अब 12 साल से नरेंद्र मोदी और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ लगातार अभियान चला रहे हैं. दिल्ली के नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी का नाम बदल दिया गया है. 2021 में ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ के लिए लगाए गए एक पोस्टर में स्वतंत्र भारत के संस्थापकों की सूची से नेहरू का नाम हटा दिया गया था. जब भी नेहरू का नाम आता है, बीजेपी का आईटी सेल तुरंत एक्टिव हो जाता है. मोदी के नेतृत्व वाली BJP का नेहरू को लेकर जुनून इतना ज्यादा है कि ‘Blame It On Nehru’ यानी ‘हर बात के लिए नेहरू को दोष दो’ इंटरनेट पर एक मीम बन गया है.
लेकिन नेहरू पर हमेशा हमला करने के बजाय मोदी को वास्तव में हमारे पहले और सबसे महान प्रधानमंत्री से कुछ-न-कुछ सीखना चाहिए.
इस साल स्वतंत्रता दिवस पर मोदी ने 75 मिनट का लंबा और कई जगहों पर असामान्य रूप से हिचकिचाहट भरा भाषण दिया. इसमें उन्होंने भारत के लिए एक नया राष्ट्रीय दुश्मन बताया: ‘दिमागी नक्सल’ यानी वे लोग जो वामपंथी प्रदर्शन में विश्वास करते हैं. ये ‘दिमागी नक्सल’ कौन हैं? मोदी ने यह साफ नहीं किया. उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि ये लोग विकसित भारत बनने से रोक रहे हैं. ‘दिमागी नक्सल’ उन ‘दुश्मनों’ की सूची में नया नाम है, जिन्हें मोदी ने असहमति की हर आवाज़ को कमजोर करने के लिए लगातार सार्वजनिक रूप से नाम लेकर निशाना बनाया है. मोदी ने ‘आंदोलनजीवी’, ‘खान मार्केट गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’ और अब ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है. लोगों के बीच पुल बनाने के बजाय वह दीवारें खड़ी करना पसंद करते हैं. इस बार उन्होंने उन लोगों को निशाना बनाया है जो एक खास तरह से सोचते हैं. यह संविधान पर सीधा हमला है, जो अपनी प्रस्तावना में ही विचार की स्वतंत्रता की गारंटी देता है.
मोदी के भाषण में एक और ज्यादा महत्वपूर्ण चीज़ गायब थी. उन्होंने एक बार भी उस उपलब्धि का ज़िक्र नहीं किया, जिस पर भारतीय आज़ादी को सबसे ज्यादा गर्व हो सकता है: एक काम करने वाली संसद. मोदी ने एक बार भी संसदीय लोकतंत्र की बात नहीं की, जबकि यही संस्था गणराज्य का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.
यह कोई हैरान करने वाली बात नहीं थी. 2026 के मानसून सत्र के दौरान मोदी पूरे समय संसद से गैरहाजिर रहे. वह और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सिर्फ औपचारिक मौकों पर ही संसद पहुंचे—सत्र की शुरुआत में राष्ट्रगान के समय और अंत में राष्ट्रगीत के समय.
मोदी के नाम अब एक ऐसा रिकॉर्ड है, जिस पर गर्व नहीं किया जा सकता—वह भारत के इतिहास में पूरे संसद सत्र से गैरहाजिर रहने वाले एकमात्र प्रधानमंत्री बन गए हैं. 20 दिनों तक विपक्ष ने मांग की कि वह और शाह सदन में आएं. हमने बहुत आवाज़ उठाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. दोनों सदन से गायब रहे.
एक ऐसा ज़िक्र जिसे मोदी नहीं कर सकते थे
इसमें कोई हैरानी नहीं है कि मोदी के भाषण में संसद का ज़िक्र नहीं आया. अगर मोदी वास्तव में संसदीय लोकतंत्र के विषय पर बात करते, तो उन्हें नेहरू को श्रेय देना पड़ता. नेहरू वह प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने भारत के सबसे कमजोर दौर में देश की संसद को बनाया और मजबूत किया.
नेहरू हर दिन सुबह 11 बजे बिना किसी चूक के संसद आते थे. उन्होंने विपक्ष को बोलने का मौका दिया. उन्होंने एक युवा अटल बिहारी वाजपेयी को भी मंच दिया. वाजपेयी उस समय विपक्षी सांसद और भारतीय जनसंघ के प्रमुख वक्ता थे. इसी मंच ने उन्हें आगे बढ़ने और वह बड़ा नेता बनने का मौका दिया, जो वह बाद में बने. यह नेहरू का संसदीय लोकतंत्र ही था, जिसने वाजपेयी के उभरने को संभव बनाया. संसद ने उन्हें अपनी पहचान और अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए जगह दी.
