गुरुग्राम: केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने IAS अधिकारी साकेत कुमार पर आरोप लगाया है कि उन्होंने हरियाणा के पंचायत विभाग के बैंक खातों में हुई धोखाधड़ी को दबाने की कोशिश की. CBI के मुताबिक, उन्होंने उस समय दो खाते बंद कराने की कोशिश की, जब घोटाला सामने आने वाला था.
दो सितंबर को दाखिल की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में एजेंसी ने आरोप लगाया कि 2005 बैच के IAS अधिकारी साकेत कुमार को दिसंबर 2025 के आखिरी हफ्ते में धोखाधड़ी के बारे में पता था. उस समय वह विकास एवं पंचायत विभाग के कमिश्नर और सचिव थे.
CBI का कहना है कि उन्होंने धोखाधड़ी की जानकारी नहीं दी, बल्कि उन दो खातों को बंद कराने की कोशिश की, जिनसे पैसे निकाले गए थे. ऐसा इसलिए किया गया ताकि बैंक अधिकारियों को खाते का घाटा पूरा करना पड़े और किसी को इसकी जानकारी न देनी पड़े.
चार्जशीट में कहा गया है, “इसलिए वह धोखाधड़ी की जानकारी देकर सरकारी पैसे को बचाने की कोशिश नहीं कर रहे थे. वह धोखाधड़ी को चुपचाप और अंदर से छिपाने की कोशिश कर रहे थे, ताकि खातों का हिसाब बराबर किया जा सके, उन्हें बंद किया जा सके और बात को भुला दिया जाए, और किसी को इसकी जानकारी देने की जरूरत ही न पड़े.”
दिप्रिंट ने चार्जशीट की कॉपी देखी है. इसमें कहा गया है कि साकेत कुमार जिस बिजली कंपनी के प्रमुख थे, उसके पेंशन फंड से 25 करोड़ रुपये पंचायत विभाग के खातों में भेजे गए थे.
साकेत कुमार के पास मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी था. इसके अलावा वह सहकारिता विभाग के कमिश्नर और सचिव और हरियाणा पावर जनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPGCL) के MD भी थे.
CBI का कहना है कि खातों को बंद कराने का निर्देश देने के लिए वह जिम्मेदार थे, जबकि उन्हें खुद रकम ट्रांसफर करने का आदेश देना चाहिए था. चार्जशीट में कहा गया है कि फरवरी में, जब घोटाले को छिपाना मुश्किल हो गया, तब कुमार उस व्यक्ति के तौर पर सामने आए जिसने इसकी जानकारी दी थी.
चार्जशीट में उस शिकायत के बारे में कहा गया है, “यह शिकायत दर्ज करना खुद को उस रिकॉर्ड के सही पक्ष में रखने की कोशिश थी, जिसे बदलने की कोशिश में उन्होंने इससे पहले के दो महीने बिताए थे.”
यह मामला हरियाणा सरकार की आठ संस्थाओं के सरकारी पैसे को कथित तौर पर IDFC First Bank और AU Small Finance Bank के खातों के जरिए दूसरी जगह भेजने से जुड़ा है. चार्जशीट में छह IAS अधिकारियों के नाम हैं और CBI ने हर IAS अधिकारी की भूमिका के बारे में विस्तार से बताया है.
साकेत कुमार ने दिप्रिंट से कहा कि वह इस मामले पर टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि मामला अदालत में विचाराधीन है. उन्होंने कहा, “मामला अदालत में विचाराधीन है और मैं इस समय इस मामले पर टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा.”
एक फाइल पर सिर्फ एक शब्द
CBI के मुताबिक, कहानी एक शब्द से शुरू होती है. सितंबर 2025 में हाउसिंग फॉर ऑल विभाग, मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना (MMGAY) 2.0 के तहत पंचायत विभाग को 197.87 करोड़ रुपये भेजने वाला था.
