नई दिल्ली: भारत के दो पड़ोसी देश, जिनकी आपस में कोई सीमा नहीं लगती, उन्होंने हाल ही में अपने बीच की सीमा को संभालने के लिए एक आयोग बनाया है. नई दिल्ली ने इसे तुरंत खारिज कर दिया, जैसा उसने 1963 में भी किया था, जब चीन और पाकिस्तान ने अपने बीच पहला सीमा समझौता किया था.
16 सितंबर को विदेश मंत्रालय (MEA) ने पाकिस्तान और चीन की ओर से घोषित बॉउंड्री जॉइंट कमीशन (BJC) को खारिज कर दिया. मंत्रालय ने कहा कि दोनों देशों के बीच कोई सीमा नहीं है. भारत ने यह भी दोहराया कि उसने 1963 के “तथाकथित” चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है. इसी समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने बीच की “सीमा” तय करने के लिए एक आयोग बनाया था.
बॉउंड्री जॉइंट कमीशन की शुरुआत 2013 के चीन-पाकिस्तान बॉउंड्री मैनेजमेंट सिस्टम समझौते से हुई थी. इसका मकसद 1963 के समझौते के तहत तय की गई “सीमा” का प्रबंधन करना था.
BJC का पहला सत्र 16 से 17 सितंबर तक इस्लामाबाद में हुआ. इसके साथ ही आयोग ने औपचारिक रूप से काम शुरू किया.
पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने BJC का गठन पाकिस्तान-चीन के “ऑल-वेदर स्ट्रैटेजिक कोऑपरेटिव पार्टनरशिप” को मजबूत करने की दिशा में एक जरूरी कदम बताया. उसने कहा कि अगली बैठक चीन में होगी.
भारत की ओर से अपने दोनों पड़ोसी देशों के बीच हुए ‘सीमा समझौते’ पर ऐसी आपत्ति कोई नई बात नहीं है. यह 1963 के समझौते से भी पहले की बात है. यह समझौता 2 मार्च को पेकिंग, जिसे अब बीजिंग कहा जाता है, में औपचारिक रूप से हुआ था.
चीन-पाकिस्तान समझौतों की टाइमलाइन
पाकिस्तान ने पहली बार चीन के सामने अनौपचारिक तौर पर सीमा तय करने की अपनी इच्छा जताई थी. इसके करीब दो साल बाद मार्च 1961 में उसने चीन को औपचारिक नोट भेजा. चीनी सरकार ने इसका जवाब देने में एक साल लिया और फरवरी 1962 में जवाब दिया.
तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने अपनी किताब Friends Not Masters में बताया है कि उन्होंने चीन को बातचीत की मेज पर आने के लिए कैसे तैयार किया. उनका मानना था कि चीन भारत के साथ एक और विवाद नहीं चाहता था.
जुलाई 1961 में चीनी राजदूत अयूब खान से मिलने पहुंचे और संयुक्त राष्ट्र में चीन की सीट के लिए पाकिस्तान का समर्थन मांग रहे थे. अयूब खान ने इस मौके का फायदा उठाते हुए उन्हें सीमा तय करने के अपने प्रस्ताव की याद दिलाई.

राजदूत ने कहा कि यह एक जटिल मामला है. इस पर राष्ट्रपति ने जवाब दिया कि संयुक्त राष्ट्र की सीट का मुद्दा भी जटिल था. अयूब खान ने सुझाव दिया कि दोनों मुद्दों को इस आधार पर देखा जाना चाहिए कि उनमें कितना दम है, फिर चाहे वे “आसान हों या जटिल”.
3 मई 1962 तक पाकिस्तान और चीन ने एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें दोनों देशों ने इस मुद्दे पर बातचीत करने पर सहमति जताई.
इसके कुछ दिनों बाद जवाहरलाल नेहरू से लोकसभा में इस मुद्दे पर जवाब देने को कहा गया. उन्होंने कहा कि वह पहले ही अयूब खान के सामने पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में चीन की घुसपैठ का मुद्दा उठा चुके हैं और उनसे पूछा था कि इस मामले में इस्लामाबाद का क्या रुख होगा.
