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Tuesday, 1 September, 2026
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बेलगावी विवाद से हिंदी के खिलाफ मोर्चे तक: कन्नड़ समर्थक संगठन और MNS क्षेत्रीय अधिकारों पर साथ आए

कर्नाटक रक्षणा वेदिके और राज ठाकरे की MNS, जो कभी एक-दूसरे की विरोधी थीं, अब भाषा के अधिकार, प्रवास, परिसीमन और संघीय मुद्दों पर एक प्रस्तावित राष्ट्रीय दबाव समूह के जरिए साथ काम कर रही हैं.

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बेंगलुरु: कन्नड़ समर्थक संगठन कर्नाटक रक्षणा वेदिके (KRV) और राज ठाकरे की अगुवाई वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) संघीय मुद्दों और बिना योजना के हो रहे प्रवास से जुड़े मामलों पर साथ काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि इससे हिंदी थोपने की स्थिति बन रही है और स्थानीय संस्कृति कमजोर हो रही है.

ऐसे ही मुद्दों को लेकर दोनों संगठनों के बीच पहले टकराव होता रहा है. इसके बावजूद अब दोनों संगठन दूसरे राज्यों के समूहों के साथ मिलकर क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृति के लिए कथित खतरे के खिलाफ साझा मुद्दे तलाश रहे हैं और एक साथ काम करने की कोशिश कर रहे हैं.

KRV के महासचिव अरुण जावगल ने दिप्रिंट से कहा, “यह अलग-अलग संघीय मुद्दों पर एक दबाव समूह होगा. हिंदी थोपने से ज्यादा, यह भाषा की असमानता को खत्म करने की एक साझा कोशिश है.”

KRV के 68 लाख से ज्यादा सक्रिय सदस्य हैं और इसे अक्सर ‘नेला, जला, बाशे’ यानी ज़मीन, पानी और भाषा के खिलाफ माने जाने वाले किसी भी फैसले का विरोध करते देखा जाता है. हालांकि, संगठन काफी हद तक राजनीति से दूर रहा है. इसके उलट MNS पड़ोसी महाराष्ट्र में नियमित रूप से चुनाव लड़ती है.

दोनों संगठनों के बीच बेलगावी, कृष्णा नदी के पानी के विवाद और महादयी (मांडवी) नदी जैसे मुद्दों पर कई बार टकराव हुआ है.

अब साथ आकर दोनों का कहना है कि मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में लोगों का बिना नियंत्रण के प्रवास स्थानीय संस्कृति को प्रभावित कर रहा है. उनका कहना है कि ज्यादा लोग हिंदी को आम भाषा बनाने पर जोर दे रहे हैं.

MNS के मुंबई शहर अध्यक्ष संदीप देशपांडे ने कहा कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार का लंबे समय से चले आ रहे विवादों को हल करने का कोई इरादा नहीं है.

देशपांडे ने दिप्रिंट से कहा, “ये ऐसी समस्याएं हैं जिन्हें केंद्र हल नहीं करना चाहता. वे चाहते हैं कि राज्य आपस में लड़ते रहें. इसलिए हमने तय किया है कि इन मुद्दों पर हम आपस में चर्चा करेंगे और इन्हें हल करेंगे.”

उन्होंने बीजेपी और दूसरी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों पर राज्य के मुद्दों को लगातार ‘क्षेत्रीय’ बताकर कमजोर करने, भाषा के अधिकार के लिए काम करने वाले समूहों को तोड़ने और ‘राष्ट्रीय हित’ के नाम पर उनकी बात खारिज करने का आरोप लगाया.

KRV और MNS अब तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में समान विचार रखने वाले संगठनों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि समर्थन जुटाया जा सके और साझा मुद्दे तलाशे जा सकें.

