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Saturday, 26 September, 2026
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समुद्र की गहराई में युद्ध का नया दौर: ब्रिटेन के Excalibur ने दिखाई भविष्य की झलक

13 सितंबर को, ब्रिटिश रॉयल नेवी के बिना चालक दल वाले एक्सपेरिमेंटल अंडरवॉटर व्हीकल XV एक्सकैलिबर ने अमेरिकी Mk 48 हेवीवेट टॉरपीडो लॉन्च किया. भारत भी अंडरसी ऑटोनॉमी (समुद्र के नीचे बिना इंसानी मदद के काम करने वाली तकनीक) विकसित कर रहा है.

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जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम इस हफ्ते न्यूयॉर्क में पहली बार आमने-सामने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से मिले, उसी समय लंदन ने दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ते तकनीकी रक्षा संबंधों का एक और हिस्सा सामने रखा. ब्रिटेन और अमेरिका ने AI और स्वायत्त तकनीक पर मिलकर काम करने का नया ऐलान किया. लगभग उसी समय एक ज्यादा ठोस स्वायत्त तकनीक वाले प्रयोग की खबर भी आई. ब्रिटेन के एक  uncrewed (बिना क्रू/ इंसान वाले)  पानी के अंदर चलने वाले जहाज ( UUV) ने सफलतापूर्वक एक अमेरिकी भारी टॉरपीडो लॉन्च किया.

इसका समय बिल्कुल सही था. यह परीक्षण सीधे AUKUS के तहत आता है. AUKUS ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच सुरक्षा साझेदारी है. इसके पिलर II में उन्नत तकनीकों पर लगातार ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है. इनमें AI, स्वायत्त तकनीक, क्वांटम तकनीक और खास तौर पर बिना इंसान के चलने वाले पानी के अंदर के सिस्टम शामिल हैं. मई में घोषित इसका पहला “सिग्नेचर प्रोजेक्ट” ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के UUVs के लिए ऐसे पेलोड और तकनीकों पर काम करने के लिए है, जिन्हें अलग-अलग सिस्टम में इस्तेमाल किया जा सके.

बिना इंसान के चलने वाले ड्रोन और उनके जरिए ताकतवर हथियार पहुंचाने की क्षमता हाल में सैन्य मामलों में काफी चर्चा में रही है. युद्ध के मैदान के बिल्कुल अलग-अलग छोरों पर, नौ महीने के अंतर से किए गए दो प्रयोग युद्ध के तरीके को बदल रहे हैं.

29 नवंबर 2025 को तुर्की के काला सागर तट पर सिनोप के पास Baykar के Kızılelma बिना इंसान के चलने वाले लड़ाकू ड्रोन ने अपने साथ लगे MURAD AESA रडार की मदद से जेट इंजन वाले एक लक्ष्य को खोजा और Gökdoğan (गोकदोआन) लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल से उसे नष्ट कर दिया. विमान एक देश में बनी सुरक्षित डेटा लिंक और दोस्त या दुश्मन की पहचान करने वाली प्रणाली भी इस्तेमाल कर रहा था. यह इस बात का महत्वपूर्ण प्रदर्शन था कि बिना इंसान के चलने वाला लड़ाकू विमान उन मिशनों में कितनी दूर तक जा सकता है, जिन पर अब तक सिर्फ इंसान वाले लड़ाकू विमानों का अधिकार रहा है.

फिर 13 सितंबर को इस साल यह प्रयोग पानी के अंदर हुआ.

स्कॉटलैंड के ब्रिटिश अंडरवाटर टेस्ट एंड इवैल्यूएशन सेंटर में रॉयल नेवी के प्रयोगात्मक XV Excalibur ने, जो एक बहुत बड़ा बिना इंसान के चलने वाला पानी के अंदर का वाहन यानी XLUUV है, एक अमेरिकी Mk 48 भारी टॉरपीडो लॉन्च किया. यह Project Broadsword (प्रोजेक्ट ब्रॉडस्वॉर्ड) और Trial Iron (ट्रायल आयरन) के तहत किया गया. यह पहली बार था जब किसी बिना इंसान के चलने वाले पानी के अंदर के वाहन से अमेरिका और ब्रिटेन का ऐसा लॉन्च किया गया. Mk 48 को Excalibur (एक्सकैलिबर) के अंदर मौजूद सामान्य टॉरपीडो ट्यूब से नहीं, बल्कि उसके नीचे बाहर की तरफ लगाया गया था.

