नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की उस मांग पर बंटा हुआ फैसला सुनाया है, जिसमें CEC और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की गई थी.
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने सरकार की इस मांग को खारिज कर दिया, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा उनसे सहमत नहीं थे. उनका कहना था कि इस मामले में कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल शामिल है, जिसका फैसला बड़ी पीठ को करना चाहिए.
हालांकि, दोनों जज इस बात पर सहमत थे कि आगे और देरी से बचने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश को पांच जजों की पीठ बनानी चाहिए.
आमतौर पर दो जजों की पीठ के बंटे हुए फैसले का मतलब होता है कि तीन जजों की पीठ मामले की सुनवाई करेगी. इसमें वे दोनों जज भी शामिल होते हैं, जिन्होंने पहले मामले की सुनवाई की थी.
डिवीजन बेंच ने कहा, “किसी मामले को पांच से 20 साल या उससे भी ज्यादा समय तक लंबित रखना संस्थान के लिए अच्छा नहीं है.” पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में हुई देरी को स्वीकार करते हुए कहा कि, “चूंकि संवैधानिक मुद्दों का समाधान करना इस अदालत के जजों का मुख्य काम है, इसलिए यह उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए.”
विस्तृत फैसला अभी आना बाकी है.
2023 के इस कानून को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि इसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली तीन सदस्यीय समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया गया है. साथ ही, यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या यह कानून सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में दिए फैसले के खिलाफ है.
याचिकाओं में कानून की धारा 7 को चुनौती दी गई है. इसके तहत CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं. इस चुनौती पर अभी फैसला होना बाकी है.
भारत में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर एक कानूनी खालीपन था. इसे मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दूर किया था. कोर्ट ने कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति राष्ट्रपति को एक उच्चस्तरीय समिति की सलाह पर करनी चाहिए. इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होने चाहिए.
यह फैसला अनूप बरनवाल की ओर से दायर जनहित याचिका पर पांच जजों की पीठ ने दिया था.
हालांकि, यह व्यवस्था सिर्फ तब तक लागू रहने की उम्मीद थी, जब तक संसद संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत इस बारे में कानून नहीं बना देती.
दिसंबर 2023 में संसद ने CEC और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 पास किया. इस कानून में तीन सदस्यीय समिति में CJI की जगह एक केंद्रीय मंत्री को रखा गया. इससे सरकार को समिति में 2:1 का बहुमत मिल गया. इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. कोर्ट को पहले यह तय करना था कि इस मामले की सुनवाई कौन करेगा, बिना चुनौती के मुख्य मुद्दे पर फैसला किए.
बुधवार को फैसला सुनाते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मामले के मुख्य मुद्दे पर पहली नजर में कुछ टिप्पणियां भी कीं.
उन्होंने कहा, “यह उम्मीद करना बहुत दूर की बात है कि मंत्रिपरिषद का हिस्सा रहने वाला कोई मंत्री नेता या सरकार से अलग रुख अपनाएगा. केंद्रीय मंत्रियों को शामिल करने से ऐसी स्वतंत्र ताकत नहीं मिलती, जो किसी निष्पक्ष चयनकर्ता से मिलती.”
जस्टिस दत्ता ने आगे कहा, “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव एक पूरी तरह स्वतंत्र ECI पर निर्भर करते हैं. सिर्फ ECI का स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए. प्रधानमंत्री की ओर से नामित सदस्य से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह प्रधानमंत्री के खिलाफ जाएगा.”
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने Collegium व्यवस्था की जो आलोचना की थी, जस्टिस दत्ता ने उस पर भी खास तौर पर असहमति जताई. उन्होंने कहा, “यह बात कि जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं, एक मिथक है. लोगों को निहित स्वार्थ वाले लोगों ने अपने मकसद से बनाई गई बातों के जरिए यह समझाया है.”
उन्होंने जोर दिया कि Collegium को “अपने आप में एक कानून” बताना एक बहुत बड़ा सामान्यीकरण है. इससे उस विस्तृत सलाह-मशवरे की प्रक्रिया को नजरअंदाज किया जाता है, जिसमें राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारियों के साथ-साथ खुफिया एजेंसियों की राय भी शामिल होती है.
उन्होंने डॉ. बी.आर. आंबेडकर की सोच और मौजूदा समय के बीच भी तुलना की. उन्होंने कहा कि व्यवस्था को कमजोर करने वाली असली समस्या कार्यपालिका की ओर से नियमों को चुनिंदा तरीके से लागू करना है.
दूसरी ओर, जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस मुद्दे का फैसला संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान पीठ को अधिकार के साथ करना चाहिए. इस अनुच्छेद के तहत ऐसे किसी मामले की सुनवाई और फैसला करने के लिए कम से कम पांच सुप्रीम कोर्ट जजों की जरूरत होती है, जिसमें संविधान की व्याख्या से जुड़ा कानून का कोई महत्वपूर्ण सवाल हो या संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति की ओर से भेजा गया मामला हो.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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