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Sunday, 27 September, 2026
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प्यार, गोत्र और निर्वासन: हरियाणा के कपल्स की पंचायत से बचने की जद्दोजहद

राज्य भर में, एक ही गांव या समुदाय में विवाह वर्जित है, यह नियम इसे लागू करने वाले परिवारों से भी पुराना है. खाप नेता इसका बचाव दृढ़ता से करते हैं.

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हिसार/रोहतक: श्रवण और आरती की प्रेम कहानी बहुत साधारण तरीके से शुरू हुई थी. वे तब मिले थे जब श्रवण 17 साल और आरती 15 साल की थी. दोनों हरियाणा के हिसार के आर्य नगर में एक ही क्लासरूम में एक-दूसरे के पास बैठते थे.

जब अब 21 साल के श्रवण और 19 साल की आरती ने इस साल मई में शादी करने का फैसला किया, तो उन्हें पता था कि उनके गांव के लोग इसे मंजूर नहीं करेंगे. इसलिए दोनों चुपचाप कोर्ट चले गए. न कोई मंडप था, न शादी का कार्ड, न स्टेज, न DJ और न मिठाई.

और फिर वे गायब हो गए.

पंचायत की प्रतिक्रिया के डर से श्रवण और आरती, दोनों कुम्हार (प्रजापत) OBC जाति से हैं, हिसार छोड़कर भाग गए और चार महीने तक छिपकर रहे. कभी किसी दोस्त के घर. कभी शहर के पार्कों या मॉल में.

श्रवण के पिता मस्तान सिंह ने याद करते हुए कहा, “श्रवण ने मुझे फोन करके शादी के बारे में बताया. मैं खुश था. हम आरती को कई सालों से जानते थे. लेकिन फिर हमें पता चला कि आरती का परिवार इस शादी से खुश नहीं था. मैं चिंतित हो गया. फिर उन्होंने सब कुछ और भी ज्यादा मुश्किल बना दिया.”

वे तभी वापस लौटे जब मस्तान सिंह ने उन्हें भरोसा दिलाया कि अब वापस आना सुरक्षित है.

लेकिन ऐसा नहीं था.

उनके लौटने के बाद गांव में दो पंचायतें हुईं. एक ही गांव में शादी करना आज भी गलत माना जाता है. यह नियम उन परिवारों से भी पुराना है जो इसे लागू करते हैं. खाप के नेता पूरे भरोसे के साथ इस नियम का बचाव करते हैं.

20 सितंबर को गांव के बुजुर्ग एक अनौपचारिक पंचायत के लिए इकट्ठा हुए और उन्होंने प्रेम विवाहों के पूरी तरह सामाजिक बहिष्कार का प्रस्ताव पास किया. इसका निशाना श्रवण, आरती और ऐसे दूसरे “जोड़े” थे, जो दशकों पुराने नियमों को चुनौती देते हैं.

हरियाणा पुलिस ने ऐसे जोड़ों को सुरक्षित रखने के लिए अलग सुरक्षित घर बनाए.

Shravan’s father Mastan Singh rarely leaves his home in Hisar, since his son’s marriage to Aarti, who is from the same village | Samridhi Tewari | ThePrint
श्रवण के पिता मस्तान सिंह अपने बेटे की आरती से शादी के बाद, जो उसी गांव की रहने वाली है, हिसार में अपने घर से बहुत कम बाहर निकलते हैं | समृद्धि तिवारी | दिप्रिंट

गांव के बुजुर्ग कुलवंत गोसला, जो इस अनौपचारिक प्रस्ताव को पास करने में शामिल थे, ने दिप्रिंट से कहा, “यह स्वीकार नहीं किया जा सकता.”

उन्होंने कहा, “एक ही जाति और एक ही गांव के दो लोग शादी कैसे कर सकते हैं? हम ऐसे जोड़ों के सामाजिक बहिष्कार की मांग करते हैं. हमें एक उदाहरण पेश करना होगा ताकि ऐसी शादियों को बढ़ावा न मिले.”

गांव के चुने हुए सरपंच रतन सिंह ने पंचायत की आधिकारिक भूमिका और समुदाय की कार्रवाई के बीच अंतर करने की कोशिश की.