इस योजना के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को रहने के लिए प्लॉट दिए जाते हैं. इस पैसे का इस्तेमाल ग्राम पंचायतों को जमीन का मुआवजा देने और नई कॉलोनियों में विकास कार्यों के लिए किया जाना था.
10 सितंबर 2025 को क्लर्क आशीष ने एक फाइल पर नोट लिखा. विभाग को पैसे लेने के लिए एक बैंक खाते की जरूरत थी. उन्होंने एक अलग खाता खोलने का प्रस्ताव दिया. यह नोट अधिकारियों के पास आगे बढ़ता गया. यह उस समय के डायरेक्टर जनरल, डी.के. बेहरा के पास पहुंचा. उन्होंने 16 सितंबर को लिखा कि “C&SDP के साथ फोन पर हुई बातचीत के मुताबिक”, ज़मीन के मुआवजे की रकम एक ही बैंक में जानी चाहिए, और इसके लिए Axis Bank को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
C&SDP का मतलब कमिश्नर और सचिव, विकास एवं पंचायत विभाग है. उस समय यह पद साकेत कुमार के पास था.
बेहरा ने लिखा कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड IDFC First Bank और AU Small Finance Bank में जाना चाहिए.
यह फाइल कुमार के पास गई. 18 सितंबर को उन्होंने इस पर सिर्फ एक शब्द लिखा: “Seen”.
चार्जशीट में कहा गया है कि उस एक शब्द को मंजूरी माना गया और इसके आधार पर तीन खाते खोले गए. इनमें से दो खाते IDFC First Bank और AU Small Finance Bank में खोले गए.
CBI ने कहा कि नीचे से भेजे गए नोट में सिर्फ एक सवाल पूछा गया था: खाता किस बैंक में खोला जाए? एजेंसी के मुताबिक, “Seen” लिखकर कुमार ने दिखाया कि यह मामला “पहले ही तय हो चुका था”.
बेहरा ने जांचकर्ताओं को बताया कि उनके पास किसी उचित बैंक में खाता खोलने का अधिकार था. लेकिन उन्होंने कहा कि कुमार ने इन बैंकों में खाते खोलने को कहा था, इसलिए फाइल उसी के मुताबिक आगे बढ़ाई गई. CBI के मुताबिक, बेहरा के बयान में कहा गया है कि “अंतिम अधिकारी” ने अपनी इच्छा साफ कर दी थी, इसलिए इसे बदलने की कोई गुंजाइश नहीं थी.
CBI का कहना है कि नियम नज़रअंदाज़ किए गए
CBI का कहना है कि बैंकों का चुनाव कुमार का काम नहीं था. 13 मार्च 2018 की फाइनेंस डिपार्टमेंट की गाइडलाइंस के तहत, फाइल सलाह और मंज़ूरी के लिए फाइनेंस डिपार्टमेंट के पास जानी चाहिए थी. 12 जुलाई 2024 की गाइडलाइंस के तहत, किसी भी बैंक को चुनने से पहले उनसे उनके इंटरेस्ट रेट बताने के लिए कहा जाना था.
ऐसा कुछ नहीं हुआ. चार्जशीट में कहा गया है कि किसी भी बैंक से कोई कोटेशन नहीं मांगा गया था. फाइनेंस डिपार्टमेंट से पहले कोई मंज़ूरी नहीं ली गई थी, और बाद में भी कोई मंज़ूरी नहीं ली गई.
एक फाइल जिसके बारे में कहा गया था कि उसे पोस्ट फैक्टो अप्रूवल के लिए फाइनेंस डिपार्टमेंट भेजा गया था, CBI के शब्दों में, “कभी भेजी ही नहीं गई”. डिपार्टमेंट का अपना तरीका भी अलग था. वह पहले से ही इंडसइंड बैंक, HDFC बैंक और केनरा बैंक के साथ दूसरी स्कीमों के लिए अलग-अलग अकाउंट चला रहा था.
