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Saturday, 26 September, 2026
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इंदिरा दौर से तीसरे साल में सरकारों की थमती रफ्तार: मोदी को इससे बचने के लिए EC की छवि बहाल करनी होगी

ज्ञानेश कुमार अब हमारे 26 CECs में से दूसरे सबसे यादगार व्यक्ति बन गए हैं. ज़ाहिर है, उन्होंने यह 'शोहरत' नहीं चाही थी। लेकिन वे इससे पीछा भी नहीं छुड़ा सकते.

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अगर आप वादा करें कि आप गूगल में सर्च नहीं करेंगे तो मैं आपसे तीन सवाल करना चाहूंगा.

पहला सवाल: मोदी के राज में ज्ञानेश कुमार से पहले कितने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) हुए हैं?

दूसरा सवाल: क्या आप किसी एक का नाम बता सकते हैं?

तीसरा सवाल: 1950 से लेकर अब तक कितने CEC हुए?

पहले सवाल का जवाब है: 8. मोदी के राज में 8 CEC ने बाइज्जत अपना काम किया और रुखसत हुए. BJP के एक प्रवक्ता के मुताबिक, इस दौरान BJP “20 चुनाव हारी”, 2024 में वह लोकसभा में 240 सीटों पर सिकुड़ गई. आपको खूब याद होगा कि 1990 वाले दशक में टी.एन. शेषन ने चुनाव आयोग का किस तरह कायाकल्प किया था. CEC रहे एस.वाई. कुरैशी सिविल सोसाइटी के सार्वजनिक विमर्शों में किस तरह सक्रिय रहते हैं. और शायद आपको मनोहर सिंह गिल की भी सिर्फ इसलिए याद हो कि उन्होंने 1993-95 के दौरान साथी चुनाव आयुत जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति के साथ मिलकर शेषन की ‘तानाशाही’ का किस तरह मुक़ाबला किया था और इस सिद्धांत को स्थापित करने में सफल रहे थे कि तीनों चुनाव आयुक्त समान रुतबा रखते हैं. और आपको शायद यह भी याद होगा कि गिल मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री नियुक्त किए गए थे.

बाकी 22 CEC अपनी प्रतिष्ठा कायम रखते हुए चुपचाप रिटायर हुए. जहां तक एक संस्था के रूप में चुनाव आयोग का सवाल है, इसकी महानता में इन सबने इजाफा ही किया, इसे शायद ही किसी ने कम किया .

पिछले करीब 50 वर्षों से देश की राजनीति और चुनावों को कवर करते रहने के बावजूद मैं भी इनमें से कुछ के नाम ही याद कर सकता हूं. कुछ को तो मैं तब से व्यक्तिगत तौर पर जानता था जब वे CEC नहीं बने थे, और कई से मैंने अपने पेशे की वजह से बातचीत की.

सबसे पहले मैंने जिन CEC से बात की थी वे थे आर.के. त्रिवेदी, जो 18 जून 1982 से 31 दिसंबर 1985 तक CEC रहे. उनसे बात करने का मौका तब आया था जब इंदिरा गांधी ने असम में जनता के भारी हिंसक बायकॉट के बीच जबरन चुनाव करवाया था. उस बायकॉट में करीब 7,000 लोग मारे गए थे. मैंने त्रिवेदी से पूछा था कि इस तरह ज़बरदस्ती चुनाव करवाने की क्या जरूरत थी? उनका संक्षिप्त जवाब था: “मुझे प्रैक्टिकल बनना होगा.” उनका यह जवाब काफी चर्चित हुआ था.

मैंने भूमिका के तौर पर पिछले 75 साल की बातों का जिक्र सिर्फ इस तथ्य को एक संदर्भ देने के लिए किया कि ज्ञानेश कुमार पिछले 26 मुख्य चुनाव आयुक्तों में दूसरे सबसे ज्यादा याद किए जाने वाले CEC क्यों बन गए हैं. जाहिर है, उन्होंने अपनी यह ‘ख्याति’ शायद ही चाही होगी. लेकिन अब वे इससे मुक्त नहीं हो सकते. न ही मोदी सरकार उनसे पल्ला झाड़ सकती है. वैसे, संकेत तो यही दिख रहे हैं कि वे सब यही चाह रहे हैं. न हो तो उन तमाम प्रभावशाली ‘कमेंटेटर्स’ को सुन लीजिए, जो ज्ञानेश कुमार की कड़ी आलोचना कर रहे हैं. उनमें ख्यातनाम टीवी एंकर रजत शर्मा जैसे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें कोई गलती से भी विपक्ष का पैरोकार नहीं कहेगा.

