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Wednesday, 23 September, 2026
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फ्रंटियर नगालैंड बिल को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिलनी चाहिए थीं. ऑटोनॉमी का एक नया मॉडल

FNTA बिल 2026 नगालैंड के पूर्वी जिलों के लिए एक नई ऑटोनॉमस बॉडी बनाता है. यह एक पॉलिटिकल सेटलमेंट है जो ‘ऑटोनॉमस काउंसिल’ के स्टैंडर्ड आइडिया से ज़्यादा बड़ा है.

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तीन सितंबर को 14वीं नगालैंड विधानसभा के नौवें सत्र के आखिरी दिन, कोहिमा में सदन ने दो ऐसे काम किए, जिन्हें दिल्ली के अखबारों के पहले पन्ने की खबर बनना चाहिए था. सदन ने फ्रंटियर नगालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) बिल, 2026 पास किया. इससे राज्य के पूर्वी जिलों—तुएनसांग, मोन, लोंगलेंग, किफिरे, नोकलाक और शामाटोर के लिए एक नई ऑटोनॉमस बॉडी बनाई गई.

छह महीने पहले, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, नगालैंड के मुख्य सचिव सेंतियांगेर इमचेन और ईस्टर्न नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) के नेतृत्व—ए चिंगमक चांग और महासचिव एम. होनांग, ने इस मुद्दे पर एक समझौता ज्ञापन (MoA) पर हस्ताक्षर किए थे. विधानसभा ने एकमत से एक प्रस्ताव भी पास किया, जिसमें केंद्र सरकार से राज्य से प्रोटेक्टेड एरिया परमिट (PAP) व्यवस्था हटाने को कहा गया. उनका कहना था कि इस पाबंदी से राज्य में पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और निवेश से जुड़े फैसलों पर बुरा असर पड़ रहा है.

दोनों डेवलपमेंट्स की रिपोर्ट पीटीआई और आईएएनएस ने की. कॉपी हर जगह गई जहां यह आमतौर पर जाती है, लेकिन कुछ ही अखबारों ने एग्रीमेंट के कुछ हिस्से छापे, जिनमें इनमें दिप्रिंट, डेक्कन क्रॉनिकल, हिंदुस्तान टाइम्स, द हंस इंडिया, द फेडरल, सेंटीनेल असम, ईस्टमोजो और नॉर्थईस्ट के अखबार शामिल हैं. ऐसा लगता है कि किसी भी नेशनल अखबार ने खास तौर पर कोहिमा या तुएनसांग में अपना रिपोर्टर नहीं भेजा. किसी ने भी एडिटोरियल कमेंट नहीं किया. न ही उन्होंने अपने ओपिनियन कॉलमिस्ट से कोई एनालिटिकल पीस कमीशन किया या पब्लिश किया.

हालांकि, बिल और प्रस्ताव, दोनों पर विस्तार से विश्लेषण की जरूरत है, लेकिन इस और अगले कॉलम का फोकस अनुच्छेद 371A के तहत हुए इस राजनीतिक समझौते के असर और दूसरे इलाकों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव पर है.

FNTA बिल की अहमियत कवरेज से कहीं ज्यादा

इस साल की शुरुआत में नई दिल्ली में ENPO समझौते पर हुए हस्ताक्षर समारोह की कवरेज से इसकी तुलना करने पर बड़ा अंतर साफ दिखता है. अमित शाह और उनके बगल में नेफ्यू रियो की तस्वीर हर जगह छपी थी. अगले दिन प्रधानमंत्री की ओर से इस समझौते का समर्थन भी हर जगह खबर बना था, लेकिन हैरानी की बात है कि छह महीने तक चली लंबी बातचीत के बाद इस समझौते को लागू करने वाला कानून खबर नहीं बना.

यह बिल ‘ऑटोनॉमस काउंसिल’ जैसे आम प्रशासनिक शब्द से कहीं ज्यादा बड़ा है. असल में यह शासन की दूसरी व्यवस्था है. इसके तहत 62 सदस्यों वाली अथॉरिटी को तुएनसांग, मोन, लोंगलेंग, किफिरे, नोकलाक और शामाटोर जिलों में 46 विषयों पर कानून बनाने, काम करने, प्रशासन चलाने और पैसे से जुड़े फैसले लेने की शक्तियां दी जाएंगी. हालांकि, यह व्यवस्था नगालैंड के संवैधानिक और कानूनी ढांचे के अंदर ही रहेगी.

62 में से 40 सदस्य एक-सदस्यीय क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे वयस्क मतदाताओं द्वारा चुने जाएंगे. इनमें एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व रहेंगी. दो और सदस्यों को राज्यपाल, अथॉरिटी से सलाह लेकर, उन मान्यता प्राप्त जनजातियों में से मनोनीत करेंगे, जिनका इस क्षेत्र में प्रतिनिधित्व नहीं है या बहुत कम है. 20 पदेन विधायकों के उलट, इन मनोनीत सदस्यों को वोट देने का अधिकार भी होगा.