उन्होंने कहा, “आधिकारिक संस्था के रूप में पंचायत की इसमें कोई भूमिका नहीं है. गांव के बुजुर्गों ने यह फैसला किया है. हम सामान्य रूप से प्रेम विवाह के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन एक ही गांव में शादी करके परेशानी क्यों पैदा करनी? भाईचारा बना रहने दें. गांव में सभी लड़के और लड़कियां भाई-बहन जैसे होते हैं.”

आरती के परिवार ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया. उनके लिए यह शादी एक “धोखा” थी और उन्होंने “अपनी बेटी से सारे रिश्ते तोड़ लिए”.

आरती की दादी रोशनी ने दिप्रिंट से कहा, “हम चाहते थे कि वह पढ़ाई करे. हमने उससे कभी घर का काम करने के लिए भी नहीं कहा, न सफाई और न झाड़ू-पोंछा, जो ज्यादातर लड़कियों से करवाया जाता है.”

उन्होंने कहा, “देखो उसने बदले में क्या किया. वह बस भागना चाहती थी, शादी करना चाहती थी और हमारे परिवार को बदनाम करना चाहती थी. आरती अब हमारे लिए मर चुकी है. उसे कभी वापस नहीं आना चाहिए और न ही हमसे मदद मांगनी चाहिए.”

आरती का परिवार जिस घर में रहता है, वह श्रवण के घर से सिर्फ कुछ किलोमीटर दूर है. वहां से आरती का सारा सामान पूरी तरह हटा दिया गया है. उसका परिवार ऐसे आगे बढ़ गया है जैसे वह कभी थी ही नहीं.

Aarti’s home in Arya Nagar, Hisar. Her family claims no association with her after her marriage | Samridhi Tewari/ThePrint
आर्य नगर, हिसार में आरती का घर. उसके परिवार का कहना है कि शादी के बाद उनका उससे कोई संबंध नहीं है | समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

दहिया खाप के अध्यक्ष सुरेंद्र दहिया के लिए “खाप की मर्यादा हमेशा बनी रहनी चाहिए”. उन्होंने कहा कि गांव के बच्चों को “हिंदू परंपरा” पता होनी चाहिए और यह भी पता होना चाहिए कि परिवार की इज्जत को चोट पहुंचाने के लिए वे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं.

दहिया ने कहा, “हमारी परंपरा कहती है कि जब शादी होती है, तो गांव, गोहंड और गोत्र एक नहीं होने चाहिए. यह परंपरा दशकों से चली आ रही है. जो दो लोग एक ही पानी पीते हैं, वे आपस में शादी नहीं कर सकते.”

उन्होंने इसके पीछे “वैदिक” और “वैज्ञानिक” कारण भी बताए.

उन्होंने कहा कि एक ही गांव में शादी करने वाले जोड़ों का “DNA मजबूत नहीं होता”. उन्होंने कहा, “पहले माता-पिता और गांव के बुजुर्ग तय करते थे कि किससे शादी करनी चाहिए, लेकिन अब इन फिल्मों ने हमारे युवाओं को खराब कर दिया है. अब कोई संस्कारी फिल्म नहीं बची. सभी फिल्मों में यही दिखाया जाता है… प्रेम संबंध, चोरी-छिपे मिलना, चोरी-छिपे शादी करना और प्रेमी के साथ भाग जाना. यही चीज हमारे युवाओं को प्रभावित कर रही है. इसी वजह से वे प्रेम विवाह कर रहे हैं.”

दहिया का यह भी मानना है कि सोशल मीडिया युवाओं को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभाता है. उन्होंने कहा, “इंस्टाग्राम और फेसबुक की रील्स ने युवाओं को ऐसा बना दिया है कि उन्हें लगता है कि वे सब कुछ सबसे बेहतर जानते हैं. लोग ऐसी तस्वीरें और वीडियो डालते हैं और वे युवा जोड़ों को प्रभावित करते हैं. यह हमारी हिंदू संस्कृति के खिलाफ है.”

व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम से दूरी

श्रवण और आरती अकेले नहीं हैं.

पूरे हरियाणा में जो युवा प्रेम विवाह करना चाहते हैं, वे बहुत बड़ा खतरा उठाते हैं. समुदाय और सामाजिक बहिष्कार के डर से वे चुपचाप शादी करते हैं, अक्सर आधी रात को घर से भाग जाते हैं और आखिर में ऐसे सुरक्षित घरों में पहुंचते हैं जो अंधेरे और जेल जैसे लगते हैं.