कहा जाता है कि नेहरू ने भविष्यवाणी की थी कि वाजपेयी एक दिन प्रधानमंत्री बनेंगे—यानी एक वैचारिक विरोधी को भी आगे बढ़ने का पूरा मौका दिया गया.
नेहरू अपने कार्यालय की मेज पर लगे लाउडस्पीकर के जरिए संसद की कार्यवाही सुनते थे. समाजवादी और कम्युनिस्ट नेता, जो नेहरू के सबसे बड़े वैचारिक विरोधी थे—राम मनोहर लोहिया, हीरेन मुखर्जी और वे लोग जो नेहरू पर बहुत तीखे हमले करते थे—सभी को बोलने का मौका मिलता था, उनकी बात सुनी जाती थी और उनसे बातचीत की जाती थी. कभी-कभी नेहरू उनकी बात भी मान लेते थे.
सवाल पूछा जा सकता है: क्या आज मोदी सरकार विपक्षी नेताओं को वैसी ही जगह दे रही है? क्या उन्हें बोलने का मंच, सम्मान और इज्जत दी जा रही है? नहीं. उन्हें परेशान किया जा रहा है, उनके यहां छापे मारे जा रहे हैं, उन्हें निलंबित किया जा रहा है, उनकी आवाज़ दबाई जा रही है और उन्हें चुप कराया जा रहा है. शून्यकाल में सबसे ज्यादा मुद्दे BJP के ही होते हैं. ज्यादातर तारांकित सवाल (यानी ऐसे सवाल जिनका जवाब मंत्री सदन में मौखिक रूप से देते हैं) भी BJP को ही मिलते हैं.
शायद शीतकालीन सत्र से पहले मोदी को 1950 और 1960 के दशक की संसद की कार्यवाही पढ़नी चाहिए—वाजपेयी के भाषण, हीरेन मुखर्जी के भाषण और उस संसद की तीखी बहसें, जहां नेता जोरदार और ईमानदारी से बहस करते थे, लेकिन फिर भी संसद और अपने विरोधियों का सम्मान करते थे.
नेहरू की अपनी कैबिनेट में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे. वह जनसंघ के संस्थापक और नेहरू के कट्टर विरोधी और आलोचक थे. जब 1964 में नेहरू का निधन हुआ, तो दो दशकों से उनके वैचारिक विरोधी रहे वाजपेयी ही सदन में खड़े हुए और उन्होंने नेहरू को भारत माता का “राजकुमार” बताया. वाजपेयी की मेरी जीवनी में मैंने नेहरू के बारे में उनके लिखे इन शब्दों को शामिल किया है: “वह (नेहरू) संसद को एक पवित्र मंदिर मानते थे…सदन में उनकी मौजूदगी से माहौल में एक अलग ऊर्जा आ जाती थी और संसद की प्रतिष्ठा और गंभीरता बढ़ जाती थी.”
इसके उलट, मोदी ने 12 साल में एक बार भी प्रश्नकाल में किसी सवाल का जवाब नहीं दिया है. प्रश्नकाल इसलिए होता है ताकि चुने हुए प्रतिनिधि सरकार से सीधे सवाल पूछ सकें और सरकार को जवाबदेह बनाया जा सके. प्रश्नकाल संसदीय व्यवस्था में बनाया गया सबसे लोकतांत्रिक तरीका है. यही वह समय होता है जब कोई मंत्री पहले से लिखे हुए भाषण के पीछे नहीं छिप सकता और उसे सदन के सामने सवाल का जवाब देना पड़ता है. 12 साल हो गए हैं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री ने एक बार भी इस प्रक्रिया का सामना नहीं किया है.
संसदीय लोकतंत्र को अंदर से खोखला करना
संसद में बहुत कम आने के अलावा, मोदी विपक्षी सांसदों की बात भी नहीं सुनते. जब मोदी संसद में बोलते हैं, तो उनके चुनावी अभियान जैसे भाषण सदन में मौजूद सांसदों के बजाय टीवी कैमरों और सोशल मीडिया क्लिप के लिए होते हैं. वह सभी दलों की बैठकों में भी शामिल नहीं होते. ये बैठकें वह सामान्य मंच होती हैं, जहां सरकार और विपक्ष मिलकर यह तय करते हैं कि संसद का सत्र कैसे चलेगा. फिर भी, हर सत्र से पहले मोदी “सहयोग” की अपील की रस्म ज़रूर निभाते हैं—मानो एक दशक तक संसद को खुले तौर पर नज़रअंदाज़ करने के बाद अब वह अचानक स्विच ऑन करने की तरह सहयोग करना शुरू कर देगी.
