मैं बड़े पैमाने पर गुजराती स्वामीनारायण संप्रदाय की ओर से एफिल टावर से सभी महिलाओं को हटाने की मांग को लेकर हुए अंतरराष्ट्रीय विवाद पर बात करना चाहता हूं, लेकिन उससे पहले, हमें आज के गुजरातियों के बारे में बात करनी होगी.
सच कहें तो गुजरातियों के लिए इससे अच्छे दिन कभी नहीं रहे. देश के दो सबसे ताकतवर लोग गुजराती हैं. देश के दो सबसे अमीर लोग भी गुजराती हैं. भारत के सबसे अमीर लोगों की कोई भी सूची गुजरातियों से भरी हुई मिलेगी.
गुजरात और गुजरातियों के लिए ये गौरव के दिन हैरान करने वाले हैं. 1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक की शुरुआत में जब कपड़ा उद्योग बर्बाद हो गया, तो गुजरात के कई बड़े कारोबारी परिवारों की दौलत खत्म हो गई. कपड़ा मिलें, जो लंबे समय से गुजरात की समृद्धि की पहचान रही थीं, बंद हो गईं, बेरोज़गारी बढ़ गई और पूरे राज्य में निराशा का माहौल फैल गया.
गुजरात राजनीतिक रूप से भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने से पहले के दो दशकों में राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक नेता बनने वाले गुजरातियों की संख्या आप अपनी उंगलियों पर गिन सकते हैं. जब राष्ट्रीय राजनीति में गुजरात के योगदान की बात करनी होती थी, तो लोगों को बहुत पीछे जाकर एमके गांधी, वल्लभभाई पटेल और शायद मोरारजी देसाई तक जाना पड़ता था.
मैंने हमेशा कहा है—जब से वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने हैं—कि इतने सारे गुजराती हिंदू मोदी के इतने वफादार इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने शुरू से ही उन्हें ऐसे व्यक्ति के तौर पर पहचान लिया था जो राज्य का रुतबा वापस ला सके और उसमें खुशहाली ला पाए.
प्रधानमंत्री को लेकर आपकी राय चाहे जो हो, इस बात से इनकार करना मुश्किल है कि उन्होंने इन उम्मीदों को पूरा किया है. गुजरात पहले से ज्यादा समृद्ध है. इसके कस्बों और शहरों में तेज़ी से विकास हो रहा है. गुजरातियों में अब पहले से कहीं ज्यादा करोड़पति और अरबपति हैं और गुजराती अपनी क्षेत्रीय पहचान पर गर्व करते हैं.
मज़े की बात यह है कि शायद यहीं से समस्या शुरू हुई.
आधुनिक दुनिया में मध्यकालीन सोच
स्वामीनारायण संप्रदाय ज़्यादातर गुजराती लोगों का है, इसलिए बाकी भारत में लोग इसके बारे में ज़्यादा नहीं जानते. हो सकता है कि विदेशों में भी इसकी पहचान ज़्यादा हो, क्योंकि न्यू जर्सी और लंदन के सबअर्ब नीसडेन जैसी जगहों पर इसके जाने-माने मंदिर हैं. हालांकि कुछ हिंदुओं ने इसकी मान्यताओं की आलोचना की है, जो संप्रदाय के अपने फाउंडर स्वामीनारायण को पूजनीय मानने की आदत से परेशान हैं, लेकिन ज़्यादातर हिंदू मानते हैं कि संप्रदाय को वैष्णव परंपरा के अंदर अपनी मान्यताएं रखने का हक है.
मिसाल के लिए मोदी संप्रदाय के दिवंगत नेता प्रमुख स्वामी के बेहद करीबी थे. जब अगस्त 2016 में प्रमुख स्वामी का निधन हुआ, तो मोदी स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन के तुरंत बाद सीधे गुजरात गए और उन्हें श्रद्धांजलि दी. उन्होंने कई बार प्रमुख स्वामी और खुद इस संप्रदाय की तारीफ की है और यह संप्रदाय भी उन्हें बहुत पसंद करता है.
