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Saturday, 8 August, 2026
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असली लोकतंत्र सिर्फ मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था के ज़रिए ही हासिल किया जा सकता है: जी. एन. लवांडे

जी. एन. लवांडे ने 1959 में लिखा था कि अगर हमारा लक्ष्य देश का तेज़ी से आर्थिक विकास करना है, तो प्रत्यक्ष करों को कम करने की ज़रूरत है.

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हाल के वर्षों में अविकसित देशों के आर्थिक विकास का प्रश्न विशेष ध्यान का विषय बना है. इस विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष एक उचित राजकोषीय नीति का अनुसरण करना है. दुर्भाग्य से इस पक्ष को उतना महत्त्व नहीं दिया गया, जितना दिया जाना चाहिए था. हमारी वर्तमान राजकोषीय नीति वैचारिक आग्रहों और भावनात्मक पूर्वाग्रहों पर आधारित है. जब तक इनसे छुटकारा नहीं पाया जाएगा, तब तक नियोजन के माध्यम से आर्थिक विकास का लक्ष्य हासिल करना कठिन रहेगा.

हमारी योजना

पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में हमारी राष्ट्रीय सरकार ने देश के तीव्र आर्थिक विकास के लिए राज्य-नियोजन को अपनाया है. उनका मानना है कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने का नियोजन के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है. यदि पिछले आठ वर्षों से लागू योजनाओं और उनके परिणामों का परीक्षण करें, तो यह स्पष्ट होता है कि नियोजन समृद्धि का मार्ग बनने के बजाय निम्न और मध्यम वर्ग के लिए निर्धनता का मार्ग बन गया है. सरकारी हलकों में यह माना जाता है कि प्रथम पंचवर्षीय योजना समाप्त हो चुकी है और वह अत्यंत सफल रही. किंतु वास्तविकता यह है कि केवल योजना की अवधि समाप्त हुई है, उसके लक्ष्य नहीं. अब तक हम उन उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सके हैं जिनके लिए योजना बनाई गई थी—जैसे जनता के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना और रोजगार के अवसर बढ़ाना.

मंत्रीगण अपने भाषणों में प्रथम पंचवर्षीय योजना की भरपूर प्रशंसा करते हैं, लेकिन जब जनता उनसे यह सरल प्रश्न पूछती है कि पंचवर्षीय योजनाएँ अपेक्षित सफलता क्यों नहीं प्राप्त कर सकीं, तो उत्तर मिलता है कि जनसंख्या बढ़ गई. यह तर्क निराधार है. क्या योजनाकारों को पहले से यह ज्ञात नहीं था कि जनसंख्या बढ़ेगी? यदि यह तथ्य पहले से स्पष्ट था, तो योजनाएं उसी को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए थीं.

दूसरी बात यह है कि आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा जनसंख्या वृद्धि नहीं, बल्कि सरकार द्वारा अपनाई गई त्रुटिपूर्ण राजकोषीय नीति है. इस संदर्भ में प्रोफेसर लुईस का यह कथन उल्लेखनीय है—”यह कहना सही नहीं है कि जीवन-स्तर में वृद्धि न होने का मुख्य कारण वास्तविक या संभावित जनसंख्या वृद्धि है. इन देशों में प्रति व्यक्ति उत्पादन बढ़ाने में सबसे बड़ी बाधा जनसंख्या वृद्धि नहीं, बल्कि यह है कि उनकी पूंजी निर्माण की दर लगभग पांच प्रतिशत है, जो अत्यंत कम है.” इस स्थिति के लिए मुख्य रूप से सरकार की भ्रमपूर्ण नीतियां उत्तरदायी हैं.

नियोजित व्यय

हमारी योजनाओं का प्रमुख उद्देश्य देश का तीव्र आर्थिक विकास है. इसी लक्ष्य को सामने रखकर सरकार पांच वर्षों में 4,800 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है. अर्थात् प्रति वर्ष 960 करोड़ रुपये, प्रति माह 80 करोड़ रुपये, और प्रतिदिन लगभग 2⅔ करोड़ रुपये. देश की वर्तमान जनसंख्या 37 करोड़ है. इस प्रकार प्रतिदिन 2⅔ करोड़ रुपये का व्यय, औसतन पंद्रह व्यक्तियों पर एक रुपये, या प्रति व्यक्ति प्रतिदिन एक आना खर्च करने के बराबर है. इसी एक आने के व्यय से कृषि, उद्योग, परिवहन, सामाजिक सेवाओं और अन्य विकास कार्यों को आगे बढ़ाया जाना है. इसी आधार पर श्री नेहरू समाजवादी व्यवस्था के अनुरूप एक नए भारत का निर्माण करना चाहते हैं. उनके शब्दों में—”अब समय आ गया है कि हमारे लोग केवल रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करने भर के लिए न जिएँ. हम अपने लोगों का जीवन-स्तर ऊंचा उठाना चाहते हैं. हम असमानताओं को कम करना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि भारत के प्रत्येक व्यक्ति को कमोबेश समान अवसर मिलें.”

