग रखना और उन्हें हमेशा उस “दूसरे” के रूप में दिखाना, जिसके खिलाफ हिंदू राजनीतिक पहचान को मजबूत किया जा सके. फिर से गुजरात मॉडल.
बंगाल की मिली-जुली धार्मिक संस्कृति, जिसमें बाउल और फकीर शामिल हैं और रामकृष्ण, विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम, चैतन्य और लालन की समावेशी और जीवंत परंपरा है, RSS की तरह के सख्त हिंदुत्व से मेल नहीं खाती. लेकिन आज बंगाल की अपनी अलग पहचान खतरे में दिख रही है.
बंगाल में शाकाहार की सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है. बंगाल के मुख्यमंत्री और बंगाल के मुख्य सचिव ने बागेश्वर बाबा का सम्मान किया. वह दुर्गा पूजा पंडालों में मांसाहारी खाना न रखने की मांग का समर्थन करते हैं. कोलकाता के 500 स्कूलों में 44,000 बच्चों के मिड-डे मील की जिम्मेदारी ISKCON की शाकाहारी रसोई को दी गई. विरोध होने के बाद ही यह आदेश वापस लिया गया और खाने में अंडे फिर से शामिल किए गए. गॉडमैन को बंगाली संस्कृति पर सार्वजनिक अधिकार रखने वाले लोगों के रूप में ऊंचा दर्जा दिया जा रहा है. पूर्व AAP कार्यकर्ता और खुद को कवि बताने वाले कुमार विश्वास हाल में एक बड़े कमल के सिंहासन पर बैठे दिखाई दिए, जबकि मुख्यमंत्री उनके पैरों के पास बैठे थे. नागा साधुओं को जादवपुर यूनिवर्सिटी के गेट तक जुलूस में ले जाया जा रहा है.
शाकाहार की सोच को सरकारी संकेतों के जरिए बढ़ावा दिया जा रहा है. बंगाल में खाने को लेकर इस तरह की शुद्धता की सोच सिर्फ अजीब नहीं है. यह बंगाल के लोगों के अलग-अलग तरह के हिंदू धर्म की जगह एक जैसा, बीजेपी-RSS की मंजूरी वाला हिंदुत्व लाने की कोशिश है. जब सरकार किसी खास तरह की उत्तर भारतीय धार्मिक सोच को बहुत सम्मान देती है और मछली पसंद करने वाले बंगालियों को खाने को लेकर नई नैतिकता अपनाने की तरफ धकेलती है, तो यह सिर्फ आस्था नहीं है. यह संस्कृति और राजनीति को बदलने की कोशिश है.
बंगाल के ‘गुजरातीकरण’ की चौथी खास बात शिक्षा है. कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी लंबे समय से उस चीज का प्रतीक रही है, जिससे सत्तावादी राजनीति डरती है: बौद्धिक स्वतंत्रता और असहमति. इसका मतलब यह नहीं है कि कैंपस में लगाए जाने वाले हर नारे का बचाव किया जा सकता है. न ही इसका मतलब है कि छात्र कानून से ऊपर हैं, लेकिन आपत्तिजनक भाषण का जवाब कानूनी कार्रवाई और लोकतांत्रिक बहस होना चाहिए. इसका जवाब यह नहीं होना चाहिए कि मुख्यमंत्री भगवा कपड़े पहने साधुओं और नागा साधुओं के साथ जुलूस निकालकर उच्च शिक्षा के एक संस्थान को डराने की कोशिश करें. बीजेपी की रणनीति साफ है: यूनिवर्सिटी कैंपस पर कब्जा करो और भविष्य पर कब्जा करो.
