भारतीय जनता पार्टी-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पितृसत्तात्मक सोच बहुत गहराई तक जड़ें जमा चुकी है. संघ परिवार के लिए आज़ाद और अपने फैसले खुद लेने वाली महिलाएं सबसे बड़ी दुश्मन हैं. असल में BJP-RSS को महिलाओं से परेशानी है. उन्हें महिलाएं प्रतीक के रूप में तो ठीक लगती हैं, लेकिन जब महिलाएं अपने फैसले खुद लेने वाली नागरिक के रूप में सामने आती हैं, तो वे बहुत असहज हो जाते हैं. जो महिलाएं उनके बनाए दायरे में नहीं रहतीं, जिन्हें वे अपने हिसाब से परिभाषित, नियंत्रित या रोक नहीं सकते, उनके लिए उनके मन में छिपी नापसंदगी साफ दिखाई देती है.
नरेंद्र मोदी सरकार के पोस्टर, नारे और बार-बार “बेटी” ये, “दीदी” वो और “बहन” ये जैसे शब्द एक ऐसी सोच को छिपाते हैं, जो महिलाओं को उसी जगह रखने की कोशिश करती है, जहां BJP उन्हें देखना चाहता है. बेहतर होगा कि वे सिंदूर और मंगलसूत्र पहनें (यानी “स्वीकार्य” पहनावा), संस्कृति के हिसाब से चलें और उन्हें थोड़ी-सी भी पहचान मिलने के लिए हमेशा आभारी रहें.
संघ परिवार महिलाओं को प्रतीक के रूप में सम्मान देता है, लेकिन एक व्यक्ति के रूप में उन पर भरोसा नहीं करता. किसी को देवी बना देना भी उसे एक तरह से कैद करने का तरीका बन सकता है. सत्यजीत रे की परेशान करने वाली फिल्म ‘देवी’ में दिखाया गया था कि कैसे एक ससुर अपनी बहू को “देवी” मानकर उसे लगभग घर में कैद करके रखता है.
महिलाओं को लेकर संघ की सोच हाल ही में एक बार फिर सामने आई, जब अभिनेता कृति सेनन के एक GIVA रक्षा बंधन विज्ञापन में इंडो-वेस्टर्न कपड़े पहनने के बाद दक्षिणपंथी लोगों ने उनके खिलाफ जोरदार विरोध किया. वह कपड़ा तुरंत एक ऐसा मुद्दा बन गया, जिसके जरिए हिंदुत्व के समर्थक भारतीय संस्कृति को “बचाने” के लिए निकल पड़े. दक्षिणपंथी सोशल मीडिया पर ऐसा हंगामा हुआ, जैसे सेनन के कपड़े देश के लिए कोई बहुत बड़ा नैतिक संकट हों. BJP सांसद कंगना रनौत ने सवाल किया कि कोई “बिकिनी या अंडरगारमेंट्स” पहनकर राखी क्यों बांधेगा. विरोध के बाद विज्ञापन देने वाली कंपनी ने वह विज्ञापन वापस ले लिया.
विज्ञापन हटा दिया गया. इसके साथ BJP-RSS के महिलाओं के समर्थक होने का दिखावा भी हट गया.
सेनन पर किया गया हमला सांस्कृतिक चिंता के नाम पर चलाया गया एक रूढ़िवादी अभियान था. निगरानी करने वालों को असल में जिस बात से परेशानी थी, वह एक महिला की आज़ादी थी, अपने कपड़ों के बारे में खुद फैसला लेने की उसकी आज़ादी थी. वह इतनी आज़ाद कैसे हो सकती है?
‘सशक्तीकरण’ लेकिन आखिरी फैसला पुरुषों का
यह घटना एक पैटर्न का हिस्सा थी. BJP के बड़े नेता अक्सर यह तय करने की कोशिश करते हैं कि महिलाएं क्या पहनें. 2014 में मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि महिलाओं को “सभ्य” कपड़े पहनने चाहिए और “पश्चिमी प्रभाव” की वजह से पहने जाने वाले “छोटे कपड़ों” के खिलाफ बात की थी. 2021 में तीरथ सिंह रावत ने “फटी जींस” पहनने वाली महिलाओं के खिलाफ खूब बयानबाजी की थी. वैसे, पितृसत्ता सिर्फ पुरुषों के जरिए ही काम नहीं करती; यह दूसरी महिलाओं पर निगरानी रखने के लिए महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ लेती है.
