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Wednesday, 29 July, 2026
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मोदी की आधी रात वाली इंस्टा रील का एक शब्द, जिसने सब कुछ बता दिया

मोदी की आधी रात वाली इंस्टा रील का एक शब्द बता गया कि शासक और जनता के बीच का रिश्ता बदल चुका है.

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वह पल अजीब और भटकाने वाला था, लेकिन यह एक टर्निंग पॉइंट था. यह एक ऐसा पल था जिस पर भविष्य के रिसर्चर और आर्काइविस्ट मोदी के सालों की स्टडी करते समय वापस आएंगे. जब वे ऐसा करेंगे, तो वे इस पल पर एक चैप्टर लिख सकते हैं और उसका टाइटल रख सकते हैं: “मित्रों से फ्रेंड्स तक: कैसे भारत के स्टूडेंट्स ने एक अनसुने प्रधानमंत्री को सुनने पर मजबूर किया.”

23-24 जुलाई 2026 की आधी रात के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंस्टाग्राम पर नज़र आए. वीडियो वर्टिकल फ्रेम में था, रोशनी ठीक नहीं थी और उनकी बात भी पहले जैसी आत्मविश्वास से भरी नहीं लग रही थी. यह वही मोदी नहीं थे, जो बड़ी चुनावी रैलियों में जोश से भाषण देते हैं या टेलीप्रॉम्प्टर के साथ पूरी तैयारी से मंच पर दिखाई देते हैं. वह थके हुए दिख रहे थे. चेहरे पर थकान थी और हावभाव में भी पहले जैसा भरोसा नहीं था. इस बार उन्होंने एक ऐसा शब्द कहा, जो वह लगभग कभी इस्तेमाल नहीं करते. “मित्रों” नहीं, बल्कि “फ्रेंड्स”. सिर्फ “फ्रेंड्स”.

दो दिन बाद, एक और असरहीन इंस्टाग्राम रील आई और फिर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया. सवाल है कि मोदी सरकार ने कार्रवाई करने में इतनी देर क्यों की?

कई हफ्तों तक कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में छात्र और युवा दिल्ली के जंतर-मंतर और देश के कई हिस्सों में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन करते रहे. उनकी सिर्फ एक मांग थी—जवाबदेही तय हो और धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें.

लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक लगातार भूख हड़ताल पर बैठे रहे. उनकी तबीयत बिगड़ती गई, लेकिन उन्होंने अनशन जारी रखा. मोदी ने हमेशा की तरह चुप्पी साधे रखी. न कोई मुलाकात हुई, न कोई बयान आया और न ही उन छात्रों के बारे में एक शब्द कहा गया, जिन्होंने नीट-यूजी में हुए विवाद के बाद आत्महत्या कर ली.

लेकिन 20 जुलाई को जब सीजेपी के नेतृत्व में छात्र, युवा और दूसरे नागरिक संसद की ओर मार्च करने निकले और पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया, आंसू गैस छोड़ी और पेलेट गन का इस्तेमाल किया, तब हालात बदल गए.

पुलिस पर निहत्थे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ ज़रूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने के आरोप लगे. पेलेट गन से लोगों के घायल होने की खबरें सामने आईं. बिहार में एक पुलिसकर्मी के एके-47 राइफल से फायरिंग करने की भी खबरें आईं. संसद को पूरी तरह घेर लिया गया, लेकिन इसके बावजूद युवा पीछे नहीं हटे. उन्होंने मार्च जारी रखा. वे रुके नहीं और डरकर घर नहीं लौटे. यहां तक कि मोदी सरकार के प्रति नरम रुख रखने वाला मुख्यधारा का मीडिया भी इस मार्च को दिखाने के लिए मजबूर हो गया. पहली बार ऐसा लगा कि मोदी सरकार घबराई हुई है, बल्कि डरी हुई है.

दबाव बढ़ने पर, जो मोदी सरकार आमतौर पर पूरे आत्मविश्वास में दिखती थी, उसे बातचीत की राह पकड़नी पड़ी.