इन सब पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई, जब तक कि इस हफ्ते स्वामीनारायण संप्रदाय दुनियाभर की खबरों में नहीं आ गया. संप्रदाय के सदस्यों के वहां आने पर एफिल टावर के मैनेजमेंट से इमारत से सभी महिलाओं को हटाने की मांग की गई. इस मांग की फ्रांस की हर राजनीतिक पार्टी ने निंदा की.
गुजराती होने के नाते, मैं दुनिया के बारे में इस पंथ के पुराने ज़माने के नज़रिए के बारे में थोड़ा जानता हूं, लेकिन फिर भी, मैं हैरान हूं कि उन्होंने ऐसी मांग की. पंथ का नियम, जो ब्रह्मचर्य (यानी अविवाहित रहना) के बारे में हमेशा की तरह ही है, यह है कि इसके साधुओं को कभी भी औरतों की तरफ नहीं देखना चाहिए.
यह बात कुछ हद तक समझ में आती है. कुछ ईसाई संप्रदायों में भी साधुओं को महिलाओं से दूर मठों में बंद रखा जाता है. जब तक साधुओं को इससे कोई आपत्ति नहीं है, मैं इसे उनका निजी मामला मानता हूं.
समस्या तब आती है जब स्वामीनारायण संप्रदाय अपनी मध्यकालीन सोच के हिसाब से बाहरी दुनिया के साथ जुड़ने की कोशिश करता है. करीब चार दशक पहले, जब मैं संडे का एडिटर था, तब कुछ स्वामी मुझसे मिलने आए. वे न्यू जर्सी में अपने काम के बारे में खबर छपवाना चाहते थे. उन्होंने पूछा कि क्या मैं किसी को उनके मंदिर में जाने के लिए भेजूंगा?
मैंने कहा कि मैं ऐसा करूंगा. इसी समय उन्होंने साफ कर दिया कि जिस पत्रकार को भेजा जाएगा, वह पुरुष होना चाहिए. स्वाभाविक रूप से, मैंने एक महिला संवाददाता को भेज दिया.
स्वामी नाराज़ थे, लेकिन इतने नाराज़ नहीं थे कि वे किसी राष्ट्रीय न्यूज़ मैगजीन में खबर छपवाने का मौका ही छोड़ देते. संडे की एक युवा महिला संवाददाता न्यू जर्सी गईं और उन्होंने खबर लिखी. बाद में मेरी संवाददाता ने मुझे बताया कि एक जानी-मानी गुजराती महिला पत्रकार ने भी इस प्रोग्राम को कवर किया था और संगठन ने उनके साथ सहयोग किया था. हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि जब भी कोई साधु उन्हें देखता, वह उल्टी दिशा में भागने लगता था.
अगर आपकी सोच मध्यकालीन समय में अटकी हुई है, तो आधुनिक दुनिया में काम करना मुश्किल है. जिन कुछ स्वामियों से मैं मिला था, उनमें से कुछ आखिरकार मान गए थे कि 21वीं सदी में महिलाओं को दूर रखने की यह नीति व्यावहारिक नहीं होगी.
इसलिए आप मेरी हैरानी का अंदाज़ा लगा सकते हैं, जब मुझे पता चला कि कई दशक बाद भी स्वामीनारायण संप्रदाय न सिर्फ इस नीति पर कायम है, बल्कि अब उसने दुनिया के मशहूर पर्यटन स्थलों को महिलाओं से खाली कराने की मांग करने की हिम्मत भी की है. इतना ही नहीं, उनकी मांग मानी भी जा रही थी. शायद इसलिए क्योंकि यह संप्रदाय बेहद अमीर है और, जैसा कि हमने देखा है, भारत में सत्ता के सबसे ऊंचे स्तरों पर इसकी बहुत मजबूत पहुंच भी है.
कुछ लोग इसे ‘हिंदू बनाम बाकी लोगों’ का मुद्दा मानते हैं. मैं ऐसा नहीं मानता. मैं इसे गुजराती समस्या के तौर पर देखता हूं.