संघ की सोच के केंद्र में एक सीधा इनकार है: महिलाओं को अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी नहीं दी जाती. पुणे में हाल ही में हुई महिलाओं की एक रैली में राहुल गांधी ने इस फंदे की पहचान की. उन्होंने कहा कि महिलाओं को सिर्फ बेटी, पत्नी और मां की तीन पहचान तक सीमित नहीं किया जा सकता. सबसे पहले वे खुद की हैं. एक बड़े राष्ट्रीय नेता के लिए उनका संदेश साफ और बिना किसी संदेह के था: “जोर से बोलो. खुद पर गर्व करो. समाज में अपनी जगह के लिए लड़ो. पितृसत्ता को तोड़ दो.”
महिलाओं के खिलाफ हिंसा का मतलब सिर्फ शारीरिक हमला नहीं है. किसी महिला को शिक्षा, नौकरी, संपत्ति, आने-जाने की आज़ादी, राजनीतिक ताकत या अपनी बात कहने के अधिकार से वंचित करना भी हिंसा है. किसी पिंजरे की सलाखों को फूलों और रिबन से सजा देने भर से वह पिंजरा अच्छा नहीं बन जाता.
महिलाओं के लिए BJP की पूरी भाषा पुरुषों के साथ रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमती है. “बेटी.” “बहन.” “दीदी.” महिलाओं को इस आधार पर आंका जाता है कि उनका रिश्ता किस पुरुष से है, न कि वे क्या कहती हैं, क्या सोचती हैं या क्या लिखती हैं. उदाहरण के लिए BJP के ट्रोल अक्सर मेरी लिखी बातों का जवाब देते हुए मेरे पति का नाम टैग करते हैं. क्यों? मेरे लेखक के रूप में या सार्वजनिक जीवन में मेरे काम से मेरे पति का क्या लेना-देना है? फिर भी दक्षिणपंथी लोग मेरे तर्कों का जवाब देने के लिए किसी पुरुष रिश्तेदार को बीच में ले आते हैं, जैसे किसी महिला की बात का जवाब उसकी बात के आधार पर नहीं दिया जा सकता.
पितृसत्ता की पसंदीदा महिला हमेशा किसी न किसी की कुछ होती है. जो महिला अपनी आज़ादी का दावा करती है और सच में अपने फैसले खुद लेती है, वह हिंदुत्व की सोच में कहीं फिट नहीं बैठती.
पिछले साल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज साझा न करने के फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि इससे माताओं, बेटियों, बहुओं और बहनों की निजता का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन निजता हर मतदाता का अधिकार है. ज्ञानेश कुमार ने खास तौर पर किसी की बहन या मां की तस्वीर का उदाहरण क्यों दिया? सार्वजनिक रूप से वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं को ऐसी महिलाओं के रूप में क्यों दिखाया गया, जिन्हें घर के अंदर सुरक्षित रखने और जिनकी इज्जत की रक्षा करने की ज़रूरत है?
बीजेपी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला सिलेंडर और सरकारी मदद के पैसे देने जैसी योजनाओं का उदाहरण देगी. गैस सिलेंडर किसी महिला की मेहनत कम कर सकता है, लेकिन उसकी जगह आज़ादी नहीं ले सकता. कोई पार्टी सिर्फ रोजमर्रा की सुविधाएं देकर खुद को महिलाओं को आजाद करने वाली पार्टी नहीं बता सकती, जबकि वह महिलाओं के कपड़ों, प्यार, बोलने और अपने सपनों पर लगातार निगरानी रखती है. सशक्तीकरण ऐसा नहीं है जो पुरुषों के दबदबे वाली सरकार अपनी कृपा से महिलाओं को दे. सशक्तीकरण तब शुरू होता है, जब पुरुषों के अंतिम फैसले का अधिकार खत्म होता है.
एक खतरनाक लक्ष्मण रेखा
महिलाओं को एक व्यक्ति, अलग पहचान और आज़ादी न देने की यही सोच है कि BJP कभी इंदिरा गांधी या ममता बनर्जी जैसी नेता नहीं बना पाई. इंदिरा गांधी और ममता बनर्जी सिर्फ ऊंचे पद पर बैठी महिलाएं नहीं थीं, बल्कि उन्होंने अपनी राजनीतिक सोच खुद बनाई और अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद लिए.