लेकिन विरोध प्रदर्शनों को लेकर मोदी सरकार की पुरानी रणनीति की तरह, सीजेपी से बातचीत की जिम्मेदारी भी दूसरे नेताओं को दी गई. स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा और पीएमओ में मंत्री जितेंद्र सिंह को बातचीत के लिए भेजा गया, जबकि गुजरात की ‘जोड़ी नंबर 1’—नरेंद्र मोदी और अमित शाह— हमेशा की तरह खुद सामने नहीं आए और हर संभावित राजनीतिक नुकसान से दूर रहे.

प्रदर्शन से निपटने का पुराना तरीका

यह कोई नई बात नहीं है. मोदी सरकार का राजनीतिक तंत्र मानो यह समझ ही नहीं पाता कि लोकतंत्र में प्रदर्शन का कितना संवैधानिक महत्व होता है. व्यक्तिपूजा पर आधारित इस राजनीतिक व्यवस्था में हर प्रदर्शन को “साजिश” के रूप में देखा जाता है. जबकि प्रदर्शन लोकतंत्र का अहम हिस्सा हैं. यही वह जगह है जहां जनता और सरकार अपने रिश्ते को तय करती हैं. भारत को आज़ादी भी आंदोलनों और प्रदर्शनों के जरिए ही मिली थी, लेकिन मोदी के लिए प्रदर्शन एक निजी चुनौती जैसा है.

किसान आंदोलन को याद कीजिए. किसान पूरी सर्दी दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे. खुद मोदी ने उन्हें तंज कसते हुए “आंदोलनजीवी” कहा. किसानों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सड़कों पर कीलें और बैरिकेड लगाए गए. बातचीत के लिए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को भेजा गया, जबकि मोदी खुद दूर रहे. तोमर बातचीत में सफल नहीं हुए. एक साल से ज्यादा लंबे आंदोलन के बाद आखिरकार तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े. आज तोमर मध्य प्रदेश विधानसभा के स्पीकर हैं.

विनेश फोगाट और साक्षी मलिक को भी याद कीजिए. भारत की दो सबसे सफल महिला पहलवानों को 28 मई 2023 को दिल्ली पुलिस ने सड़क से घसीटकर हटाया था. उसी दिन मोदी नए संसद भवन का उद्घाटन कर रहे थे, जिसे उन्होंने “लोकतंत्र का मंदिर” कहा था. प्रधानमंत्री को खिलाड़ियों के साथ तस्वीरें खिंचवाना और “खेलो इंडिया” की बात करना पसंद है, लेकिन जब वही खिलाड़ी यौन उत्पीड़न के खिलाफ सड़क पर उतरे, तो मोदी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

यही प्रदर्शन विरोधी सोच बार-बार दिखाई दी है—CAA विरोधी आंदोलन से लेकर अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर और मणिपुर के आंदोलन तक. लोगों की शिकायतों पर बात नहीं की जाती, बल्कि उन्हें अलग-अलग नाम देकर बदनाम किया जाता है— “आंदोलनजीवी”, “खालिस्तानी”, “देशविरोधी”, “जिहादी”, “अर्बन नक्सल”, “विदेशी फंडिंग वाले”. यही सबसे अहम तरीका है. जब किसी प्रदर्शन को एक खास नाम देकर बदनाम कर दिया जाता है, तो सरकार को उसकी बात सुनने की ज़रूरत नहीं पड़ती. जब प्रदर्शन करने वालों को गालियां देकर और टीवी चैनलों के जरिए उनकी छवि खराब कर दी जाती है, तो उनकी असली शिकायतों को आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पत्र में भी यही सोच दिखाई दी. उन्होंने भारत के युवाओं की उम्मीदों का सम्मान करने जैसी बातें लिखीं, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि वह इसलिए इस्तीफा दे रहे हैं ताकि “राष्ट्रविरोधी ताकतें” इस मौके का फायदा न उठा सकें. यानी एक मंत्री छात्रों के लगातार दबाव के बाद इस्तीफा देता है, फिर भी उसे एक काल्पनिक “दुश्मन” का ज़िक्र करना पड़ता है. ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में अगर किसी मंत्री की सार्वजनिक विफलता के बाद इस्तीफा हो जाए, तो यह सामान्य बात मानी जाती है. इसे जवाबदेही कहा जाता है. लेकिन मोदी सरकार अलग है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार साफ कहा था, “हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं होते.”

