गुरुग्राम: 22 जनवरी की शाम, प्रशांत नाम का एक युवा ओल्ड राजिंदर नगर मेट्रो स्टेशन के पास घबराते हुए खड़ा था. बताया गया है कि वह एक ऐसे ऑपरेशन के लिए वहां आया था, जिसकी कड़ियां दिल्ली के उस इलाके से बहुत आगे तक फैली हुई थीं, जो UPSC कोचिंग सेंटरों के लिए जाना जाता है.
वहां मौजूद लोगों को पता भी नहीं था कि वह चांदनी चौक में काम करने वाले हवाला ऑपरेटरों से 1 करोड़ रुपये, 50 लाख रुपये और फिर 50 लाख रुपये, यानी कुल 2 करोड़ रुपये, तीन हिस्सों में लेने आया था. हर बार पहचान का तरीका एक ही था. 10 रुपये का एक नोट, जिसका सीरियल नंबर पहले ही साझा किया गया था.
बाद में पता चला कि प्रशांत, राम कुमार सिंह का बेटा है. राम कुमार सिंह हरियाणा कैडर के 2012 बैच के प्रमोटेड IAS अधिकारी हैं. जब नगर निकाय के खाते से पैसे गायब हुए, उस समय वह पंचकूला नगर निगम के कमिश्नर थे.
IDFC-AU स्मॉल फाइनेंस बैंक मामले में CBI की सप्लीमेंट्री चार्जशीट, जो 2 सितंबर को पंचकूला की CBI विशेष अदालत में दाखिल की गई, में इस पैसे की डिलीवरी का पूरा घटनाक्रम बताया गया है. जांच में फोन के कॉल डिटेल रिकॉर्ड, कुरियर और हवाला ऑपरेटरों के फोन से मिले WhatsApp चैट और दिल्ली के कैश-एक्सचेंज नेटवर्क से जब्त की गई साइन की हुई रसीदों का इस्तेमाल किया गया.
चार्जशीट के मुताबिक, पैसे पहुंचाने का तरीका कुछ इस तरह था. 11 दिन पहले, 11 जनवरी को, एक कुरियर 50 लाख रुपये कैश लेकर सेक्टर 19-A, चंडीगढ़ में राम कुमार सिंह के सरकारी घर पहुंचा था. पैसे पहुंचाने से पहले अधिकारी के अपने नंबर पर फोन करके डिलीवरी की पुष्टि की गई थी.
प्रशांत तक पहुंचाया गया पैसा हवाला के रास्ते गया. 22 जनवरी की दोपहर को, बैंकर रिभव ऋषि के दो ‘कुरियर’ ने स्थानीय स्तर पर पैसे जुटाए. इसमें सेक्टर 47, चंडीगढ़ के बंसल एसोसिएट्स से 50 लाख रुपये लिए गए. इसके अलावा सेक्टर 28 की एक दुकान और इंडस्ट्रियल एरिया फेज 2 से 30 लाख रुपये और 20 लाख रुपये लिए गए. इसके अलावा चंडीगढ़ और मोहाली के मेगा स्टोर आउटलेट्स से अलग से 1 करोड़ रुपये लिए गए, ऐसा CBI की चार्जशीट में कहा गया है.
पूरा पैसा दो किस्तों में 1-1 करोड़ रुपये करके ललित नाम के एक हवाला ऑपरेटर को दिया गया. CBI के पास उसके फोन रिकॉर्ड और WhatsApp कॉल हैं, जिनसे पता चलता है कि वह उस दिन दोपहर 2 बजे और 4 बजे दोनों बार पैसे देने की जगह पर था.
इसके बाद ललित ने दिल्ली के हवाला बाजार में अपने संपर्कों को फोन करके 10 रुपये के उस नोट का सीरियल नंबर बताया. रिभव ऋषि ने इसी नंबर को पहचान के कोड के तौर पर तय किया था.
इस कोड के आधार पर विशाल पटेल ने प्रशांत को 1 करोड़ रुपये दिए. जयेश पटेल ने उसी जगह 50 लाख रुपये का इंतजाम किया. हरेश पटेल ने बाकी 50 लाख रुपये अपनी दुकान, कूचा घासी राम लेन, पर दिए और प्रशांत से इसकी रसीद पर हस्ताक्षर भी करवाए.