इंदिरा गांधी को ताने के तौर पर “गूंगी गुड़िया” कहा जाता था, जो एक बहुत ही घटिया अपमान था, लेकिन उन्होंने इस सोच को तोड़ दिया और एक मजबूत राजनीतिक ताकत बनकर सामने आईं. ममता बनर्जी ने बिल्कुल शुरुआत से अपनी राजनीतिक पार्टी खड़ी की, 34 साल तक सत्ता में रहे मजबूत लेफ्ट फ्रंट को हराया (खुद को “प्रगतिशील” कहने वाले कम्युनिस्टों ने भी उनके खिलाफ बेहद घटिया और महिलाओं का अपमान करने वाली बातें कहीं) और तीन बार मुख्यमंत्री, सात बार सांसद और कई बार केंद्रीय मंत्री रहीं. इंदिरा गांधी और ममता बनर्जी में वह चीज़ थी, और है, जो BJP की महिला नेताओं में नहीं है और उन्हें दी भी नहीं जाती—अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी और अपने तरीके से काम करने की स्वतंत्रता. ऐसी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की आजादी, जिन्हें पुरुष तय या मंजूर न करें.
BJP उन स्वतंत्र और कामयाब महिलाओं के खिलाफ बहुत आक्रामक हो सकती है, जो अपने दम पर आगे बढ़ती हैं. पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की हाल की ममता बनर्जी के खिलाफ धमकी इसका एक उदाहरण है. ममता बनर्जी कभी उनकी राजनीतिक मार्गदर्शक थीं और उन्हीं के साथ आगे बढ़कर अधिकारी राजनीति में ऊपर पहुंचे. लेकिन हाल ही में अधिकारी ने कहा कि ममता बनर्जी को घर में रहकर फेसबुक लाइव करना चाहिए और उन्होंने कहा कि वह ऐसी “व्यवस्था” करेंगे कि ममता कभी सड़कों पर निकल ही न सकें. क्यों? लोकतांत्रिक भारत में किसी को यह अधिकार कैसे मिल सकता है कि वह किसी दूसरे व्यक्ति को घर में कैद रहने का आदेश दे?
क्या शुभेंदु अधिकारी किसी ऐसे पुरुष को, जो तीन बार मुख्यमंत्री रह चुका हो, घर के अंदर रहने और “आराम करने” के लिए कहने की हिम्मत करेंगे? अधिकारी ने ममता बनर्जी के खिलाफ पितृसत्ता की सबसे पुरानी और सबसे जहरीली धमकी दी: एक महिला को घर में रहने का आदेश देना.
यही दोहरा रवैया जुलाई 2026 के छात्र प्रदर्शनों के दौरान भी सामने आया. उन प्रदर्शनकारियों से “माफी” मांगने की अपील करते हुए, जिन्होंने उनके खिलाफ गालियां दी थीं, नरेंद्र मोदी ने कहा कि “हमारी बेटियों” का ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना एक “सांस्कृतिक झटका” था. “हमारी बेटियां” ही क्यों? उन्हें युवा नागरिक क्यों नहीं कहा गया? जब पुरुष कड़ी भाषा बोलते हैं, तो इसे सिर्फ बदतमीजी माना जाता है. लेकिन जब कोई लड़की अपने मन की बात कहती है, तो उसका महिला होना ही अपराध बना दिया जाता है—जैसे वह महिलाओं से जुड़ी तय सोच से बाहर निकल गई हो. मोदी ने जिस 15 साल की लड़की का ज़िक्र किया था, उस पर बेरहमी से हमला किया गया. उसे और उसकी विधवा मां को ऑनलाइन इतनी भयानक गालियां और धमकियां मिलीं कि उन्हें अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा.
संदेश बिल्कुल साफ था: लक्ष्मण रेखा पार की, तो आप, आपका चेहरा, आपका शरीर, आपका परिवार, आपका घर और आपका पूरा भविष्य—सब निशाना बन सकते हैं. आपकी आज़ादी पितृसत्ता के पुरुष की इज़ाज़त और उसकी तय की हुई शर्तों पर ही है.