‘आम न्यूनतम कार्यक्रम’

सोमवार को बेंगलुरु में हुई एक बैठक में MNS और KRV ने एक आम न्यूनतम कार्यक्रम तैयार करने का फैसला किया. इसका इस्तेमाल दूसरे राज्यों में भी लोगों को इन मुद्दों के बारे में जागरूक करने के लिए किया जाएगा.

साझा क्षेत्रीय मुद्दों में भाषा के अधिकार और पहचान, केंद्र को उत्तर प्रदेश और बिहार से आगे देखने के लिए मजबूर करना, प्रस्तावित परिसीमन और इससे प्रतिनिधित्व में होने वाले अनुमानित नुकसान और नीट समेत कई दूसरे मुद्दे शामिल हैं.

देशपांडे ने कहा, “यह मंच हिंदी थोपने, स्थानीय लोगों को नौकरी देने, बिना नियंत्रण के प्रवास और ज्यादा टैक्स वसूली लेकिन कम फायदा मिलने जैसे मुद्दों के खिलाफ होगा…हम केंद्र सरकार पर एक तरह का दबाव समूह बनाना चाहते हैं, ताकि वह हमारे मुद्दों को गंभीरता से ले.”

राज ठाकरे की अगुवाई वाली MNS ने अतीत में हिंसा का सहारा लिया है और ‘मराठी गौरव’ के लिए खतरा मानने वाले लोगों या चीजों पर शारीरिक हमला भी किया है.

कर्नाटक में KRV ने भी स्थानीय भाषा और संस्कृति की रक्षा के नाम पर कानून अपने हाथ में लेते हुए इसी तरह के तरीके अपनाए हैं.

दोनों समूह लगभग हर साल दिसंबर के आसपास एक-दूसरे के सामने आ जाते हैं. इसी समय बेलगावी में कर्नाटक विधानसभा का शीतकालीन सत्र होता है. महाराष्ट्र का एक वर्ग बेलगावी को महाराष्ट्र का अभिन्न हिस्सा मानता है.

जावगल ने कहा, “हम पड़ोसी हैं और हमारे बीच कई मुद्दे हैं. लेकिन हम साझा मुद्दे तलाशने की भी कोशिश कर रहे हैं, जिससे समय के साथ दूसरे मतभेदों को कम करने में मदद मिलेगी.”

ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) के चुनाव नजदीक हैं. ऐसे में KRV और दूसरे कन्नड़ समर्थक संगठन इस बात को लेकर चिंतित हैं कि पांच नई बनाई गई नगर निगमों में से कम से कम तीन में गैर-कन्नड़ भाषी लोग बहुमत में हो सकते हैं.

दोनों संगठनों का मानना है कि यह BJP की एक बड़ी योजना का हिस्सा है, जिससे क्षेत्रीय पहचान और कमजोर होगी.

हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब दोनों संगठन साथ आए हैं.

2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले MNS, KRV और भाषा के अधिकार के लिए काम करने वाले दूसरे समूह हिंदी थोपे जाने का विरोध करने के लिए साथ आए थे.

उस समय द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की कर्नाटक इकाई ने भी इन मुद्दों का समर्थन किया था.

देशपांडे ने कहा कि KRV इस महीने के अंत में या अगले महीने की शुरुआत में मुंबई आएगा. इसके अलावा Zoom कॉल की जाएंगी और 10 बिंदुओं वाला आम न्यूनतम कार्यक्रम तैयार किया जाएगा. इसके बाद इसे दूसरे राज्यों के समान विचार रखने वाले संगठनों के सामने रखा जाएगा.

यह पूछे जाने पर कि क्या 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह सब हासिल हो जाएगा, देशपांडे ने कहा, “अभी काफी समय है, लेकिन हमें किसी तरह का दबाव समूह बनाना होगा क्योंकि अभी केंद्र में एक पार्टी की तानाशाही है, जो किसी भी राज्य के लिए कुछ अच्छा नहीं सोचती. हमें साझा मुद्दे तलाशने होंगे और यह काम हमें खुद करना होगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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