हाल में ABVP के सदस्यों ने बंगाल की विद्यासागर यूनिवर्सिटी में कुलपति के कमरे में घुसकर हंगामा किया. यह यूनिवर्सिटी के स्थानों पर नियंत्रण करने की कोशिश दिखाता है. बंगाल के महान लोगों और प्रतीकों को उनकी पूरी जटिलता से अलग किया जा रहा है और उन पर भगवा रंग चढ़ाया जा रहा है. कोलकाता के प्रतिष्ठित आशुतोष कॉलेज में संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने तस्वीरों पर भगवा तिलक लगाया. विवेकानंद की सार्वभौमिक सोच, टैगोर की मानवतावादी सोच और नेताजी के सख्त धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद को बीजेपी की सीमित राजनीतिक कहानी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.
बंगालियों ने अपनी मछली को RSS की मंजूरी वाले खाने से बदलने के लिए वोट नहीं किया था. हमने अपनी जीवंत अड्डेबाजी को चुपचाप आज्ञा मानने और डर में जीने के लिए बदलने के लिए वोट नहीं किया था. हमने अपनी समृद्ध विविधता को बाहर से लाई गई एक जैसी भगवा सोच से बदलने के लिए वोट नहीं किया था.
‘गुजरातीकरण’ की पांचवीं खास बात है एक खास औद्योगिक घराने का दबदबा. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने गर्व से घोषणा की है कि अडाणी समूह न्यू टाउन में एक बड़ा हेल्थ सिटी बनाएगा. अडाणी और अधिकारी ने मिलकर कोलकाता के न्यू टाउन में 2,000 बेड वाले अस्पताल की आधारशिला रखी है. बताया गया है कि यह 4,000 करोड़ रुपये की परियोजना है.
ऐसा कोई भी वास्तविक निवेश जो रोजगार पैदा करे, स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाए और आम बंगालियों को फायदा पहुंचाए, उसका स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन यहां का संदेश साफ दिखाई देता है. बीजेपी के बंगाल में सबसे ज्यादा प्रचार जिस औद्योगिक वादे का किया जा रहा है, वह गौतम अडानी की ओर से है. अडानी की पहचान नरेंद्र मोदी के दौर से सबसे ज्यादा जुड़े कारोबारियों में होती है. मॉडल जाना-पहचाना है: राज्य राजनीतिक माहौल तैयार करता है और पसंदीदा कारोबारी समूह “विकास” का चेहरा बन जाता है.
बंगाल को कई निवेशकों की जरूरत है, लेकिन ऐसी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की नहीं, जो एक या दो पसंदीदा कॉरपोरेट घरानों के इर्द-गिर्द बनी हो. निवेश से बंगाल को फायदा होना चाहिए. बंगाल को किसी कॉरपोरेट-राजनीतिक परियोजना के लिए काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
आखिर में ‘गुजरातीकरण’ की सबसे अहम बात है मीडिया की चुप्पी और उसका पक्षपात.
जो लोग कभी कहते थे कि बंगाल में लोकतंत्र खत्म हो गया है, वे अब नजरें फेर रहे हैं. राजभवनों में बैठे वे लोग जो कभी “नैतिकता” के बड़े रक्षक बनकर बहुत सक्रिय रहते थे, अब चुप हैं. राष्ट्रीय टीवी चैनल जो कभी रिपोर्टरों की पूरी टीम कोलकाता भेजते थे, अब बंगाल में कदम नहीं रखते.
यह चुनिंदा गुस्सा एक बात साफ करता है: मीडिया का पहले वाला इतना ज्यादा शोर बंगाल या लोकतंत्र के लिए नहीं था. उसका मकसद ममता बनर्जी को हराना था.
बंगाल में इससे पहले भी सरकारें बदली हैं. लेकिन आज बंगाल के सामने अपनी विविधता की जगह एकरूपता, अपनी बेबाकी की जगह आज्ञाकारिता और अपनी बहस करने वाली संस्कृति की जगह बहुसंख्यकवाद और राज्य की दबाव वाली ताकत को लाने की एक संगठित कोशिश है.
गुजरात मॉडल सख्त राजनीतिक हिंदुत्व को बेलगाम राज्य की ताकत और डंडा राज के साथ जोड़ता है. यह मॉडल बंगाल में लागू किया जा रहा है. बंगाल के ‘गुजरातीकरण’ का असली मतलब यही है.
लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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