गुजरातियों के दिखावे का बदसूरत पहलू
पिछले करीब एक दशक में, जैसे-जैसे गुजरातियों की दौलत और प्रभाव बढ़ा है, मेरे लोगों के साथ कुछ अजीब हुआ है. अब हमें अपनी दौलत का इतना ज्यादा एहसास है कि हम बड़े-बड़े कार्यक्रमों और शादियों में इसे सबसे ज्यादा दिखावे वाले तरीके से दिखाते हैं. हम ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे हर चीज़ बिकाऊ है. हम एफिल टावर को खाली क्यों नहीं करवा सकते? किसी यूरोपीय शहर की सड़कों को बंद क्यों नहीं करवा सकते, ताकि हमारी शादी की बारात वहां से गुज़र सके? और क्योंकि गुजरातियों के पास पैसा है, इसलिए हम अपनी मनचाही चीज़ हासिल करने के तरीके ढूंढ लेते हैं. यह बात गुजराती उद्योगपतियों पर भी उतनी ही लागू होती है, जितनी गुजराती धार्मिक संप्रदायों पर.
दुख की बात यह है कि यह बात उन लोगों पर भी लागू होती है, जिनके पास अरबों रुपये नहीं हैं, लेकिन उनके अंदर वही हुक्म चलाने का रवैया और भद्दापन है. इसलिए गुजराती लोग हवाई जहाज के केबिन को भी निजी जमणवार (दावत) में बदलने में कुछ गलत नहीं समझते. पहले गुजराती परिवार कुछ थेपले पैक करते थे और चुपचाप खा लेते थे. अब वे पूरी दावत पैक करते हैं और जितना हो सके उतनी जोर-जोर से पूरे विमान पर अपना कब्ज़ा जमा लेते हैं.
मैंने इससे पहले कभी नहीं सुना कि गुजरातियों ने फ्लाइट में बैठने से पहले एयरपोर्ट के रनवे पर गरबा करने का फैसला किया हो. उन्हें समझना चाहिए कि यह आम व्यवहार नहीं है, क्योंकि कोई दूसरा यात्री ऐसा नहीं कर रहा, लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं है. वे अपने ही नियमों का पालन करेंगे.
दिखावा और भद्दापन इस कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है. इस नए आत्मविश्वास का एक बदसूरत पहलू भी है. जहां भी संभव होगा, वे शाकाहार थोपेंगे. वे मुसलमानों को उन सामान्य डांस कार्यक्रमों में शामिल होने से रोकेंगे, जहां कभी सभी का स्वागत होता था. वे अलग धर्म के लोगों को प्रवेश देने से इनकार करके त्योहारों को भेदभाव दिखाने का मौका बना देंगे.
जैसे-जैसे समय बीत रहा है और हमारा आत्मसंतोष बढ़ रहा है, सार्वजनिक जगहों पर गुजरातियों का व्यवहार ज्यादा से ज्यादा सवालों के घेरे में आ रहा है. कुछ लोग हमें भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी कहते हैं. यह बात शायद बहुत ज्यादा कठोर हो सकती है या नहीं भी, लेकिन मुझे चिंता इस बात की है कि बहुत कम ताकतवर गुजराती इस तरह के व्यवहार के खिलाफ बोलते हैं. मैं ऐसे बहुत ज्यादा ताकतवर गुजरातियों के बारे में नहीं सोच सकता, जिन्होंने स्वामीनारायण संप्रदाय की निंदा की हो.
इसकी एक कीमत चुकानी पड़ रही है. गुजरातियों के खिलाफ देशभर में विरोध बढ़ रहा है. हमारा अहंकार और दूसरों की भावनाओं की परवाह न करने वाला रवैया धीरे-धीरे देश के बाकी लोगों को हमारे खिलाफ कर रहा है.
लोग भूल जाते हैं कि हम गांधी और पटेल की धरती हैं. हमें खुद को यह याद दिलाना होगा: अपनी संस्कृति और विरासत को. ताकतवर लोग और बड़े कारोबारी आते-जाते रहेंगे, लेकिन गुजरात सिर्फ इस दुखद तस्वीर से कहीं ज्यादा है, जिसमें उसके लोग दुनिया भर में घूमकर अपने देश के लिए शर्मिंदगी का कारण बन रहे हैं.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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