संघ की कांच की छत
महिलाओं को अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी न देना संघ की संगठनात्मक व्यवस्था में ही शामिल है. RSS की सदस्यता पूरी तरह पुरुषों तक सीमित है. महिलाओं को अलग संगठन राष्ट्र सेविका समिति में भेजा जाता है. वे उसी विचारधारा के लिए काम कर सकती हैं, लेकिन संगठन में पुरुषों के बराबर जगह और अधिकार के साथ शामिल नहीं हो सकतीं.
BJP की महिला नेताओं के साथ क्या हुआ? दिवंगत सुषमा स्वराज, जो अपनी पीढ़ी की सबसे अच्छी और प्रभावशाली सांसदों में से एक थीं, उन्हें किनारे कर दिया गया. सुषमा स्वराज को विदेश मंत्री बनाया गया, लेकिन मोदी ने विदेश नीति को अपने आसपास ही रखा. वसुंधरा राजे—जो शायद BJP में असली स्वतंत्र ताकत का केंद्र बनने वाली सबसे करीबी नेता थीं और मोदी की तरह ही दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी थीं—को मोदी-शाह के हाईकमान ने दूर रखा. पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को “अचानक कुछ भी करने वाली” नेता के रूप में देखा गया और वह भी धीरे-धीरे केंद्र की राजनीति से दूर हो गईं. इनमें से किसी को भी BJP ने अपने लिए बनाए गए दायरे से बाहर निकलने की इज़ाज़त नहीं दी, यहां तक कि जब उन्होंने इसके लिए अपनी जगह और अधिकार बना लिए थे.
स्मृति ईरानी का इस्तेमाल मुख्य रूप से गांधी परिवार के खिलाफ लड़ने वाली नेता के रूप में किया जाता है. दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता एक चुनी हुई मजबूत दिल्ली नेता की बजाय पार्टी की ओर से सामने लाई गई नेता हैं. कंगना रनौत को मुख्य रूप से इस बात के लिए जाना जाता है कि वह किन लोगों पर हमला करती हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ऐसा मंत्रालय चलाती हैं, जो PMO के कड़े नियंत्रण में है. आर्थिक सोच रखने वाली नेता के रूप में सीतारमण की अपनी पहचान कहां है? क्या वह उदारवादी हैं, कल्याणकारी नीतियों की समर्थक हैं, खुले बाजार की समर्थक हैं या लोकलुभावन नेता हैं? उन्हें कभी अपनी खुद की आर्थिक सोच या नीति खुलकर बताने की इज़ाज़त नहीं दी गई. “मोदीनॉमिक्स” की बात होती है, “सीतारमैन-नॉमिक्स” की नहीं.
BJP ने आज तक ऐसी एक भी महिला नेता तैयार नहीं की, जिसकी अपनी स्वतंत्र पहचान और अपनी सार्वजनिक राजनीतिक सोच हो—ऐसी कोई महिला नहीं, जिसने ममता बनर्जी की तरह बिल्कुल शुरुआत से अपना राजनीतिक आंदोलन खड़ा किया हो, या इंदिरा गांधी की तरह ताकत और लोकप्रियता हासिल की हो.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में लैंगिक समानता पर राहुल गांधी की टिप्पणियों को लेकर उन पर हमला करने के लिए मनुस्मृति का ज़िक्र किया, लेकिन क्या यूपी में महिलाओं को सच में सशक्त बनाया गया है? एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में यूपी पहले स्थान पर है.
21वीं सदी में बेमेल सोच
मैं हमेशा कहती रही हूं कि दिखाई देना बराबरी नहीं है और किसी प्रतीक को आगे बढ़ाना सत्ता में बदलाव नहीं है. मोदी सरकार का महिलाओं के आरक्षण को लेकर रवैया इस सोच को साफ दिखाता है. 2023 में पास हुए महिला आरक्षण कानून को लागू करने का मतलब है लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें तय करना. अगर इसे मौजूदा 543 सदस्यों वाली लोकसभा में लागू किया जाए, तो सत्ता का सच में बंटवारा होगा. महिलाओं को 181 सीटें मिलेंगी, जबकि 362 सीटें पुरुषों के पास जाएंगी. राजनीतिक दलों को लंबे समय से जमे हुए पुरुष नेताओं को हटाना पड़ेगा और ताकतवर पुरुषों को असली जगह छोड़कर सत्ता बांटनी पड़ेगी. हां, 362 पुरुषों के मुकाबले 181 महिलाओं का होना सत्ता में असली हिस्सेदारी है.