कार्यकारी शक्ति अधिकतम नौ सदस्यों वाली एक काउंसिल के पास होगी. इसका नेतृत्व एक मुख्य कार्यकारी सदस्य करेगा, जिसे कैबिनेट मंत्री के बराबर प्रोटोकॉल का दर्जा मिलेगा. 46 विषयों पर काम शुरू करने में मदद करने वाले सचिवालय का नेतृत्व अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रधान सचिव स्तर के एक वरिष्ठ IAS अधिकारी के पास होगा. इन विषयों में कृषि, बागवानी, मछली पालन, आरक्षित वन के अलावा अन्य वन, सिंचाई, झूम खेती, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, उच्च माध्यमिक तक स्कूली शिक्षा, कौशल विकास, श्रम और रोजगार, ग्रामीण विकास, सामाजिक कल्याण, पर्यटन, हथकरघा और हस्तशिल्प, जिला सड़कें, सार्वजनिक परिवहन और आवास शामिल हैं.

पूर्वी नगालैंड का विशेष दर्जा

पूर्वी जिलों की शिकायतें और समस्याएं 1963 से भी पहले की है. 1963 में नगा हिल्स-तुएनसांग क्षेत्र को भारत का 16वां राज्य ‘नगालैंड’ बनाया गया था.

यह याद रखना ज़रूरी है कि जब 1951 में भारत की पहली जनगणना हुई थी, तब तुएनसांग को इसमें शामिल नहीं किया गया था. इसकी वजह यह थी कि यह इलाका बहुत दूर था और जनगणना करने के लिए जरूरी प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद नहीं थी.

1957 में ही तुएनसांग फ्रंटियर ट्रैक्ट को असम के नगा हिल्स जिले में शामिल किया गया. इसी इलाके से बाद में ये छह जिले बनाए गए. उस समय नगा हिल्स जिले का मुख्यालय कोहिमा में और एक सब-डिविजन मोकोकचुंग में था. यह कदम इंडियन फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IFAS) के मेजर बॉब रालेंगनाओ खाथिंग की पहल पर उठाया गया था. वह 1953 से 1957 तक तुएनसांग के पॉलिटिकल ऑफिसर थे. इसी दौरान इस इलाके में नगा विद्रोह अपने चरम पर था. उनका तर्क था कि एक जैसी प्रशासनिक व्यवस्था होने से सुरक्षा एजेंसियों असम पुलिस, असम राइफल्स और भारतीय सेना के बीच, मजिस्ट्रेट व्यवस्था और विकास प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल होगा.

कोहिमा की तुलना में तुएनसांग सड़क संपर्क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार सुविधाओं के मामले में काफी पिछड़ा हुआ था. वास्तव में, पहला बैंक और नियमित डाकघर भी तब ही बना, जब खाथिंग ने तुएनसांग की जिम्मेदारी संभाली. खाथिंग को 1957 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था.

22 से 26 अक्टूबर 1959 तक मोकोकचुंग में हुई तीसरी नागा पीपुल्स कन्वेंशन (NPC) ने केंद्र के साथ समझौते का रास्ता साफ किया. इसके बाद 16 सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर हुए. उस समय खाथिंग मोकोकचुंग के डिप्टी कमिश्नर थे. इस इलाके की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक पिछड़ेपन को देखते हुए, अनुच्छेद 371A के तहत तुएनसांग को 10 साल के लिए विशेष व्यवस्था दी गई. राज्यपाल की निगरानी में एक क्षेत्रीय परिषद बनाई गई और उसे स्वतंत्र रूप से फंड दिया जाता था.

हालांकि, 1963 में राज्य का दर्जा मिलने के बाद शुरुआती कुछ दशक विद्रोह से प्रभावित रहे और विकास से जुड़ी चर्चा पीछे चली गई. 1974 में तुएनसांग के लिए बनाई गई संस्थागत सुरक्षा व्यवस्था खत्म कर दी गई और पूर्वी नगालैंड राज्य की सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बन गया. उस समय किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया.

फ्रंटियर नगालैंड की मांग

तब से अब तक, पूर्वी नगालैंड और राज्य के बाकी हिस्सों के बीच का अंतर और बढ़ गया है.

मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (MP-IDSA) के एक ब्रीफिंग पेपर के मुताबिक, पूर्वी नगालैंड के छह जिलों में राज्य की 28.88 प्रतिशत आबादी रहती है और राज्य के करीब 36 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में ये जिले फैले हैं, लेकिन विधानसभा की 60 सीटों में से इन जिलों के पास सिर्फ 20 सीटें थीं.

हालांकि, पूर्वी नगा राज्य की सरकारी नौकरियों के लिए योग्य कर्मचारियों की संख्या में करीब 20 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं और गैर-राजपत्रित और गैर-तकनीकी पदों पर उन्हें कानून के तहत 25 प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है, ENPO ने बताया है कि स्थायी राज्य सरकारी नौकरियों में असल प्रतिनिधित्व इस आंकड़े के आसपास भी नहीं था. राज्य सरकार ने UNDP के साथ मिलकर दूसरी नगालैंड स्टेट ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट तैयार की थी. इसे तत्कालीन मुख्यमंत्री टीआर जेलियांग ने स्वतंत्रता दिवस 2017 पर जारी किया था. रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि ऊपर से दिखने वाली प्रगति के पीछे राज्य के अंदर काफी असमानता छिपी हुई है. ज़रूरी सड़कों की घनत्व 100 वर्ग किलोमीटर पर 71.07 किलोमीटर थी, जबकि पश्चिमी नागालैंड में यह 100 वर्ग किलोमीटर पर 95.70 किलोमीटर थी.