खास तौर पर नेहरू ने हुंजा का मुद्दा उठाया. हुंजा के मीर ने पाकिस्तानी सरकार के सामने विरोध जताते हुए कहा था कि चीन ने उनके पुराने राज्य हुंजा की चरागाह वाली जमीन पर कब्जा कर लिया है, जो कश्मीर का हिस्सा है.
नेहरू ने कहा था, “मुझे लगा कि दोनों पक्ष, पाकिस्तान और चीन, स्थिति के तथ्यों से पूरी तरह वाकिफ नहीं थे. हमारे पास जो तथ्य थे, वे उनकी जानकारी से थोड़े ज्यादा थे.”
इसके कुछ दिनों बाद 10 मई 1962 को भारत में पाकिस्तान के हाई कमीशन को भेजे गए एक पत्र में MEA ने लिखा, “प्रेस में कई रिपोर्टों के बावजूद… भारत इतने समय से यह मानने को तैयार नहीं था कि पाकिस्तान सरकार वास्तव में जम्मू-कश्मीर राज्य की उस जमीन के संबंध में चीन के साथ बातचीत करेगी, जो भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा है.”
मई और जून 1962 के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के प्रतिनिधि वी.के. कृष्ण मेनन ने कई भाषण दिए और पाकिस्तान तथा चीन के बीच चल रही बातचीत की आलोचना की. वह उस समय देश के रक्षा मंत्री भी थे. उसी साल अक्टूबर-नवंबर में चीन से युद्ध में भारत की हार के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा था.
मेनन ने कहा कि पाकिस्तान ने कश्मीर पर अवैध कब्जा कर रखा है, इसलिए उसे भारतीय क्षेत्र के किसी भी हिस्से को किसी दूसरे देश को देने या सौंपने का अधिकार नहीं है. उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी हस्तांतरण अंतरराष्ट्रीय कानून का साफ उल्लंघन होगा. मेनन ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ऐसा “परेशान करने की वजह” से और भारत पर “दबाव बनाने के एक साधन” के तौर पर कर रहा था.
इसके बाद 27 दिसंबर 1962 को रावलपिंडी में भारत-पाकिस्तान वार्ता से ठीक पहले, जिसमें कश्मीर और उससे जुड़े दूसरे मुद्दों पर चर्चा होनी थी, चीन और पाकिस्तान ने शिनजियांग और पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से के बीच सीमा के निर्धारण पर “सैद्धांतिक रूप से समझौते” की घोषणा की.
भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह, जो भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे थे, ने रावलपिंडी में राष्ट्रपति अयूब खान और विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को तुरंत भारत का रुख साफ कर दिया. जनवरी में जब भारत-पाकिस्तान वार्ता दिल्ली में दोबारा शुरू हुई, तब उन्होंने भुट्टो के सामने भी भारत की स्थिति दोहराई.
इसके बाद भारत ने चीन और पाकिस्तान दोनों के सामने कई बार विरोध दर्ज कराया.
समझौता हुआ
चाहे जो भी हो, पाकिस्तान और चीन के विदेश मंत्रियों ने 2 मार्च 1963 को समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए. इसके अनुच्छेद 6 में इस समझौते की ‘अस्थायी’ प्रकृति का जिक्र है.
“दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर विवाद के समाधान के बाद, संबंधित संप्रभु सत्ता चीन की पीपुल्स रिपब्लिक की सरकार के साथ सीमा पर दोबारा बातचीत करेगी… और मौजूदा समझौते की जगह एक औपचारिक सीमा संधि पर हस्ताक्षर करेगी.”
इसमें आगे कहा गया है, “अगर वह संप्रभु सत्ता पाकिस्तान होती है, तो इस समझौते और ऊपर बताए गए प्रोटोकॉल के प्रावधानों को चीन की पीपुल्स रिपब्लिक और पाकिस्तान के बीच होने वाली औपचारिक सीमा संधि में बरकरार रखा जाएगा.”
हालांकि, इसके बाद पाकिस्तान और चीन ने जो किया, उससे यह संकेत मिला कि यह समझौता वास्तव में ‘अस्थायी’ नहीं था.