Kızılelma (किज़िलेल्मा) और एक्सकैलिबर तकनीकी रूप से एक जैसे नहीं हैं. हवा में और समुद्र के नीचे युद्ध की भौतिक परिस्थितियां बहुत अलग हैं. लेकिन सोच के स्तर पर दोनों एक ही बदलाव का हिस्सा हैं.

कई दशकों तक ड्रोन मुख्य रूप से सेनाओं की आंख और कान थे. वे निगरानी करते थे, नक्शे बनाते थे, लक्ष्य का पता लगाते थे और उन्हें चिन्हित करते थे. इसके बाद हथियारों से लैस UAVs हमले वाले मिशनों में इस्तेमाल होने लगे. रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन तकनीक की नई सीमाएं आम हो गई हैं. अब बिना इंसान के चलने वाले सिस्टम उन सबसे मुश्किल लड़ाकू कामों की तरफ बढ़ रहे हैं, जो पहले महंगे इंसान वाले प्लेटफॉर्म, जैसे लड़ाकू विमान या पनडुब्बियों के लिए ही रखे जाते थे.

पायलट या पनडुब्बी में मौजूद इंसान गायब नहीं हुआ है, लेकिन अब हथियार चलाने वाले प्लेटफॉर्म के अंदर इंसान का बैठना जरूरी नहीं रह गया है.

गहरे समुद्र बनाम खुला आसमान

एक्सकैलिबर को सिर्फ पानी के अंदर का ड्रोन कहना इस बात को छिपा देता है कि तकनीक की यह सीमा इतनी मुश्किल क्यों है.

हवा में चलने वाला बिना इंसान का वाहन ऐसे वातावरण में काम करता है जहां इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कनेक्टिविटी काफी अच्छी होती है. वह सैटेलाइट नेविगेशन और रेडियो-फ्रीक्वेंसी डेटा लिंक का इस्तेमाल कर सकता है और प्लेटफॉर्म और परिस्थितियों के आधार पर अपने ऑपरेटरों के साथ काफी तेज संचार बनाए रख सकता है.

लेकिन समुद्र का पानी पूरा समीकरण बदल देता है. आइए देखें कि इसमें क्या दिक्कतें आती हैं.

रेडियो-फ्रीक्वेंसी वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें समुद्र के पानी में ठीक से आगे नहीं बढ़ पातीं. इसलिए पानी के अंदर ध्वनि के जरिए संचार अभी भी बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन इसमें डेटा भेजने की क्षमता सीमित होती है, देरी ज्यादा होती है और मल्टीपाथ प्रोपेगेशन, डॉप्लर प्रभाव और पर्यावरणीय दखल जैसी समस्याएं होती हैं. इतना ही नहीं, तापमान, पानी में नमक की मात्रा, गहराई, आसपास का शोर और समुद्र की तलहटी का भूगोल भी ध्वनि के वातावरण को प्रभावित करते हैं.

GPS एक और समस्या पैदा करता है. हवा में चलने वाले वाहन के उलट, सैटेलाइट नेविगेशन सिग्नल पानी के अंदर चलने वाले वाहन को लगातार सामान्य स्थिति की जानकारी नहीं दे सकते. एक्सकैलिबर ने खुद एक क्वांटम ऑप्टिकल एटॉमिक क्लॉक का परीक्षण किया है, जिसे वहां नेविगेशन की सटीकता बेहतर करने के लिए बनाया गया है जहां GPS उपलब्ध नहीं है.

लंबी और तकनीकी कहानी को छोटा करें तो, एक स्वायत्त पानी के अंदर चलने वाले वाहन को एक साथ कई समस्याएं हल करनी पड़ती हैं. उसे बिना लगातार सतह पर आए अपनी जगह का पता लगाना होता है. उसे अपने सेंसर जो देख रहे हैं, उन्हें समझना होता है. उसे रास्ते में आने वाली रुकावटों से बचकर चलना होता है. उसे लंबे मिशन के लिए पर्याप्त ऊर्जा बचाकर रखनी होती है. उसे अपनी छिपी हुई मौजूदगी को उजागर किए बिना संचार करना होता है. और उसे ऐसे समय में भी काम करते रहना होता है जब इंसानी ऑपरेटरों से संपर्क कभी-कभी रुक सकता है या पूरी तरह टूट सकता है.