इन उद्देश्यों को वे प्रति व्यक्ति प्रतिदिन केवल एक आना खर्च करके और नियोजन के माध्यम से ही देश में समृद्धि लाकर प्राप्त करना चाहते हैं. दुर्भाग्यवश, इतने बड़े सरकारी व्यय के बावजूद आर्थिक विकास उसी अनुपात में नहीं हुआ. इसका मुख्य कारण हमारी राजकोषीय नीति है.

कर नीति के उद्देश्य

हर देश में कर नीति के उद्देश्य एक जैसे नहीं होते. औद्योगिक देशों में कर नीति का मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखना और सुचारु प्रशासन के लिए आवश्यक राजस्व जुटाना होता है. किंतु इन उद्देश्यों को ज्यों-का-त्यों अविकसित देशों पर लागू नहीं किया जा सकता. दुर्भाग्य से हमारे नीति-निर्माताओं ने ऐसी कर-व्यवस्था अपनाई है, जिसे अपनाने का साहस विकसित देश भी नहीं करते. एक पिछड़े देश में कर नीति का मुख्य उद्देश्य पूँजी निर्माण को प्रोत्साहित करना और उसकी दिशा निर्धारित करना होना चाहिए. ऐसी कर-व्यवस्था का आधार उत्पादकता होना चाहिए—अर्थात् वह क्षमता जिससे आर्थिक विकास के लिए आवश्यक उत्पादन बढ़ सके. सरकार को यह भी देखना चाहिए कि उसकी कर नीति का निजी निवेश और निजी पहल पर क्या प्रभाव पड़ता है. साथ ही, करों का बोझ लोगों पर उनकी भुगतान करने की क्षमता के अनुसार न्यायसंगत रूप से वितरित होना चाहिए.

यदि वर्गहीन समाज की स्थापना के नाम पर उच्च आय वर्ग पर अत्यधिक कर लगाए जाएं—जैसा कि आज हमारे देश में हो रहा है—तो पूंजी निर्माण की गति धीमी पड़ जाएगी और सरकार को अप्रत्यक्ष करों पर अधिक निर्भर होना पड़ेगा. खेद की बात है कि हमारी सरकार इस सरल तथ्य को समझने में असफल रही है. उसने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष—दोनों प्रकार के अनेक कर लगाए हैं. परिणामस्वरूप बचत और निवेश की प्रवृत्ति कम हुई है. इसी कारण अपनी अव्यावहारिक योजनाओं को लागू करने के लिए हमें विदेशी ऋणों का सहारा लेना पड़ रहा है. यदि हमारा उद्देश्य वास्तव में देश का तीव्र आर्थिक विकास है, तो प्रत्यक्ष करों में कमी लाना आवश्यक है. उद्योगों पर कराधान पहले ही उस सीमा तक पहुंच चुका है जहां कर की दरें बढ़ाने पर भी राजस्व नहीं बढ़ता, बल्कि घटने लगता है. आज की कर-व्यवस्था असंतुलित है और व्यापार तथा उद्योग पर आवश्यकता से अधिक बोझ डालती है. आर्थिक विकास की कुंजी निजी निवेश को प्रोत्साहन देने में है. तभी अधिकतम बचत संभव होगी और उन्हीं बचतों के आधार पर संतुलित तथा गतिशील विकास कार्यक्रम चलाए जा सकेंगे. वास्तविक निवेश बढ़े बिना पूँजी निर्माण संभव नहीं है.

इस विषय पर लखनऊ में अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर एम. एच. गोपाल ने कहा था—”यदि कर नीति का प्रमुख उद्देश्य पूंजी निर्माण है, यदि बचत और निवेश मुख्यतः निजी क्षेत्र में होने हैं, और यदि बचत की सबसे अधिक क्षमता उच्च आय वर्ग तथा संस्थाओं में है, तो विकास की दृष्टि से यह आवश्यक है कि कर नीति जोखिम उठाकर निवेश करने के निर्णयों को हतोत्साहित न करे. इसलिए कर-राहत मुख्यतः उच्च आय वर्ग और संस्थाओं को मिलनी चाहिए.”

जब तक हमारी वर्तमान राजकोषीय नीति को पूरी तरह तर्कसंगत नहीं बनाया जाता, तब तक आर्थिक विकास की गति न केवल धीमी रहेगी, बल्कि देश आर्थिक संकट की ओर भी बढ़ सकता है. इसलिए यह कहना उचित होगा कि हमारे आर्थिक विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा जनसंख्या वृद्धि नहीं, बल्कि हमारी राजकोषीय नीति है. जनसंख्या वृद्धि तो केवल द्वितीयक कारण है.