जहां किसी स्कीम में एक से ज़्यादा हिस्से थे, वहां उसने बच्चों के अकाउंट के साथ एक नोडल अकाउंट खोला. MMGAY 2.0 में दो हिस्से थे.
CBI का कहना है कि तीन बैंकों में तीन अकाउंट खोलने का कोई कारण नहीं था. इसमें कहा गया है कि “इस आइडिया की शुरुआत से ही मिलीभगत साफ थी.”
बैंकर आरोपी तक कैसे ‘पहुंचे’
चार्जशीट में कहा गया है कि फाइल कुमार तक आम तरीके से नहीं पहुँची, क्योंकि उनके नीचे के डायरेक्टरेट ने कभी मामला उनके पास नहीं भेजा.
CBI का कहना है कि इस मामले में आरोपी नंबर एक बैंकर रिभव ऋषि और उनके सह-आरोपियों को अपने सोर्स से पता चला कि डिपॉज़िट आ रहे हैं.
चार्जशीट के मुताबिक, वे पंचायत डिपार्टमेंट के RTI विंग में सुपरिटेंडेंट, बिचौलिए नरेश कुमार के ज़रिए कुमार तक पहुंचे. नरेश कुमार का इस स्कीम से कोई ऑफिशियल कनेक्शन नहीं था.
चार्जशीट में कहा गया है, “साकेत कुमार ने अपनी मर्ज़ी से और नीचे से किसी रेफरेंस पर नहीं, डी.के. बेहेरा को फोन किया और अकाउंट खुलवाने के लिए उन पर असर डाला.”
डिपार्टमेंट के एक डिप्टी डायरेक्टर मनोज कौशल के बयान का सपोर्ट में ज़िक्र किया गया है.
चार्जशीट के मुताबिक, 18 सितंबर के ‘देखा’ वाले कमेंट के बाद, IDFC फर्स्ट बैंक के अभय कुमार और कुछ दूसरे बैंक अधिकारी पंचायत ऑफिस आए. वे कौशल से मिले और कहा कि वे अकाउंट खोलने के लिए डॉक्यूमेंट्स लेने “साकेत कुमार के रेफरेंस पर” आए थे. उन्होंने ऑथराइज़्ड सिग्नेटरी बेहेरा के घर का पता पूछा, ताकि वे फॉर्म पर साइन करवा सकें.
CBI का कहना है कि रिभव ऋषि और एक और बैंकर शमीम डार भी कुमार के रेफरेंस पर आए थे. अभय कुमार विज़िट से तीन महीने पहले ही 10 जून 2025 को IDFC फर्स्ट बैंक छोड़ चुके थे.
CBI के मुताबिक, कौशल ने कुमार को बताया कि दोनों बैंकों की परमिशन्ड डिपॉज़िट लिमिट IDFC फर्स्ट बैंक के लिए 50 करोड़ रुपये और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के लिए 25 करोड़ रुपये थी. चार्जशीट में कहा गया है कि दोनों अकाउंट्स के लिए 112 करोड़ रुपये पर विचार किया गया था.
CBI का कहना है: “साकेत कुमार ने उसे डांटा.”
3 अक्टूबर 2025 को, एक्सिस बैंक अकाउंट से दोनों बैंकों में 75 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए: 50 करोड़ रुपये IDFC फर्स्ट बैंक और 25 करोड़ रुपये AU स्मॉल फाइनेंस बैंक गए.
चार्जशीट में कहा गया है कि तब तक स्कीम के तहत कोई भी डेवलपमेंट काम मंज़ूर नहीं हुआ था और कोई पेमेंट भी नहीं देना था.
पैसा कैसे निकाला गया
पैसे निकालने का सिलसिला कुछ ही दिनों में शुरू हो गया. AU Small Finance Bank के खाते से 6 अक्टूबर को पहली बार 10 करोड़ रुपये निकाले गए. IDFC First Bank के खाते से 9 अक्टूबर से लेन-देन शुरू हुआ.