मोदी सरकार में असहमति और प्रदर्शन को लोकतंत्र का ज़रूरी हिस्सा नहीं, बल्कि सत्ता को चुनौती देने वाला और कई बार अपराध जैसा माना जाता है. हर बार लगभग एक ही तरीका अपनाया जाता है—पहले प्रदर्शन को नज़रअंदाज़ करो, फिर प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग नाम देकर बदनाम करो, उनके खिलाफ सख्त बल प्रयोग करो, बातचीत की जिम्मेदारी दूसरे नेताओं को सौंप दो और आखिर में लंबे टकराव के बाद मांग मान लो. जबकि अगर सरकार शुरुआत में ही लोगों की शिकायत सुन लेती, तो इतना बड़ा टकराव टाला जा सकता था, लेकिन जिस राजनीतिक व्यवस्था की नींव खुद को कभी गलत न मानने पर टिकी हो, वहां गलती स्वीकार करना सबसे मुश्किल काम होता है.

यह आंदोलन अलग क्यों था

लेकिन इस आंदोलन ने एक और बड़ी चीज हासिल की. इसने युवाओं की ताकत और सच की ताकत को एक साथ जोड़ दिया. यह ऐसा तूफान बन गया जिसने पूरे देश को झकझोर दिया. नीट से जुड़ी आत्महत्याओं की दुखद घटनाएं, परीक्षा व्यवस्था की नाकामी और अन्याय, और जींस व बैकपैक पहने हजारों युवाओं की तस्वीरों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया.

खुले हाथों से सामने खड़ी हेलमेट पहने रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) का सामना करते युवा. ढीली-ढाली डिजाइन वाली स्कर्ट पहनी एक किशोरी, जिसे लाठी लिए पुलिसकर्मियों ने जमीन पर गिरा दिया. मासूम चेहरे वाले युवा, जो पुलिस से बहस कर रहे थे. वे सिर्फ प्रदर्शनकारी नहीं थे, वे हमारा भविष्य थे, हमारा देश थे, हमारी उम्मीद थे.

जंतर-मंतर पर एक अभिभावक ने मुझसे कहा, “भारतीय हर चीज़ सह सकता है, लेकिन अपने बच्चों के साथ कुछ गलत होता हुआ कभी बर्दाश्त नहीं करेगा. हम अपने बच्चों के लिए जीते हैं.”

इस बार मोदी पूरे घटनाक्रम की कहानी अपने हिसाब से तय नहीं कर सके. पिछले 12 सालों से उनका संवाद का तरीका लगभग एकतरफा रहा है—मन की बात, पहले से तय कार्यक्रम, पूरी तरह नियंत्रित सार्वजनिक मौजूदगी और कभी खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं. सवाल पूछने की गुंजाइश खत्म कर दी गई. बहस की जगह भी कम होती गई.

यह सोच मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के समय से ही दिखाई देती है. आलोचकों, पत्रकारों और सिविल सोसायटी के कई संगठनों ने बार-बार आरोप लगाया कि मोदी सरकार असहमति बर्दाश्त नहीं करती थी. गुजरात की पहचान एक ऐसे राज्य के रूप में बनने लगी थी, जहां शायद ही कोई प्रदर्शन होता हो. सड़कों पर विरोध रोकने के लिए धारा 144 और दूसरे प्रतिबंधात्मक कानूनों का बार-बार इस्तेमाल किया जाता था. यही सोच मोदी के साथ गुजरात से दिल्ली भी आई. प्रदर्शन को सुनने या समझने की चीज नहीं, बल्कि उसे अपराध बताने, बदनाम करने या पूरी तरह नज़रअंदाज़ करने की चीज़ माना गया. दरअसल, दिसंबर 2025 में भी गुजरात हाई कोर्ट ने बिना सोचे-समझे बार-बार विशेष प्रतिबंध लगाने वाली शक्तियों के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी. अदालत ने कहा था कि आपातकाल जैसी व्यवस्थाओं को रोजमर्रा के शासन का स्थायी तरीका नहीं बनाया जा सकता. प्रदर्शन के खिलाफ यह राजनीतिक तरीका मुख्यधारा के मीडिया के एक हिस्से की वजह से भी मजबूत हुआ. जब टीवी लोगों की शिकायतों को ठीक से नहीं दिखाता, जब प्राइम टाइम के एंकर सत्ता से मुश्किल सवाल नहीं पूछते, तब सरकार में बैठे लोग यह मानने लगते हैं कि असहमति जैसी कोई चीज है ही नहीं.