चीन… भारत-पाकिस्तान संबंधों में सीधे दखल दे रहा है. ऐसा करके चीन कश्मीर के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेदों का फायदा उठाकर अपनी विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाना चाहता है.
— जवाहरलाल नेहरू, 1963 के चीन-पाकिस्तान समझौते के कुछ दिन बाद
समझौते पर हस्ताक्षर होने के कुछ दिनों बाद नेहरू से एक बार फिर लोकसभा में इस मुद्दे पर जवाब देने को कहा गया. उन्होंने कहा, “समझौते में कहा गया है कि यह अस्थायी है, फिर भी इसे पूरा करने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई.”
नेहरू ने कहा, “…चीन, कश्मीर विवाद में कभी शामिल नहीं होने के अपने दावों या इस हास्यास्पद दावे के बावजूद कि सीमा वार्ता से चीनी और पाकिस्तानी लोगों के बीच दोस्ती बढ़ी है… भारत-पाकिस्तान संबंधों में सीधे दखल दे रहा है. ऐसा करके चीन कश्मीर के सवाल पर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेदों का फायदा उठाकर अपनी विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाना चाहता है.”
चीन के विदेश मंत्रालय ने भी 25 मार्च 1963 को बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास को पत्र लिखा. इसमें कहा गया कि यह “पूरी तरह साफ” है कि समझौता अस्थायी है और इसका पाकिस्तान के साथ “कश्मीर के स्वामित्व” को लेकर चीन के किसी समझौते से कोई लेना-देना नहीं है.
भारत ने यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी उठाया. 16 मार्च 1963 को लिखे एक पत्र में भारत ने बताया कि पाकिस्तान के अपने पुराने बयान ही उसके मौजूदा रुख को कमजोर करते हैं.
तीन साल पहले, 3 दिसंबर 1959 को संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद को एक पत्र लिखा था. इसमें लद्दाख में चीनी आक्रमण का जिक्र करते हुए कहा गया था कि “भारत और चीन के बीच मौजूदा विवाद में दोनों में से किसी भी पक्ष की ओर से लिए गए फैसले या किए गए समझौते… मान्य नहीं होंगे और जम्मू-कश्मीर के क्षेत्र की स्थिति पर कोई असर नहीं डालेंगे.” उन्होंने 25 मार्च 1960 को लिखे एक और पत्र में भी यही बात दोहराई थी.
अब भारत ने तर्क दिया कि पाकिस्तान ने वही काम किया जिसकी उसने पहले आलोचना की थी. उसने चीन के साथ ऐसा समझौता किया, जिसने जम्मू-कश्मीर की स्थिति और 17 जनवरी 1948 के सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव, जिसे नई दिल्ली और इस्लामाबाद दोनों ने स्वीकार किया था, दोनों का उल्लंघन किया.
भारत ने 30 सितंबर 1963 को चीन के दूतावास को भेजे एक अलग पत्र में पाकिस्तान और चीन पर दुनिया की राय को गुमराह करने और भारतीय क्षेत्र पर आक्रामक कार्रवाई में अपनी मिलीभगत को “अस्थायी” होने के नाम के पीछे छिपाने का आरोप लगाया.
भारत ने कहा कि इस दावे के झूठे होने का सबूत खुद अनुच्छेद 4 में मौजूद था. इसमें सीमा आयोग बनाने, सीमा पर निशान लगाने और प्रोटोकॉल तैयार करने की व्यवस्था थी. ये सभी अंतरराष्ट्रीय सीमा की ‘स्थायी’ सीमा-निर्धारण प्रक्रिया में आम तौर पर की जाने वाली व्यवस्थाएं थीं.
पत्र में कहा गया कि चीनी सीमा आयोग के प्रतिनिधियों का गिलगित, नगर और हुंजा का दौरा और यह घोषणा कि दोनों पक्षों की सीमा-निर्धारण टीमों ने जमीन का सर्वे, हवाई तस्वीरें लेने और सीमा पर निशान लगाने को लेकर सहमति बना ली है, यह भी साबित करता है कि पाकिस्तान और चीन इस समझौते को अस्थायी नहीं रखना चाहते थे.