2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी ने मशहूर तौर पर संसद की सीढ़ियों पर झुककर अपना माथा पत्थर से लगाया था. टीवी पर इस पल को बार-बार दिखाया गया था और इसे लोकतंत्र के मंदिर के सामने उनकी विनम्रता के प्रतीक के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन यह सिर्फ दिखावे की बात थी.
2014 के बाद जो हुआ, वह विनम्रता नहीं बल्कि संसद को अंदर से खोखला करना था. गुजरात मॉडल—विपक्ष के लिए बहुत कम जगह, बिना चर्चा के बजट पास करना और ज्यादा विरोध करने पर विपक्षी सदस्यों को बड़ी संख्या में निलंबित करना—दिल्ली लाया गया और इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया.
दिसंबर 2023 में भारतीय न्याय संहिता से जुड़े कानून उस समय पास किए गए, जब 146 विपक्षी सांसद निलंबित थे. इस मानसून सत्र में भी विधेयकों को बहुत तेज़ी से पास किया गया: 17 दिनों में मोदी सरकार ने 10 विधेयक पास किए, यानी हर विधेयक के लिए औसतन चार मिनट दिए गए. विपक्ष को यह जांचने का कोई सार्थक मौका नहीं दिया गया कि वास्तव में किस चीज़ पर वोट किया जा रहा है. 20 साल पहले हर 10 में से छह विधेयक समितियों के पास जांच के लिए भेजे जाते थे. आज हर 10 में से दो से भी कम विधेयक समितियों के पास जाते हैं.
संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक विरोधी दुश्मन नहीं होते. असहमति और कड़ी वैचारिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन मोदी के लिए विपक्ष दुश्मन है—निजी दुश्मन और राज्य के दुश्मन. सभी विपक्षी सदस्य “राष्ट्र-विरोधी” या ‘दिमागी नक्सल’ जैसे दूसरे अपमानजनक शब्दों से बुलाए जाते हैं.
सेंट्रल हॉल, जो कभी ऐसा गर्मजोशी और स्वागत वाला स्थान था, जहां अलग-अलग पार्टियों के नेता आपस में मिलते-जुलते थे, जहां कभी कांग्रेस सांसद और BJP सांसद सत्र के बीच एक साथ चाय पीते और मजाक करते थे, उसे बंद कर दिया गया है. संसद तक मीडिया की पहुंच भी पहले की तुलना में बहुत कम कर दी गई है. अब विधायी एजेंडा चुपचाप आगे बढ़ता है—क्या FCRA लाया जाएगा? क्या परिसीमन लाया जाएगा? सिर्फ कानाफूसी और संकेत मिलते हैं, सरकार की मंशा की कोई खुली और साफ घोषणा नहीं होती.
संसद के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे यह सम्मान देने और मिलकर काम करने वाली संस्था नहीं, बल्कि तीखी राजनीतिक चालों और अंधेरे, नुकसान पहुंचाने वाले षड्यंत्रों का मंच हो.
मोदी-शाह भरोसे की कमी के जिम्मेदार
मोदी और शाह इस मानसून सत्र में यह दावा करते हुए जोरदार तरीके से आए थे कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और शिवसेना को तोड़ने का काम किया है—पार्टियों को बांटा गया, दलबदल करवाए गए और अलग हुए गुटों को इनाम दिया गया. यह विडंबना है कि सत्र में यह दावा करते हुए आए कि उन्होंने पार्टियों को तोड़ दिया है, लेकिन मोदी और शाह को आखिरकार पीछे हटना पड़ा और वे बिना किसी खास असर के सत्र से बाहर निकले.
अगर विपक्षी पार्टियों को तोड़ना सामान्य तरीका है, तो विपक्ष सरकार पर भरोसा कैसे करे? जब गृह मंत्री खुद विरोधी पार्टियों को तोड़ने में लगे हों, तो संसद में सहयोग की मांग कैसे की जा सकती है? संसद के बाहर विपक्षी पार्टियों को तोड़ा जा रहा हो, तो संसदीय सहयोग कैसे बच सकता है? जब दलबदल करने वाले लोग आसानी से सत्ता पक्ष की बेंचों में चले जाएं और उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो, तो राजनीतिक भरोसा कैसे बच सकता है?
आप संसद के अंदर सभी पार्टियों का सहयोग और अच्छी भावना नहीं मांग सकते, जबकि संसद के बाहर राजनीतिक लड़ाई कर रहे हों. भरोसा किसी सत्र की शुरुआत से पहले जारी की गई प्रेस रिलीज़ नहीं है. भरोसा कमाना पड़ता है.
