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Saturday, 26 September, 2026
होमइंडियन लिबरल्स मैटर‘घाटे की वित्त व्यवस्था’ से बढ़ी महंगाई, कृषि उत्पादन बढ़ाए बिना आर्थिक विकास संभव नहीं: जी. एन. लवांडे

‘घाटे की वित्त व्यवस्था’ से बढ़ी महंगाई, कृषि उत्पादन बढ़ाए बिना आर्थिक विकास संभव नहीं: जी. एन. लवांडे

1960 के इस लेख में कहा गया है कि सरकार महंगाई के लक्षणों पर बात करने के बजाय अपने बढ़ते और अनुत्पादक खर्च पर लगाम लगाए, कृषि उत्पादन बढ़ाना जरूरी.

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नौ वर्षों की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के बावजूद हमारे शासक मुद्रास्फीति की समस्या से निपटने में विफल रहे हैं. इसके विपरीत, दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान मुद्रास्फीति का दबाव बहुत बढ़ गया है और प्रस्तावित घाटे की वित्त व्यवस्था को देखते हुए तीसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान इसके और बढ़ने की आशंका है. आज हम जिस मुद्रास्फीति का सामना कर रहे हैं, वह युद्ध के दौरान अपनाई गई सरकारी नीतियों और युद्ध के कारण पैदा हुई कुछ अन्य परिस्थितियों का अनिवार्य परिणाम है.

मुद्रास्फीति को बढ़ावा देने का मुख्य कारण सरकार की राजकोषीय नीति रही है. युद्ध के बाद के दौर में मुद्रास्फीति को ऐसी स्थिति के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें बचत की तुलना में निवेश अधिक हो गया. आज देश में मुद्रा की आपूर्ति में किसी भी महत्वपूर्ण वृद्धि के दो प्रमुख स्रोत हैं. पहला और सबसे महत्वपूर्ण है केंद्र और राज्य सरकारों के खर्च की घाटे की वित्त व्यवस्था. इससे रिज़र्व बैंक के प्रति सरकार की प्रत्यक्ष देनदारी बढ़ती है. इसका एक बड़ा हिस्सा समय-समय पर ट्रेजरी बिलों के माध्यम से बैंक के इश्यू विभाग में जमा की गई एड हॉक प्रतिभूतियों में बदल दिया जाता है और उसके बदले उतनी ही राशि के मुद्रा नोट जारी किए जाते हैं. दूसरा स्रोत है सरकारी ऋणों का वह हिस्सा जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक अपने पास रखता है, साथ ही बैंक द्वारा खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की की गई खरीद.

इसके बाद वाणिज्यिक बैंकों की मांग देनदारियों तथा उनके ऋण और अग्रिमों में भी वृद्धि होती है. इस पूरी प्रक्रिया की बुनियाद भारत की सभी सरकारों द्वारा किया जाने वाला अत्यधिक खर्च है. कुल मिलाकर यह खर्च अर्थव्यवस्था की उस क्षमता से कहीं अधिक है जिसे वह मौजूदा कर-क्षमता या उपलब्ध वर्तमान बचत के आधार पर वहन कर सकती है. दूसरे शब्दों में, स्थिर कीमत स्तर पर उपलब्ध वास्तविक संसाधनों की तुलना में सरकारी खर्च बहुत अधिक है. इससे स्पष्ट है कि सरकारी खर्च का एक बड़ा हिस्सा नई मुद्रा के सृजन से पूरा किया जा रहा है.

सरकार ने मुद्रास्फीति के मूल कारण—घाटे की वित्त व्यवस्था से समर्थित अपनी फिजूलखर्ची पर प्रहार करने की बहुत कम इच्छा दिखाई है. इसके बजाय वह केवल इसके लक्षणों के खिलाफ बोलती रहती है. वह कहती है कि किसानों और उत्पादकों को अपना माल बाजार में रोककर नहीं रखना चाहिए, उपभोक्ताओं को खरीदारी कम करनी चाहिए और कर्मचारियों को वेतन बढ़ाने की अपनी मांगों में संयम बरतना चाहिए. इसके साथ ही निर्माताओं से “कीमतों को स्थिर रखने” की अपील की जाती है और बिचौलियों पर जमाखोरी, मुनाफाखोरी और कालाबाजारी के आरोप लगाए जाते हैं. वास्तव में मुद्रास्फीति इतनी गंभीर हो चुकी है कि लोग लगातार बढ़ती कीमतों से बचने के लिए अपने धन को दूसरी चीजों में लगाने को समझदारी मानने लगे हैं. यदि सरकार इसी गति से अर्थव्यवस्था में नई मुद्रा डालती रही, तो संभव है कि हम तेज़ी से बढ़ती मुद्रास्फीति की उस स्थिति तक पहुंच जाएं, जब लोग खुले तौर पर मुद्रा से छुटकारा पाने लगें.

