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Thursday, 10 September, 2026
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पश्चिम एशिया के मुद्दे पर BRICS देशों में मतभेद, संयुक्त बयान पर सहमति बनाने में जुटे शेरपा

अधिकारियों को ईरान और UAE के बीच की दूरी कम करने का भरोसा है. ध्यान एक ऐसे समझौते के फ़ॉर्मूले पर है जिसमें किसी खास देश की निंदा किए बिना, बिना उकसावे के की गई आक्रामकता की आलोचना की जा सके.

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नई दिल्ली: BRICS के शेरपा संयुक्त नेताओं के घोषणापत्र पर सहमति बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं, क्योंकि पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा पर अभी भी मतभेद हैं. दिप्रिंट को यह जानकारी मिली है. शनिवार से शुरू होने वाले नेताओं के शिखर सम्मेलन से पहले शेरपाओं के पास किसी समाधान तक पहुंचने के लिए 48 घंटे से भी कम समय है.

भारत की ओर से सुझाई गई भाषा का फोकस सभी BRICS सदस्य देशों के बीच, खासकर पश्चिम एशिया के मुद्दे पर, सहमति बनाने के लिए किसी खास देश की निंदा करने के बजाय बिना उकसावे की गई आक्रामकता और संयुक्त राष्ट्र चार्टर जैसे बड़े सिद्धांतों पर रहने की संभावना है.

वरिष्ठ अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि नई दिल्ली को अभी भी भरोसा है कि BRICS के सभी सदस्य देशों के बीच सहमति बन जाएगी. अधिकारियों ने इसके लिए भारत के संयुक्त अरब अमीरात और ईरान दोनों के साथ मजबूत द्विपक्षीय संबंधों का भी हवाला दिया.

सुझाई गई भाषा का मकसद युद्ध में एक-दूसरे के विरोधी पक्षों पर खड़े इन दोनों देशों के बीच समझौता कराना है. BRICS के शेरपा कम से कम मंगलवार से ज्यादातर आमने-सामने बैठकर बातचीत कर रहे हैं. बुधवार तक जारी किए गए प्रस्ताव के अलग-अलग ड्राफ्ट में पश्चिम एशिया से जुड़ी भाषा पर अभी तक सहमति नहीं बन पाई है.

नेताओं का शिखर सम्मेलन शनिवार से शुरू होगा, जबकि रविवार को भारत की ओर से आमंत्रित साझेदार देशों और क्षेत्रीय संगठनों के प्रमुखों के साथ आउटरीच समिट पर ध्यान रहेगा. अभी ऐसा माना जा रहा है कि UAE और ईरान के बीच मतभेद ही भारतीय वार्ताकारों के सामने बची एकमात्र बड़ी रुकावट है.

एक सूत्र ने बताया कि UAE और ईरान के साथ भारत के मजबूत रिश्ते और सभी सदस्य देशों का बातचीत के प्रति “सकारात्मक और रचनात्मक रुख” पश्चिम एशिया से जुड़ी भाषा पर ऐसा समझौता कराने में मदद करेगा, जिसे सभी आसानी से स्वीकार कर सकें.

एक राजनयिक सूत्र ने बताया कि UAE और ईरान के बीच अभी कुछ मतभेद बाकी हैं, जबकि दूसरे राजनयिक सूत्र ने कहा कि भारत संयुक्त नेताओं का घोषणापत्र सुनिश्चित करने पर जोर दे रहा है और सभी सदस्य देशों के साथ उसके संबंधों से संयुक्त घोषणापत्र के लिए सहमति बनाने की इच्छा पैदा होनी चाहिए.

दूसरे राजनयिक सूत्र ने भारत और चीन के बीच हाल में आए सुधार को भी नई दिल्ली की पश्चिम एशिया के मुश्किल मुद्दे और ईरान तथा UAE के विरोधाभासी रुख से निपटने की क्षमता का एक और संकेत बताया.

भारत BRICS शिखर सम्मेलन की तैयारियों में जुटा है. इस समूह से जुड़े कई कार्यक्रम शुक्रवार से शुरू हो रहे हैं. रूस ने राष्ट्रपति व्लादिमीर वी. पुतिन की मौजूदगी की पुष्टि कर दी है. शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक भी तय है.

शुक्रवार को होने वाले BRICS बिजनेस फोरम में शाम को नेताओं की चर्चा होगी. मोदी और समय पर राष्ट्रीय राजधानी पहुंचने वाले अन्य BRICS नेताओं के इसमें शामिल होने की उम्मीद है. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के भी शिखर सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है, जबकि भारत चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगमन की तैयारियां जारी रखे हुए है.