इसीलिए पानी के अंदर की स्वायत्त तकनीक सिर्फ हवाई ड्रोन की तकनीक को एक वाटरप्रूफ सिलेंडर के अंदर डाल देना नहीं है.

एक्सकैलिबर खुद ब्रिटेन के Project Cetus (प्रोजेक्ट सेटस) से निकला है. इसे MSubs ने UK Submarine Delivery Agency (यूके पनडुब्बी आपूर्ति एजेंसी) के साथ मिलकर तीन साल से भी कम समय में विकसित किया. करीब 12 मीटर लंबा और 19 टन का यह वाहन अब तक रॉयल नेवी द्वारा परीक्षण किया गया सबसे बड़ा बिना इंसान का पानी के अंदर चलने वाला वाहन है. यह एक प्रयोगात्मक प्लेटफॉर्म है, न कि ब्रिटेन की परमाणु पनडुब्बियों की जगह लेने वाला ऑपरेशनल सिस्टम. इसे स्वायत्त तकनीक, पेलोड और भविष्य के पानी के अंदर के मिशनों का परीक्षण करने के लिए बनाया गया है.

एक्सकैलिबर के प्रयोग में सिर्फ उसकी आगे बढ़ने की क्षमता का परीक्षण नहीं हुआ और उसने एक भारी टॉरपीडो भी ले जाया. इसे दूर से भी चलाया जा सकता है. पहले ऑस्ट्रेलिया में मौजूद एक रिमोट ऑपरेशंस सेंटर ने ब्रिटेन के पानी में इस बिना इंसान के चलने वाले पानी के अंदर के वाहन को नियंत्रित किया था. यह नेटवर्क से जुड़े युद्ध की एक और उभरती हुई विशेषता दिखाता है. ऑपरेटर, प्लेटफॉर्म और हथियार का एक ही जगह पर होना अब जरूरी नहीं है.

बिना चालक वाला, मानव-रहित और स्वायत्त

आगे बढ़ने से पहले यह बताना जरूरी है कि unmanned (बिना चालक वाला), uncrewed (मानव-रहित) और autonomous (स्वायत्त) एक ही चीज नहीं हैं. इन सिस्टमों के बारे में इस्तेमाल होने वाली भाषा कई बार जरूरत से ज्यादा ढीली होती है.

“बिना चालक वाला” अभी भी सेना में इस्तेमाल होने वाला पुराना और आम शब्द है. इसका मतलब ऐसे वाहन से है जिसमें कोई व्यक्ति मौजूद नहीं होता. अब “मानव-रहित” शब्द को ज्यादा पसंद किया जा रहा है, क्योंकि यह ज्यादा साफ तरीके से बताता है कि वाहन के अंदर कोई क्रू नहीं है. लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि उसे कौन या क्या नियंत्रित कर रहा है.

इसलिए इनमें से किसी भी शब्द को autonomous यानी स्वायत्त का समान अर्थ नहीं मानना चाहिए.

एक मानव-रहित सिस्टम को अब भी कोई इंसान दूर से चला सकता है. एक स्वायत्त सिस्टम बिना लगातार इंसानी निर्देश के खुद कुछ काम कर सकता है. जैसे रास्ता तय करना, रूट प्लान करना, रुकावटों से बचना, सेंसर से मिली जानकारी को समझना या मिशन के कुछ हिस्सों को खुद पूरा करना. यानी वह कुछ काम अपने दम पर कर सकता है.

और इनमें से किसी भी शब्द का मतलब अपने आप यह नहीं है कि सिस्टम खुद तय कर सकता है कि किसी इंसान को मारना है या नहीं.

यह अंतर तब और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है जब बिना इंसान के चलने वाला वाहन हथियार लेकर चलता है.

उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के मुताबिक, एक्सकैलिबर के प्रयोग में यह नहीं दिखाया गया कि मशीन ने खुद किसी पनडुब्बी का पीछा किया, उसे दुश्मन के रूप में पहचाना, उस पर हमला करने का फैसला किया और बिना इंसान की मंजूरी के टॉरपीडो चला दिया.

