बेंगलुरु: 37 साल के अंतराल के बाद कर्नाटक की डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में 2026-27 शैक्षणिक सत्र से छात्र संघ चुनाव कराने को मंजूरी दे दी है.
राज्य में आखिरी बार 1989-90 में छात्र चुनाव हुए थे. इसके बाद वीरेंद्र पाटिल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने इन्हें बंद कर दिया था. चुनाव दोबारा शुरू करने के फैसले को जेन ज़ी को अपने साथ जोड़ने की बीजेपी और कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों की कोशिशों के विस्तार के तौर पर देखा जा रहा है.
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने कहा, “हमने (सरकार ने) इसे बंद किया था, लेकिन अब हमने इसे दोबारा शुरू करने का फैसला किया है.”
आखिर छात्र चुनाव पहले क्यों बंद किए गए थे? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछ रहे हैं.
राजनीति में नए चेहरों को उभरने से रोकना, परिवार के सदस्यों या अपने करीबी लोगों को बढ़ावा देना, बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को रोकना और कैंपस में बेकाबू हिंसा छात्र चुनावों को करीब चार दशक पहले कर्नाटक में बंद करने की प्रमुख वजहों में शामिल थे. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “छात्र चुनाव इसलिए बंद किए गए थे क्योंकि सामंती सोच रखने वाले कुछ वरिष्ठ नेता और दबदबा रखने वाले समूह नहीं चाहते थे कि नए चेहरे सामने आएं.”
बीजेपी ने कॉलेज चुनाव फिर से शुरू करने के फैसले का स्वागत किया, लेकिन चुनाव बंद किए जाने की वजह अलग बताई.
कर्नाटक विधान परिषद में बीजेपी के एमएलसी और विपक्ष के मुख्य सचेतक एन. रवि कुमार ने दिप्रिंट से कहा, “उस समय (1980 के दशक में) कांग्रेस मजबूत थी और सत्ता में थी, लेकिन यह वही समय था जब एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) कॉलेज चुनाव जीत रही थी और कांग्रेस नहीं चाहती थी कि इससे बीजेपी को फायदा मिले.”
1989 में चित्रदुर्ग के सरकारी बीएड कॉलेज के अध्यक्ष रहे कुमार ने कहा, “इसी वजह से उन्होंने छात्र चुनाव बंद कर दिए थे.”
राजनीतिक नेताओं का कहना है कि यह भी माना जा रहा है कि सरकार का यह फैसला कर्नाटक में कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) की कमजोर होती स्थिति को फिर मजबूत करने में मदद करेगा. पिछले कुछ वर्षों में NSUI ने राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित एबीवीपी और अन्य वामपंथी विचारधारा वाले समूहों के लिए अपनी जगह खो दी है.
नई व्यवस्था के तहत छात्र संघ में एक छात्र अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष, एक महासचिव, दो संयुक्त सचिव और कार्यकारी समिति के छह सदस्य होंगे.
परमेश्वर ने कहा कि दो उपाध्यक्ष पदों और दो संयुक्त सचिव पदों में से एक-एक पद महिलाओं के लिए आरक्षित होगा. कार्यकारी समिति में भी दो पद महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे.
छात्र चुनावों के इस नए रूप में जाति के आधार पर नहीं, बल्कि लिंग के आधार पर आरक्षण होगा. उपमुख्यमंत्री ने कहा, “हमने जानबूझकर जाति और धर्म को छात्रों से दूर रखने का फैसला किया है.”
हालांकि, घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले लोगों का कहना है कि इसमें और बदलाव या सुधार किए जाने की उम्मीद है, क्योंकि कॉलेज और विश्वविद्यालय अभी इस विचार को अपनाने के लिए तैयार नहीं हुए हैं.
परमेश्वर ने कहा कि चुनाव कराना है या नहीं, इसका फैसला छात्रों को करना है और प्रबंधन को उसी के अनुसार कदम उठाना होगा.
दिप्रिंट ने पिछले साल जुलाई में खबर दी थी कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इन चुनावों को दोबारा शुरू करने की मंजूरी दे दी थी.
‘कॉलेज हिंसा के अड्डे बन गए थे’
दशकों तक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में होने वाले चुनाव युवाओं के राजनीति में आने के कुछ गिने-चुने रास्तों में से एक थे.