घाटे की वित्त व्यवस्था और कीमतों को एक सीमा पर बनाए रखने की कोशिश एक ओर, तथा वास्तविक आय और वास्तविक बचत दूसरी ओर—दोनों साथ-साथ चलते हैं, लेकिन विपरीत दिशाओं में. यही मुद्रास्फीति की समस्या का मूल है. मुद्रास्फीति और जनसंख्या वृद्धि, दोनों ही योजनाबद्ध आर्थिक विकास की बाधाएं हैं, लेकिन इनमें मुद्रास्फीति बड़ी बाधा है क्योंकि स्वयं योजना-व्यवस्था के माध्यम से, विशेषकर साम्यवादी या केंद्रीकृत योजना के जरिए, इसे पैदा करना आसान है. जीवन स्तर बढ़ने के साथ जनसंख्या वृद्धि की दर कम हो सकती है, लेकिन घाटे की वित्त व्यवस्था के माध्यम से जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में अधिक पैसा डाला जाता है, मुद्रास्फीति पैदा होती है.

केंद्रीकृत योजना की एक स्वाभाविक कमी यह है कि वह पूरे परिदृश्य को बहुत बड़ा बना देती है और कई विकास योजनाओं की लागत बढ़ा देती है, जबकि स्थानीय पहल और उद्यम के माध्यम से उन्हें कहीं कम खर्च में पूरा किया जा सकता है. भारत जैसे विशाल देश में लाखों किसान और अन्य लोग अपने खाली समय का उपयोग करके उत्पादन में जो छोटे-छोटे योगदान दे सकते हैं, वे मिलकर राष्ट्रीय आय में बड़ी वृद्धि कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, मिश्रित खेती को प्रोत्साहित करके हर छोटे किसान को मुख्य फसल के साथ-साथ दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन और रसोई-बागवानी करने का अवसर दिया जाए, तो किसान की आय में काफी वृद्धि हो सकती है. इसके लिए प्रति व्यक्ति उतना खर्च भी नहीं होगा जितना विभिन्न कृषि और सिंचाई परियोजनाओं में प्रस्तावित है.

यह तभी संभव होगा जब राज्य अपने संसाधनों का गंभीरता से सर्वेक्षण करें और उद्योगों के विकास के लिए जिला-स्तर की योजनाएं तैयार करें. अधिक विकेंद्रीकृत योजना और स्थानीय पहल के साथ संसाधनों की समस्या को हर स्तर पर अधिक आसानी से संभाला जा सकेगा, जबकि अखिल भारतीय स्तर की योजना कुछ निश्चित उद्देश्यों तक सीमित रह सकती है. जब तक यह बुनियादी बदलाव हमारी योजना-व्यवस्था के दृष्टिकोण और दिशा में नहीं आता, तब तक हमारी योजनाएं पिछले दस वर्षों की तरह मुद्रास्फीति, क्षेत्रीय असंतुलन और बढ़ती बेरोजगारी जैसी समस्याएं पैदा करती रहेंगी.

विचारधारा से प्रेरित कृषि सुधारों को उत्पादन बढ़ाने की सर्वोच्च आवश्यकता के अधीन रखना होगा. प्रशासन तथा सार्वजनिक उपक्रमों के निर्माण, संचालन और प्रबंधन में मितव्ययिता भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है, जिसे अतीत में नजरअंदाज किया गया है. विकास के दिखाई देने वाले मापदंड के रूप में मौद्रिक खर्च को अधिक महत्व देकर योजना आयोग ने अनजाने में ऐसे सार्वजनिक खर्च को बढ़ावा दिया है, जिसका अपेक्षित परिणामों से कोई संबंध नहीं था. जब राष्ट्रीय स्तर पर होने वाला अनुत्पादक खर्च कई करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है, तो वह मुद्रास्फीति को बढ़ाने वाली ताकत बन जाता है.