इस प्रयोग ने इससे कुछ सीमित लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण चीज दिखाई. इसने यह दिखाया कि एक अमेरिकी भारी हथियार को ब्रिटेन के एक स्वायत्त पानी के अंदर चलने वाले प्लेटफॉर्म पर ले जाने और वहां से लॉन्च करने के लिए जरूरी मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और सॉफ्टवेयर सिस्टम को एक साथ जोड़ा जा सकता है. अमेरिकी नौसेना खुद इस प्रयोग को स्वायत्त पानी के अंदर के सिस्टम में मारक क्षमता जोड़ने की दिशा में एक शुरुआती कदम बताती है.

पानी के अंदर की स्वायत्त तकनीक की उलझन

ऑस्ट्रेलिया के रक्षा विशेषज्ञ मैल्कम डेविस ने एक्सकैलिबर के परीक्षण के बाद सामने आने वाली बड़ी दुविधा को पहचाना.

उन्होंने इस प्रयोग को आगे चलकर हथियारों से लैस UUVs के ऐसे झुंडों की दिशा में पहला कदम बताया जो इंसान वाली पनडुब्बियों के साथ काम कर सकते हैं और समुद्र के नीचे के युद्धक्षेत्र में बड़ी संख्या में सिस्टम जोड़ सकते हैं. लेकिन उन्होंने तुरंत एक समस्या भी बताई. रेडियो तरंगें पानी के अंदर ठीक से नहीं चलतीं. फिर सेनाएं हथियारों से लैस UUVs को स्वायत्त तरीके से काम करते समय इंसानों को “लूप में” कैसे रख सकती हैं और यह कैसे सुनिश्चित कर सकती हैं कि जानलेवा ताकत इस्तेमाल करने के फैसले इंसान ही लेते रहें.

यही सवाल पानी के अंदर की स्वायत्त तकनीक के केंद्र में मौजूद उलझन को दिखाता है.

जिस वातावरण में मशीनों को ज्यादा स्वायत्तता की जरूरत पड़ सकती है, वही वातावरण ऐसा भी है जहां इंसानों के लिए लगातार उन पर निगरानी रखना सबसे मुश्किल है.

यहां यह फर्क महत्वपूर्ण है कि इंसान सिस्टम के अंदर है, सिस्टम पर निगरानी रख रहा है या पूरी तरह बाहर है. मैं बताती हूं कि यह क्यों जरूरी है.

जब इंसान “in the loop” होता है, तो जानलेवा कार्रवाई से पहले उसके पास सीधे फैसला लेने का एक मौका रहता है. जब इंसान “on the loop” होता है, तो वह ऐसे स्वायत्त सिस्टम की निगरानी करता है जो खुद कई महत्वपूर्ण काम कर सकता है, लेकिन इंसान के पास उसे रोकने, उसकी सीमा तय करने या उसका काम बदलने की कुछ क्षमता रहती है. इंसान को “out of the loop” कर देने पर एक बिल्कुल अलग और गंभीर सवाल खड़ा होता है. क्या किसी मशीन को इंसान के किसी सार्थक हस्तक्षेप के बिना खुद लक्ष्य चुनने और उस पर हमला करने की अनुमति दी जानी चाहिए.

डेविस की बात इससे भी आगे जाती है और राजनीतिक भी है. उनका मानना है कि उदार लोकतांत्रिक देश स्वेच्छा से इस आखिरी सीमा को पार नहीं करेंगे.

लेकिन पानी के अंदर की भौतिक परिस्थितियां बीच का रास्ता बेहद मुश्किल बना देती हैं. किसी हथियार से लैस प्लेटफॉर्म के साथ इंसान जितनी कम भरोसेमंद तरीके से संपर्क कर पाते हैं, उस प्लेटफॉर्म को सिर्फ सैन्य रूप से उपयोगी बने रहने के लिए उतनी ही ज्यादा स्वायत्तता की जरूरत पड़ सकती है.

फर्क समझने के लिए किज़िलेल्मा को देखें. यह हवा में ऐसे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वातावरण में काम कर सकता है जहां रडार, पहचान प्रणाली, डेटा लिंक और इंसानी कमांड अपेक्षाकृत तेजी से एक-दूसरे के साथ काम कर सकते हैं.

एक्सकैलिबर इस इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सीमा के नीचे गायब हो जाता है.