इन असमानताओं ने ENPO के गठन में भी भूमिका निभाई थी. इसकी शुरुआत 1994 में हुई थी, जब इसे पहले तुएनसांग-मोन पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (TMPO) के नाम से बनाया गया था. जैसे-जैसे नए जिले बनाए गए, 2005 में इसका नाम और स्वरूप बदलकर ENPO कर दिया गया. इसका उद्देश्य पूर्वी नगा क्षेत्र की सात जनजातियों—चांग, खियामनिउंगन, कोन्याक, फोम, संगतम, तिखिर और यिमखियुंग—की व्यापक क्षेत्रीय पहचान को दिखाना था.

2010 के आखिर में ENPO ने एक सामाजिक कल्याण संगठन से आगे बढ़कर एक सक्रिय राजनीतिक आंदोलन के रूप में अपनी मांग को साफ तौर पर रखा. उसने भारत सरकार को एक ज्ञापन देकर अलग ‘फ्रंटियर नगालैंड’ राज्य बनाने की मांग की. कई ज्ञापनों, काम बंद करने के विरोध, प्रदर्शनों और बातचीत के बाद, 23 फरवरी 2024 को उसने चेनमोहों प्रस्ताव अपनाया. इसके तहत स्थानीय निकायों और राज्य विधानसभा से लेकर संसद तक सभी चुनावों का बहिष्कार करने का फैसला किया गया.

हालांकि, तब तक 2023 के नगालैंड विधानसभा चुनाव हो चुके थे और पूर्वी नगालैंड के 20 विधायक विधानसभा में पहुंच चुके थे. इनमें बीजेपी के पी. पाईवांग कोन्याक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग संभालते हैं, नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) के सीएल जॉन वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन और विलेज गार्ड्स मंत्री हैं. वहीं बीजेपी के पी. बाशांगमोंबा चांग के पास आवास और मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की जिम्मेदारी है.

इस बीच, नगालैंड में लोकसभा की केवल एक सीट है. इसलिए पूर्वी जिलों के सभी 738 मतदान केंद्रों पर ENPO के पूरी तरह चुनाव बहिष्कार लागू कराने का असर मध्य और पश्चिमी नगालैंड के बाकी 40 विधानसभा क्षेत्रों के 1,601 मतदान केंद्रों पर नहीं पड़ा. इंडियन नेशनल कांग्रेस के एस. सुपोंगमेरेन जमीर ने बीजेपी समर्थित NDPP के डॉ. चुम्बेन मरी को हराकर लोकसभा सीट जीती.

2026 में FNTA बिल आखिरकार पास होने के बाद ENPO की प्रतिक्रिया में खास उत्साह नहीं दिखा. उसने बिल पास होने को “भविष्य में आने वाली कई बाधाओं की दिशा में सिर्फ दूसरा कदम” बताया और गृह मंत्रालय (MHA) तथा राज्य सरकार, दोनों से इसके लागू होने में मदद जारी रखने को कहा.

राज्य सरकार इस मामले में काफी गंभीर दिखती है. 11 सितंबर 2026 को जब मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो और उपमुख्यमंत्री यांथुंगो पैटन ने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की, तो उन्होंने केंद्र से स्पेशल डेवलपमेंट ग्रांट पैकेज बढ़ाने की नगालैंड की औपचारिक मांग दोहराई. MoA के तहत इस पैकेज के लिए 5,000 करोड़ रुपये का प्रस्ताव था. राज्य ने इसे बढ़ाकर कम से कम 10,000 करोड़ रुपये करने की मांग की, क्योंकि पूर्वी छह जिलों में लंबे समय से बुनियादी ढांचे की भारी कमी है.

शुरुआत अच्छी हुई है. हालांकि, आगे रास्ते में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

यह हिमालयी क्षेत्र दार्जिलिंग-कलिम्पोंग और आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों में राजनीतिक समझौतों पर चार कॉलम की सीरीज़ का तीसरा लेख है, जिन्हें अब अष्टलक्ष्मी कहा जाता है—धन और समृद्धि की आठ बहनें.

संजीव चोपड़ा सेंटर फॉर कंटेंपररी स्टडीज़, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी (PMML), नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं, जहां उनकी फेलोशिप का टॉपिक है बॉर्डर्स, बाउंड्रीज़ एंड ब्लूवाटर्स ऑफ भारत. वे पद्मश्री मेजर बॉब खाथिंग की बायोग्राफी पर भी काम कर रहे हैं, जो नगालैंड के पूर्व चीफ सेक्रेटरी और बर्मा में भारत के एम्बेसडर थे. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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