राष्ट्रीय स्तर पर अरुण जेटली, सीताराम येचुरी, लालू प्रसाद यादव, अनंत कुमार, अजय माकन और अशोक गहलोत समेत कई नेता छात्र आंदोलनों के जरिए राजनीति में आए.
कर्नाटक में शिवकुमार, राज्य कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद, विधान परिषद के सभापति सलीम अहमद, रामलिंगा रेड्डी, बीजेपी के एन. रवि कुमार और राज्य के कई अन्य नेता भी छात्र राजनीति से आगे बढ़े हैं.
1970 और 1980 के दशक में कर्नाटक के कई हिस्सों, खासकर बेंगलुरु में छात्र चुनाव अक्सर हिंसक हो जाते थे.
रिटायर्ड सहायक पुलिस आयुक्त बी.बी. अशोक कुमार ने दिप्रिंट से कहा, “उस समय कॉलेजों में विरोधी गिरोहों के बीच धमकी, डराना-धमकाना, रैगिंग और यहां तक कि हत्याएं भी होती थीं. कोटवाल रामचंद्र और जयराज जैसे कई जाने-माने बदमाश भी कॉलेज चुनावों से जुड़े थे. छात्र वोट मांगने और कैंपस में डर और हिंसा फैलाने के लिए इन बदमाशों से अपनी पहचान जोड़ते थे.”
उन्होंने बताया कि कन्नड़ की चर्चित फिल्म ‘ओम’, जिसमें शिवराजकुमार मुख्य भूमिका में थे और जो समय के साथ कल्ट फिल्म बन गई, 1980 के दशक की शुरुआत में बेंगलुरु के कुरुबारा हॉस्टल इलाके के पास पीछा करके हत्या किए गए एक छात्र की जिंदगी पर आधारित थी.
कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री में इस तरह की कहानी एक तरह की अलग शैली बन गई है. कई पूर्व और सुधरे हुए अपराधी अब ऐसे चुनावों में अपनी भूमिका के साथ-साथ बेंगलुरु में अंडरवर्ल्ड और छात्र राजनीति के बीच बड़े संबंध के बारे में भी बताते हैं.
उस दौर को जानने वाले कई लोगों ने बताया कि ये कॉलेज कैंपस अंडरवर्ल्ड के लिए लोगों को भर्ती करने की जगह बन गए थे. अंडरवर्ल्ड अक्सर छात्रों से जुड़े मामलों में शामिल होता था, जिसमें चुनावों के दौरान उम्मीदवारों का समर्थन करना भी शामिल था.
शिवकुमार ने खुद भी बेंगलुरु के श्री जगद्गुरु रेणुकाचार्य कॉलेज ऑफ साइंस, आर्ट्स एंड कॉमर्स यानी आरसी कॉलेज में अपने समय के दौरान कॉलेज चुनावों में बदमाशों के प्रभाव का जिक्र किया है.
उन्होंने इन असामाजिक तत्वों से किसी भी तरह के संबंध होने से इनकार किया है. उन्होंने बार-बार कहा है कि वह कांग्रेस से जुड़े नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया यानी NSUI के जरिए राजनीति में आगे बढ़े हैं.
1973-74 में बेंगलुरु के MES कॉलेज के अध्यक्ष रहे हरिप्रसाद ने कहा कि कॉलेज चुनाव दोबारा शुरू करना युवाओं को मुख्यधारा की राजनीति में लाने का अच्छा तरीका है.
हालांकि, उन्होंने पार्टी की जेन ज़ी तक पहुंच बनाने की कोशिश को हाल ही में की गई घोषणा से अलग बताया.
उन्होंने कहा, “जेन ज़ी से जुड़ने की कोशिश सिर्फ करीब तीन महीने पुरानी है. मैं पिछले दो साल से कॉलेज चुनाव दोबारा शुरू करने की कोशिश कर रहा हूं. कॉलेज चुनाव किसी भी पार्टी के बैनर के तहत नहीं लड़े जाएंगे. ये स्वतंत्र होंगे.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: हसीना नहीं, रहमान की रद्द हुई भारत यात्रा की असली वजह कुछ और, मामला घरेलू समस्याओं का है