इसलिए दोनों विकास एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं, लेकिन उनके सामने कमांड से जुड़ी समस्याएं बहुत अलग हैं.

मॉड्यूलर सिस्टम और बड़ी संख्या

एक्सकैलिबर के प्रयोग पर ध्यान देने की एक और वजह है.

प्रोजेक्ट ब्रॉडस्वॉर्ड को फरवरी 2026 में अमेरिकी नौसेना विभाग का रैपिड कैपेबिलिटीज़ ऑफ़िस ने मंजूरी दी थी. इसके सात महीने से भी कम समय बाद Mk 48 को लॉन्च किया जा सका.

यह उपलब्धि सिर्फ एक बड़ी रोबोटिक पनडुब्बी के नीचे टॉरपीडो लगाने की नहीं थी. अमेरिकी और ब्रिटिश इंजीनियरों को यह सुनिश्चित करना पड़ा कि एक अमेरिकी हथियार ब्रिटेन के स्वायत्त वाहन के साथ काम करे. इसके लिए मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और सॉफ्टवेयर इंटरफेस को एक-दूसरे के साथ अनुकूल बनाना पड़ा.

यह सैन्य तकनीक में एक और बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है. इसे मॉड्यूलरिटी कहा जा सकता है.

आधुनिक रक्षा उद्योग के ज्यादातर दौर में एक पनडुब्बी, उसके सेंसर, कॉम्बैट-मैनेजमेंट सिस्टम और हथियारों को एक साथ जुड़े हुए बेहद उन्नत प्लेटफॉर्म के हिस्सों के रूप में बनाया जाता था. एक हिस्से में बदलाव करने के लिए कई साल तक नए डिजाइन, टेस्ट और मंजूरी की जरूरत पड़ सकती थी. यह बहुत जटिल प्रक्रिया थी.

AUKUS Pillar II कुछ अलग चीज का प्रयोग कर रहा है. इसमें ऐसे कॉमन इंटरफेस, मॉड्यूलर पेलोड और सॉफ्टवेयर-डिफाइंड आर्किटेक्चर बनाने की कोशिश हो रही है, जिससे एक सहयोगी देश की बनाई टेक्नोलॉजी दूसरे सहयोगी देश के प्लेटफॉर्म पर काम कर सके.

इसके पहले सिग्नेचर पिलर II प्रोजोक्ट का मकसद ऐसे पेलोड और जरूरी तकनीक विकसित करना है जो आगे चलकर ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के UUVs पर काम कर सकें. जिन मिशनों पर विचार किया जा रहा है उनमें ISR, पनडुब्बियों और सतह के जहाजों के खिलाफ युद्ध, माइन वॉरफेयर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, लॉजिस्टिक्स, हमला और समुद्र की तलहटी पर मौजूद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा शामिल है.

यह सिर्फ इंटरऑपरेबिलिटी से एक कदम आगे है. इंटरऑपरेबिलिटी का मतलब है कि सहयोगी देश मिलकर युद्ध कर सकें. इसके आगे इंटरचेंजेबिलिटी आती है. इसका मतलब है कि एक देश का हथियार, दूसरे देश का प्लेटफॉर्म और किसी तीसरे देश के सेंसर या सॉफ्टवेयर एक ही युद्धक कार्रवाई या सिस्टम का हिस्सा बन सकते हैं.

इससे दोनों प्रयोग फिर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं.

एक पारंपरिक लड़ाकू विमान में पायलट, रडार, संचार, इंजन और हथियार सभी एक ही विमान के अंदर होते थे. इसी तरह एक पनडुब्बी में नाविक, सोनार, कमांड सिस्टम, इंजन और टॉरपीडो एक ही ढांचे के अंदर होते थे.

नेटवर्क से जुड़े युद्ध में इन कामों को अलग-अलग जगहों पर बांटा जा सकता है. एक सेंसर किसी चीज का पता लगाता है, दूसरा प्लेटफॉर्म उसकी पहचान कर सकता है, नेटवर्क जितनी जानकारी भेज सकता है उतनी भेजता है, एल्गोरिदम उस जानकारी को प्रोसेस करते हैं, किसी दूसरी जगह मौजूद इंसान निगरानी करता है या मंजूरी देता है और आखिर में बिना इंसान का प्लेटफॉर्म हथियार लेकर जाता है.