देश के तेज़ आर्थिक विकास के लिए कीमतों के स्तर को स्थिर रखना अनिवार्य है. मुद्रास्फीति-विरोधी नीतियां आर्थिक विकास को बढ़ावा देती हैं, क्योंकि जब लोगों को विश्वास होता है कि आज भविष्य के लिए बचाया गया प्रत्येक नया पैसा कल की बढ़ती कीमतों के कारण अपनी कीमत नहीं खोएगा, तो वे अधिक बचत करने के लिए तैयार होते हैं. आज आवश्यकता अधिक उत्पादन की है. जब तक उत्पादन नहीं बढ़ेगा, तब तक आर्थिक प्रगति की सारी बातें महज़ मज़ाक बनकर रह जाएंगी.

भारत में राष्ट्रीय आय का 50 प्रतिशत कृषि से आता है और कृषि कीमतों की स्थिरता ही सामान्य कीमत स्तर की स्थिरता की कुंजी है. मुद्रास्फीति से लड़ने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है. यह सहकारी खेती और खाद्यान्नों के राज्य व्यापार से नहीं, बल्कि किसानों को आधुनिक और वैज्ञानिक उत्पादन विधियों को अपनाने के लिए हर संभव प्रोत्साहन देकर किया जा सकता है. उपभोक्ता की दृष्टि से खाद्यान्नों की कीमत उसके कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा होती है. औद्योगिक वस्तुओं की कीमतों को तभी स्थिर रखा जा सकता है जब कच्चे माल और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव न हो.

अब तक सरकारी नीति इस समस्या से निपटने में विफल रही है और खाद्य पदार्थों तथा कच्चे माल की कीमतों में अनुचित वृद्धि के दूरगामी सामाजिक प्रभाव पड़े हैं. तीसरी पंचवर्षीय योजना की सफलता काफी हद तक कीमतों के स्थिर स्तर पर निर्भर करेगी. फिलहाल हम अमेरिका से खाद्य पदार्थों के आयात पर अधिक से अधिक निर्भर होते जा रहे हैं और हमारे खाद्य मंत्री ने अगले चार वर्षों की कमी को पूरा करने के लिए हाल ही में 1.7 करोड़ टन खाद्यान्न की व्यवस्था की है.

नए समझौते के तहत मिलने वाला गेहूं खाद्य और सामान्य आर्थिक स्थिति को स्थिर करने तथा तीसरी योजना के दबावों और कठिनाइयों का सामना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. इससे भारत सरकार को कृषि उत्पादन बढ़ाने के कार्यक्रमों पर अधिक ध्यान देने का अवसर भी मिलेगा और बार-बार पैदा होने वाली खाद्य कमी से निपटने की समस्या से कुछ राहत मिलेगी.

बफर स्टॉक बनाने से कीमतों को एक सीमा में बनाए रखने में मदद मिल सकती है और कीमतों को नियंत्रित करने या जमाखोरी तथा मुनाफाखोरी से निपटने के लिए भौतिक नियंत्रण और राज्य व्यापार जैसे उपायों की आवश्यकता कम हो सकती है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि इस सहायता का उचित उपयोग किया जाए और तीसरी पंचवर्षीय योजना के अंत तक कृषि उत्पादन इतनी तेजी से बढ़ाया जाए कि आयात पर निर्भरता की आवश्यकता न रहे. आयातित अनाज से बनाया गया भंडार देश के उन क्षेत्रों से खरीद की आवश्यकता को समाप्त नहीं करेगा जहां उत्पादन अधिक है. हालांकि, आंतरिक खरीद और बिक्री की नीति व्यावहारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तय करनी होगी.