ज्ञानेश कुमार आज उन हस्तियों में शुमार हैं जिन्हें उच्चतम पदों पर होने के कारण सबसे ज्यादा संवैधानिक सुरक्षा हासिल है. उन्हें उनके पद से कोई भी नहीं हटा सकता. 2023 में बनाए गए नए कानून के मुताबिक CEC के रूप में किए गए उनके किसी कार्य के लिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. विपक्ष धमकी तो दे सकता है, लेकिन उन पर महाभियोग लगाकर उन्हें हटाने का बहुमत उसके पास नहीं है. अगर सरकार उन्हें पद से हटने के लिए ‘राजी’ करवाती है तो इसके बड़े राजनीतिक नतीजे निकल सकते हैं क्योंकि कई चुनाव होने वाले हैं और 2029 की गर्मियों में महाचुनाव होने वाला है. वे 26 जनवरी 2029 तक, अपना कार्यकाल पूरा होने तक पद पर बने रह सकते हैं. यानी 27 महीने का लंबा समय है. सो, ‘सिस्टम’ उस पेंच में फंस गया है जिस बहुचर्चित पेंच में शेक्सपियर के एक नाटक की पात्र लेडी मैकबेथ फंस गई थी.

मोदी सरकार के लिए यह नौबत ऐसे मोड़ पर आई है, जिसका सामना भारत में सरकारों को अपने कार्यकाल के तीसरे साल में करना पड़ता रहा है और जो आमतौर पर उनके लिए कठिनाई भरा साबित होता रहा है. साठ साल पहले, जनवरी 1966 में जब इंदिरा युग की शुरुआत हुई थी, तब से देखें तो हर सरकार अपने कार्यकाल के तीसरे साल में थकती-भटकती दिखी है. जो अपनी राजनीति और सरकार में नयापन ला सके, वही इस जाल में फंसने से बच सके.

इंदिरा गांधी ने 1969 में अपनी पार्टी को तोड़कर, वामपंथ की ओर मुड़कर और CPI के रूप में अपना वैचारिक सहयोगी तलाश करके यह किया. 1971 में वे विशाल बहुमत हासिल करने में सफल रहीं, लेकिन 1974 आते-आते पतन की राह पर चल पड़ीं. 1980 में वापसी के बाद भी, 1983 में उनकी सरकार दिशाहीन हो गई. उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी भारी बहुमत से चुनाव सिर्फ इसलिए जीते क्योंकि इंदिरा गांधी ने ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ करके देश में और खासतौर से हिंदी पट्टी में एक राष्ट्रवादी भावना जगा दी थी. 545 सीटों वाली लोकसभा की 415 सीटें जीतने के बावजूद राजीव 1987 आते-आते दिशा भटक बैठे और फिर कभी उबरे नहीं. पी.वी. नरसिंहराव के साथ भी यही हुआ. 1991 में आर्थिक सुधारों के साथ उन्होंने उत्साहवर्द्धक शुरुआत की, लेकिन 1993 में उनकी सरकार ‘अयोध्या कांड’ और अर्जुन सिंह की ‘सेकुलर’ बगावत के कारण पंगु होकर घिसटने लगी.

सवाल यह है कि मोदी अपने पहले दो कार्यकाल में इस तीसरे साल वाली ठोकर से कैसे बचे? पहले कार्यकाल में तो नोटबंदी, उरी/सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा/बालाकोट ने लहर को उलट दिया. दूसरे कार्यकाल में उन्हें ऐसा नाटकीय मौका नहीं मिला, और अंततः 2024 में वे स्पष्ट बहुमत पाने से वंचित हो गए. अब उनके तीसरे कार्यकाल का यह तीसरा साल है.

फिलहाल जबकि एशियाई खेल चल रहे हैं, हम अपने प्रिय खेल फुटबॉल या हॉकी का उदाहरण लें, तो कह सकते हैं कि इनमें जो कोच होते हैं उन्हें पता होता है कि टीम में नये खिलाड़ियों को कब शामिल करना है. अच्छे-से-अच्छे खिलाड़ी भी थकते हैं, और उनकी जगह दूसरे खिलाड़ियों को उतारना पड़ता है. इसी तरह, थकी हुई सरकारें मंत्रिमंडल में फेरबदल करती रहती हैं ताकि नया खून आ सके, सरकार के बारे में खबरों की सुर्खियां बदलें. वर्तमान मोदी सरकार लंबे समय से एक जैसी बनी हुई है.

इस सरकार के सामने बाहर से भी और भीतर से भी चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है. अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो रही है लेकिन रोजगार और वेतन में वृद्धि नहीं हो रही है. कई कमजोर मुख्यमंत्री दिशाहीन हो रहे हैं. जिन नए ‘घोड़ों’— सेमीकंडक्टर, निजी क्षेत्र में रक्षा उत्पादन, और अति महत्वपूर्ण खनिजों— पर दांव लगाया जा रहा है उन्हें लंबी दौड़ लगानी पड़ेगी.