इसलिए तकनीकी क्रांति सिर्फ यह नहीं है कि “ड्रोन हर जगह पहुंच रहे हैं”. असली बदलाव यह है कि सेंसर, हथियार चलाने वाला सिस्टम और इंसान धीरे-धीरे एक नेटवर्क के अंदर अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे हैं.

और पानी के अंदर इसका असर और भी बड़ा हो सकता है, क्योंकि बिना इंसान वाले सिस्टम नौसेनाओं को ऐसी चीज दे सकते हैं जिसकी उन्हें बहुत जरूरत है. बड़ी संख्या में सिस्टम.

एक बहुत सक्षम परमाणु ऊर्जा से चलने वाली अटैक पनडुब्बी बेहद महंगी होती है, उसकी संख्या सीमित होती है और उसमें बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत होती है. एक XLUUV वह सब कुछ नहीं कर सकता जो एक SSN कर सकती है और जरूरी भी नहीं कि उसका उद्देश्य वही हो. इसके बजाय बड़ी संख्या में स्वायत्त सिस्टम कम संख्या वाली इंसान वाली पनडुब्बियों की मदद कर सकते हैं. वे निगरानी का दायरा बढ़ा सकते हैं, सेंसर ले जा सकते हैं, पेलोड तैनात कर सकते हैं, दुश्मन को भ्रमित करने वाले की तरह काम कर सकते हैं या आगे चलकर हथियार भी ले जा सकते हैं.

ऑस्ट्रेलिया का घोस्ट शार्क कार्यक्रम साफ तौर पर इंसान वाले और बिना इंसान वाले सिस्टम को साथ मिलकर काम कराने की दिशा में बढ़ रहा है. ऑस्ट्रेलिया ने घोस्ट शार्क, स्पियरटूथ और अन्य ऑटोनॉमस सिस्टम्स को नेवी के ऑपरेशंस में शामिल करने के लिए मैरीटाइम ऑटोनॉमस सिस्टम्स यूनिट भी बनाई है.

ऑस्ट्रेलिया के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्स ने हाल ही में इस सोच को अच्छी तरह समझाया. एक वर्जीनिया-क्लास पनडुब्बी तेजी से उस जगह पहुंच सकती है जहां उसकी जरूरत है. बड़ी संख्या में घोस्ट शार्क आगे चलकर बाकी उन सभी जगहों पर मौजूद हो सकते हैं जहां उनकी जरूरत है.

यह नौसैनिक ताकत का बिल्कुल अलग हिसाब है. इससे UUV के झुंडों और ऐसी saturation tactics (संतृप्ति रणनीति) का विकास हो सकता है जिनके बारे में अभी बहुत कुछ पता नहीं है.

समुद्र के नीचे युद्ध

युद्ध पहले से ही समुद्र की तलहटी तक पहुंच चुका है, क्योंकि वहां ऐसी चीजें लगातार बढ़ रही हैं जिनके लिए संघर्ष हो सकता है.

समुद्र की तलहटी किसी अर्थव्यवस्था के भौतिक और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को अपने अंदर रखती है. समुद्र के नीचे बिछी टेलीकॉम केबल्स दुनिया के महाद्वीपों के बीच होने वाले डिजिटल संचार का बहुत बड़ा हिस्सा पहुंचाती हैं. ऊर्जा पाइपलाइन, बिजली के इंटरकनेक्टर और उन्नत सैन्य सेंसर भी समुद्र की तलहटी से गुजरते हैं या वहीं मौजूद होते हैं.

IISS की एक हालिया स्टडी में दर्शना बरुआ और वीरप्रताप विक्रम सिंह ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्र के नीचे की केबल्स की इन उभरती हुई “नई भौगोलिक जगहों” का नक्शा तैयार किया है. इसमें एक दिलचस्प रणनीतिक विडंबना सामने आती है. क्लाउड कंप्यूटिंग, AI और ऐसी डिजिटल अर्थव्यवस्थाएं जिन्हें अक्सर बिना किसी वजन वाली चीज माना जाता है, वास्तव में समुद्र की तलहटी में पड़ी बेहद ठोस बुनियादी सुविधाओं पर निर्भर हैं.

इस कमजोरी पर दुनिया भर की सेनाओं का ध्यान पहले से जा रहा है.