CBI का कहना है कि खातों में इस तरह बदलाव किए गए थे कि विभाग को इसकी जानकारी न हो. दोनों बैंकों में दर्ज मोबाइल नंबर प्रिंस शर्मा का था. वह डायरेक्टोरेट में सुपरिंटेंडेंट था और इस योजना से उसका कोई लेना-देना नहीं था.
हर निकासी का हर अलर्ट बेहरा के पास जाने के बजाय इसी नंबर पर जाता था. AU Small Finance Bank को दिया गया ईमेल आईडी भी विभाग के असली ईमेल आईडी से सिर्फ एक अक्षर अलग था.
CBI के मुताबिक, जब विभाग ने खातों का स्टेटमेंट मांगा तो फर्जी स्टेटमेंट दिए गए. AU Small Finance Bank के एक बैलेंस सर्टिफिकेट में 15 दिसंबर तक खाते में 25.26 करोड़ रुपये दिखाए गए, जबकि तब तक खाते से सारा पैसा निकाला जा चुका था.
एजेंसी का आरोप है कि पैसे ऐसे चेक से निकाले गए जिनके साथ कोई संबंधित डेबिट नोट नहीं था, या ऐसे डेबिट नोट थे जिनके साथ कोई चेक नहीं था. एक चेक, जिसका नंबर 000011 था, उसमें अंकों में 2,50,00,000 रुपये और शब्दों में ‘Twenty Five Crores’ लिखा था. चार्जशीट के मुताबिक, यह चेक 4 नवंबर को पास हुआ.
CBI का कहना है कि ज्यादातर पैसा स्वस्तिक देश प्रोजेक्ट्स को गया, जिसे उसने एक शेल कंपनी बताया है.
चार्जशीट के मुताबिक, IDFC First Bank के खाते से 16 लेन-देन में कुल 89,23,69,652 रुपये की धोखाधड़ी वाली निकासी हुई. वहीं AU Small Finance Bank के खाते से 14 बार में 71,61,14,910 रुपये निकाले गए.
सिर्फ 1,27,44,689 रुपये वापस आए. यह रकम 29 जनवरी 2026 को IDFC First Bank से वापस आई. CBI के मुताबिक, करीब 49 करोड़ रुपये का अब तक कोई हिसाब नहीं मिला है.
दिसंबर में क्या हुआ, CBI के मुताबिक
चार्जशीट के मुताबिक, पैसे का यह रास्ता कुमार के नेतृत्व वाले एक दूसरे विभाग तक भी पहुंचता है.
29 दिसंबर को AU Small Finance Bank में HPGCL Employees’ Pension Fund के खाते से चेक नंबर 000021 के जरिए 25 करोड़ रुपये निकाले गए. चार्जशीट के मुताबिक, यह पैसा स्वस्तिक देश प्रोजेक्ट्स को गया.
15 जनवरी 2026 को स्वस्तिक देश प्रोजेक्ट्स से करीब 25.33 करोड़ रुपये पंचायत विभाग के MMGAY 2.0 खाते में भेजे गए.
कुमार 18 जून 2025 से 10 अप्रैल 2026 तक HPGCL के मैनेजिंग डायरेक्टर थे. चार्जशीट के मुताबिक, कुमार ने 9 जनवरी 2026 को AU Small Finance Bank का खाता बंद करने और 25 करोड़ रुपये IDFC First Bank में भेजने के प्रस्ताव को मंजूरी दी.
चार्जशीट में कहा गया है, लेकिन तब तक “वास्तव में उस खाते में ट्रांसफर करने के लिए कोई पैसा बचा ही नहीं था”. इसलिए ऋषि को 25 करोड़ रुपये की व्यवस्था करने के लिए कहा गया.
CBI का कहना है कि स्वस्तिक देश प्रोजेक्ट्स के जरिए भेजी गई पेंशन फंड की रकम खाते में वापस लाई गई, ताकि खाता बंद किया जा सके. 10 दिसंबर 2025 को विभाग ने नए डायरेक्टर जनरल अनिल यादव के सैंपल सिग्नेचर तीनों बैंकों को भेजे.