पैसे की इस पूरी कड़ी के हर हिस्से के पीछे जब्त की गई रसीदें, कॉल रिकॉर्ड या ऑपरेटरों और कुरियर के फोन से मिली WhatsApp चैट मौजूद हैं. यह चार्जशीट में बताई गई कई कड़ियों में से सिर्फ एक है. पूरी चार्जशीट कई सौ पन्नों की है.
चार्जशीट, सप्लीमेंट्री चार्जशीट और अंतिम रिपोर्ट, जो क्रमशः 196 और 568 पन्नों की हैं, में हरियाणा सरकार के 400 करोड़ रुपये से ज्यादा के पैसे को IDFC फर्स्ट बैंक और बाद में AU स्मॉल फाइनेंस बैंक में खोले गए खातों से कथित तौर पर निकालने की पूरी जानकारी दी गई है.
अप्रैल में CBI ने IDFC फर्स्ट बैंक में सरकार के खातों से पैसे के गबन की जांच अपने हाथ में ली थी.
एक बैंक शाखा, सरकार के आठ विभाग
CBI के मुताबिक इस मामले में सिर्फ किसी एक रिश्वत की बात नहीं है. जांच में जिस बात पर जोर दिया गया है, वह है कि यह मामला सरकारी व्यवस्था के बड़े स्तर तक पहुंचा हुआ बताया गया है.
जांचकर्ताओं के मुताबिक, इस धोखाधड़ी में हरियाणा सरकार की आठ संस्थाओं के खाते शामिल थे. इनमें हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी HSPCB, हरियाणा पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी HPGCL, उसका ड्राई फ्लाई ऐश फंड और एम्प्लॉइज पेंशन फंड ट्रस्ट, हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद, हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड यानी HSAMB, विकास एवं पंचायत विभाग, पंचकूला नगर निगम, कालका नगर परिषद और हरियाणा श्रम कल्याण बोर्ड शामिल थे. ये खाते कुल 12 बैंक खातों में फैले हुए थे.
इन सभी मामलों में धोखाधड़ी का एक जैसा तरीका बताया गया है. बैंक अधिकारियों ने ब्याज दरों के बारे में गलत जानकारी देकर सरकारी कारोबार हासिल किया. सरकारी अधिकारियों ने नियमों को दरकिनार करके खाते खुलवाए. जमा राशि की तय सीमा का उल्लंघन करके पैसे जमा किए गए. बैंक के अंदर उठने वाले अलर्ट और खतरे के संकेतों को नजरअंदाज किया गया या दबाया गया. पहले ही निकाले जा चुके पैसे को छिपाने के लिए नकली बैंक स्टेटमेंट और फर्जी फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें इस्तेमाल की गईं. चोरी किए गए पैसे को अलग-अलग तरीकों से घुमाया गया. कुछ पैसा दूसरे विभागों में वापस डाल दिया गया ताकि खाते सामान्य दिखें, जबकि बाकी पैसे को कैश, सोने और प्रॉपर्टी में बदला गया.
रिभव ऋषि को CBI ने इस पूरे कथित नेटवर्क का मुख्य योजनाकार बताया है. उसके आसपास रिलेशनशिप मैनेजर, पैसे को मंजूरी देने वाले अधिकारी और टेलर काम करते थे. इसके अलावा मनीष जिंदल नाम का एक बिचौलिया था, जो बैंक अधिकारी और सरकारी अधिकारियों के बीच निर्देश और कथित रिश्वत पहुंचाता था. एक चंडीगढ़ का ज्वेलर भी था, जिसके जरिए चोरी के पैसे को सोने में बदला गया. इसके अलावा चंडीगढ़ और दिल्ली के हवाला ऑपरेटर भी इस नेटवर्क का हिस्सा बताए गए हैं.
‘घर पर ही चेक पर साइन होते थे’
पंचकूला नगर निगम यानी PMC के खाते में कथित धोखाधड़ी का तरीका सबसे खुला हुआ बताया गया है. चार्जशीट के मुताबिक, नवंबर और दिसंबर 2025 के बीच PMC के एक खाते से 22 फर्जी लेनदेन के जरिए 100 करोड़ रुपये कथित तौर पर निकाल लिए गए. यह पैसा दुर्गा फूड्स, तिरुपति फूड्स, बालाजी फूड्स, गर्ग ओवरसीज और झिमझाम एंटरप्राइजेज जैसी कंपनियों को भेजा गया. असल में इन ट्रेडिंग कंपनियों का नगर निगम के साथ कोई वास्तविक कारोबार नहीं था.