रूस ने समुद्र की तलहटी की निगरानी और पानी के अंदर के बुनियादी ढांचे के खिलाफ कार्रवाई के लिए विशेष क्षमताएं विकसित की हैं. चीन ने गहरे समुद्र की तकनीक और बड़े बिना इंसान के चलने वाले पानी के अंदर के वाहनों में काफी निवेश किया है. अमेरिका बोइंग के ओर्का XLUUV को विकसित कर रहा है. ऑस्ट्रेलिया के पास घोस्ट शार्क है. ब्रिटेन के पास एक्सकैलिबर है.

लेकिन तकनीक की सफलता को लेकर अभी बहुत ज्यादा उत्साहित होना जल्दबाजी होगी.

अमेरिका का ओर्का कार्यक्रम दिखाता है कि यह तकनीक अभी भी कितनी मुश्किल है. इसका विकास कई साल पहले शुरू हुआ था और बाद में डिजाइन, निर्माण और प्रेशर-वेसल बनाने से जुड़ी बड़ी देरी का सामना करना पड़ा. पहला प्रोटोटाइप सितंबर 2025 में ही दिया गया था. बाकी वाहनों की डिलीवरी बाद में होने की उम्मीद है.

भारत का क्या?

भारतीय नौसेना के पास मेक-I फ़्रेमवर्क के तहत पहले से ही एक XLUUV कार्यक्रम है. आधिकारिक प्रोजेक्ट दस्तावेजों में चार प्रोटोटाइप बनाने और उसके बाद 40 तक उत्पादन वाहनों का प्रावधान है. इसमें underwater-domain awareness (पानी के नीचे के क्षेत्र की जानकारी), निगरानी और हथियार पहुंचाने जैसे मिशनों की पहचान की गई है. देश में ही डिजाइन और विकास की मंजूरी अक्टूबर 2022 में दी गई थी.

नौसेना का अपना आकलन इस चुनौती के बारे में असामान्य रूप से साफ है. इसमें प्रोपल्शन, पावर, ऑटोनॉमस कंट्रोल, सेंसर, मिनिएचराइज़ेशन और हथियारों के इंटीग्रेशन जैसी अहम तकनीकी चुनौतियों की पहचान की गई है और यह माना गया है कि भारतीय इंडस्ट्री पहली बार इस तरह के XLUUV को विकसित करने की कोशिश कर रही है. कमांड, कंट्रोल और कम्युनिकेशन को भी ऐसी अहम टेक्नोलॉजी के तौर पर पहचाना गया है जिन्हें देश में ही विकसित करने की ज़रूरत है.

डीआरडीओ का अंडरवाटर-टेक्नोलॉजी रोडमैप दिखाता है कि भारत जानता है कि टेक्नोलॉजी की यह सीमा किस दिशा में जा रही है.

हिंद महासागर तेजी से डिजिटल होती अर्थव्यवस्था की केबल्स के रास्ते को अपने अंदर रखता है. चीन की नौसैनिक गतिविधियों के कारण पानी के अंदर के क्षेत्र के बारे में जागरूकता यानी underwater-domain awareness का महत्व बढ़ता जा रहा है. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी, पूरे हिंद महासागर के बड़े क्षेत्र के हिस्से के रूप में, निगरानी की इतनी बड़ी चुनौती पैदा करते हैं कि इसे हमेशा सिर्फ ज्यादा महंगे इंसान वाले जहाज और पनडुब्बियां जोड़कर हल नहीं किया जा सकता.

इसलिए भारत इस पहेली के कई हिस्सों को विकसित कर रहा है. ज्यादा असहज सवाल यह है कि वह इन सभी हिस्सों को कितनी जल्दी एक साथ जोड़ सकता है.

किज़िलेल्मा ने हमें आसमान में इस भविष्य की एक झलक दिखाई और अब Excalibur ने यह सवाल समुद्र की लहरों के नीचे पहुंचा दिया है.

समुद्र की तलहटी में युद्ध पहले से यहां है. बहुत तेजी से जो चीज बदल रही है, वह यह है कि इसे कौन या क्या लड़ेगा.

स्वस्ति राव ‘दिप्रिंट’ में कंसल्टिंग एडिटर (इंटरनेशनल और स्ट्रैटेजिक अफेयर्स) हैं. वह @swasrao पर ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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