यह पत्र 12 दिसंबर को IDFC First Bank पहुंचा, लेकिन बैंक बेहरा के सिग्नेचर पर लेन-देन करता रहा, जबकि तब तक उनका विभाग से ट्रांसफर हो चुका था.
चार्जशीट के मुताबिक, दिसंबर के अंत तक “डायरेक्टर पंचायत MMGAY 2.0 के खातों में हुई धोखाधड़ी सामने आने वाली थी”, क्योंकि पंचायत विभाग के लेन-देन सीधे दूसरे विभागों से जुड़े हुए थे.
इसमें कहा गया, “इसलिए गड़बड़ी को ठीक करने के लिए कदम उठाए गए.”
CBI ने कहा कि इसी दौरान कुमार के पास HPGCL का भी प्रभार था. एजेंसी का कहना है कि यह कदम “आग बुझाने के लिए काफी नहीं था”, क्योंकि IDFC First Bank के एक दूसरे खाते में भी इसी तरह के लेन-देन हुए थे.
13 जनवरी को यादव ने फाइल पर लिखा कि “C&SDP के साथ फोन पर हुई बातचीत के मुताबिक, मामला/प्रस्ताव मंजूर हो गया है”.
इसी दिन दोनों खाते बंद करने और पैसे Axis Bank में ट्रांसफर करने का प्रस्ताव भेजा गया. इसमें “ऊंचे अधिकारियों के आदेश” का हवाला दिया गया था. CBI का कहना है कि कुमार ने इसे मंजूरी दी.
AU Small Finance Bank का खाता 15 और 16 जनवरी को बंद कर दिया गया और 25.45 करोड़ रुपये विभाग के Axis Bank खाते में भेजे गए.
चार्जशीट में कहा गया है, “यह तरीका बिल्कुल साफ है. खाते को बंद करने का निर्देश मिलने पर बैंक के पास कोई विकल्प नहीं बचता, क्योंकि खाते में मौजूद रकम पूरी किए बिना खाता बंद नहीं किया जा सकता.”
इसमें आगे कहा गया है कि अगर बैंक अधिकारी रकम की व्यवस्था कर लेते, तो “इस विभाग में हुई पूरी धोखाधड़ी उसी समय दबा दी जाती”.
वॉइस नोट
CBI ने नरेश कुमार और रिभव ऋषि के बीच रिकॉर्ड हुई बातचीत पर भी भरोसा किया है. यह रिकॉर्डिंग अंकुर शर्मा के फोन से मिली थी. अंकुर शर्मा उस कंपनी का डायरेक्टर है, जिसे CBI ने आरोपियों में शामिल किया है.
रिकॉर्डिंग में नरेश कुमार को ऋषि से कहते हुए सुना गया: “साकेत सर से पैसे वाला फोन न कराना कहीं उनको ये लगे कि मेरे रेफरेंस से बुला रहे हैं.”
नरेश कुमार यह भी कहते हैं: “खुद बॉस ने कहा था यार नरेश हे दिन जो पहला डे था ना फर्स्ट डे, कि रायता फैलने दो, इसको निपटाओ, ये रायता फैला देगा”.
“रायता फैलाना” हिंदी का एक बोलचाल का मुहावरा है, जिसका मतलब गड़बड़ करना या मामला बिगाड़ देना है. CBI इन शब्दों को धोखाधड़ी को रोकने और दबाने के निर्देश के तौर पर देखती है, न कि इसकी जानकारी देने के तौर पर.
एक दूसरी लाइन में ऋषि कहते हैं कि “साकेत सर” ने यादव से कहा था कि अगर काम नहीं हुआ तो कार्रवाई करें.
CBI का कहना है कि इस बातचीत से पता चलता है कि कुमार ऋषि को जानते थे और ऋषि के पहले उनके घर आने के बारे में भी जानते थे. एजेंसी का कहना है कि इसमें शामिल लोग उनके पास पहुंच को “उपलब्ध” मान रहे थे.