प्रेम विवाह का मतलब है व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर चुपचाप रहना. कोई फोटो पोस्ट न करना और परिवार से सारे संबंध तोड़ देना. इसका मतलब यह भी है कि नौकरी छोड़नी पड़ती है और रातोंरात अपना करियर छोड़ना पड़ता है.

जोड़े यह नहीं जानते कि वे कब घर वापस जा पाएंगे, इसलिए घर से भाग जाते हैं. हर कदम पर ऑनर किलिंग का डर बना रहता है. युवा जोड़ों को किसी भी समय आराम करने, सांस लेने या सुरक्षित महसूस करने की आजादी नहीं होती.

Shravan’s father and brother discuss the village panchayat’s unofficial boycott of their son and daughter-in-law | Saqiba Khan/ThePrint
श्रवण के पिता और भाई गांव की पंचायत द्वारा उनके बेटे और बहू के अनौपचारिक बहिष्कार पर चर्चा करते हुए | साकिबा खान/दिप्रिंट

यह डर लगातार बना रहता है और राज्य भर की गांव की पंचायतों द्वारा जारी किए गए अनौपचारिक फरमानों से इसकी पुष्टि भी होती है.

एक ही गांव या एक ही गोत्र में शादी करना कानूनी है, लेकिन फिर भी इसे समुदाय के नियमों का उल्लंघन माना जाता है. ऐसे जोड़ों को अक्सर सामाजिक बहिष्कार, गांव से निकालने, जबरन अलग करने या बहुत गंभीर मामलों में हत्या तक की सजा दी जाती है.

कई जिलों में खाप के नियम-कानून से ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते हैं. इसकी वजह से जोड़ों को छिपकर रहना पड़ता है या अपना घर और गांव छोड़ना पड़ता है.

खाप पहले आदिवासी और गांव के प्रशासन की एक व्यवस्था के रूप में महत्वपूर्ण हुईं. आज इनका सबसे ज्यादा प्रभाव महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में है.

एक दुर्लभ बदलाव में, हरियाणा के कुछ हिस्सों में खापों ने पिछले साल एक सदी पुराने नियम को बदलते हुए कुछ जुड़े हुए गांवों के बीच शादी की अनुमति दे दी थी, जैसा कि दिप्रिंट ने पिछले साल बताया था.

Aarti’s grandmother, Roshni, and her younger brother at their residence in Arya Nagar. They say she brought shame to the family | Saqiba Khan/ThePrint
आरती की दादी रोशनी और उसका छोटा भाई आर्य नगर स्थित अपने घर पर. उनका कहना है कि आरती ने परिवार को बदनाम किया | साकिबा खान/दिप्रिंट

लेकिन ज्यादातर मामलों में हरियाणा में पारंपरिक नियम अभी भी लागू हैं. हिसार भी इसका अपवाद नहीं है.

दशकों से हरियाणा की खापों ने शादी को लेकर कड़े नियम लागू किए हैं. एक ही गोत्र, एक ही खानदान और एक ही गांव में शादी करना मना था और इसे अपराध जैसा माना जाता था.

खापें अनौपचारिक अदालतों की तरह काम करती थीं. वे उन जोड़ों का भविष्य तय करती थीं, जिन्होंने सामाजिक नियम तोड़े होते थे.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा उन राज्यों में है जहां “ऑनर किलिंग” के मामले सबसे ज्यादा हैं. 2024 में हरियाणा में ऐसे 4 मामले दर्ज हुए. उस साल कुल 36 ऑनर किलिंग के मामले दर्ज हुए थे. इनमें बिहार में 6, जबकि झारखंड और पंजाब में 5-5 मामले थे.

रोहतक, झज्जर और सोनीपत की खाप पंचायतें हर साल बैठक करती हैं और कुछ नियमों को आधिकारिक रूप से लागू करने की मांग करती हैं. इनमें एक ही गांव और एक ही गोत्र में शादी पर रोक, लिव-इन रिश्तों पर रोक, कानूनी शादी की उम्र 18 से घटाकर 16 साल करना और प्रेम विवाह के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी करना शामिल है. वे कहते हैं कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे.