पैसे के गायब होने को छिपाने के लिए 20-20 करोड़ रुपये की चार फर्जी फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें यानी FDR दिखाई गईं. जांचकर्ताओं के मुताबिक, इन FDR के लिए चेक खुद जाकर लिए गए थे. 24 दिसंबर 2025 को नरेश कुमार नाम का एक अधिकारी कथित तौर पर राम कुमार सिंह के घर गया और वहां से चार साइन किए हुए चेक लेकर आया. उसने इन चेक की फोटो खींचकर दूसरे बैंकर अभय कुमार को भेजी.
चार्जशीट में अभय कुमार का WhatsApp पर भेजा गया जवाब भी दिया गया है. उसने लिखा, ‘क्या बात है’, और इसके बाद लिखा, ‘मजा आ गया’. इन चेक के बदले कभी कोई फिक्स्ड डिपॉजिट बनाया ही नहीं गया.
जब PMC के कर्मचारियों को खातों में पैसे का हिसाब नहीं मिला, तो CBI के मुताबिक एक नोट लगाया गया जिसमें नगर निगम का खाता किसी दूसरी शाखा में ट्रांसफर करने की सलाह दी गई. इसके लिए खराब सर्विस को वजह बताया गया. जांचकर्ताओं का कहना है कि यह असली शिकायत नहीं थी, बल्कि गायब FDR का पता चलने से रोकने की कोशिश थी.
चार्जशीट में राम कुमार सिंह को नगर निगम को हुए 100 करोड़ रुपये के नुकसान के लिए जिम्मेदार बताया गया है. इसके अलावा कालका नगर परिषद से गायब हुए 18.46 करोड़ रुपये के लिए भी उन्हें जिम्मेदार बताया गया है, जो उनकी निगरानी में थी. CBI के मुताबिक, कालका की रकम जाने के दो दिन बाद दिल्ली में उनके बेटे को हवाला के जरिए 2 करोड़ रुपये दिए गए.
‘बगीचे में सोने के सिक्के पहुंचाए गए’
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी PCB के खाते में कथित धोखाधड़ी की रकम सबसे ज्यादा बताई गई है. यह करीब 160 करोड़ रुपये है. इसमें खोया हुआ ब्याज, गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया मूल पैसा और तय सीमा से ज्यादा सेविंग अकाउंट में रखा गया पैसा शामिल है.
जांचकर्ताओं को 201.42 करोड़ रुपये की सात FDR मिलीं, जिन्हें तत्कालीन HSPCB चेयरपर्सन विनीत गर्ग की निजी मंजूरी से IDFC फर्स्ट बैंक में रखा गया बताया गया. लेकिन बैंक के पास इन FDR का कोई रिकॉर्ड नहीं था.
विनीत गर्ग 1991 बैच के IAS अधिकारी हैं. अगर यह घोटाला सामने नहीं आता, तो वह हरियाणा के मुख्य सचिव के पद के लिए दावेदार हो सकते थे. चार्जशीट के मुताबिक, 2025 में दिवाली से करीब चार-पांच दिन पहले PCB चेयरपर्सन को 50-50 ग्राम के दो सोने के सिक्के मिले थे.
रिभव ऋषि के लिए काम करने वाले एक कुरियर ने चंडीगढ़ की एक ज्वेलरी दुकान से ये सिक्के लिए. इसके बाद उन्हें सेक्टर 7A, चंडीगढ़ में एक घर पर पहुंचाया गया. चार्जशीट के मुताबिक, वहां ये सिक्के बगीचे में एक ऐसे व्यक्ति को दिए गए, जिसे कुरियर ‘सर’ कहकर बुलाता था.
CBI के मुताबिक, मोबाइल टावर के डेटा से पता चलता है कि विनीत गर्ग, कुरियर और बिचौलिए मनीष जिंदल के फोन एक ही जगह पर थे.