शिकायत
CBI कुमार की बाद में की गई शिकायत को उनकी ईमानदार नीयत का सबूत नहीं मानती. चार्जशीट में कहा गया है कि वह इसे अपनी अच्छी नीयत के सबूत के तौर पर पेश करते हैं, लेकिन “सच्चाई में यह इसका उल्टा साबित करता है”.
इसमें कहा गया है कि उन्हें धोखाधड़ी की जानकारी “कम से कम दिसंबर 2025 के आखिरी हफ्ते में हो गई थी, जब वह खाता बंद करा रहे थे”. चार्जशीट में तीन तारीखें दी गई हैं, जिन पर कुमार ने इन्हीं खातों से जुड़े मामलों में काम किया लेकिन इसकी जानकारी नहीं दी: 9 जनवरी, 13 जनवरी और 28 जनवरी 2026.
चार्जशीट में कहा गया है, “सरकारी पैसे से जुड़ी किसी गड़बड़ी की जानकारी मिलते ही सरकारी कर्मचारी का उसे बताने का कर्तव्य शुरू हो जाता है.” इसमें कहा गया है कि वह “फरवरी 2026 में तभी सामने आए, जब घोटाला सामने आना तय हो गया था”.
विभाग ने 9 फरवरी को IDFC First Bank को पत्र लिखकर कहा कि उसने कभी भी पैसे ट्रांसफर करने का कोई निर्देश जारी नहीं किया था.
11 फरवरी को तीन सदस्यों वाली एक समिति बनाई गई और उसने 18 फरवरी को अपनी रिपोर्ट दी. उसी दिन विभाग ने AU Small Finance Bank से स्वस्तिक देश प्रोजेक्ट्स के खाते को फ्रीज करने को कहा.
CBI का यह भी कहना है कि कुमार ‘Sukoon Group’ नाम के एक WhatsApp ग्रुप के सदस्य थे. इस ग्रुप में IDFC First Bank के अधिकारी भी थे. एजेंसी का कहना है कि इस ग्रुप में उनकी मौजूदगी से पता चलता है कि उनका “आरोपी बैंक अधिकारियों के साथ किसी एक लेन-देन से अलग भी करीबी संपर्क” था.
आरोप
CBI ने कुमार को आरोपी नंबर 23 बनाया है. एजेंसी का कहना है कि वह “इस समझौते का हिस्सा थे” और उनका व्यवहार “उनकी भागीदारी को दिखाता है”.
CBI ने कहा है कि उन्होंने “डायरेक्टर जनरल के अधिकार में आने वाले मामले में सीधे दखल दिया”. यह दखल दो नामित बैंकों के पक्ष में था और “मौखिक निर्देश के आधार पर था, जिसे उन्होंने लिखित में दर्ज नहीं करने का ध्यान रखा”.
चार्जशीट में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराएं लगाई गई हैं. इनमें आपराधिक साजिश, आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, जालसाजी और सबूत के तौर पर जरूरी दस्तावेजों को नष्ट करने से जुड़ी धाराएं शामिल हैं. इसके अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं भी लगाई गई हैं, जिनमें आपराधिक कदाचार से जुड़ी धारा 13(1)(a) शामिल है.
कुछ दूसरे अधिकारियों के मामलों में CBI ने बताया है कि उन्हें कितने पैसे या दूसरे फायदे मिले. लेकिन इस चार्जशीट में यह नहीं बताया गया है कि साकेत कुमार को बदले में क्या मिला.
CBI ने 8 अप्रैल को FIR दर्ज की थी. चार्जशीट में कुमार को गिरफ्तार नहीं किया गया बताया गया है. वह अब आर्काइव्स विभाग के कमिश्नर और सचिव हैं. प्रिंस शर्मा, जिसका मोबाइल नंबर बैंकों ने अलर्ट के लिए इस्तेमाल किया था, न्यायिक हिरासत में है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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