Before getting married, Shravan ran a mobile shop which saw good business. Now it remains locked | Saqiba Khan/ThePrint
शादी से पहले, श्रवण मोबाइल की दुकान चलाते थे और उनका काम अच्छा चलता था। अब वह दुकान बंद रहती है | साकिबा खान/दिप्रिंट

हिसार के वकील मनोज कुश ने इसे सीधे शब्दों में कहा. “ऑनर किलिंग दशकों से होती आ रही है. पहले इनके मामले दर्ज नहीं होते थे. मीडिया भी इनकी ज्यादा रिपोर्टिंग नहीं करता था. अब यह बदल रहा है. ये अपराध अब राष्ट्रीय सुर्खियां बन रहे हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “मनोज-बबली ऑनर किलिंग केस हरियाणा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण फैसला था.”

यह मामला जून 2007 में नवविवाहित मनोज बनवाला और बबली की हत्या का था.

खाप ने यह मान लिया था कि मनोज और उसकी पत्नी बबली एक ही गोत्र यानी एक ही खानदान से थे. इसलिए खाप ने कहा कि वे भाई-बहन हैं, भले ही उनका सीधा पारिवारिक रिश्ता नहीं था. इस वजह से उन्होंने दोनों की शादी को भाई-बहन के बीच संबंध जैसा और अमान्य घोषित कर दिया और उन्हें मारने का आदेश दिया.

बबली के परिवार के सदस्य, जो खाप के नेता भी थे, इस मामले में दोषी पाए गए.

विशेषज्ञ गांव से बाहर शादी करने के नियम यानी इस विचार को कि आप अपने गोत्र या गांव में शादी नहीं कर सकते, एक “गहरी जड़ वाली समस्या” कहते हैं.

JNU के प्रोफेसर और समाजशास्त्री सुरिंदर जोधका ने कहा, “परंपरागत पितृसत्ता ने महिलाओं की यौन स्वतंत्रता को पुरुषों के नियंत्रण में रखा है. चाहे वह भाई हो या पिता.”

जोधका के अनुसार, मामला सिर्फ इन नियमों के टूटने का नहीं है. इसके पीछे चोट पहुंचा हुआ अहंकार, पुरुषों की सत्ता को चुनौती मिलने का डर और गांव के सामने अपनी authority यानी अधिकार के खत्म होने की भावना भी है.

युवा जोड़े बनाम पंचायत

हिसार के भारत नगर से कुछ किलोमीटर दूर 27 साल के हिमांशु, जो वाल्मीकि समुदाय से हैं, और 25 साल की बिमला, जो सैनी समुदाय से हैं, तीन साल पहले एक स्थानीय डॉक्टर के क्लिनिक में साथ काम करते हुए मिले थे.

उनकी दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई, लेकिन उन्हें पता था कि पंचायत इस शादी का विरोध करेगी. अपने परिवारों को बिना बताए दोनों अपने-अपने घर से निकल गए और दिसंबर 2022 में शादी कर ली.

हिमांशु के पिता राजेश बागड़ी, जो स्थानीय नगर निगम में सफाई कर्मचारी हैं, ने कहा, “जब वे गायब हुए, तो मैंने तुरंत पुलिस को इसकी जानकारी दी और मामले की जांच शुरू करने को कहा.”

उन्होंने आगे कहा, “बाद में पुलिस ने उनका पता लगाया और वे पुलिस के एक सुरक्षित घर में मिले. हम उनसे मिलने वहां गए और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से आखिरकार उन्हें सुरक्षित घर वापस लाने में सफल हुए.”

बिमला के परिवार ने उसे स्वीकार करने से मना कर दिया. लेकिन हिमांशु के पिता उनके साथ खड़े रहे और पंचायत की मांगें मानने से इनकार कर दिया.

राजेश ने कहा, “मैंने बिमला के पिता से कहा कि अगर वे इस शादी का विरोध करते हैं और गांव के बुजुर्ग भी इससे खुश नहीं हैं, तो वे इसे हमेशा के लिए खत्म कर दें. मेरे बच्चों ने एक-दूसरे को चुनकर कुछ भी गलत नहीं किया है. इसके बाद उन्होंने बहुत मुश्किल जिंदगी जी.”

पंचायत ने उन्हें गांव छोड़ने के लिए कहा और इस फैसले को अनौपचारिक तरीके से लागू भी किया गया.

दोनों एक हफ्ते तक कड़ी सुरक्षा वाले सुरक्षित घर में रहे. सुरक्षित घर छोड़ने के बाद वे 15 दिन तक एक गुप्त जगह पर छिपकर रहे.