HPSCB के मेंबर सेक्रेटरी और IAS अधिकारी प्रदीप कुमार के साथ-साथ विभाग के दो अन्य अधिकारी, परवीन कुमार और सौरव शर्मा को भी आरोपी बनाया गया है.
CBI ने इन लोगों पर या तो गलत तरीके से खाता खुलवाने में मदद करने या फिर बिना यह जांचे कि FDR वास्तव में मौजूद हैं या नहीं, फिक्स्ड डिपॉजिट लगाने की मंजूरी देते रहने का आरोप लगाया है.
फ्लाई ऐश फंड को भी नहीं छोड़ा गया
HPGCL में CBI ने उसके ड्राई फ्लाई ऐश फंड को 59.46 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया है. यह एक अलग खाता है, जिसमें थर्मल पावर प्लांट से मिलने वाला राजस्व या पर्यावरण से जुड़ा मुआवजा जमा किया जाता है.
उस समय के MD और 2002 बैच के IAS अधिकारी मोहम्मद शायिन को आरोपी बनाया गया है. उनके साथ कंपनी के चीफ अकाउंट्स ऑफिसर राजेश गोयल और डायरेक्टर फाइनेंस अमित दीवान को भी आरोपी बनाया गया है.
चार्जशीट के मुताबिक, शायिन ने HPGCL के ड्राई फ्लाई ऐश फंड और एम्प्लॉइज पेंशन फंड ट्रस्ट से पैसे के कथित गबन की अनुमति दी. इसमें ट्रस्ट के IDFC फर्स्ट बैंक खाते से नौ फर्जी डेबिट के जरिए 19.71 करोड़ रुपये लिए गए. उसके AU स्मॉल फाइनेंस बैंक खाते से एक ही डेबिट में 25 करोड़ रुपये निकाले गए. इसके अलावा समय से पहले पैसा निकालने के कारण 1.66 करोड़ रुपये का और नुकसान हुआ.
जांचकर्ताओं का आरोप है कि फ्लाई ऐश फंड का खाता खोला गया और शायिन की मंजूरी से उसमें पैसे जमा किए गए, जबकि इस मामले को वित्त विभाग के पास भेजा ही नहीं गया.
उनके ड्राइवर हेमराज ने CBI को बताया कि उसने रिभव ऋषि को आठ-नौ बार शायिन के घर के बाहर छोड़ा था. हेमराज के मुताबिक, रिभव ऋषि फोन पर अपने साथी अभय कुमार से कथित तौर पर कहता था, ‘शायिन साहब के घर चलना है, मीटिंग है.’
चार्जशीट में शायिन को रिभव ऋषि से मिले कथित गलत लाभ की रकम 1.67 लाख रुपये बताई गई है.
हरियाणा श्रम कल्याण बोर्ड में चार्जशीट के मुताबिक 50.05 करोड़ रुपये का गलत नुकसान हुआ. अक्टूबर 2025 में डिप्टी लेबर कमिश्नर सुरिंदर कौर को व्यक्तिगत रूप से बताया गया था कि बोर्ड के नाम पर कोई फिक्स्ड डिपॉजिट मौजूद नहीं है और जिस बैंक अधिकारी से वह संपर्क कर रही थीं, वह नौकरी छोड़ चुका था.
लेकिन चार्जशीट के मुताबिक, कौर ने एक महीने से ज्यादा समय तक फाइल अपने पास लंबित रखी और इसके बाद बैंक को जानकारी दी. उन्होंने यह फाइल वेलफेयर कमिश्नर को भी नहीं भेजी. साथ ही वह उस पूर्व बैंक कर्मचारी से संपर्क करती रहीं, जो जनवरी में कथित तौर पर उनसे मिलने भी आया था.
दो अन्य अधिकारियों, अमित कुमार और जुगल किशोर को भी खाता खुलवाने और फर्जी फिक्स्ड डिपॉजिट कागजों के इस्तेमाल में कथित भूमिका के लिए चार्जशीट किया गया है.
‘रायता मत फैलने दो’
विकास एवं पंचायत विभाग का नाम चार्जशीट में एक छोटे से शब्द के जरिए सामने आता है.
साकेत कुमार, जो विकास एवं पंचायत विभाग के कमिश्नर और सेक्रेटरी का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे थे और उसी समय HPGCL के MD भी थे, पर आरोप है कि उन्होंने मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना 2.0 के पैसे रखने के लिए इन दोनों बैंकों का चयन किया. इस योजना के तहत ग्रामीण परिवारों को रहने के लिए प्लॉट दिए जाने थे.