जो लोग खाद्यान्नों के पूरे थोक व्यापार को राज्य के हाथ में देने की मांग करते रहे हैं, उन्होंने न तो इस काम के विशाल आकार को समझा है और न ही इससे जुड़े जोखिमों और लागत को. उपभोक्ता या उत्पादक के हितों की रक्षा के लिए भी ऐसा कदम आवश्यक नहीं है. जब तक खाद्यान्न का व्यापार प्रतिस्पर्धी बना रहता है और राज्य जरूरत से अधिक बढ़ती कीमतों के समय भंडार से खरीद या बिक्री करके बाजार कीमतों को प्रभावित कर सकता है, तब तक उपभोक्ता और समाज—दोनों के हित में यही होगा कि मुक्त बाजार को काम करने दिया जाए और राज्य की भूमिका सीमित हस्तक्षेप तक रहे.

यह भी याद रखना चाहिए कि केवल खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता. जब तक सार्वजनिक और निजी वित्त के पूरे क्षेत्र में मुद्रास्फीतिकारी शक्तियों पर नियंत्रण नहीं किया जाता, तब तक अनिवार्य खरीद और दूसरी ओर कठोर राशनिंग जैसे उपायों के अलावा अपनाए जाने वाले कोई भी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे. इसका अर्थ केवल घाटे की वित्त व्यवस्था पर कड़ा नियंत्रण ही नहीं, बल्कि हर तरह के अनुत्पादक खर्च को पूरी तरह समाप्त करना भी है—चाहे वह जरूरत से अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति हो या महंगी इमारतों का निर्माण.

यदि विकास पर खर्च किए गए प्रत्येक रुपये से वस्तुओं या सेवाओं के रूप में समाज को पर्याप्त उत्पादक लाभ मिले, तो कीमतों को स्थिर करना उतना कठिन नहीं होता जितना पिछले पांच वर्षों में रहा है. मुद्रास्फीतिकारी दबावों को रोकने के लिए व्यापक स्तर पर लागू होने वाली एक सुसंगत नीति की आवश्यकता है. लेकिन राज्य व्यापार जैसे नारों पर ध्यान केंद्रित करने की प्रवृत्ति इस व्यापक समाधान को दूर, और शायद असंभव, बना देती है.

मुद्रास्फीति से लड़ने और लोगों की वास्तविक बचत बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए. इससे ही सरकार स्थिर कीमत स्तर बनाए रख सकेगी और इसके बिना देश की आर्थिक प्रगति बहुत धीमी हो जाएगी. निवेश ऐसी परियोजनाओं में होना चाहिए, जिनमें उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन वाली वे परियोजनाएं भी शामिल हों जिन्हें पूरा होने में कम समय लगता है. इन परियोजनाओं में उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो योजना के मूल आधार हैं—भोजन, ईंधन, परिवहन और बिजली.

मुद्रास्फीति ने हमारी अर्थव्यवस्था को पहले ही गंभीर रूप से विकृत कर दिया है और कम आय वाले लाखों लोगों की बचत के वास्तविक मूल्य को दस वर्ष पहले के मूल्य का केवल एक छोटा हिस्सा बना दिया है. यह प्रक्रिया बिना अर्थव्यवस्था को कमजोर किए अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रह सकती.

कीमतों को स्थिर करने का हमारा लक्ष्य साम्यवादी तरीकों से नहीं, बल्कि जापान, फ्रांस और पश्चिम जर्मनी द्वारा अपनाए गए तरीकों से हासिल किया जा सकता है. इन देशों ने सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था के बजाय मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था अपनाकर अपनी आर्थिक समस्याओं का समाधान किया. इसके परिणामस्वरूप वे तेजी से औद्योगिकीकरण करने, लोगों का जीवन स्तर बढ़ाने और एक स्थिर तथा मजबूत मुद्रा स्थापित करने में सफल हुए.

दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान बढ़े मुद्रास्फीतिकारी दबावों के कारण मध्यम वर्ग लगभग समाप्त हो गया है. युद्ध के बाद के दौर में सत्तारूढ़ दल द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीति निश्चित रूप से देश के आर्थिक विकास के लिए नुकसानदेह है. इसने स्थिति को और खराब किया है और तीसरी पंचवर्षीय योजना में प्रस्तावित घाटे की वित्त व्यवस्था मुद्रास्फीति के दबाव को और बढ़ाएगी. यदि समय रहते आर्थिक नीति में बदलाव नहीं किया गया, तो योजनाएँ देश को समृद्धि के बजाय दिवालियापन की ओर ले जाएंगी.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “मुद्रास्फीति और पंचवर्षीय योजनाएं” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से मई 1960 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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