आखिरकार वे सिरसा भाग गए, जहां वे तीन महीने तक एक रिश्तेदार के घर छिपे रहे. इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट नहीं किया और अपने परिवारों को एक भी फोन नहीं किया.

हिमांशु और बिमला दोनों को अपनी अच्छी तनख्वाह वाली क्लिनिक की नौकरी छोड़नी पड़ी, ताकि उनका पता न लगाया जा सके.

अब, भले ही वे वापस आ चुके हैं, लेकिन डर अभी भी बना हुआ है.

बिमला घर के अंदर ही रहती है और उसे अभी तक नई नौकरी नहीं मिल पाई है. हिमांशु दिन में काम पर जाता है और अंधेरा होने से पहले वापस आ जाता है. दोनों में से कोई भी कभी अकेले घर से बाहर नहीं निकलता. वे हर समय फोन पर एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं.

जोड़ों की सुरक्षा

हिसार में केंद्रीय जेल के पीछे एक जंगल के अंदर छिपा हुआ हरियाणा सरकार द्वारा तय किए गए सुरक्षित घरों में से एक है.

जंगल बाहर के लोगों को दूर रखता है. बाहर से यह सुरक्षित घर किसी आम रिहायशी इमारत जैसा दिखाई देता है. वहां रहने वाले युवा लड़के और लड़कियां खिड़कियों से सावधानी से झांकते रहते हैं कि कौन आया है.

अंदर 10 से 12 ऐसे जोड़े रहते हैं जो अपने गांव से भाग गए हैं. ये जोड़े प्रेम विवाह से पहले या बाद में अपनी जान के डर से गांव छोड़कर भागे थे. वे एक बड़े कमरे जैसी व्यवस्था में साथ रहते हैं, जहां सिर्फ बुनियादी बिस्तर और गद्दे हैं. सरकारी बजट मिलने पर कंबल दिए जाते हैं.

A safe house meant for runaway couples in Hisar district tucked away in a forest. Haryana Police provide protection for couples | Saqiba Khan/ThePrint
हिसार जिले में जंगल के अंदर छिपा हुआ भागे हुए जोड़ों के लिए सुरक्षित घर. हरियाणा पुलिस इन जोड़ों को सुरक्षा देती है | साकिबा खान/दिप्रिंट

कमरों में रोशनी तो है, लेकिन AC नहीं है. इससे अंदर की हवा घुटन भरी हो जाती है और शौचालयों से बदबू आती है. इन शौचालयों को जोड़े खुद साफ करते हैं.

वहां एक बरामदा है, जहां अच्छी धूप आती है. तारों पर कुर्तियां और टी-शर्ट सूखती रहती हैं. जोड़े पैर मोड़कर बैठते हैं, धीरे-धीरे बातें करते हैं और अपना समय बिताते हैं.

रोजमर्रा की जिंदगी बहुत साधारण है. जोड़े अपनी बाइक साफ करते हैं, पानी की टंकियां भरते हैं और कपड़े धोते हैं.

वहां रहने वाले लोगों के लिए यह सुरक्षित घर उन्हें सुरक्षा का एहसास तो देता है, लेकिन इसके बदले उन्हें बुनियादी सुविधाओं और अपनी निजी आजादी से समझौता करना पड़ता है.

हिमांशु को याद है कि घर से भागने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी बिमला के साथ हिसार के सुरक्षित घर में वे दिन कैसे बिताए थे. हिमांशु ने दिप्रिंट से कहा, “हम दोनों के परिवार हमारे रिश्ते से खुश नहीं थे क्योंकि यह अलग-अलग जातियों की शादी थी.”

उन्होंने कहा, “जब हमें लगा कि हमारे पास कोई और रास्ता नहीं है, तो हमने 22 दिसंबर 2022 को हिसार की अदालत में शादी करने का फैसला किया. हमें पता ही नहीं था कि सुरक्षित घर जैसी कोई जगह भी होती है. हमने Google पर खोजा और एक वकील से बात की. उसने हमें वहां जाने की सलाह दी.”

करीब 12.30 बजे शादी करने के बाद वे दोपहर 3.30 बजे उस जगह पहुंचे जहां रेड क्रॉस की इमारत में सुरक्षित घर बनाया गया था.