लेकिन यही वह चीज़ है जिससे मोदी सरकार बचना चाहती है. उसने महिला आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ दिया है. इससे लोकसभा का आकार बहुत बढ़ सकता है, संभव है कि यह करीब 816 सीटों तक पहुंच जाए. 816 सदस्यों वाली लोकसभा में एक-तिहाई आरक्षण से महिलाओं को 273 सीटें मिलेंगी, जबकि बाकी 543 सीटें पुरुषों के पास होंगी. यानी पुरुषों के पास मौजूद सीटों की कुल संख्या वास्तव में बढ़ जाएगी. लंबे समय से सत्ता में जमे पुरुष अपनी जगह बनाए रखेंगे, जबकि महिलाओं को बहुत बड़ी कर दी गई लोकसभा में सिर्फ जगह दी जाएगी—273 महिलाएं और 543 पुरुष किसी भी तरह से बराबर या सही बंटवारा नहीं है.
यह सत्ता का असली हस्तांतरण नहीं है. यह इस बात का इंतज़ाम है कि बड़ी संख्या में महिलाओं के संसद में आने की संभावना से ताकतवर पुरुषों को होने वाली परेशानी को कैसे संभाला जाए. जैसा कि एक कॉलम लिखने वाले ने कहा है, इसका मतलब है कि “बड़ी पितृसत्तात्मक हवेली में एक बड़ा जनाना हिस्सा जोड़ देना”, जबकि उसकी पुरुषों के दबदबे वाली व्यवस्था को वैसा ही रहने देना. महिलाओं के लिए अलग डिब्बा बड़ा कर दो, लेकिन बाकी पूरी ट्रेन पुरुषों के पास ही रहने दो. यह नारी शक्ति नहीं है. यह महिलाओं के सशक्तीकरण के नाम पर पुरुषों को खुश रखने की कोशिश है.
एक अलग लेकिन उतनी ही ज़रूरी बात यह है कि सांसदों की संख्या 800 से ज्यादा बढ़ाने पर टैक्स देने वाले लोगों पर बहुत बड़ा अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
संघ परिवार का “लव जिहाद” को लेकर बार-बार जोर देना भी उसकी गहरी पितृसत्तात्मक सोच का एक और उदाहरण है. यह सोच तभी समझ में आती है जब आप मानें कि महिलाएं अपने फैसले खुद लेने में सक्षम नहीं हैं और वे सिर्फ ऐसी चीज़ हैं, जिन्हें कामुक मुस्लिम पुरुषों से बचाने की जरूरत है. “लव जिहाद” का जुनून महिलाओं को बच्चों की तरह समझता है, जो अपने फैसले खुद नहीं ले सकतीं.
दिलचस्प बात यह है कि जो लोग हिंदू महिलाओं से कहते हैं कि वे कपड़ों में “परंपरा” की सीमा के अंदर रहें, अक्सर वही लोग मुस्लिम महिलाओं से पारंपरिक हिजाब उतारने के लिए कहते हैं. असल में महिलाओं के कपड़े कभी महिलाओं के बारे में नहीं होते. सवाल यह होता है कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए, यह फैसला कौन करेगा.
BJP-RSS की पितृसत्तात्मक सोच को चालाकी से “परंपरा” और “संस्कृति” का नाम दिया जाता है. असल में यह महिलाओं से नफरत करने वाली एक हिंसक सोच है, जो महिलाओं को अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी, अपनी अलग पहचान और स्वतंत्रता देने से इनकार करती है.
सच्ची आज़ादी का मतलब है हर महिला के इस अधिकार को मानना कि वह हिजाब पहन सकती है या उतार सकती है, साड़ी पहन सकती है या फटी जींस या ब्रालेट पहन सकती है और बाद में अपना फैसला बदल भी सकती है, बिना किसी से वैचारिक इज़ाज़त लिए.
महिलाओं के शरीर कोई राजनीतिक ज़मीन नहीं हैं. महिलाओं के फैसलों के लिए नेताओं, मंत्रालयों या सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वाली भीड़ से सांस्कृतिक मंजूरी लेने की ज़रूरत नहीं है.
BJP-RSS की पितृसत्तात्मक सोच 21वीं सदी में बेमेल है. राहुल गांधी बिल्कुल सही कह रहे हैं: इस पितृसत्ता को तोड़ना ज़रूरी है.
लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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