यह हैरान करने वाला, बेहद बेतुका और संविधान के हिसाब से अस्वीकार्य है कि टीएमसी से अलग हुए एक गुट को सत्ता पक्ष गले लगा सकता है और उसे मान्यता दे सकता है, जबकि स्पीकर इस गुट के खिलाफ अयोग्यता की याचिकाओं पर अनिश्चित समय तक और सुविधाजनक तरीके से फैसला नहीं कर रहे हैं. जिन लोगों की संसदीय पहचान अभी तय भी नहीं हुई थी, उन्हें मोदी ने बहुत उत्साह के साथ सत्तारूढ़ एनडीए में स्वागत किया. यह कोई गलती नहीं है. यही तरीका है.
इस मानसून सत्र में शाह, जो मोदी की तरह 18 दिनों तक संसद में नहीं आए—तब भी नहीं आए, जब उनके नाम से विधेयक पेश किए गए. जरा सोचिए: किसी विधेयक की जिम्मेदारी जिस मंत्री की है, वही मंत्री उस विधेयक के पेश किए जाने के समय सदन में मौजूद नहीं है. स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू को बार-बार सदन को संभालने के लिए भेजा जाता है, लेकिन यह बिल्कुल साफ है कि मोदी और शाह पर्दे के पीछे से नियंत्रण कर रहे हैं.
संदेश साफ है: मोदी सरकार कोई सवाल बर्दाश्त नहीं करेगी, सवालों का सामना करने के लिए तैयार नहीं है और गृह मंत्री सवालों से बचते रहेंगे. पूरे सत्र के दौरान शाह ने इस सवाल का जवाब देने से इनकार किया कि 20 जुलाई के प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में निहत्थे छात्र प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल क्यों किया गया, जिसका इस्तेमाल आम तौर पर आतंकवाद प्रभावित इलाकों में किया जाता है. सत्र के आखिरी से एक दिन पहले शाह ने अहंकार भरे अंदाज़ में बयान देने की पेशकश की, लेकिन तब तक सारा भरोसा खत्म हो चुका था.
इस सरकार और विपक्ष के बीच भरोसे की कमी कोई रहस्य नहीं है और न ही यह विपक्ष की गलती है, चाहे सरकार इसे किसी भी तरह पेश करना चाहे. भरोसे की यह कमी जानबूझकर और एक तय तरीके से ऐसे नेतृत्व ने पैदा की है, जिसने कभी भी वास्तव में सहमति बनाने की कोशिश नहीं की. मोदी और शाह ने एक बार भी विपक्ष से संपर्क करने की कोशिश नहीं की. वे “छोटे” विरोधियों से बात करने के लिए खुद को बहुत बड़ा समझते हैं. मोदी-शाह को टूटी हुई संसद विरासत में नहीं मिली थी—उन्होंने सत्र दर सत्र संसदीय कामकाज को बर्बाद किया है.
मोदी ने नेहरू को और चमका दिया
फिर भी संसद लोकतंत्र की लाइफलाइन है. यह वह व्यवस्था है, जिसके जरिए सरकार उन लोगों के प्रति भी जवाबदेह बनती है, जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया, सिर्फ उनके प्रति नहीं जिन्होंने उसे वोट दिया. जो प्रधानमंत्री प्रश्नकाल को अपने लिए छोटा या अपने स्तर से नीचे समझता है, जो विपक्ष को गणराज्य का जायज हिस्सा मानने के बजाय एक गैरकानूनी रुकावट समझता है, वह चालाकी से और एक तय तरीके से उस संस्था को खत्म कर रहा है, जो प्रधानमंत्री की शक्ति पर नज़र रखने और जनता की आवाज़ बनने के लिए मौजूद है. संसद सरकार के लिए कोई नोटिस बोर्ड नहीं है. संसद विपक्ष का घर है, जहां हर सरकार को आकर सवालों के जवाब देने पड़ते हैं.
तो 12 साल देर से ही सही, एक सुझाव है: जवाहरलाल नेहरू को लगातार बुरा-भला कहने के बजाय मोदी को उनसे सीखने की कोशिश करनी चाहिए. सदन में आइए. किसी सवाल का जवाब दीजिए. किसी विरोधी को खत्म करने की कोशिश करने के बजाय उसे आगे बढ़ने का मौका दीजिए. नेहरू ने संसदीय लोकतंत्र बनाया; मोदी ने एक दशक इसे खत्म करने में लगा दिया है. मोदी पोस्टरों से नेहरू का नाम मिटा सकते हैं और लाइब्रेरियों के नाम बदल सकते हैं, लेकिन संसद और संसद के प्रति नेहरू की विरासत और प्रतिबद्धता को मिटाया नहीं जा सकता. संसद पर हमला करके और उसका अपमान करके, मोदी यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि नेहरू पहले से कहीं ज्यादा शानदार तरीके से चमकें. जब भी मोदी संसद से बचते हैं, नेहरू की मौजूदगी और ऊंची दिखाई देती है. हर खाली अगली बेंच पर नेहरू का नाम और बड़े अक्षरों में लिखा जाता है.
लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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