योजना और जनता का सहयोग

कोई भी योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उसे जनता का स्वैच्छिक सहयोग प्राप्त न हो. योजना अपने-आप में कोई लक्ष्य नहीं है; वह केवल एक साधन है. हर योजना का अंतिम उद्देश्य जनता का कल्याण होना चाहिए. योजना जनता के लिए होती है, जनता योजना के लिए नहीं. अब तक हमारी सरकार योजनाओं के क्रियान्वयन में जनता का पूरा सहयोग प्राप्त करने में असफल रही है. इसका मुख्य कारण यह है कि योजनाएं जनता के वास्तविक हितों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई हैं. योजनाकार जनता को रोटी के स्थान पर पत्थर थमा देते हैं. जब प्यासे लोगों को समय पर पानी तक उपलब्ध नहीं हो पाता, तब ऐसी योजना का क्या लाभ?

मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था ही एकमात्र समाधान

यदि हम अपने देश में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते हैं, तो हमें अपनी अर्थव्यवस्था का विकास मुक्त बाज़ार व्यवस्था के आधार पर करना होगा. पश्चिम जर्मनी ने बहुत कम समय में जो उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की, वह मुक्त बाज़ार व्यवस्था अपनाने के कारण ही संभव हुई. नियोजन का परिणाम अव्यवस्था और निर्धनता है, जबकि मुक्त बाज़ार व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक विकास में योगदान देने की स्वतंत्रता मिलती है. मुक्त बाज़ार व्यवस्था में उपभोक्ता सर्वोपरि होता है. वही यह तय करता है कि कौन-सी वस्तु का उत्पादन होगा, कितनी मात्रा में होगा और किस गुणवत्ता का होगा. उसका खरीदना या न खरीदना ही अंततः यह निर्धारित करता है कि उद्यमी क्या बनाएंगे. इसी प्रक्रिया से लाभ और हानि का निर्धारण होता है, ब्याज दरें तय होती हैं और लोगों की आय का स्वरूप बनता है. मुक्त बाज़ार व्यवस्था का केंद्र स्वयं बाज़ार है—वह प्रक्रिया जिसके माध्यम से वस्तुओं के मूल्य, मजदूरी की दरें, ब्याज दरें तथा उनसे जुड़े लाभ और हानियां निर्धारित होती हैं. यह व्यवस्था प्रत्येक उत्पादक को उपभोक्ताओं के प्रति उत्तरदायी बनाती है. उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले सभी लोगों के प्रयासों को बाज़ार उन्हीं की इच्छाओं के अनुरूप ढालता है जिनके लिए उत्पादन किया जाता है—अर्थात् उपभोक्ताओं के लिए. इस प्रकार उत्पादन, उपभोग के अधीन रहता है. वास्तव में बाज़ार स्वयं एक लोकतंत्र है. यह मान लेना भ्रम है कि नियोजित समाजवादी व्यवस्था को लोकतांत्रिक शासन-पद्धति के अनुरूप चलाया जा सकता है. लोकतंत्र का गहरा संबंध पूंजीवादी व्यवस्था से है. जहां व्यापक राज्य-नियोजन होता है, वहां लोकतंत्र टिक नहीं सकता. यदि हम अपनी अर्थव्यवस्था का विकास करना चाहते हैं और समृद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, तो राज्य के एकाधिकार के स्थान पर प्रतिस्पर्धा को अपनाना होगा. इस संदर्भ में पश्चिम जर्मनी के डॉ. एल. एरहार्ड ने अपनी पुस्तक “समृद्धि का मार्ग: प्रतिस्पर्धा” (Prosperity Through Competition) में लिखा है—”समृद्धि प्राप्त करने और उसे बनाए रखने का सबसे सफल साधन प्रतिस्पर्धा है.”

वे इस बात पर विशेष बल देते हैं कि प्रत्येक नागरिक को अपनी आर्थिक स्थिति, व्यक्तिगत इच्छाओं और जीवन-मूल्यों के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

नागपुर में पारित प्रस्तावों तथा देश के शीर्ष नेताओं के बार-बार दिए गए बयानों से यह स्पष्ट हो गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र को केवल आकार में ही नहीं, बल्कि महत्त्व में भी निरंतर बढ़ाया जाना है. इन घोषणाओं ने निजी क्षेत्र के लिए अनुकूल वातावरण को नुकसान पहुँचाया है. यह सही है कि भारी उद्योगों की स्थापना में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका हो सकती है. किंतु यहां भी सरकार को निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी की संभावनाओं पर विचार करना चाहिए, क्योंकि इससे बेहतर और अधिक शीघ्र परिणाम प्राप्त हो सकते हैं. यदि सरकार वास्तव में देश का आर्थिक विकास चाहती है, तो उसके सामने सबसे विवेकपूर्ण मार्ग यही है कि वह नियोजन के स्थान पर मुक्त अर्थव्यवस्था को अपनाए. आज जिन समस्याओं का हम सामना कर रहे हैं, उनका समाधान केवल नियोजन से संभव नहीं है. निजी उद्यम वह कार्य अधिक दक्षता और अधिक प्रभावशीलता से कर सकता है, जिसे नियोजन कभी पूरा नहीं कर सकता.

पिछले आठ वर्षों का अनुभव स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि नियोजन ने जनता को समृद्धि से अधिक कठिनाइयां और अभाव दिए हैं.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “राजकोषीय नीति और आर्थिक विकास” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से मार्च 1959 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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