अंतरराष्ट्रीय मामलों में डॉनल्ड ट्रंप, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन जबकि महाशक्तियों वाला आपसी तालमेल बैठा चुके हैं, तो भारत के सामने गहरे चक्रव्यूह से गुजरने की चुनौती है. गौर कीजिए, अमेरिका साफ संकेत दे रहा है कि इस साल वह ‘जी-20’ शिखर सम्मेलन के मेजबान के रूप में पुतिन को निमंत्रित करने जा रहा है. यह यूरोप और कनाडा की तरह भारत के लिए भी नए अवसरों के दरवाजे खोल सकता है. लेकिन इन तीनों सुपरपावर्स पर बड़ी निर्भरता के कारण जटिलताएं भी पैदा हो सकती हैं.

इसके अलावा, देश में कई चुनाव होने हैं. अगले साल उत्तर प्रदेश में पहले, फिर पंजाब तथा गुजरात में चुनाव होने हैं. इसके बाद हवा का रुख बताने वाले चुनाव कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होंगे. ये बड़े राज्य हैं. और ये चुनाव चोट खाए चुनाव आयोग की देखरेख में होंगे, जिनकी कहानी विपक्ष लिख सकता है. अगर वह किसी राज्य में जीत जाता है तब यही दावा करेगा कि मोदी सरकार अब जाने ही वाली है. और अगर वह चुनाव हार गया तब यही कहेगा कि वोट चोरी की गई.

मोदी के लिए राजनीतिक दृष्टि से सकारात्मक बात यह है कि उन्हें कोई आंतरिक चुनौती नहीं मिल रही है. उनकी पार्टी, उनके सहयोगी, उनका मंत्रिमंडल एकजुट है. जैसा कि पहले भी लिख चुका हूं, लोग हसरतें भले पाल रहे हों, मगर कोई विरोधी फुसफुसाहट भी नहीं उभरेगी.

BJP के अंदर जिन तीन-चार लोगों को अपने भविष्य की चिंता होगी उन्हें मालूम है कि वे अपने बूते पार्टी को 2029 में जीत नहीं दिला सकते. चौथी बार सत्ता में आने के लिए उन्हें मोदी की ही जरूरत पड़ेगी. याद कीजिए, 2003 में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, प्रमोद महाजन की क्या स्थिति थी. वे सब यही चाहते थे कि उनके लिए वाजपेयी 2004 का चुनाव जिता दें. आज जो हालात हैं उनके कारण पार्टी के वरिष्ठ नेता मोदी का कहीं ज्यादा समर्थन करेंगे.

मोदी को ही ज्यादा अच्छी तरह मालूम होगा कि अपने तीसरे कार्यकाल के तीसरे साल में उभरे संकट से वे कैसे निबटेंगे. क्या बदलाव करने होंगे, काम करने वालों में फेरबदल करना होगा या नए विचार और नई योजनाएं लानी होंगी, क्या करना होगा यह मोदी ही जानते होंगे. लेकिन पहली प्राथमिकता तो भारत की सबसे मूल्यवान संस्था के रूप में चुनाव आयोग की साख को बहाल करना ही हो सकती है.

भारत के 145 करोड़ लोग भारतीय लोकतंत्र की जिस खासियत को सबसे मूल्यवान मानते हैं वह है— स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव, बेशक दशक-दर-दशक नेता आते-जाते रहे, विचारधाराएं आती-जाती रहीं. जैसा कि राहुल गांधी ने भी माना है, हमारा लोकतंत्र दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा साझा लोकहित साधता है. अगर ऐसा है, और चुनाव प्रक्रिया अगर इसकी आत्मा है तो इसकी रक्षा किसे करनी चाहिए? यह काम पार्टी प्रवक्ताओं के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता.

मोदी सरकार और चुनाव आयोग के नजरिए से आदर्श स्थिति तो यही हो सकती थी कि तीनों चुनाव आयुक्त साथ बैठकर सवालों के जवाब देते, कैमरे के सामने मुस्कराते हुए पूरे देश से कहते— ‘ऑल इज वेल’, सब चंगा है. ऐसा नहीं हुआ है, इससे यही जाहिर होता है कि चुनौती कितनी बड़ी है. प्रधानमंत्री मोदी   बड़े गर्व से कहा करते हैं कि भारत ‘लोकतंत्र की जननी’ है. क्या वे चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता और निष्पक्षता की रक्षा के लिए पहल करने वाले सबसे उपयुक्त व्यक्ति नहीं हो सकते? क्या पता, यह उनकी सरकार और पार्टी को भी कार्यकाल के तीसरे साल में उभरने वाली शिथिलता, सुस्ती से उबार ले! लीक से हटकर उठाए जाने वाले कदम भी कभी-कभी राजनीति में कारगर साबित हो जाते हैं.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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