लेकिन भारत के युवाओं ने इस बार राजनीति का एक बड़ा सबक सीख लिया. इंस्टाग्राम ने बैरिकेड तोड़ दिए.

बातचीत पर फिर से नियंत्रण हासिल करना

युवा प्रदर्शनकारियों ने रील, मीम, सटायर और डिजिटल कैंपेन का बेहद रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल किया. अपनी बात कहने के लिए उन्हें किसी संपादक की अनुमति की ज़रूरत नहीं थी. उन्हें यह साबित करने के लिए किसी प्राइम टाइम एंकर की भी ज़रूरत नहीं थी कि उनकी शिकायत सही है. उनके मोबाइल ही उनके टीवी स्टूडियो बन गए. उनकी सोशल मीडिया फीड ही जनता की चौपाल बन गई. धूप हो या बारिश, वे वहीं डटे रहे—युवा, उम्मीद से भरे हुए. उनके पास हथियार नहीं थे, सिर्फ हिम्मत, समझदारी, हंसी, संगीत और नई सोच थी. उसी के सहारे उन्होंने इस थके हुए देश में उम्मीद की नई रोशनी फैलाई.

और अचानक मीडिया को सबसे अच्छी तरह इस्तेमाल करने वाले मोदी खुद बातचीत को नियंत्रित करने के बजाय उसके पीछे भागते नज़र आए. इसलिए आधी रात वाली इंस्टाग्राम रील आई. इसलिए पहली बार नरेंद्र मोदी उसी पीढ़ी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पहुंचे, जिसकी आवाज़ को उनकी सरकार दबाने की कोशिश कर रही थी. इसलिए उनकी आवाज़ में वह अलग-सी अपील सुनाई दी—”फ्रेंड्स”.

मोदी ने अपने कैबिनेट मंत्रियों से भी इंस्टाग्राम पर आने को कहा. लेकिन इससे असली बात समझ में नहीं आई.

सीजेपी के नेतृत्व में प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने सरकार को इसलिए नहीं हराया क्योंकि वे इंस्टाग्राम बेहतर चलाते थे. उन्होंने सरकार को जवाब देने पर इसलिए मजबूर किया क्योंकि उन्होंने शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से लगातार आंदोलन जारी रखा. इंस्टाग्राम सिर्फ उनकी बात लोगों तक पहुंचाने का माध्यम था. उनका संदेश सच बोलने का था. उनकी इंस्टाग्राम स्टोरी का संदेश था—”सत्यमेव जयते”. मोदी सरकार के पास लाठियां थीं, लेकिन छात्रों के पास सच था.

मोदी हमेशा से सोशल मीडिया की ताकत को समझते रहे हैं, लेकिन इन युवाओं ने एक और बात समझ ली थी—सोशल मीडिया सबसे ज्यादा असर तब करता है, जब वह किसी असली समस्या और सच्ची शिकायत को लोगों तक पहुंचाता है और तस्वीरों व वीडियो के जरिए बिना किसी बनावट के सच दिखाता है. मुख्यधारा के मीडिया ने इस आंदोलन को किनारे लगाने की पूरी कोशिश की. लेकिन इंस्टाग्राम ऐसा नहीं कर सका. मोदी छात्रों की तरह उसी माध्यम पर तो आ गए, लेकिन उनकी मांग को खत्म नहीं कर सके.