BRICS के विस्तार के साथ सहमति बनाना मुश्किल हुआ

विदेश मंत्रालय (MEA) के अधिकारी इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि संयुक्त घोषणापत्र जारी किया जाएगा, जिसमें समूह के सभी प्रमुख हितों वाले क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा. खासकर सदस्य देशों की विकास से जुड़ी प्राथमिकताओं को इसमें जगह मिलेगी. 2009 से अब तक हुए BRICS नेताओं के शिखर सम्मेलन में समूह मुद्दों पर सहमति बनाने और संयुक्त बयान जारी करने में सफल रहा है.

2024 और 2025 में संगठन के विस्तार के बाद सहमति बनाना और भी मुश्किल हो गया है. 2023 तक इस समूह में पांच सदस्य देश थे – ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (BRICS).

2023 के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन में संगठन का विस्तार करने का फैसला हुआ था. इसके बाद 2024 में पांच नए सदस्य देश – सऊदी अरब, मिस्र, इथियोपिया, UAE और ईरान – समूह में शामिल हुए. इंडोनेशिया 2025 में संगठन का सदस्य बना.

सहमति बनाने में मुश्किल सितंबर 2024 में ही दिखने लगी थी. उस साल विस्तारित संगठन के विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुई थी. यह बैठक रूसी शहर कजान में होने वाले नेताओं के शिखर सम्मेलन से कुछ हफ्ते पहले हुई थी.

बैठक बिना किसी संयुक्त बयान के खत्म हुई, क्योंकि मिस्र और इथियोपिया ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए दक्षिण अफ्रीका की मांग के समर्थन वाली भाषा को स्वीकार नहीं किया. अप्रैल 2025 में ब्राजील की अध्यक्षता में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक भी संयुक्त बयान पर सहमति बनाने में नाकाम रही. हालांकि, नेताओं का शिखर सम्मेलन संयुक्त घोषणापत्र के साथ खत्म हुआ था.

इसी तरह, मई में भारत की अध्यक्षता में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक भी ईरान और UAE के बीच मतभेदों के कारण सहमति तक नहीं पहुंच सकी. विदेश मंत्रियों की बैठक में 63 पैराग्राफ वाला बयान जारी किया गया था, लेकिन सदस्य देशों को दो खास पैराग्राफ – 26 और 29 – पर आपत्ति थी. ईरान ने उस अंतिम भाषा पर सहमति नहीं दी थी, जिसमें कहा गया था कि “गाजा पट्टी कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा है.”

वहीं पैराग्राफ 29 में “लाल सागर और बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य में सभी देशों के जहाजों के नौवहन अधिकार और स्वतंत्रता” सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया था. इन दोनों पैराग्राफ को लेकर सदस्य देशों ने भाषा के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई थी.

अप्रैल में BRICS सदस्य देशों के मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) के प्रतिनिधियों की एक बैठक भी कई मुद्दों पर सहमति बनाने में नाकाम रही थी. खासकर फिलिस्तीन और गाजा पट्टी के मुद्दे पर भाषा को कमजोर किए जाने की धारणा को लेकर मतभेद थे.

MENA बैठक के दौरान भारत की ओर से भेजी गई भाषा पर खासकर ब्राजील और मिस्र ने आपत्ति जताई थी. विदेश मंत्रियों की बैठक में सदस्य देशों ने गाजा की स्थिति पर ऐसी भाषा खोज ली थी, जो काफी हद तक उनके राष्ट्रीय रुख का समर्थन करती थी.

एक राजनयिक सूत्र ने बताया कि नेताओं के घोषणापत्र को लेकर चल रही बातचीत में फिलिस्तीन से जुड़ी भेजी गई भाषा पर अभी तक कोई मतभेद नहीं है.

भारत के लिए सहमति बनाने का यह प्रयास विरोधी पक्षों को एक साथ लाने और बातचीत तथा कूटनीति के जरिए समाधान निकालने का एक महत्वपूर्ण राजनयिक संकेत माना जा रहा है. दुनिया में चल रहे अलग-अलग संघर्षों को लेकर भारत का सार्वजनिक रूप से यही रुख रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी ने रूस और यूक्रेन दोनों को बातचीत की मेज पर लाने में नई दिल्ली की मदद की पेशकश की है. पिछले महीने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन से इतर राष्ट्रपति पुतिन के साथ मुलाकात के दौरान उन्होंने लगभग आधे दशक से चल रहे संघर्ष को खत्म करने की भी अपील की थी.

कुछ दिनों बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कीव की अलग यात्रा की और बातचीत तथा कूटनीति की भारत की अपील दोहराई. भारत सितंबर 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान रूस-यूक्रेन युद्ध पर ऐसी भाषा तैयार करने में सफल रहा था, जिसे सभी सदस्य स्वीकार कर सके.

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यूक्रेन G20 का सदस्य नहीं था. उस समय बातचीत में मुख्य रूप से अमेरिका, यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देशों तथा रूस के बीच मतभेदों को संभाला गया था. इस बार UAE और ईरान दोनों BRICS के सदस्य हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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