2005 बैच के IAS अधिकारी साकेत कुमार ने कथित तौर पर फाइल को सिर्फ ‘Seen’ लिखकर मंजूरी दी.
CBI के मुताबिक, योजना के 75 करोड़ रुपये, जिसमें 50 करोड़ रुपये IDFC फर्स्ट बैंक को और 25 करोड़ रुपये AU स्मॉल फाइनेंस बैंक को दिए गए, दोनों खातों में डाल दिए गए. उस समय कोई विकास कार्य मंजूर नहीं हुआ था और किसी भुगतान की जरूरत भी नहीं थी.
जांच में सामने आया कि उस समय विभाग के डायरेक्टर डी.के. बहेरा ने नोट पर लिखा था कि ‘C&SDP यानी साकेत कुमार के साथ हुई चर्चा के अनुसार, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कहा कि कुमार का ‘seen’ लिखना यह दिखाता है कि मामला पहले ही तय हो चुका था और साकेत कुमार बहेरा के नोट से सहमत थे. CBI के मुताबिक, साकेतांकि, दूसरे विभागों के पैसों की तरह विकास एवं पंचायत विभाग का भी काफी पैसा के फंड IDFC फर्स्ट बैंक और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक में रखे जाएं.’
केंद्रीय एजेंसी ने कहा कि कुमार का ‘seen’ लिखना यह दिखाता है कि मामला पहले ही तय हो चुका था और साकेत कुमार बहेरा के नोट से सहमत थे. CBI के मुताबिक, साकेत कुमार ने ही दोनों बैंकों को चुनने का निर्देश दिया था.
हालांकि, दूसरे विभागों के पैसों की तरह विकास एवं पंचायत विभाग का भी काफी पैसा बाद में बैंकों से गायब हो गया.
केंद्रीय एजेंसी के मुताबिक, बाद में IDFC खाते से 89.23 करोड़ रुपये और AU खाते से 71.61 करोड़ रुपये फर्जी डेबिट के जरिए निकाल लिए गए. इसमें से सिर्फ 1.27 करोड़ रुपये ने HPGCL के EPF ट्रस्ट खाते से 25 करोड़ रुपये की फर्जी निकासी को मंजूरी दी. यह पैसा हाउसिंग योजना के खाते में डाल दिया गया, ताकि उस खाते को बिना किसी दिखाई देने वाले नुकसान के ही वापस मिल पाए.
जब पैसे की कमी सामने आने का खतरा बढ़ा, तो जांचकर्ताओं के मुताबिक कुमार ने HPGCL के EPF ट्रस्ट खाते से 25 करोड़ रुपये की फर्जी निकासी को मंजूरी दी. यह पैसा हाउसिंग योजना के खाते में डाल दिया गया, ताकि उस खाते को बिना किसी दिखाई देने वाले नुकसान के बंद किया जा सके.
एक रिटायर्ड IAS अधिकारी ने द प्रिंट से कहा, ‘इतनी बड़ी रकम का एक विभाग से दूसरे विभाग में ट्रांसफर होना दिखाता है कि IAS अधिकारी बिना किसी डर के इतनेाणा के मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव भी थे. इस पद का मतलब था कि उनसे नीचे के बहुत बड़े घोटाले को होने दे रहे थे.’
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कुमार हरियाणा के मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव भी थे. इस पद का मतलब था कि उनसे नीचे के बहुत कम अधिकारी उनके फैसलों पर सवाल उठा सकते थे.
चार्जशीट में शामिल नरेश कुमार और रिभव ऋषि के बीच रिकॉर्ड की गई बातचीत में साकेत कुमार के बारे में कहा गया है कि उन्होंने निर्देश दिया था, ‘रायता ना फैलने दो, इसको निपटाओ, ये रायता फैला देगा.’ यानी, ‘इस मामले को फैलने मत दो, इसे खत्म करो, वरना यह और फैल जाएगा.’
फर्जी डेबिट
पंकज अग्रवाल ने अलग-अलग समय पर कृषि एवं किसान कल्याण विभाग और स्कूल शिक्षा विभाग, दोनों के प्रधान सचिव का पद संभाला है. आरोपी IAS अधिकारियों में उन पर सबसे ज्यादा तरह के आरोप लगाए गए हैं.