रिश्ते की नई तस्वीर

इसी वजह से 23-24 जुलाई की आधी रात मोदी की इंस्टाग्राम रील राजनीतिक इतिहास का हिस्सा बनने लायक है. वजह यह नहीं कि मोदी ने उसमें क्या कहा. उन्होंने कोई नई बात नहीं कही. उन्होंने परीक्षा पेपर लीक रोकने के नए कानून की बात की, जबकि संसद दो साल पहले ही पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 बना चुकी थी. असली समस्या किसी नए सख्त कानून की कमी नहीं थी. समस्या थी कानून को सही तरीके से लागू करना और जवाबदेही तय करना.

लेकिन उस आधी रात वाली रील की असली अहमियत उससे पहले हुई बातों में नहीं, बल्कि उसके बाद जो हुआ उसमें है. मोदी की रील आने के बाद भी छात्र प्रदर्शन करते रहे. मोदी की रील के बाद भी शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा.

मोदी की इंस्टाग्राम रील लोगों की राय नहीं बदल सकी. इसे बड़े पैमाने पर खारिज कर दिया गया और सच की ताकत के सामने यह टिक नहीं पाई. पिछले दो महीनों में मोदी का जितना मजाक उड़ा और जितनी आलोचना हुई, उतनी शायद उनके पूरे प्रधानमंत्री कार्यकाल में कभी नहीं हुई. आधी रात की यह रील शायद यह दिखाने के लिए बनाई गई थी कि हालात अब भी उनके नियंत्रण में हैं, लेकिन हुआ इसका उलटा. मोदी की अजेय और कभी गलती न करने वाली छवि अचानक कमजोर पड़ती दिखी. ऐसा लगा कि उनकी राजनीतिक साख पहले से कहीं ज्यादा नीचे पहुंच गई है. पहले से तैयार किया गया उनका संदेश भी लोगों को प्रभावित नहीं कर पाया.

कई सालों में पहली बार ऐसा हुआ कि खुद को मीडिया का सबसे बड़ा जानकार बताने वाले प्रधानमंत्री बातचीत की दिशा तय नहीं कर रहे थे. वे उसका जवाब दे रहे थे.

छात्रों ने एक नई राजनीतिक हकीकत सामने रख दी. जिस प्रधानमंत्री ने मीडिया पर पकड़ बनाकर बड़ी राजनीतिक ताकत हासिल की थी, उन्हें अब ऐसी पीढ़ी का सामना करना पड़ा, जिसके मीडिया प्लेटफॉर्म पर न तो वह पहरा लगा सकते थे और न ही उसे अपने नियंत्रण में रख सकते थे. वह उसी प्लेटफॉर्म पर तो पहुंचे, लेकिन युवाओं का संदेश नहीं समझ पाए. मोदी मीडिया की लड़ाई हार गए. 12 साल में पहली बार राजनीतिक संवाद पर उनका एकाधिकार टूटता हुआ दिखाई दिया.

23 जुलाई की रात, एक दशक से ज्यादा समय तक माइक्रोफोन पर छाए रहने वाले नरेंद्र मोदी को एहसास हुआ कि अब सबसे अहम माइक्रोफोन उनके हाथ में नहीं रहा. अब हज़ारों ज्यादा अहम आवाज़ें बोल रही थीं, जो उन्हें और उनकी सरकार को सुनने के लिए मजबूर कर रही थीं. “मित्रों” से “फ्रेंड्स” तक का सफर शायद सिर्फ एक शब्द का बदलाव लगे, लेकिन कई बार सिर्फ एक शब्द ही बता देता है कि शासक और जनता के बीच का रिश्ता बदल चुका है.

और हां, जहां मोदी के राजनीतिक विरोधियों को ईडी और दूसरी एजेंसियों के जरिए दबाया जा सकता है, वहीं युवाओं में ऐसा डर नहीं है. सीजेपी के नेतृत्व में हुए युवा आंदोलन की जीत, डर और सत्तावाद पर सच और उम्मीद की जीत है. भारत की जनता के साथ मोदी का रिश्ता अब पहले जैसा कभी नहीं रहेगा.

लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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