1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान ‘सीमा समझौते’ के तहत पाकिस्तान ने लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले इलाकों से शक्सगाम घाटी की 5,180 वर्ग किलोमीटर भारतीय जमीन चीन को अवैध रूप से सौंप दी.
— वी. मुरलीधरन, तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री, 2022 में लोकसभा में
भारत और चीन के बीच विरोध और चीन के जवाब को MEA के White Paper No. IX (श्वेत पत्र संख्या IX) से भी समझा जा सकता है. इसका शीर्षक ‘Notes, Memoranda and Letters Exchanged Between the Governments of India and China: January 1963-July 1963’ (भारत और चीन की सरकारों के बीच नोट्स, ज्ञापन और पत्रों का आदान-प्रदान: जनवरी 1963-जुलाई 1963) था.
पाकिस्तान ने क्या सौंपा
पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी या ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट चीन को दे दिया, जबकि चीन ने हुंजा पर अपने दावे छोड़ दिए. पाकिस्तान के लिए हुंजा इतना महत्वपूर्ण था कि वह इसके लिए लड़ने को भी तैयार था.
इसका पता अयूब खान की तत्कालीन ब्रिटेन के कॉमनवेल्थ रिलेशंस मंत्री डंकन सैंडिस और फॉर ईस्टर्न अफेयर्स के सहायक विदेश मंत्री डब्ल्यू. एवरल हैरिमैन के साथ बातचीत से चलता है. इस बातचीत में उन्होंने हुंजा इलाके की अपनी यात्रा का जिक्र किया और “उम्मीद” जताई कि वह पीकिंग, जो बीजिंग का पुराना नाम है, के साथ सीमा को लेकर समझौता कर पाएंगे. हालांकि, उन्होंने हुंजा के चरागाह वाले इलाकों को अपने पास रखने पर जोर देने की बात कही.
अयूब खान की आत्मकथा से भी इस बारे में कुछ जानकारी मिलती है. उन्होंने लिखा, “हमने शामशाल दर्रे के दूसरी तरफ मौजूद कई सौ वर्ग मील में फैले चरागाह के मुद्दे को उठाया. हमने चीनी प्रतिनिधि को बताया कि यह इलाका पारंपरिक रूप से शामशाल के लोगों के इस्तेमाल में रहा है और अगर उन्हें वहां जाने से रोका गया तो उन्हें बहुत मुश्किल होगी. चीनियों ने कहा कि वे शिनजियांग के लोगों से इस बारे में जानकारी लेंगे, लेकिन सिद्धांत रूप में वे इस बात पर सहमत हुए कि मामले का फैसला तथ्यों के आधार पर किया जाए. आखिरकार वे हमें यह इलाका देने पर सहमत हो गए.”
उन्होंने यह भी बताया था कि शामशाल के लोगों को उस इलाके की जमीन से नमक मिलता था. नमक उस समय एक दुर्लभ और कीमती चीज थी. उसी इलाके में चीन ने कुछ चौकियां बना रखी थीं.
पाकिस्तान ने हुंजा अपने पास रखा, लेकिन चीन को इससे बड़ा और बेहतर फायदा मिला.
2022 में तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन ने लोकसभा में कहा था, “चीन पिछले छह दशकों से लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर अवैध कब्जा किए हुए है. इसके अलावा, 1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान ‘सीमा समझौते’ के तहत पाकिस्तान ने लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले इलाकों से शक्सगाम घाटी की 5,180 वर्ग किलोमीटर भारतीय जमीन चीन को अवैध रूप से सौंप दी.”
भारत लंबे समय से यही रुख रखता आया है. इसी के तहत भारत ने चीन के बुनियादी ढांचे के विकास और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की उन परियोजनाओं का विरोध किया है, जो उन इलाकों से होकर गुजरती हैं जिन्हें भारत पाकिस्तान और चीन के अवैध कब्जे में मानता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: PM मोदी की BRICS मास्टरक्लास ने बताया कि असली डिप्लोमेसी कैसे की जाती है