2000 बैच के IAS अधिकारी पर हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद को 50.54 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप है. यह रकम 101 फर्जी डेबिट के जरिए निकाली गई. उन पर हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड के खाते से 10 करोड़ रुपये का एक और फर्जी डेबिट होने देने का भी आरोप है. बाद में बैंक ने 10 करोड़ रुपये ब्याज समेत वापस कर दिए, जब एक दूसरे अधिकारी ने इस मामले की जानकारी कानून लागू करने वाली एजेंसियों को दी.
चार्जशीट में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने बैंक के एक औपचारिक प्रस्ताव को उस अधिकारी से हटाकर दूसरे रास्ते पर भेज दिया, जिसे सामान्य तौर पर उसे मंजूर करना चाहिए था. उन्होंने पहले से मौजूद नोटशीट वापस मंगवाई और उसकी जगह पिछली तारीख डालकर नई नोटशीट लगवाई. बाद में जब उन्हें धोखाधड़ी की जानकारी दी गई, तो उन्होंने पुलिस या जांच एजेंसी में शिकायत दर्ज कराने के बजाय मामले को छोटा करके दिखाने की कोशिश की.
‘W-3’
CBI की चार्जशीट में आरोप लगाया गया है कि पंकज अग्रवाल नवंबर और दिसंबर 2025 में जेड मैनर नाम की एक निजी प्रॉपर्टी पर गए थे. यह प्रॉपर्टी जीरकपुर में है. वहां ‘W3’ के नाम से पहचानी गई एक महिला मौजूद थी. जांचकर्ताओं का आरोप है कि वह वहां इस ‘इरादे से’ गए थे कि उसकी मर्यादा का अपमान करें और उसकी निजी जिंदगी में दखल दें.
चार्जशीट के मुताबिक, ‘W3’ जेड मैनर वहां पहुंची थी क्योंकि कबीर नाम के एक व्यक्ति ने आरोपी नरेश कुमार और रिभव ऋषि के निर्देश पर उसे वहां भेजा था. हर बार राकेश कुमार उर्फ चाचा नाम का एक व्यक्ति ‘W3’ को वहां लेकर गया और फिर वापस छोड़कर आया.
अपने बयान में ‘W3’ ने आरोप लगाया कि दोनों मौकों पर वह ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे में थी, तभी अग्रवाल वहां आए और कुछ समय उसके साथ रहे. दोनों मौकों पर उसे कथित तौर पर कैश में 10,000 रुपये और 12,000 रुपये दिए गए.
चार्जशीट में 24 दिसंबर 2025 को चंडीगढ़ के होटल नोवोटेल में की गई तीसरी व्यवस्था का भी जिक्र है. होटल के रिकॉर्ड और फोन रिकॉर्ड से पता चलता है कि यह बैठक हुई ही नहीं थी.
अग्रवाल के खिलाफ लगाए गए औपचारिक आरोपों में इस बात का भी जिक्र है. इसके अलावा उन पर कैश, होटल की मेहमाननवाजी और मुजरा पार्टियों को कथित तौर पर रिश्वत या गलत लाभ के तौर पर लेने के आरोप भी हैं. द प्रिंट ने सितंबर के पहले हफ्ते में इन आरोपों की रिपोर्ट की थी.
IAS अधिकारी राम कुमार सिंह, पंकज अग्रवाल और प्रदीप कुमार, जो अपनी गिरफ्तारी वाले दिन ही रिटायर हुए थे, साथ ही बैंकर रिभव ऋषि और अभय कुमार न्यायिक हिरासत में हैं.
तीन अन्य IAS अधिकारी, विनीत जोशी, मोहम्मद शायिन और साकेत कुमार, को गिरफ्तार नहीं किया गया है.
इन लोगों पर लगाए गए अपराधों में आपराधिक साजिश, सरकारी कर्मचारी द्वारा भरोसे का आपराधिक उल्लंघन, धोखाधड़ी, कीमती दस्तावेज या सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज की जालसाजी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गैरकानूनी रिश्वत देने और लेने के अपराध शामिल हैं. इनके साथ भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराएं भी लगाई गई हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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