हिमांशु ने याद करते हुए कहा, “जब हम अंदर गए तो हम हैरान रह गए. वहां रहना या सांस लेना भी मुश्किल था. यह एक खुले हॉल जैसा था. जगह घुटन भरी और गंदी थी.”

जोड़ों को कमरे और बाथरूम खुद साफ करने पड़ते थे, क्योंकि बाहर से सफाई करने वाले कर्मचारियों को अंदर आने की अनुमति नहीं थी. घर को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा गया था. हर हिस्से में एक बिस्तर और एक कुर्सी थी.

उन्होंने कहा, “दो लोगों को एक छोटे से बिस्तर पर किसी तरह साथ सोना पड़ता था. बहुत ठंड थी, इसलिए छह या सात जोड़ों को उसी तंग जगह में रहना पड़ता था और उनके पास बांटने के लिए सिर्फ पतले कंबल होते थे.”

बेहद मजबूरी में घर से भागते समय वे अपने साथ कुछ भी नहीं ला पाए थे. बिमला डर की वजह से कपड़े तक नहीं रख पाई थी, क्योंकि उसे डर था कि उसका परिवार उसे पकड़ लेगा.

हिमांशु सिर्फ 35,000 रुपये नकद ला पाया था, ताकि कानूनी खर्च और अचानक आने वाले जरूरी खर्च पूरे किए जा सकें.

उन्होंने कहा, “अंदर आपको पूरी तरह कैदी जैसा महसूस होता है. हमें मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की सख्त मनाही थी और हमें सिर्फ बरामदे तक जाने की अनुमति थी. गेट के बाहर जाने की अनुमति नहीं थी.”

उन्होंने आगे कहा, “सर्दियों की ठंडी शामों में सभी जोड़े एक साथ इकट्ठा होते थे, छोटी सी आग जलाते थे और धीरे-धीरे बातें करते थे. हम सोचते रहते थे कि घर पर क्या हो रहा होगा. दिन बिताना मुश्किल था. रातें आसान थीं.”

हिसार के अलग-अलग गांवों से आए इन जोड़ों ने अपने परिवारों, अदालत की सुनवाई और नौकरी चले जाने की चिंता एक-दूसरे से साझा की.

हिमांशु ने कहा, “मैं हर दिन यही सोचता रहता था कि जज क्या कहेंगे या हमारे खिलाफ क्या कार्रवाई होगी.”

उन्होंने कहा, “समाज में लोगों को कोई दिक्कत नहीं होती जब शादी तलाक पर खत्म हो जाती है या जब किसी को पीटा जा रहा होता है. लेकिन क्योंकि हमने प्यार को चुना, हमें सिर्फ जिंदा रहने के लिए एक बहुत बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी. यह बहुत डरावना दौर था. मैंने इसे अपनी यादों से मिटाने की बहुत कोशिश की है.”

इस “साझा कैद” के दौरान, हांसी, आदमपुर और बरवाला जैसे आसपास के गांवों से आए जोड़ों के बीच एक-दूसरे का साथ और भरोसा बन गया.

दो पुलिस अधिकारी, एक पुरुष और एक महिला, इस घर की 24 घंटे सुरक्षा करते हैं. जोड़े बहुत कम बाहर निकलते हैं और सिर्फ खाना और दवा जैसी जरूरी चीजों के लिए बाहर जाते हैं.

जिंद के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “ज्यादातर जोड़े 7 से 15 दिन तक यहां रहते हैं, जब तक कि शुरुआत में मिलने वाली धमकियां थोड़ी कम न हो जाएं.”

इन सुरक्षित जगहों को चलाना प्रशासन के लिए अभी भी एक बड़ी समस्या है.

जिंद और हांसी जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं की कमी अभी भी एक बड़ी चुनौती है.

हांसी के एक अधिकारी ने कहा कि जोड़ों की सुरक्षा के लिए अलग से कोई बजट नहीं है. जिंद के अधिकारी ने कहा, “ये घर पुलिस लाइनों में बने होते हैं और इनके लिए अलग से कोई जगह तय नहीं है. कभी सिर्फ एक कमरा उपलब्ध होता है और कभी दो.”

उन्होंने कहा, “कुछ जोड़े एक जिले से भागने के बाद अदालत में याचिका दायर करते हैं और उसी जिले के सुरक्षित घर में पहुंच जाते हैं. यह खतरनाक हो सकता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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